Thursday, March 10, 2022

वो सदी आ गई !

 


यह फरवरी 2022 का पहला हफ्ता था.  रुसी राष्‍ट्रपति ब्‍लादीम‍िर पुत‍िन
, बेलारुस के साथ सैन्‍य अभ्‍यास के बहाने यूक्रेन पर यलग़ार की तैयार‍ियां परख रहे थे. ठीक उसी वक्‍त सुदूर पूर्व के  दक्ष‍िण कोर‍िया में आरसीईपी (रीजनल कंप्रहेसिव कोऑपरेटिव पार्टन‍रशि‍प) प्रभावी हो गई, यानी की द‍ुन‍िया की दसवीं अर्थव्‍यवस्‍था विश्‍व के सबसे बड़े व्‍यापार समूह को लागू कर चुकी थी. 2022 की शुरुआत में महामारी का मारा यूरोप खून खच्‍चर और महंगाई के  डर से अधमरा हुआ जा रहा था तब   एश‍िया की नई तस्‍वीर फलक पर उभरने लगी थी.

कोरोना वायरस के नए संस्‍करण ऑम‍िक्रॉन के हल्‍ले के बावजूद, चीन की अगुआई वाली इस व्‍यापार संध‍ि का उद्घाटन इतना तेज तर्रार रहा कि  अमेरिकी राष्‍ट्रपत‍ि जो बाइडेन को कहना पड़ा कि वह भी एक नए व्‍यापार गठजोड़ की कोशि‍श शुरु कर रहे हैं. पिछले अमेरिकी मुखि‍या डोनल्‍ड ट्रंप ने  टीपीपी यानी ट्रांस पैस‍िफि‍क पार्टनरशि‍प के प्रयासों को कचरे के डब्‍बे में फेंक दिया था जो आरसीईपी के लिए चुनौती बन सकती थी.

याद रहे क‍ि इसी भारत इसी आरसीईपी  से बाहर निकल आया था . यह दोनों बड़ी अर्थव्‍यवस्‍थायें इस समझौते का हिस्‍सा नहीं हैं. चाहे न चाहे लेकि‍न चीन इस कारवां सबसे अगले रथ पर सवार हो गया है .

आरसईपी के आंकड़ों की रोशनी में एश‍िया एक नया परिभाषा के साथ उभर आया है आस‍ियान के दस देश (ब्रुनेई, कंबोड‍िया, इंडोनेश‍िया, थाईलैंड, लाओस, मलेश‍िया, म्‍यान्‍मार, फिलीपींस, सिंगापुर, वियतनाम) इसका हिस्‍सा हैं जबकि आस्‍ट्रेल‍िया, चीन, जापान, न्‍यूजीलैंड और दक्ष‍िण कोर‍िया इसके एफटीए पार्टनर हैं. यह चीन का पहला बहुतक्षीय व्‍यापार समझौता है.

दुनिया की करीब 30 फीसदी आबादी, 30 फीसदी जीडीपी और 28 फीसदी व्‍यापार इस समझौते के प्रभाव क्षेत्र में है.  विश्‍व व्‍यापार में हिस्‍सेदारी के पैमाने  इसके करीब पहुंचने वाले व्‍यापार समझौते में अमेरिका कनाडा मैक्‍स‍िको (28%) और यूरोपीय समुदाय (17.9%) हैं

आरसीईपी के 15 सदस्‍य देशों ने अंतर समूह व्‍यापार के लिए 90 फीसदी उत्‍पादों पर सीमा शुल्‍क शून्‍य कर दि‍या है..यानी  कोई कस्‍टम ड्यूटी नहीं. संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के व्‍यापार संगठन अंकटाड ने बताया है कि इस समझौते से 2030 तक आरसीईपी क्षेत्र में निर्यात में करीब 42 अरब डॉलर की बढ़ोत्‍तरी होगी. यह समझौता अगले आठ वर्ष में ग्‍लोबल अर्थव्‍यवस्‍था में 200 अरब डॉलर का सालाना योगदान करने लगेगा. क्‍या यूरोप यह सुन पा रहा है कि बकौल अंकटाड,  अपने आकार और व्‍यापार वैव‍िध्‍य के कारण आरसीईपी  दुन‍िया में व्‍यापार का नया केंद्र होने वाला है. 

आप इसे चीन की दबंगई कहें, अमेरिका की जिद या  भारत का  स्‍वनिर्मित भ्रम लेकिन आरसीईपी और एशि‍या की सदी का उदय एक साथ हो रहा है. वही सदी जिसका जिक्र हम दशकों से नेताओं भाषणों में सुनते आए हैं.  एश‍िया की वह सदी यकीनन अब आ पहुंची है  

यह है नया एश‍िया

एश‍िया की आर्थिक ताकत बढ़ने की गणना 2010 से शुरु हो गई थी, गरीबी पिछड़पेन और आय व‍िि‍वधता के बावजूद एश‍िया ने यूरोप और अमेरिका की जगह दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था में केंद्रीय स्‍थान लेना शुरु कर दिया था. महामारी के बाद जो आंकडे आए हैं, दुन‍िया की आर्थ‍िक धुरी बदलने की तरफ इशारा करते हैं.

कोविड के इस तूफान का सबसे मजबूती से सामना एश‍ियाई अर्थव्‍यवस्‍थाओं ने कि‍या. आईएमफ का आकलन बताता है कि महामारी के दौरान 2020 में दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍थायें करीब 3.2 फीसदी सि‍कुड़ी लेक‍िन एशि‍या की ढलान  केवल 1.5 फीसदी थी. एश‍ियाई अर्थव्‍यवस्‍थाओं की वापसी भी तेज थी जुलाई में 2021 में आईएमएफ ने बताया क‍ि 2021 में  एश‍िया  7.5 फीसदी की दर से और 2022 में 6.4 फीसदी की दर से विकास कर करेगा जबकि‍ दुनिया की विकास दर 6 और 4.9 फीसदी रहेगी.

