Monday, December 12, 2011

डूब कर ही उबरेगा यूरोप

यूरो जोन तवे से गिरकर चूल्‍हे में आ गया है। कर्ज संकट की लपट से बचने के लिए यूरोप के खेवनहार अपनी दुकानें अलग करने लगे हैं। यूरोप का राजनीतिक नेतृत्‍व करो या मरो टाइप का एजेंडा लेकर इस सप्‍ताह ब्रसेल्स में जुटा था। दस घंटे तक मगजमारी के बाद यूरोपीय रहनुमा जब बाहर आए तो यूरोप की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यव्‍स्‍था ब्रिटेन साथ नहीं थी। डेविड कैमरुन,  यूरोप की नई संकट निवारण संधि को शुभकामनायें देकर कट लिये और यूरोपीय एकता का शीशा खुले आम दरक गया। हालांकि मर्कोजी मान रहे हैं कि यूरोपीय देश नई सख्‍त वित्‍तीय अनुशासन संधि में बंध कर संकट से बच जाएंगे। यह बात अलग है नेताओं की इन कोशिशों पर बाजार का भरोसा जम नहीं रहा है।  रेटिंग एजेंसियां कह रही हैं कि यूरोपीय देशों 2012 में कर्ज की बहुत भारी देनदारी आ रही है जो सुधारों के इस नए इंतजाम से नहीं रुकने वाली। बाजार मान रहा है कि यूरोजोन पर कर्ज की इतनी बारिश हो चुकी है कि सुधारों की धूप की निकलने पर भी यह ढह जाएगा।
यूरो की खातिर
यूरोप के राजनेता जो बच सके बचाने की फिराक में हैं। यह सर्वनाशे समुत्‍पन्‍ने  अर्ध: त्‍यजति पंडित: जैसी स्थिति है। ब्रसेल्‍स की यूरोपीय संघ शिखर बैठक से पेरिस में मर्कोजी ( एंजेल मर्केल और निकोलस सरकोजी) ने तय कर लिया था कि यूरोप की मौद्रिक एकता को बचाने के  यूरोपी देशों के बजटों का डीएनए ठीक करना होगा है। अब पूरा यूरोपीय संघ एक नई संधि में बंधेगा जिसमें बेहद सख्‍त वित्‍तीय अनुशासन होगा और घाटों के बेहाथ होने पर देशों को जुर्माना चुकाना पड़ेगा। यूरो मुद्रा अपनाने वाले 17 देशों के लिए तो नियम और भी सख्‍त है। व्‍यवहारिक रुप से यूरोप के सभी देशों को अपने बजट अपनी संसद से पहले यूरोपीय आयोग को दिखाने होंगे। संप्रभु मुल्‍कों पर को पहली एसी विकट शर्त

Monday, December 5, 2011

बैंक खतरे में हैं !

क्‍त के मारे एक निवेशक ने एक, चतुर सुजान विश्‍लेषक से पूछा- गुरु, ग्रोथ घटने लगी है, बचाव का ज्ञान बताओ। विश्‍लेषक फुसफुसाया बैंकों से दूर रहो!! यूरोप अमेरिका के बैंकों से ?? निवेशक ने पूछा। विश्‍लेषक बोला, बौड़म ! भारतीय बैंकों से बचो, ये ले डूबेंगे । ..बैंकों का मामला यकीनन संगीन है। यूरोप व अमेरिका की तरह भारत के बैंकों ने भी जोखिम का बारुद जुटा लिया है, बस पलीते का इंतजार है। यह हाल फिलहाल के वर्षों में में पहला मौका है जब फंसते कर्ज से लेकर घटते रिटर्न तक, भारतीय बैंकों में खतरे के कई बल्‍ब अचानक जल उठे है। लड़खड़ाती ग्रोथ, मुश्किल में फंसती कंपनियों, रसातल में जाते रुपये और महंगाई के बीच देशी बैंक सबसे कमजोर कड़ी साबित हो सकते हैं। भारत की अधिकांश बैकिंग सरकारी है इसलिए इस यह बैंकों का बुरा हाल दरअसल सरकार के लिए नई मुसीबत है।
कड़कती बिजली  
नवंबर की शुरुआत में इलाहाबाद बैंक ने बिजली बोर्डों को और कर्ज न देने   का ऐलान किया तो साफ हो गया कि बैंकों को करंट लगने लगा है। राज्‍य बिजली बोर्डों को बैंकों का कर्ज इस जून में  2,92,342 करोड़ रुपये (रिजर्व बैंक का आंकड़ा) से ऊपर निकल गया था। राज्‍य बिजली बोडों के घाटे दो लाख करोड़ रुपये से के घाटे देखकर आधा दर्जन से अधिक सार्वजनिक बैंकों की जान सूख रही है। बिजली बोर्डों के डिफॉल्‍ट होने का खतरा बहुत पुख्‍ता है। इसलिए बोर्डों पर बकाये के पुनर्गठन

