Monday, December 4, 2017

माननीय सभासदो...

लोकतंत्र की सफलता को मापने का सबसे बेहतर पैमाना क्या हो सकता है
नतीजों से नीतियों की ओर चलते हैं. यह सफर हमें नौकरशाहीक्रियान्वयनमॉनिटरिंग के पड़ावों से गुजारते हुए विधायिका की दहलीज पर ले जाकर खड़ा कर देगा.
हम खुद को संसद या विधानसभा के दरवाजे पर खड़ा पाएंगेजहां से कानून निकलते हैं.

लोकतंत्र में सरकारें कितनी सफल होती हैंयह इस बात पर निर्भर करता है कि उनके कानून कितने सुविचारित और दूरदर्शी हैं. जाहिर है कि कानूनों की गुणवत्ता विधायिकाओं की कुशलता पर निर्भर है यानी हमारे कानून निर्माताओं—सांसद-विधायकों की काबिलियत पर.

दो ताजे उदाहरण हमें भारत में विधायी दक्षता की स्थिति पर सोचने को मजबूर करते हैं.

पहला है इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्टसी (दीवालियापन) कानूनजिसमें एक साल के भीतर ही अध्यादेश के जरिए बड़ा बदलाव करना पड़ा है. पिछले साल दिसंबर से लागू हुआ कानून बीमार कंपनियों के पुनर्गठन और बकाया बैंक कर्ज की वसूली के लिए आधुनिकत्वरित कानूनी प्रक्रिया लेकर आया था. यह सुधार निवेश के माहौल को स्थायी बनाने और बैंक कर्ज का दुरुपयोग रोकने लिए जरूरी था. इसी कानून के चलते हाल में कारोबारी सहजता में भारत की रैंकिंग बेहतर हुई.

कानून लागू होते ही सरकार को पता चला कि इसका तो बेजा फायदा उठाया जा सकता है और उसका राजनैतिक नुक्सान हो सकता है इसलिए अब इसे सिर के बल खड़ा कर दिया गया. बहस जारी है कि अब यह कानून बैंकों व कंपनियों के कितने काम का बचा है और इसके बाद कर्ज वसूली और बीमार कंपनियों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में कैसे तेजी बनी रहेगी. 

संशोधन पर तकनीकी बहस से ज्यादा बड़ा मुद्दा यह है कि सिर्फ एक साल में इतने बड़े बदलाव की जरूरत क्यों पड़ीदेश में बीमार कंपनियों से निबटने वाले कानूनों (सीका ऐक्टकंपनी कानूनसारफेसी ऐक्टकर्ज उगाही ट्रिब्यूनल) का इतिहास और इस तरह के मामलों के पर्याप्त अनुभव हैं लेकिन इसके बाद भी हम एक अचूक बैंकरप्टसी कानून क्यों नहीं बना सके?

दूसरा नमूना है जीएसटी विधायी कुशलता की हालत का. जीएसटी भी करीब एक दशक से बन रहा है ताकि उपभोक्ताओं और उद्योग पर करों का बोझ कम किया जा सकेकर प्रणाली आसान बनाई जा सके और ज्यादा करदाता टैक्स दायरे में आ सकें. लेकिन बनने के तीन माह के भीतर ही जीएसटी ध्वस्त हो गया. टैक्स रेट उलट-पलट हो गए और इस दौरान नियम इतने बदले कि उन्हें याद रखना मुश्किल हो गया. जीएसटी की विफलता ने भारत के इनडाइरेक्ट टैक्स ढांचे को गहरी चोट पहुंचाई है.

टैक्स को लेकर भी तजुर्बों की कमी नहीं है. वैट और सर्विस टैक्स लागू हो चुके हैं. वैट यानी वैल्यू एडेड टैक्स को अमल में लाने में वक्त लगा था लेकिन वह जीएसटी से ज्यादा टिकाऊ साबित हुआ. जीएसटी की जरूरतें और चुनौतियां पूरी तरह स्पष्ट थीं. राजनैतिक सहमति भी थी लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी हमारे कानून निर्माता हमें एक कायदे का जीएसटी नहीं दे पाए.