2020 में महामारी के दौरान दुनिया का व्‍यापार 5 फीसदी सिकुड़ गया लेक‍िन ग्‍लोबल व्‍यापार में एश‍िया का हिस्‍सा 60 फीसदी पर कायम रहा यानी नुकसान यूरोप अमेरिका को ज्‍यादा हुआ. 

2021 में आस‍ियान  चीन का सबसे बड़ा कारोबारी भागीदार बन गया है. इस भागीदारी की ताकत  2019 में मेकेंजी की एक रिपोर्ट से समझी जा सकती  है. एश‍िया का 60 फीसदी व्‍यापार  और 59 फीसदी विदेशी निवेश अंतरक्षेत्रीय  है. चीन से कंपन‍ियों के पलायन के दावों की गर्द अब बैठ चुकी है. 2021 में यूरोपीय  और अमेरिकी चैम्‍बर ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 80-90 फीसदी कंपन‍ियां चीन छोड़ कर नहीं जाना चाहती. आरसीईपी ने इस पलायन का अध्‍याय बंद कर दिया है क्‍यों कि अध‍िकांश बाजार शुल्‍क मुक्‍त या डयूटी फ्री हो गए  हैं. इन कंपनियों  ज्‍यादातर उत्‍पादन अंतरक्षेत्रीय बाजार में बिकता  है

बात पुरानी है

एशिया की यह नई ताकत एक दशक पहले बनना शुरु हुई थी. मेकेंजी सह‍ित कई अलग अलग सर्वे  2018 में ही बता चुके थे  कि ग्‍लोबल टेक्‍नोलॉजी व्‍यापार के पैमानेां पर  एश‍िया  सबसे तेज दौड़ रहा है.  टेक्‍नोलॉजी राजस्‍व की अंतरराष्‍ट्रीय विकास दर में 52 फीसदी, स्‍टार्ट अफ फंड‍िंग में 43 फीसदी, शोध विकास फंड‍िंग में 51 फीसदी और पेटेंट में 87 फीसदी ह‍िस्‍सा अब एश‍िया का है.

ब्‍लूमबर्ग इन्‍नोवेशन इंडेक्‍स 2021  के तहत कोरिया दुनिया के 60 सबसे इन्‍नोवेटिव देशों की सूची में पहले स्‍थान पर है. अमेरिका शीर्ष दस से बाहर हो गया है. यही वजह है कि   महामारी के बाद न्‍यू इकोनॉमी में एश‍िया के दांव बड़े हो रहे हैं. शोध और विज्ञान का पुराना गुरु जापान जाग रहा है. मार्च 2022 तक जापान में एक विशाल यून‍िवर्स‍िटी इनडाउमेंट फंड काम करने लगेगा  जो करीब 90 अरब डॉलर की शोध पर‍ियोजनाओं को वित्‍तीय मदद देगा. चीन में अब शोध व विकास की क्षमतायें विश्‍व स्‍तर पर पहुंचने के आकलन लगातार आ रहे हैं.

अलबत्‍ता एश‍िया की सदी का सबसे कीमती  आंकड़ा यहां है. अगले एक दशक दुनिया की आधी खपत मांग एश‍िया के उपभोक्‍ताओं से आएगी. मेंकेंजी सहित कई संस्‍थाओं के अध्‍ययन बताते हैं क‍ि यह उपभोक्‍ता बाजार कंपनियों के लिए करीब 10 अरब डॉलर का अवसर है.  क्‍यों क‍ि 2030 तक एश‍िया की करीब 70 फीसदी आबादी उपभोक्‍ता समूह का हिस्‍सा होगी यानी कि वे 11 डॉलर ( 900 रुपये) प्रति द‍िन खर्च कर रहे होंगे. सन 2000 यह प्रतिशित 15 पर था. अगले एक दशक में 80 फीसदी मांग मध्‍यम व उच्‍च आय वर्ग की खपत से निकलेगी. 2030 तक करी 40 फीसदी मांग ड‍िजटिल नैटिव तैयार करेंगे.

दुनिया की कंपनियां इस बदलाव को करीब से पढ़ती रही हैं . कोवडि  से पहले एक दशक में प्रति दो डॉलर के नए विश्‍व निवेश में एक डॉलर एश‍िया में गया था और प्रत्‍येक तीन डॉलर में से एक चीन में लगाया गया. 2020 में दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में  एशि‍या से आए राजस्‍व का हि‍स्‍सा करीब 43 फीसदी था अलबत्‍ता इस मुकाल पर  एश‍िया का सबसे बड़ी कमजोरी भी उभर आती है

सबसे बड़ी दरार  

एश‍िया की कंपन‍ियों के मुनाफे पश्‍च‍ित की कंपनी से  कम हैं. 2005 से 2017 के बीच दुन‍िया में कारपोरेट घाटों में एश‍िया की कंपनियों का हिस्‍सा सबसे बड़ा था. यही हाल संकट में फंसी कंपनियों के सूचकांकों का है एश‍िया की करीब 24 फीसदी कंपन‍ियां ग्‍लोबल कंपन‍ियों के इकनॉमिक प्रॉफि‍ट सूचकांक में सबसे नीचे हैं. शीर्ष में केवल 14 फीसदी कंपन‍ियां एश‍िया से आती हैं. एश‍िया के पास एप्‍पल, जीएम, बॉश, गूगल, यूनीलीवर, नेस्‍ले, फाइजर जैसे चैम्‍पियन नहीं हैं.

शायद यही वजह थी  एश‍िया के मुल्‍कों की कंपन‍ियों ने सरकारों की ह‍िम्मत बढ़ाई और वे आरसीईपी के जहाज पर सवार  हो गए.  अगली सदी अगर एश‍िया की है तो कंपन‍ियों को इसकी अगुआई करनी है. मुक्‍त  व्‍यापार की विटामिन से लागत घटेगी, बाजार बढ़ेगा और शायद अगले एक दशक में एश‍िया में पास भी ग्‍लोबल चैम्‍प‍ियन होंगे.