Monday, November 28, 2011

रिटेल के फूल-कांटे

ह नामुराद खुदरा कारोबार है ही ऐसा। इसका उदारीकरण हमेशा, हाथ पर फूल और कांटे एक साथ धर देता है। रिटेल का विदेशीकरण एक तरफ से ललचाता है तो दूसरी तरफ से यह जालिम कील भी चुभाता है। यानी, रहा भी न जाए और सहा भी न जाए। वैसे खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी निवेश की सीमा बढ़ने पर हैरत कैसी, संगठित मल्‍टी ब्रांड रिटेल भारत में दस साल पुराना हो चुका है, जिसमें आंशिक विदेशी निवेश भी हो चुका है। रिटेल में वाल मार्ट आदि की आमद (मल्‍टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश) के ताजे फैसले का असर अंदाजने के लिए हमारे पास पर्याप्‍त तथ्‍य भी हैं जो रिटेल के उदारीकरण की बहस को गाढा और रोचक बनाते हैं। इसलिए अचरज तो इस फैसले की टाइमिंग पर होना चाहिए कि विरोधों की बारिश के बीच सरकार ने रिटेल की पतंग उड़ाने का जोखिम उठाया है। भारत में संगठित रिटेल का आंकड़ाशुदा अतीत, अगर विरोध के तर्कों की धार कमजोर करता है तो रिटेल से महंगाई घटने की सरकारी सूझ को भी सवालों में घेरता है। दरअसल संगठित रिटेल के खिलाफ खौफ का कारोबार जितना आसान है, इसके फायदों का हिसाब किताब भी उतना ही सहज है...जाकी रही भावना जैसी।
रोजगार का कारोबार
भारत में संगठित खुदरा यानी ऑर्गनाइज्‍ड रिटेल के पास अब एक पूरे दशक का इतिहास है, ढेरों अध्‍ययन, सर्वेक्षण व रिपोर्टें (इक्रीयर 2008, केपीएमजी 2009, एडीबी 2010, नाबार्ड 2011 आदि) मौजूद हैं, इसलिए बहस को तर्कों के सर पैर दिये जा सकते हैं। ग्रोथ और रोजगार के मामले में भारतीय संगठित रिटेल की कहानी दमदार है। भारत का (संगठित व असंगठित) खुदरा कारोबार यकीनन बहुत बड़ा है। 2008-09 में कुल खुदरा बाजार  17,594 अरब रुपये का था जो 2004-05 के बाद से औसतन 12 फीसदी सालाना की रफतार से बढ़ रहा है, जो 2020 तक 53,517 अरब रुपये का हो जाएगा। नाबार्ड की रिपोर्ट बताती है कि संगठित रिटेल करीब 855 अरब रुपये का है जिसमें 2000 फिट के छोटे स्‍टोर ( सुभिक्षा मॉडल) से लेकर 25000 फिट तक के मल्‍टी ब्रांड हाइपरमार्केट (बिग बाजार, स्‍पेंसर, इजी डे) आदि आते हैं। खुदरा कारोबार में तेज ग्रोथ के बावजूद संगठित रिटेल इस अरबों के बाजार के पिछले एक दशक में केवल पांच

Monday, November 21, 2011

बचा, बचा के !