कानूनी और नीतिगत विफलताओं की फेहरिस्त लंबी हो सकती है जो विधायिका की दक्षता पर उठने वाले सवालों को और व्यापक बना देगी. चुनावी दबावों के कारण नए बने कानूनों का ऐसा शीर्षासन (जीएसटीबैंकरप्टसी) अनोखा है. जो संसद कानून बनाती है वह इन बदलावों पर जब तक विचार करे तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

भारत में विधायी अकुशलता की चुनौती बढ़ रही है. ताजा अनुभव हमें चार निष्कर्ष देते हैं:

1. जीएसटी व बैंकरप्टसी कोड का यह हाल नहीं होता. का हाल गवाह है कि सरकार कानून बनाने से पहले पर्याप्त शोध नहीं कर रही है

2. कानून से प्रभावित होने वाले पक्षों से संवाद नहीं होता. राजनेता स्वयं को सर्वज्ञ मानते हैं.

3. संसद में कानूनों पर बहस इतिहास बन चुकी है. संसद से बहुमत के दम पर पारित कराने के बाद अधकचरे कानून जनता के माथे मढ़ दिए जाते हैं.

4. खराब कानून विवादों में बदलते हैं और तब सरकार को लगता है कि अदालतें अपनी सीमा पार कर रही हैं.

दूरदर्शिता कानूनों की पहली जरूरत है. उनमें बार-बार बदलाव उनकी कमजोरी ही साबित करते हैं. जब हमारी संसद हमें एक साल तक टिक पाने वाले कानून नहीं दे पा रही है तो राज्यों की विधानसभाओं में कैसे कानून बन रहे होंगे. 




कानूनों की अधिकता जितनी खतरनाक है, खराब कानून से उतनी ही बड़ी मुसीबतें हैं. दुर्भाग्य से हमारे पास दोनों हैं.

Sunday, November 26, 2017

आह इतिहास ! वाह इतिहास !


इतिहास से वर्तमान की जंग सबसे आसान है. जीवंत योद्धा जब काल्पनिक शत्रु से आर-पार वाली जंग लड़ते हैं तो जातीय स्मृतियों से सजा परिदृश्य, फड़कते हुए किस्से-कहानियों और जोरदार संवादों के साथ राजनैतिक ब्लॉकबस्टर की रचना कर देता है.

खोखली होती है यह रोमांचक लड़ाई. हारता-जीतता कोई नहीं अलबत्ता इतिहास बोध की शहादत का नया इतिहास बन जाता है.

इरिक हॉब्सबॉम को बीसवीं सदी के इतिहासकारों का इतिहासकार कहा जाता है. वे कहते थे, ''पहले मैं समझता था कि इतिहास ना‍भिकीय भौतिकी जैसा खतरनाक नहीं है लेकिन अब मुझे लगता है कि इतिहास भी उतना ही भयानक हो सकता है.'' 

सियासत के साथ मिलकर इतिहास के जानलेवा होने की शुरुआत बीसवीं सदी में ही हो गई थी. लंबे खून-खच्चर के बाद यूरोप ने यह वास्तविकता स्वीकार कर ली कि इतिहास के सच हमेशा कुछ मूल्यहीन तथ्यों और अर्थपूर्ण निर्णयों के बीच पाए जाते हैं. इतिहास के तथ्य अकेले कोई अर्थ नहीं रखते. इनकी निरपेक्ष या वस्तुपरक व्याख्या नहीं हो सकती. इसे संदर्भों में ही समझा जा सकता है इसलिए इनके राजनैतिक इस्तेमाल का खतरा हमेशा बना रहता है.