आपसी रिश्‍ते तय और अपने लोगों के भव‍िष्‍य को सुरक्ष‍ित के करने के मामलों में यूरोप के सनकी और दंभ भरे नेताओं की तुलना में में एश‍िया के छोटे देशों ने ज्‍यादा समझदारी दि‍खाई है यही वजह है कि आरसीईपी के तहत  चीन जापान व कोरिया एक साथ आए हैं यह इन तीनों प्रत‍िस्‍पि‍र्ध‍ियों का यह पहला कूटनीतिक, व्‍यापार‍िक गठजोड़ है. यूरोप जब जंग के मैदान से लौटेगा तब उसे मंदी के अंधेरे को दूर करने के लिए बाजार की  एश‍िया से रोशनी मांगनी  पड़ेगी.

भारतीय राजनीति दक‍ियानूसी बहसों का नशा किये हुए है जबकि  इस नई उड़ान की पायलट की सीट चीन ने संभाल ली है. भारत के नेताओं को पता चले क‍ि, वह एश‍िया की जिस सदी के नेतृत्‍व का गाल बजाते रहते हैं. वह सदी  शुरु होती है अब ...  

Sunday, February 20, 2022

न्‍यूु इकोनॉमी का सबसे बड़ा उलट फेर


एपल ने अपने नए मोबाइल ऑपरेट‍िंग सिस्‍टम यानी आईओएस 14 में मोबाइल धारकों को जरा सी आजादी क्‍या दी कि फेसबुक को एक साल में 10 अरब डॉलर की चपत लग गई यानी एक बायजूस या स्‍विगी की कीमत  के बराबर की रकम मेटा (फेसबुक) को गंवानी पड़ी. फेसबुक को इतिहास में पहली बार यूजर्स संख्‍या में गिरावट झेलनी पड़ी. शेयर बाजार उसकी गिरावट का इतिहास बन गया. फेसबुक के औंधे मुंह गिरने से न‍िवेशकों ने ट्व‍िटर और पिनटरेस्‍ट जैसी सोशल मीडिया कंपन‍ियों को भी कूट डाला.

एपल ने सिर्फ इतना किया अपने नए ऑपरेट‍िंग सिस्‍टम में एक सुव‍िधा दे दी, जिसे एप ट्रै‍क‍िंग ट्रांसपेरेंसी कहा जाता है. इसके जर‍िये आप अपने फोन की प्राइवेसी मजबूत कर सकते हैं यानी कि किसी एप्‍लीकेशन को अपना ड‍ि‍जिटल व्‍यवहार जानने और उसकी सूचना बेचने से रोक सकते हैं. मतलब यह कि अगर आपने इंटरनेट पर होटल की तलाश की है तो अब यह आपके हाथ में है कि आप अपनी टाइम लाइन पर होटलों के विज्ञापन बरसात चाहते हैं या नहीं.

वैसे सनद रहे कि मोबाइल पर डि‍जटिल व्‍यवहारों का डाटा जुटाने कके लिए फेसबुक जैसे आइडेंट‍िफायर फॉर एडवरटाइजर्स (आईडीएफ) नाम के  जिस टूल का इस्‍तेमाल करते हैं , एपल ही उसे 2012 में लेकर आई थी. इसके जर‍िये सीधे उपयोगकर्ता को विज्ञापन द‍िखाया जाता है जिसे टारगेटेड एडवरटाइजिंग कहते हैं. रिपोर्ट बताती हैं कि ज़करबर्ग की कंपनी की 90 फीसदी राजस्व इसी तरह से आता है 

तो फिर एसा क्‍या हुआ कि एपल को लोगों की न‍िजता बचाने का विकल्‍प देना पड़ा, जिससे  फेसबुक सहित पूरे सूचना आधा‍र‍ित बाजार की चूलें हिल गईं.

बात शुरु होती है कोविड के साल यानी 2020 से.

महामारी की मार से जब दुन‍िया अचानक बेतहाशा डिजिटल हो रही थी उस समय यूरोपीय समुदाय से एक बड़ा यूं कहें बहुत बड़ा झटका आया जिसने सूचना तकनीक और निजी सूचनाओं के कारोबार को लेकर पूरे पर‍िदृश्‍य को उलट पुलट द‍िया. कोर्ट ऑफ जस्टिस ऑफ द यूरोप‍ियन यून‍ियन के एक आदेश जारी किया. यह मामला डाटा प्रोटेक्‍शन कम‍िश्‍नर बनाम फेसबुक आयरलैंड और मैक्‍समिलन स्‍क्रेम्‍स का था. अदालत ने आदेश दि‍या क‍ि यूरोप की डाटा प्रोटेक्‍शन अथॉर‍िटी यूरोपीय समुदाय के न‍िवास‍ियों की निजी  सूचनाओं या डाटा के अमेरकिा को हस्‍तांतरण की व्‍यवस्‍था की पड़ताल करेंगे.

गौरतलब है कि फेसबुक,अमेजन,एपल,ट्व‍िटर जैसी कंपन‍ियों के लिए अमेरिका के बाद यूरोप सबसे बड़ा बाजार है. यूरोप व अमेरिका के बीच लोगों के निजी डाटा का हस्‍तांतरण काफी बड़ा है. दोनो भूगोलों के बीच प्राइवेसी के नियम अलग अलग हैं. इस आदेश के पहले तक अमेर‍िकी कंपन‍ियां एक प्राइवेसी शील्‍ड या सेफ हार्बर अरेंजमेंट के जरिये खुद प्रमाण‍ित करती थी और सूचनाओं का संग्रह कर लेती थीं. यूरोपीय अदालत के आदेश के बाद यह प्रक्रिया अवैध हो गई. 