कुछ पता चला आपको ? आपकी बचत का पूरा हिसाब कि‍ताब ही बदल गया है। छोडि़ये भी डाक घर जमा व प्रॉविडेंट फंड पर ब्यापज दर में मामूली बढ़ोत्तरी के ताजे तोहफे को। सरकार की कृपा से, अब छोटी बचतों में पाई पाई जोड़कर भविष्य को बेखटक बनाने का जुगाड़ पेचीदा और अनिश्चित होने वाला है। गारंटीड ब्याज या रिटर्न, सुरक्षा, सुविधा और कर रियायत वाली डाक घर बचत स्कीमों की दुनिया में बाजार घुस आया है। यानी कि इन पर रिटर्न का पहाडा नए सिरे से पढ़ना होगा।  छोटी बचतों में पिछले कई दशकों का, यह  सबसे बडा बदलाव है। जिसके आम लोगों की बचत का कारवां एक ऐसे सफर पर चल पड़ा है जहां अच्छे रिटर्न की गारंटी तो नहीं है अलबत्ता निर्मम बाजार की चपेट में आने का खतरा भरपूर है।
सारे घर के
इस दीवाली से लेकर बीते सप्ता‍ह तक सरकार ने बचतों में सारे घर के बदल दिये हैं। भारत में आम लोगो की छोटी बचत के दो ही ठिकाने हैं बैंकों की जमा (बचत बैंक और मियादी जमा यानी फिक्स्‍ड डिपॉजिट) और लघु बचत स्कींमें। ताजा बदलाव के दायरे में यह दोनों क्षेत्र आ गए हैं। बैंकों को जमा पर बयाज दर तय करने की छूट मिल गई जबकि लघु बचत स्कीमों का पूरा हुलिया ही बदल गया। 1873, 1959, 1968 और 1981 के बचत बैंक, प्रॉविडेंट फंड व बचत स्की म कानूनों के तहत आने वाले लघु बचत परिवार में आठ सदस्‍य हैं, जो डाक घर में रहते हैं।

Monday, November 14, 2011

संदिग्‍ध करिश्‍मा

गता है कि भारतीय निर्यातकों को माल बेचने के लिए जरुर कोई दूसरी दुनिया मिल गई है क्‍यों कि यह दुनिया तो मंदी, मांग में कमी और उत्‍पादन में गिरावट से परेशान है, इसलिए इस धरती पर माल बिकने से रहा।  भारत का निर्यात ऐसे बढ रहा है मानो अमेरिका व यूरोप समृद्धि से लहलहा रहे हों। पिछले छह माह में निर्यात की छलांगों ने विश्‍व व्‍यापार के पहलवान चीन को भी पछाड़ दिया है। सरकार निर्यातकों के बैंड में शामिल होकर सफलता की धुन बजा रही है मगर मुंबई-दिल्‍ली से लेकर लंदन-न्‍यूयार्क तक विशेषज्ञ गहरे असमंजस में हैं क्‍यों कि निर्यात वृद्धि का यह गुब्‍बारा दुनियावी असलियत की जमीन से कटकर हवा में तैर रहा है। विश्‍व व्‍यापार से लेकर घरेलू बाजार ऐसे मजबूत तथ्‍यों का जबर्दसत टोटा है जो निर्यात की इस सफलता को प्रामाणिक बना सकें। इतना ही नहीं निर्यात की इस बाजीगरी से अब काले धन, मनी लॉडिंग, टैक्‍स हैवेन की दुर्गंध भी उठने लगी है।
हकीकत से उलटा 
अप्रैल 35 फीसदी, मई 57 फीसदी, जून 46 फीसदी, जुलाई 81 फीसदी, अगस्‍त 44 फीसदी, सितंबर 36 फीसदी!!...... यह पिछले छह माह में निर्यात बढ़ने की हैरतंअगेज रफ्तार है। ज‍बकि हकीकत इसकी उलटी है। अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष कह रहा है कि दुनिया की विकास दर आधा फीसदी घटेगी। अमेरिका 1.5 फीसदी और पूरा यूरो क्षेत्र 1.6 फीसदी की ग्रोथ दिखा दे तो बड़ी बात है। यूरोप व अमेरिका भारत के निर्यातों के सबसे बड़े बाजार हैं। विश्‍व व्‍यापार संगठन ने अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार की विकास दर 6.5 फीसदी से घटाकर 5.8 फीसदी कर दी है। अमीर देशों के संगठन ओईसीडी ने बताया कि इस साल की दूसरी तिमाही में ब्रिक और जी 7 देशों का निर्यात घटकर 1.9 फीसदी पर आ गया, जो इससे पिछली तिमाही में 7.7 फीसदी था। लेकिन जुलाई में भारत की सरकार बताया कि एक साल में भारत के निर्यातों का मूल्‍य दोगुना हो गया है। जुलाई में तो 81 फीसदी की बढ़त ने निर्यात के चैम्पियन चीन को भी चौंका दिया। सरकार के दावे के विपरीत, विश्‍व बाजार में मांग को नापने वाले कुछ और आंकड़े भारतीय निर्यात में तेजी पर शक को मज‍बूत एचएसबीसी का मैन्‍युफैक्‍चरिंग पर्चेजिंग मैनजर्स इंडेक्‍स (पीएमआई) आयात निर्यात को सबसे करीब से पकड़ता है। इस सूचकांक में पिछली तिमाही में सबसे तेज गिरावट आई और यह 2008 के स्‍तर के करीब है जब दुनिया में निर्यात बुरी तरह टूट गए थे। पीएमआई अमेरिका, यूरोप व एशिया सभी जगह निर्यात की मांग में गिरावट दिखा रहा है। यूरो मु्द्रा का इस्‍तेमाल करने वाले 17 देशों में सेवा व मैन्‍युफैक्‍चरिंग सूचकांक दो साल के न्‍यूनतम स्‍तर पर हैं। यानी कि भारतीय निर्यातों की कहानी दुनिया की हकीकत से बिल्‍कुल उलटी है।