जिन समाजों में सांस्कृतिक इतिहास राष्ट्रीय इतिहास से पुराना और समृद्ध हो, इतिहास व मिथक के रिश्ते गाढ़े हों और परस्पर विरोधी तथ्य इतिहास का हिस्सा हों, वहां इतिहास पर राजनीति खतरनाक हो जाती है.

भारत में फिल्मों, किताबों पर गले काटने की धमकियां रुकें या नहीं. लेकिन इक्कीसवीं सदी में इतिहास को देखने के नए तरीकों पर चर्चा में कोई हर्ज नहीं है.

सांस्कृतिक स्मृतियां

उलनबटोर के पास चंगेज खान की 40 मीटर ऊंची इस्पाती प्रतिमा पिछले दशक में ही स्थापित हुई है. मंगोलिया की जातीय स्मृ‍तियों में चंगेज खान की जो छवि है, यूरोप व अरब मुल्क उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे. जातीय स्मृतियां किसी भी इतिहास का अनिवार्य हिस्सा हैं लेकिन किसी दूसरे समाज के लिए इनके बिल्कुल उलटे मतलब होते हैं. भारत में कई राजा और सम्राट कहीं नायक तो कहीं खलनायक हैं. ऐसा इतिहास वर्तमान से काफी दूर है और भविष्य के लिए प्रासंगिक भी नहीं है, अलबत्ता राजनीति चाहे तो इसे विस्फोटक बना सकती है.

भूलने के उपक्रम

इतिहास कभी नहीं मरता लेकिन समझ-बूझकर उसे भुलाने की कोशिशें भी अतीत से संवाद के नए तरीकों का हिस्सा हैं. यूरोप मध्ययुगीन बर्बरता पर शर्मिदा होता है. चीन व ब्रिटेन के रिश्तों पर अफीम युद्ध छाया नहीं है. ब्रिटेन उपनिवेशवादी इतिहास को भुला देना चाहता है. अमेरिका, जापान पर परमाणु हमले को याद करने से बचता है. स्पेन का लैटिन अमेरिका पर हमला, स्टालिन की बर्बरताएं या हिटलर की नृशंसता! दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार कौन-सा था? इस पर शोध चलेंगे  लेकिन विश्व युद्धों के बाद इतिहास के कुछ हिस्सों को सामूहिक विस्मृति में सहेज देने के उपक्रम जारी हैं ताकि वर्तमान में चैन के साथ जिया जा सके. 

कीमती यादगार 

स्मृति व इतिहास में एक बड़ा अंतर है. स्मृति किसी समाज के अतीत का वह हिस्सा है जिसे बराबर याद किया जाता है या जिससे सीखा जा सकता है, जबकि इतिहास अतीत का वह आयाम है, जिसकी प्रासंगिकता वर्तमान से उसकी दूरी के आधार पर तय होती है. ताजा इतिहास को, बहुत पुराने इतिहास पर, वरीयता दी जाती है क्योंकि ताजा अतीत, वर्तमान के काम आ सकता है.

सबसे अधिक राजनैतिक विवाद उस इतिहास को लेकर है जिसे हम बार-बार याद करना चाहते हैं और वर्तमान में उससे सीखते रहना चाहते हैं. इसलिए स्मारक, संग्रहालय बनाने, इतिहास की पाठ्य पुस्तकों का विषय तय करने और कला-कल्पना में इतिहास के प्रसंगों पर गले कटने लगते हैं.

तो फिर कैसे तय हो कि वर्तमान को कौन-सा इतिहास चुनना चाहिए?

नीदरलैंड के इतिहास के प्रोफेसर विम वान मेरुस की राय गौर करने लायक है- 21वीं सदी में किसी भी समुदाय के दो लक्ष्य हैं—पहला, स्वतंत्र राष्ट्र होना और दूसरा, उस राष्ट्र का लोकतंत्र होना. इतिहास की जो भी व्याख्या राष्ट्र या जातीय पहचान को प्रकट करती है, उसे लोकतंत्र के मूल्यों की कसौटी पर भी बेहतर होना होगा, नहीं तो इतिहास हमेशा लड़ाता रहेगा.