अदालती फरमान के बाद के यूरोप‍ के डाटा प्रोटेक्‍शन बोर्ड का डंडा चलने लगा. यूरोप के जनरल डाटा प्रोटेक्‍शन रेगुलेशन (जीडीपीडीआर) के तहत नए नियम जारी हो गए. जिनके उल्‍लंघन का मतलब था कि कंपनी पर भारी जुर्माना जो उसके ग्‍लोबल रेवेन्‍यू का चार फीसदी तक हो सकता है. इस आदेश के बाद दुनिया के प्रमुख सोशल नेटवर्क, ई कॉमर्स कंपन‍ियों को को अब सूचनायें जुटाने, कारोबार‍ियों से बांटने और हस्‍तांतर‍ित करने की पूरी व्‍यवस्‍था  बदलनी पड़ी है. मेकेंजी के एक तारी रिपोर्ट मानती है कि

-    यह फैसला डेटा प्राइवेसी का पूरा परि‍दृश्‍य बदल रहा है

-    यह घटनाक्रम अंतरराष्‍ट्रीय डाटा ट्रांसफर के लिए एक तरह से नज़ीर बन गया क्‍यों कि इसमें अपने लोगों की सूचनाओं पर वहां की सरकारों का अध‍िकार  प्रमाण‍ित हो गया है. अभी तक कंपन‍ियां सूचनाओं का अपने तरह से कारोबारी इस्‍तेमाल करती थीं

-    इस आदेश के बाद रुस चीन,अमीरात और एश‍िया के देशों के साथ डाटा ट्रांसफर के नि‍यम भी बदलेंगे और यह देश डाटा लोकलाइजेशन के सख्‍त नियम बना सकेंगे जिसमें गूगल, फेसबुक, अमेजन जैसी कंपन‍ियों के सर्वर स्‍थानीय स्‍तर पर लगाने होंगे

-    यह कदम इन कंपनियों के ऊपर टैक्‍स का रास्‍ता भी खोलेगा जिस पर ग्‍लोबल बहस जारी है. जी20 और ओईसीडी की अगुआई में बहुराष्‍ट्रीय कंपन‍ियों पर प्रत्‍येक देश में एक न्‍यूनतम टैक्‍स का प्रस्‍ताव लागू होने वाला है.

-    यूरोपीय समुदाय ही नहीं कैलीफोर्न‍िया एक्‍ट ऑफ कस्‍टमर प्राइवेसी और अमेरिका कई राज्‍यों में डाटा प्राइवेसी को लेकर खासी सख्‍ती शुरु हो गई है.  

अब वापस लौटते हैं फेसबुक पर जिसकी मुसीबत इस कानूनी बदलाव के साथ शुरु हुई. फेसबुक ही क्‍यों गूगल, अमेजन, एपल यानी वे सभी जो लोगों की सूचनाओं को बाजार तक ले जाकर मोटी कमाई कर रहे थे उनके बिजनेस मॉडल लड़खड़ाने लगे हैं

केवल एपल अपना ऑपरेट‍िंग सिस्‍टम बदला बल्कि जनवरी 2020 में गूगल एलान किया क‍िया कि वह अगले दो साल मं क्रोम पर थर्ड पार्टी कुकीज पूरी तरह खत्‍म कर देगा.एपल इसका एलान पहले ही कर चुका है. क्रोम तीसरा ब्राउजर होगा जो थर्ड पार्टी कुकीज बंद करने जा रहा है यानी ब्राउजर बाजार के 85 फीसदी हिस्‍से में कुकीज का धंधा बंद हो जाएगा. सनद रहे कि इंटरनेट उपभोक्‍ताओं को बेहतर और लक्षि‍त सूचनायें व कंटेट देने के लिए  कुकीज का जन्‍म 1994 में हुआ था अब इसका अवसान करीब है.

यूरोप अमेरिका और अन्‍य देशों में चार तरह के बड़े बदलाव आ रहे हैं

-    पहला  अमेर‍िका में अमेजन, गूगल, फेसबुक आदि के बाजार एकाध‍िकार पर निर्णायक कार्रवाई शुरु हो गइ है.

-    दूसरा- यूरोपीय जीडीपीडीआर उपभोक्‍ताओं को राइट टू बी फॉरगॉटेन दे रहा है यानी उसकी सूचना सिस्‍टम में नहीं रहनी चाहिए

-    तीसरा- सूचना तकनीक कंपन‍ियों को इस बात के लिए बाध्‍य किया जा रहा है वह उपभोक्‍ताओं को इस बात का अध‍िकार दें कि उन्‍हें ट्रैक किया जा या नहीं

 

भारत जब फिनटेक भविष्‍य की क्रांति बनाने का मृदंग बजा रहा है, वहां मोबाइल से लेकर अस्‍पताल तक डाटा चोरी के प्रतिष्‍ठान चल रहे हैं.  डाटा प्रोटेक्‍शन के कानून पर पूरी तरह मौन है, भारत को कब यह समझ में आएगा कि हमारी निजतायें भी उतनी ही कीमती हैं जितनी की यूरोपीय और अमेरिकि‍यों की

बहरहाल न्‍यू इकोनॉमी दुनिया बदल रही है. टारगेटेड विज्ञापन जो डाटा मार्केटिंग की बुनियाद है अब वही डगमगा गई है. मेकेंजी का मानना है कि  कुकीज और  आइडेंट‍िफायर फॉर एडवरटाइजर्स (आईडीएफ) के बंद होने के बाद, इस सेवाओं का इस्‍तेमाल करने वाली कंपनियों को मार्केट‍िंग पर 10 से 20 फीसदी ज्‍यादा खर्च करना होगा.

फेसबुक या अमेजन जैसी कंपन‍ियों के लिए वक्‍त मुश्‍क‍िल हो रहा है. डिज‍टिल अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा तो हमारे खाने-पीनेपहनने-ओढ़नेखरीदने-बेचनेतलाशने-मिटानेसुनने कहने की खरबों की सूचनाओं पर केंद्रित है.

इन्हीं को बेचकर तो अमेजनगूगलजोमाटोपेटीएमफेसबुक हमें उस लोक में ले जाते हैं जहां 

सेवा तो मुफ्त है लेकिन हम बेचे जा रहे हैं.