Monday, November 7, 2011

शिखर पर शून्‍य

हीं, वे कुछ नहीं कर सके!! झूठी मुस्‍कराहटों में खिसियाहट छिपाते हुए जी20 की बारात कांस से अपने डेरों को लौट गई है। 1930 की मंदी के बाद सबसे भयानक हालात से मुखातिब है दुनिया को अपने  रहनुमाओं कर्ज संकट और मंदी रोकने की रणनीति तो छोडि़ये, एकजुटता, साहस, दूरंदेशी, रचनात्‍मकता, नई सोच तक नहीं मिली। जी20 की जुटान शुरु से अंत तक इतनी बदहवास थी कि कि शिखर बैठक का 32 सूत्रीय बयान दुनिया के आर्थिक परिदृश्‍य पर उम्‍मीद की एक रोशनी भी नहीं छोड़ सका। इस बैठक के बाद यूरो जोन बिखराव और राजनीतिक संकट के कई कदम करीब खिसक गया है। इटली आईएमएफ के अस्‍पताल में भर्ती हो रहा है और जबकि ग्रीस के लिए ऑक्‍सीजन की कमी पड़ने वाली है। तीसरी दुनिया ने यूरोप के डूबते अमीरों को अंगूठा दिखा दिया है और मंदी से निबटने के लिए कोई ग्‍लोबल सूझ फिलहाल उपलब्‍ध नहीं है। कांस की विफलता की सबसे त्रासद पहलू यह है कि इससे दुनिया में नेतृत्‍व का अभूतपूर्व शून्‍य खुलकर सामने आ गया है अर्थात दुनिया दमदार नेताओं से खाली है। इसलिए कांस का थियेटर अपनी पूरी भव्‍यता के साथ विफल हुआ है।
डूबता यूरो
देखो लाश जा रही है ! (डेड मैन वाकिंग).. य‍ह टिप्‍पणी किसी ने इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्‍कोनी को देखकर की थी जब वह कांन्‍स की बारिश से बचने के लिए काले ओवरकोट में लिपटे हुए फ्रेंस रिविऐरा रिजॉर्ट ( बैठक स्‍थल) पहुंचे। यह तंज आधे यूरोप के लिए भी फिट था, जो कर्ज में डूबकर अधमरा हो गया है। जी20 ने यूरोप का घाव खोल कर छोड़ दिया है। बैठक का उद्घघाटन यूरोजोन के बिखरने की चेतावनी के साथ हुआ। ग्रीस ने खुद को उबारने की कोशिशों को राजनीति (उद्धार पैकेज पर जनमत संग्रह) में फंसाकर पूरे यूरोपीय नेतृत्‍व की फजीहत करा दी और यूरो जोन की एकजुटता पर बन आई। ग्रीस का राजनीतिक संकट जब टला तब तक कांन्‍स का मेला उखड़ गया था। यूरोप को सिर्फ यह मिला कि कर्ज के जाल में फंसा इटली आईएमएफ की निगहबानी में आ गया है। जो इटली की गंभीर बीमारी