ब्रिटिश पत्रकार और इतिहासकार, ई.एच. कार (पुस्तकः व्हाट इज हिस्ट्री) कहते थे कि इतिहास की सबसे उपयुक्त व्याख्या किसी समाज के भविष्य को निगाह में रखकर ही हो सकती है. .......

जो ऐसा नहीं कर पाते वे जॉर्ज बर्नाड शॉ को सही साबित करते हैः ''इतिहास से हम यही सीखते हैं कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा.''

Sunday, November 19, 2017

यह है असली कामयाबी


रेंद्र मोदी सरकार के पिछले तीन साल की सबसे बड़ी सफलता क्या है
अगर आपको नहीं मालूम तो इस बात पर मत चौंकिए कि प्रचार-वीर सरकार ने अब तक बताया क्यों नहीं ? 
आश्‍चर्य  तो यह है कि इस कामयाबी को मजबूत बनाने के लिए अब तक कुछ भी नहीं किया गया.
तमाम मुसीबतों के बावजूद छोटे-छोटे शहरों के मध्य वर्ग की छोटी बचतों ने बेहद संजीदगी से भारतीय शेयर बाजार की सूरत बदल दी है. म्युचुअल फंड पर सवार होकर शेयर बाजार में पहुंच रही बचतएक अलहदा किस्म का वित्तीय समावेशन (फाइनेंशियल इनक्लूजन) गढ़ रही है और भारत की निवेश आदतों को साफ-सुथरा बनाने का रास्ता दिखा रही है.

भारतीय शेयर बाजार में कुछ ऐसा हो रहा है जो अब तक कभी नहीं हुआ. बाजारों के विदेशी निवेशकों की उंगलियों पर नाचने की कहानी पुरानी हो रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद से घरेलू निवेशकों ने 28 अरब डॉलर मूल्य के शेयर खरीदे हैं. यह विदेशी निवेश के (30 अरब डॉलर) के तकरीबन बराबर ही है. इसने पिछले तीन साल में शेयर बाजार को बड़ा सहारा दिया है और विदेशी निवेश पर निर्भरता को कम किया है.

छोटे निवेशक अपनी मासिक बचत को कमोबेश सुरक्षित तरीके से (सिस्टेमिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी सिप) म्युचुअल फंड में लगा रहे हैं. म्युचुअल फंड उद्योग के मुताबिकपिछले तीन साल में उसे मिले निवेश ने सालाना 22-28 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की है. म्युचुअल फंड एसेट्समई 2014 में 10 लाख करोड़ रु. के मुकाबले 2017 की जुलाई में 19.97 लाख करोड़ रु. पर पहुंच गए. ज्यादातर निवेश छोटे-छोटे शहर और कस्बों से आ रहे हैंजहां फंड में निवेश में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है.

मकान-जमीन और सोने की चमक बुझ रही है तो घरेलू निवेशकों की मदद की बदौलत शेयर बाजार (निफ्टी) ने पिछले तीन वर्ष के दौरान 11.97 फीसदी (किसी भी दूसरी बचत या निवेश से कहीं ज्यादा) का सालाना रिटर्न दिया है.

जोखिम का मोड़

इक्विटी कल्चर की कहानी रोमांचक हैलेकिन जोखिम से महफूज नहीं. शेयरों की कीमतें जितनी तेजी से बढ़ रहीं हैंबाजार की गहराई उसके मुताबिक कम है. बाजार में धन पहुंच रहा है तो इसलिए देश की आर्थिक हकीकत (ग्रोथ में गिरावटतेल की बढ़ती कीमतपटरी से उतरा जीएसटी आदि) की परवाह किए बगैर बाजार बुलंदियों के रिकॉर्ड गढ़ रहा है.

यही मौका है जब छोटी बचतों के रोमांच को जोखिम से बचाव चाहिए.