लेक‍िन अगर निजता के आग्रह मजबूत होते गए तो इंटरनेट पर मुफ्त सेवाओं का एक पूरा संसार बदल नहीं जाएगा जिसकी आदत हमें पड़ चुकी है. न्‍यू इकोनॉमी के इस नए बदलाव की आहट हमें फेसबुक के राजस्‍व में गिरावट से मिल चुकी है

क्‍या अब गूगल, इस्‍टा, अमेजन, फेसबुक की सेवाओं का मुफ्त युग खत्‍म होने के करीब है..

उलटी गिनती शुरु हो रही है



Sunday, February 13, 2022

क्‍या सुलग रहा है बजट के भीतर

 


ढोल बजाने वाले तैयार खड़े थे, एक और महान बजट का मंच सज चुका था. उम्‍मीदों की सवारी करने का मौका भी था और चुनावों के वक्‍त दिलफेंक होने का दस्‍तूर भी .. लेक‍िन बजट सब कुछ छोड़कर बैरागी हो गया. विरक्‍त बजट ही तो था यह .. बस काम चालू आहे वाला बजट ..

बजट बड़े मौके होते हैं कुछ कर दिखाने का  लेक‍िन इस बार माज़रा कुछ और ही था.  

बेखुदी बेसबब नहीं गालिब

कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है

 

हम बताते हैं क‍ि आखिर बीते एक दो बरस में भारतीय बजट के साथ हुआ क्‍या है जिसके कारण सब बुझा बुझा सा है.

बात  बीते साल  की यानी अक्‍टूबर 2021 की है. भारत में बजट की तैयार‍ियां शुरु हो चुकी थीं. आम लोगों में कोविड के नए संस्‍करण को लेकर कयास जारी थे इसी दौरान आईएमएफ की एक रिपोर्ट ने भारत पर नजर रखने वालों के होश उड़ा दिये. हालांक‍ि दिल्‍ली के नॉर्थ ब्‍लॉक यानी वित्‍त मंत्रालय में अफसरों को यह सच पता था लेक‍िन उन्‍होंने बात अंदर ही रखी.

भारत ने एक खतरनाक इतिहास बना द‍िया था. कोविड की मेहरबानी और बजट प्रबंधन की कारस्‍तानी कि भारत एक बड़े ही नामुराद क्‍लब का हिस्‍सा बन गया था. भारत में कुल सार्वजनिक कर्ज यानी पब्‍ल‍िक डेट (केंद्र व सरकारों और सरकारी कंपन‍ियों का कर्ज) जीडीपी के बराबर पहुंच रहा था यानी जीडीपी के अनुपात में 100 फीसदी !

ठीक पढ़ रहे हैं भारत का कुल सार्वजन‍िक कर्ज भारत के कुल आर्थिक उत्‍पादन के मूल्‍य के बराबर पहुंच रहा है. यह खतरे का वह आख‍िरी मुकाम है जहां सारे सायरन एक साथ बज उठते हैं. ..

बजे भी क्‍यों न , दुनिया करीब 20 मुल्‍क इस अशुभ सूची का हिस्‍सा हैं. जिनका कुल सार्वजनिक कर्ज उनके जीडीपी का शत प्रत‍ि‍शत या इससे ज्‍यादा है. इनमें वेनेजुएला, इटली, पुर्तगाल, ग्रीस जैसी बीमार अर्थव्‍यवस्‍थायें या मोजाम्‍बि‍क, भूटान, सूडान जैसे छोटे मुल्‍क हैं. इसमें अमेरिका और जापान भी हैं लेकिन जापान तो पहले गहरी मंदी में है और अमेरिका के कर्ज मामला जरा पेचीदा है क्‍यों क‍ि उसकी मुद्रा दुनिया की केंद्रीय करेंसी है और निवेश का माध्‍यम है.

15 अक्‍टूबर को आईएमएफ ने अपनी स्‍टाफ रिपोर्ट (देशों की समीक्षा रिपोर्ट) में ल‍िखा क‍ि भारत का कुल पब्‍ल‍िक डेट जीडीपी के बराबर पहुंच रहा है. यह खतरनाक स्‍तर है. यह अभी ऊंचे स्‍तर पर ही रहेगा: विश्‍व बैंक और आईएमएफ के पैमानों पर किसी देश का पब्‍ल‍िक डेट का अध‍िकतम स्‍तर जीडीपी का 60 फीसदी होना चाहिए. इससे ऊपर जाने के अपार खतरे हैं. 

इस आईएमएफ को इस हालत की सूचना यकीनन सरकार से ही मिली होगी क्‍यों कि अनुबंधों के तहत सरकारें अंतरराष्‍ट्रीय वित्‍तीय संस्‍थाओं के साथ अपनी सूचनायें साझा करती हैं अलबत्‍ता देश को इसकी सूचना कुछ अनमने ढंग से ताजा आर्थ‍िक समीक्षा ने दी जो सरकारी टकसाल का कीमती दस्‍तावेज  है और बजट के ल‍िए जमीन तैयार करता है. 

इस दस्‍तावेज ने बहुत ही चौंकाने वाला आंकड़ा बताया. भारत  के सार्वजन‍िक कर्ज और जीडीपी अनुपात 2016 के बाद से बिगड़ना शुरु हुआ था जब जीडीपी टूटने और कर्ज बढ़ने का सिलस‍ि‍ला शुरु हुआ. 2016 में यह जीडीपी के अनुपात में 45 फीसदी था जो 2020-21 में 60 फीसदी पर पहुंच गया.

सार्वजनिक कर्ज का दूसरा हिस्‍सा राज्‍यों सरकारों के खाते हैं. आर्थि‍क समीक्षा के अनुसार 2016 में यह कर्ज जीडीपी के अनुपात में 25 फीसदी पर था जो अब 31 फीसदी है. यानी कि केंद्र और राज्‍यों का कर्ज मिला कर जीडीपी के अनुपात में 90 फीसदी हो चुका है. भारत में सरकारी कंपन‍ियां भी बाजार से खूब कर्ज लेती हैं, उसे मिलाने पर पब्‍ल‍िक डेट जीडीपी के बराबर हो चुका है.

भारत में सरकारें  कर्ज छिपाने और घाटा कम दिखने के लिए कर्ज छ‍िपा लेती हैं. बजट से बाहर कर्ज लिये जाते हैं जिन्‍हें ऑफ बजट बारोइंग कहा जाता है. जैसे क‍ि 2020-21 में केंद्र सरकार ने भारतीय खाद्य निगम को खाद्य सब्‍स‍िडी के भुगतान का आधा भुगतान लघु बचत न‍िध‍ि  से कर्ज के जर‍िये किया. यह सरकार के कुल कर्ज में शामिल नहीं था.

आईएमएफ के खतरे वाले सायरन को  इस बजट से उठने वाले स्‍वरों ने और तेज किया है. सरकार अच्‍छे राजस्‍व के बावजूद वित्‍त वर्ष 2022-23 में उतना ही कर्ज (12 लाख करोड़) लेगी जो कोविड की पहली लहर और लंबे लॉकडाउन के दौरान ल‍िए गए कर्ज के बराबर है. अब नया कर्ज महंगी ब्‍याज दरों पर होगा क्‍यों कि ब्‍याज दरें बढ़ने का दौर शुरु होने वाला है.

अच्‍छे राजस्‍व के बावजूद  इतना कर्ज क्‍यों ? वजह जानन के लिए  सार्वजनिक कर्ज के आंकड़ों के भीतर एक डुबकी और मारना जरुरी है जहां से हमें कुछ और आवश्‍यक सूचनायें मिलेंगी. आर्थ‍िक समीक्षा बताती है कि केंद्र सरकार का करीब 70 फीसदी कर्ज लंबी नहीं बल्‍क‍ि छोटी अवधि यानी 10 साल तक का है. यानी कि सरकारें बेहद सीमि‍त हिसाब किताब के साथ कर्ज ले रही हैं. वजह यह कि लंबी अवध‍ि का कर्ज लेने पर ब्‍याज का बोझ लंबा चलेगा, जिसे उठाने की कुव्‍वत नहीं है.

कर्ज को लेकर सबसे  बड़ी चुनौती अगले वित्‍त वर्ष से शुरु होगी. वित्‍त मंत्रालय की ति‍माही कर्ज रिपोर्ट बताती है कि अगले साल 2023 में करीब 4.21 लाख करोड़ का कर्ज चुकाने के लिए सर पर खड़ा होगा. यानी ट्रेजरी बिल मेच्‍योर हो जाएंगे. इन्‍हें चुकाने के लिए नकदी की जरुरत है. सनद रहे कि यह भारी देनदारी केवल एक साल की चुनौती नहीं है. 2023 से 2028 के बीच, सामान्‍य औसत से करीब चार गुना कर्ज चुकाने के लिए सर पर खड़ा होगा.

वह चाहे सरकार ही क्‍यों न हो पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेने की एक सीमा  है. नए कर्ज से नया ब्‍याज भी सर पर आता है. इसके लिए सरकार को और ज्‍यादा कमाई की जरुरत होगी यानी सरकार का कर्ज आपका मर्ज है और इसके लिए उसे आगे नई रियायतें नहीं बांटनी हैं बल्‍क‍ि नए टैक्‍स लगाने होंगे.

सरकार अब हर संभव कोश‍िश करेगी. कि खर्च सीम‍ित रहे  और टैक्‍स बढ़े. भारतीय कर्ज का यह भयावह आंकड़ा देश की संप्रभु साख पर भारी है. जिसका असर रुपये की कीमत पर नजर आएगा. यही वह दुष्‍चक्र है जो भारी कर्ज के साथ शुरु होता है

अब समझे आप बजट की बेखुदी का सबब या वित्‍त मंत्री के उस दो टूक बयान का मतलब कि शुक्र मनाइये नए टैक्‍स नहीं लगे.

भारत का बजट प्रबंधन पहले भी कोई शानदार नमूना नहीं था, दरारें खुलीं थीं, प्‍लास्‍टर झर रहा था, इस बीच कोविड का भूकंप आ गया और पूरी इमारत ही लड़खड़ा गई

भारत में राजकोषीय सुधारों की बात करना अब फैशन से बाहर है. सरकार अपनी तरह से बजट प्रबंधन की परिभाषा गढ़ती है. वह राजनीत‍िक सुव‍िधा के अनुसार राजकोषीय अनुशासन के बल‍िदान का एलान करती है. जैसे कि सरकार अपना एकमात्र राजकोषीय अनुशासन यानी फिस्‍कलन रिस्‍पांसबिलिटी और बजट मैनेजमेंट एक्‍ट ही ताक पर रख दिया है जब बात तो इसे और सख्ती से लागू करने की थी.

भारत सार्वजनिक कर्ज बेहद खतरनाक मुकाम पर है. इस कर्ज में बैंक,जमाकर्ता और टैक्‍स पेयर सब फंसे हैं. एसे अंबेडकर में याद आते हैं जिन्‍होंने अगस्‍त 1949 में संविधान सभा की बहस (अनुच्‍छेद 292 जो पहले 268 था) कहा था कि सरकार को मनचाहा कर्ज उठाने का अध‍िकार नहीं मिलना चाहिए. संसद इसे बेहद गंभीरता से लेना चाहिए और कानून न बनाकर सरकार के कर्ज की सीमा तय करनी चाहिए.

काश क‍ि संसद सुन लेती ..................


Monday, February 7, 2022

क्‍या से क्‍या हो गया !

 




महंगाई का आंकड़ा चाहे जो कलाबाजी दिखाये लेकिन क्‍या आपने ध्‍यान दिया है कि बीते छह सात सालों से इलेक्‍ट्रानिक्‍स, बिजली के सामान,आटो पुर्जों और भी कई तरह जरुरी चीजें लगातार महंगी होती जा रही हैं.