- कंपनियों के पब्लिक इश्यू बढऩे चाहिए. प्राइमरी शेयर बाजार विश्लेषक प्राइम डाटाबेस के मुताबिकपिछले तीन वर्ष में नए इश्यू की संख्या और आइपीओ के जरिए जुटाई गई पूंजी2009 और 2011 के मुकाबले कम है जो प्राइमरी मार्केट के लिए हाल के सबसे अच्छे साल थे. सरकारी कंपनियों के विनिवेश में तेजी की जरूरत है.

- शेयर बाजार की गहराई बढ़ाने के लिए नए शेयर इश्यू का आते रहना जरूरी है. औद्योगिक निवेश के संसाधन जुटाने में इक्विटी सबसे अच्छा रास्ता है.

- सेबी के नियमों के मुताबिकशेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी के कम से कम 25 फीसदी शेयर जनता के पास होने चाहिए. अब भी 1,886 सूचीबद्ध कंपनियां इस नियम का पालन नहीं कर रही हैं. कैपिटलाइन के आंकड़ों के मुताबिकइनमें 1,795 कंपनियां निजी हैं.

- लोगों की लघु बचत दो दशक के सबसे निचले स्तर पर है. 2010 में परिवारों की बचत (हाउसहोल्ड  सेविंग्स)जीडीपी के अनुपात में 25.2 फीसदी ऊंचाई पर थी जो 2017 में 18.6 फीसदी पर आ गई. सरकारी बचत योजनाएं (एनएससीपीपीएफ) ब्याज दरों में कमी के कारण आकर्षण गंवा रही हैं.
बचत में गिरावट को रोकने के लिए वित्तीय बाजार में निवेश को प्रोत्साहन देने होंगे. आयकर नियम बदलने होंगे ताकि शेयरोंम्युचुअल फंडों और डिबेंचरों में निवेश को बढ़ावा मिले.

भारत में निवेश व संपत्ति का सृजन पूरी तरह सोना व जमीन पर केंद्रित है. क्रेडिट सुइस ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2017 के मुताबिकभारत में 86 फीसदी निजी संपत्ति सोने या जमीन के रूप में हैवित्तीय निवेशों का हिस्सा केवल 14 फीसदी हैजबकि ब्रिटेन में 51 फीसदीजापान में 53 फीसदी और अमेरिकी में 72 फीसदी संपत्ति वित्तीय निवेशों के रूप में है.



नोटबंदी से तो कुछ नहीं मिला. यदि छोटे निवेशकों के उत्साह को नीतियों का विटामिन मिल जाए तो संपत्ति जुटाने के ढंग को साफ-सुथरा बनाया जा सकता है. बताने की जरूरत नहीं है कि वित्तीय निवेश पारदर्शी होते हैं और सोना व जमीन काली कमाई के पसंदीदा ठिकाने हैं.

Monday, November 13, 2017

जो नहीं जानते ख़ता क्या है

जो पीडि़त हैं वही क्यों पिटते हैं?

काली कमाई और भ्रष्टाचार पर गुर्राई नोटबंदी अंतत: उन्हीं पर क्यों टूट पड़ी जो कालिख और लूट के सबसे बड़े शिकार हैं.

जवाबों के लिए चीन चलते हैं.

इसी अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं सालाना बैठक में राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एक अनोखा दर्जा हासिल हुआ. उपलब्धि यह नहीं थी कि कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में बदलाव के साथ शी को माओ त्से तुंग और देंग श्याओ की पांत में जगह दी गई बल्कि शी ताजा इतिहास में दुनिया के पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने संगठित राजनैतिक और कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जीतकर खुद को दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं की पांत में पहुंचा दिया.

बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ पीपल में जब कम्युनिस्ट पार्टी शी का अभिनंदन कर रही थी, तब तक उनका भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अपनी ही पार्टी के 13 लाख पदाधिकारियों व सरकारी अफसरों और 200 मंत्री स्तर के 'टाइगरों को सजा दे चुका था. शी ने अपनी ही पार्टी के भ्रष्ट नेताओं और दिग्गजों को सजा देकर ताकत पाई और लोकप्रिय हो गए! 

असफल नोटबंदी के दर्द की छाया में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चीन का अभियान जरूरी सूत्र दे सकता है.

         इस अभियान के लक्ष्य आम चीनी नहीं बल्कि नेता, सरकारी मंत्री, सेना और सार्वजनिक कंपनियों के अफसर थे जो चीन के कुख्यात वोआन-जोआन (नेता-अफसर-कंपनी गठजोड़) भ्रष्टाचार की वजह हैं. 2013 में शी जिनपिंग ने कहा था कि सिर्फ मक्खियां (छोटे कारकुन) ही नहीं, शेर (बड़े नेता-अफसर) भी फंदे में होंगे. इसने चीनी राजनीति के तीन बड़े गुटोंपेट्रोलियम गैंग, सिक्योरिटी गैंग और  शांक्सी गैंग (बड़े राजनैतिक नेताओं का गुट) पर हाथ डाला, जो टाइगर्स कहे जाते हैं.

 भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का नेतृत्व सेंट्रल कमिशन फॉर डिसिप्लिनरी ऐक्शन (सीसीडीआइ) कर रहा है. स्वतंत्र और अधिकार संपन्न एजेंसी के जरिए राजनैतिक व आर्थिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का मॉडल दुनिया के अन्य देशों, खासतौर पर लोकतंत्रों से मेल खाता ही है.

    किसी भी दूसरे देश की तरह शी की यह मुहिम भी विवादित थी लेकिन चीन की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा पारदर्शी भी थी. नियमित सूचनाओं का प्रवाह और यहां तक कि राजदूतों को बुलाकर इस स्वच्छता मिशन की जानकारी देना इस अभियान का हिस्सा था.

  अभियान की सफलता शी की राजनैतिक ताकत में दिखती है. स्वतंत्र प्रेक्षक (खासतौर पर ताजा चर्चित किताब चाइनाज क्रोनी कैपिटलिज्म के लेखक और कैलिफोर्निया में क्लैरमांट मैककेना कॉलेज के प्रोफेसर मिनक्सिन पे) मानते हैं कि बड़े व संगठित भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार से निचले स्तर पर भ्रष्टाचार में कमी महसूस की जा सकती है. हालांकि चीन में कानून कमजोर हैं और स्वतंत्र मीडिया अनुपलब्ध है, इसलिए जन अभियानों का विकल्प नहीं है. 

अब वापस नोटबंदी पर

1. नोटबंदी से कालिख के दिग्गजों को सजा मिलनी थी लेकिन नौकरियां गईं आम लोगों की, धंधे बंद हुए छोटों के. भ्रष्ट और काले धन के राजनैतिक-आर्थिक ठिकानों पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

2. लोकतंत्र के पैमानों पर, नोटबंदी के फैसले और नतीजों में सरकार अपेक्षित पारदर्शी नजर नहीं आई.

3. राजनैतिक मकसद से चुनिंदा जांच के अलावा उच्च पदों पर भ्रष्टाचार पर कोई संगठित अभियान नजर नहीं आया. चीन की तो छोडि़ए, भारत में पाकिस्तान की तरह भी कोई मजबूत व स्वतंत्र जांच संस्था नहीं बन पाई. पनामा (टैक्स हैवेन) से रिश्तों में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का नाम आने के बाद, उनके खिलाफ अदालत व जांच एजेंसी की सक्रियता देखने लायक है. भारत में पनामा पेपर्स के मामलों में एक नोटिस तक नहीं भेजा गया है जबकि टैक्स हैवन के भारतीय रिश्तों पर सूचनाओं की दूसरी खेप (पैराडाइज पेपर्स) आ पहुंची है.

4. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की इस साल आई दो रिपोर्टों के मुताबिक, भारत आज भी एशिया प्रशांत क्षेत्र में सबसे भ्रष्ट देश है. यहां औसतन 70 फीसदी लोगों को रिश्वत देनी पड़ती है.

चलते-चलते एक तथ्य और पकडि़ए.

उपभोक्ताओं पर भारत के प्रमुख सर्वेक्षण, आइसीई 3600 सर्वे (2016) के अनुसार, भारत में केवल 20 फीसदी परिवार ऐसे हैं जिनका मासिक उपभोग खर्च औसतन 15,882 रु. या उससे ज्यादा है. सबसे निचले 40 फीसदी परिवारों का मासिक खर्च तो केवल 7,000-8,500 रु. के बीच है.

काला धन किसके पास है

नोटबंदी के दौरान लाइनों में कौन लगे थे?


आप खुद समझदार हैं. 

Monday, November 6, 2017

ताकि, सनद रहे !

लत सिद्ध होने का संतोष कभी कभी, सही साबित होने से ज्यादा कीमती होता है. सरकारी फैसलों पर  सवाल उठाना और आगाह करना कोई क्रांति नहीं है. यह तो पत्रकारिता का सहज  दायित्‍व है. नीतियों के नतीजे अच्‍छे रहें तो  लोकतंत्र में पत्रकारिता की यह असफलता श्रेयस्कर ही होगी.
नोटबंदी के नतीजे सामने हैं।
यह रहा नोटबंदी और उसके बाद पिछले एक वर्ष में सवालों, विश्‍लेषणों का Hyperlinked संकलन।
काश! हम गलत सिद्ध होते.
  •     नोटबंदी का तिलिस्मी खाता (5 नवंबर 2017https://goo.gl/BNrBDW
  •         सोचा न था...(8 अक्‍टूबर 2017)  https://goo.gl/ryyQVY
  •         खर्च करेंगे तो बचेंगे  (10.अक्‍टूबर 2017https://goo.gl/E3MYHm
  •         सही साबित होने का अफसोस (27जून 2017https://goo.gl/kgvQkB
  •         नोटबंदी और जीएसटी (13 जून 2017https://goo.gl/LUEhZ3
  •         बड़ी मछलियां  (20 फरवरी 2017https://goo.gl/a46rmB
  •         नोटबंदी का बजट  (12फरवरी 2017https://goo.gl/ZTGJW9
  •         नींव का निर्माण फिर (09 जनवरी 2017https://goo.gl/eKN9ey
  •         कल क्या होगा? (31.दिसंबर 2016https://goo.gl/3LDc6H
  •         न होती नोटबंदी तो .. (26 दिसंबर 2016https://goo.gl/vufudv
  •         नोटबंदी की पहली नसीहत  (19 दिसंबर 2016https://goo.gl/oPavbu
  •         8.11.16 बनाम 6.6.66 और 1.7.91 (12 दिसंबर 2016) https://goo.gl/NNpKEd
  •        कैशलेस कतारों का ऑडिट  (04 दिसंबर 2016https://goo.gl/gLBQgk
  •        मैले हाथों से सफाई!  (28 नवंबर 2016https://goo.gl/3ZCJHa
  •        नोटबंदी की बैलेंस शीट (20 नवंबर 2016https://goo.gl/w25yTF
  •        काले धन की नसबंदी (14 नवंबर2016https://goo.gl/qXnFL6

पत्रकारिता कभी चुप नहीं हो सकती. यही उसका सबसे बड़ा गुण है और उसका बड़ा दोष भी. उसे हमेशा बोलना चाहिए. चाहे लोग आश्‍चर्य में डूबे हों या कि जीत की दुंदुभि बज रही या फिर खौफ का सन्‍नाटा पसर चुका हो. पत्रकारिता को तुरंत बोलना चाहिए - Henry Anatole Grunwald