यह महंगाई पूरी तरह  प्रायोज‍ित है और नीतिगत है. भारत की सरकार जिद के साथ महंगाई का आयात कर रही है यानी इंपोर्टेड महंगाई हमें बुरी तरह कुचल रही है. आने वाले बजट में एक बार फिर कई चीजों पर कस्‍टम ड्यूटी बढाये जाने के संकेत हैं. इनमें स्‍टील और इलेक्‍ट्रानिक्‍स यानी पूरी की पूरी सप्‍लाई चेन महंगी हो सकती है.

यह चाबुक हम पर क्‍यों चल रहा है ,बजट से पहले इसे समझना बहुत जरुरी है.

नई  पहचान

भारत की यह नई पहचान परेशान करने वाली है.  भारत को व्‍यापार‍िक दरवाजे बंद करने वाले, आयात शुल्‍क बढ़ाने वाले और संरंक्षणवादी देश के तौर पर संबोध‍ित कि‍या जा रहा है. देशी उद्योगों के संरंक्षण के नाम पर भारत की सरकार ने 2014 से कस्‍टम ड्यूटी बढ़ाने का अभि‍यान शुरु कर दिया था. इस कवायद से कितनी आत्‍मनिर्भरता आई इसका कोई हिसाब सरकार ने नहीं दिया अलबत्‍ता भारत सरकार की इस  कच्‍छप मुद्रा, छोटे  उद्येागों का कमर तोड़ दी और अब उपभोक्‍ताओं का जीना मुहाल कर रही है

2022 के बजट दस्‍तावेज के मुताबिक एनडीए सरकार ने बीते छह बरस में भारत के करीब एक तिहाई आयातों यानी टैरिफ लाइन्‍स पर बेसिक कस्‍टम ड्यूटी बढ़ाई . यानी करीब 4000 टैरिफ लाइंस पर सीमा शुल्‍क बढ़ा या उन्‍हें महंगा किया गया. टैरिफ लाइन का मतलब वह सीमा शुल्‍क दर जो किसी एक या अध‍िक सामानों पर लागू होती है.

इस बढ़ोत्‍तरी का नतीजा था कि उन देशों से आयात बढ़ने लगा जिनके साथ भारत का मुक्‍त व्‍यापार समझौता है या फिर व्‍यापार वरीयता की संध‍ियां है. सरकार ने और सख्‍ती की ताकि संध‍ि वाले इन देशों के रास्‍ते अन्‍य देशों का सामान  न आने लगे. करीब 80 सामानों पर कस्‍टम ड्यूटी रियायत खत्‍म की गई और 400 से अध‍िक अन्‍य सीमा शुल्‍क प्रोत्‍साहन रद कर दिये गए.

डब्लूटीओ की रिपोर्ट के अनुसार 2019 तक भारत में औसत सीमा शुल्‍क या कस्‍टम ड्यूटी दर 17.6 फीसदी हो गई थी जो कि 2014 में 13.5 फीसदी थी. जब ट्रेड वेटेड एवरेज सीमा शुल्‍क जो 2014 में केवल 7 फीसदी था वह 2018 में बढ़कर 10.3 फीसदी हो गया. ट्रेड वेटेड औसत सीमा शुल्‍क की गणना के ल‍िए क‍िसी देश के कुल सीमा शुल्‍क राजस्‍व से उसके कुल आयात से घटा दिया जाता है.

भारत के महंगा आयात अभ‍ियान का पूरा असर समझने के लिए कुछ और भीतरी उतरना होगा. डब्‍लूटीओ के तहत सीमा शुल्‍क दरों के दो बड़े वर्ग हैं एक है एमएफएन टैरिफ यानी वह रियायती दर जो डब्लूटीओ के सदस्‍य देश एक दूसरे से व्‍यापार पर लागू करते हैं. यही बुनियादी डब्‍लूटीओ समझौता था. दूसरी दर है बाउंड टैरिफ जिसमें किसी देश अपने आयातों को अध‍िकतम आयात शुल्‍क लगाने की छूट मिलती है, चाहे वह आयात कहीं से हो रहा है. भारत के बाउंड टैरिफ सीमा शुल्‍क दर बढ़ते बढ़ते 2018 में  48.5 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच गई  जबकि एमएफएन सीमा शुल्‍क दरें औसत 13.5 फीसदी हैं. इसके अलावा कृष‍ि उत्‍पादों आदि पर सीमा शुल्‍क तो 112 फीसदी से ज्‍यादा है.

यही वजह थी कि बीते बरसों में मोदी ट्रंप दोस्‍ती के दावों बाद बावजूद व्‍यापार को लेकर अमेरिका और भारत के रिश्‍तों में खटास बढ़ती गई जो अब तक बनी हुई है. इसी संरंक्षणवाद के कारण प्रधानमंत्री मोदी के तमाम ग्‍लोबल अभ‍ियानों के बावजूद भारत सात वर्षों में एक नई व्‍यापार संध‍ि नहीं कर सका.

किसका नुकसान

आयातों की कीमत बढ़ाने की यह पूरी परियोजना इस बोदे और दकियानूसी तर्क के साथ गढ़ी गई कि यद‍ि आयात महंगे तो होंगे  देश में माल बनेगा. पर दरअसल एसा हुआ नहीं क्‍यों कि एकीकृत दुनिया में. उत्‍पादन की चेन को पूरा करने के लिए भारत को इलेक्‍ट्रानिक्‍स, पुर्जे, स्‍टील, मशीनें, रसायन आदि कई जरुरी चीजें आयात ही करनी हैं.

उदाहरण के लिए इलेक्‍ट्रानिक्‍स को लें जहां सबसे ज्‍यादा आयात शुल्‍क बढ़ा. बीते तीन साल में इलेक्‍ट्रानिक पुर्जों जैसे पीसीबी आदि का एक तिहाई आयात तो अकेले चीन से हुआ 2019-20 ज‍िसकी कीमत करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये थी. शेष जरुरत ताईवान फिलीपींस आद‍ि से पूरी हुई.

स्‍वदेशीवाद की इस नीति ने भारत छोटे उद्योागें के पैर काट दिये हैं जिनकी सबसे बड़ी निर्भरता आयात‍ित कच्‍चे माल पर है. इंपोर्टेड महंगाई इन्‍हें सबसे ज्‍यादा भारी पड़ रही है. स्‍टील तांबा अल्‍युम‍िन‍ियम जैसे उत्‍पादों और मशीनरी पर आयात शुल्‍क बढ़ने से भारत के बड़े मेटल उत्‍पादकों ने दाम बढ़ा दि‍ये. गाज गिरी छोटे उद्योगों पर, यह धातुएं जिनका कच्‍चा माल हैं. इधर  सीधे आयात होने वाले पुर्जें व अन्‍य सामान पर सीमा शुल्‍क बढ़ने से पूरी उत्‍पादन चेन को महंगी हो गई.

भारत में अध‍िकांश छोटे उद्योगों के 2017 से कच्‍चे माल की महंगाई से जूझना शुरु कर दिया था. अब तो इस महंगाई का विकराल रुप उन के सर पर नाच रहा है. कुछ छोटे उद्योग बढ़ी कीमत पर कम कारोबार को मजबूर हैं जब कई दुकाने बंद हो रही हैं

ताजा खबर यह है कि इंपोर्टेड महंगाई का अपशकुन सरकार की बहुप्रचार‍ित मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्रोत्‍साहन योजना (पीएलआई) का दरवाजा घेर कर बैठ गया है. चीन वियमनाम थाईलैंड और मैक्‍सिकों के टैरिफ लाइन और भारत की तुलना पर आधार‍ित, आईसीईए और इकध्‍वज एडवाइजर्स की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत इलेक्‍ट्रान‍िक्‍स पुर्जों के आयात के मामले में सबसे ज्‍यादा महंगा है. यानी भारत की तुलना में इन देशों दोगुने और तीन गुना उत्‍पादों पुर्जों का सस्‍ता आयात संभव है. इसलिए उत्‍पादन के ल‍िए नकद प्रोत्‍साहन के बावजूद कंपनियों की निर्यात प्रतिस्‍पर्धात्‍मकता टूट रही है.

निर्यात के लिए व्‍यापार संध‍ियां करने  और बाजारों का लेन देन करने की जरुरत होती है आयात महंगा करने से आत्‍मनिर्भरता तो खैर क्‍या ही बढ़ती महंगाई को नए दांत मिल गए. उदाहरण के लिए भारत के ज्‍यादातर उद्येाग जहां पीएलआई में निवेश का दावा किया गया वहां उत्‍पादों की कीमतें कम नहीं हुई बल्‍क‍ि बढ़ी हैं. मोबाइल फोन इसका सबसे बड़ा नमूना है जहां सेमीकंडक्‍टर की कमी से पहले ही महंगाई आ गई थी.

जो इतिहास से नहीं सीखते

बात 15 वीं सदी की है. क्रिस्टोफर कोलम्बस की अटलांटिक पार यात्रा में अभी 62 साल बाकी थेमहान चीनी कप्तान झेंग हे अपने विराट जहाजी बेडे के साथ अफ्रीका तक की छह ऐतिहासिक यात्राओं के बाद चीन वापस लौट रहा था.  झेंग हे का बेड़ा कोलम्बस के जहाजी कारवां यानी सांता मारिया से पांच गुना बड़ा था. झेंग हे की वापसी तक मिंग सम्राट योंगल का निधन हो चुका थाचीन के भीतर खासी उथल पुथल थी. इस योंगल के उत्‍तराध‍िकारों ने एक अनोखा काम क‍िया. उन्‍होंने समुद्री यात्राओं पर पाबंदी लगाते हुए दो मस्तूल से अधिक बड़े जहाज बनाने पर मौत की सजा का ऐलान कर दिया

इसके बाद चीन का विदेश व्यापार अंधेरे में गुम गया. उधर स्पेन, पुर्तगाल, ब्रिटेन, डच बंदरगाहों पर जहाजी  बेड़े सजने लगे जिन्‍होंने अगले 500 साल में दुनिया को मथ डाला और व्‍यापार का तारीख बदल दी.

चीन को यह बात समझने में पांच शताब्‍द‍ियां लग गईं क‍ि कि जहाज बंदरगाह पर खड़े होने के लिए नहीं बनाए जातेदूसरी तरफ अमेर‍िका अपनी स्‍थापना के वक्‍त पर ही यानी 18 वीं सदी की शुरुआत ग्‍लोबल व्‍यापार की अहम‍ियत समझ गया था तभी तो अमेरिका के संस्‍थापन पुरखे बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा था कि व्यापार से दुनिया का कोई देश कभी बर्बाद नहीं हुआ है 

अलबत्‍ता चीन ने जब एक बार ग्लोबलाइजेशन का जहाज छोड़ा तो फ‍िर दुन‍िया को अपना कारोबारी उपन‍िवेश बना ल‍िया लेक‍िन बीते 2500 साल में मुक्त व्यापार के फायदों से बार बार अमीर होने वाले भारत ने बीते छह साल में उलटी ही राह पकड़ ली.

एक पुराने व्‍यापार कूटनीतिकार ने कभी मुझसे कहा था कि सरकारें कुछ भी करें लेक‍िन उन्‍हें महंगाई का आयात नहीं करना चाहिए. वे हमेशा इस पर झुंझलाये रहते थे कि कोई भी समझदार सरकार जानबूझकर अपना उत्‍पादन महंगा क्‍यों करेगी. लेकि‍न सरकारें कब सीखती हैं, नसीहतें तो जनता को मिलती है, इंपोर्टेड महंगाई हमारी सबसे ताजी नसीहत है.   

ये डर है क़ाफ़िले वालो कहीं गुम कर दे

मिरा ही अपना उठाया हुआ ग़ुबार मुझे