Monday, October 31, 2011

रहनुमाओं का थियेटर

बाल बाल बचा !!! कौन ? ग्रीस ? नहीं यूरोप अमेरिका को चलाने वाला एंग्‍लो सैक्‍सन आर्थिक मॉडल। ग्रीस अगर दिनदहाडे़ डूब जाता तो पूरा जी 20 ही बेसबब हो जाता। ग्रीस की विपत्ति टालने के लिए यूरोप में बैंकों की बलि का उत्‍सव शुरु हो गया है। बैंकों से कुर्बानी लेकर अटलांटिक के दोनों किनारों पर (अमेरिकी यूरोपीय) सियासत ने अपनी इज्‍जत बचा ली है नतीजतन ओबामा-मर्केल-सरकोजी-कैमरुन (अमेरिका, जर्मन फ्रांस, ब्रिटेन राष्‍ट्राध्‍यक्षों) की चौकडी जी 20 की कान्‍स पंचायत को अपना चेहरा दिखा सकेंगे। ग्रीस राहत पैकेज के बाद फिल्‍मों के शहर कांस (फ्रांस) में विश्‍व संकट निवारण थियेटर का कार्यक्रम बदल गया है। यहां अब भारत चीन जैसी उभरती ताकतों के शो ज्‍यादा गौर से देखे जाएंगे। इन नए अमीरों को यूरोप को उबारने में मदद करनी है और विकसित मुल्‍कों से अपनी शर्तें भी मनवानी हैं। विश्‍व के बीस दिग्‍गज रहनुमाओं के शो पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं। कांस का मेला बतायेगा कि विश्‍व नेतृत्‍व ने ताजा वित्‍तीय हॉरर फिल्‍म की सिक्रप्‍ट बदलने की कितनी ईमानदार कोशिश की और यह संकट का यह सिनेमा कहां जाकर खत्‍म होगा।
और ग्रीस डूब गया
यूरोपीय सियासत की चपेट में आर्थिक परिभाषायें बदलने लगी हैं। शास्‍त्रीय अर्थों में मूलधन या ब्‍याज को चुकाने में असफल होने वाला देश संप्रभु दीवालिया (सॉवरिन डिफॉल्‍ट) है। इस हिसाब से बैंकों की कृपा ( तकनीकी भाषा में 50 फीसदी हेयरकट) का मतलब ग्रीस का दीवालिया होना है। मगर यूरोपीय सियासत इसे कर्ज माफी कह रही है। पिछली सदी के सातवें दशक में अर्जेंटीना यही हाल हुआ था और बाजार ने उसे दीवालिया ही माना था। यूरोप व तीसरी दुनिया में यही फर्क है। ग्रीस का ताजा पैकेज 2008 अमेरिकी लीमैन संकट की तर्ज पर है यानी कि बैंकर्ज माफ करेंगे और बाद में सरकारें बैंकों को

Monday, October 24, 2011

अमावस की लक्ष्मी

देवी सूक्‍त कहता है, लक्ष्‍मी श्‍वेत परिधान धारण करती है। अमृत के साथ, समुद्र से जन्‍मी शुभ व पवित्र लक्ष्‍मी सबको समृद्धि बांटती है, किंतु यह बेदाग लक्ष्मी मानो दुनिया के आंगन से रुठ ही गई है। यहां तो अमावस जैसी काली लक्षमी पूरे विश्‍व में जटा खोले अघोर नृत्‍य कर रही है। यह लक्ष्‍मी करों के स्‍वर्ग (टैक्‍स हैवेन) में निवास करती है और बड़े बड़ों के हाथ नहीं आती। काली लक्षमी का दीवाली अपडेट यह है कि कर स्‍वर्गों के दरवाजे खोलने चले दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्‍क हार कर बैठ गए हैं। खरबों डॉलर छिपाये दुनिया के 72 कर स्‍वर्ग पूरे विश्‍व को फुलझडि़यां दिखा कर बहला रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी ने बीते एक साल में इन स्‍वर्गों को धमका फुसलाकर अपनी काली लक्ष्‍मी की कुछ खोज खबर हासिल भी कर ली मगर भारत तो बिल्‍कुल गया बीता है। कर स्‍वर्गों को दबाने के बजाय हमारी सरकार काले धन की जांच रोकने के लिए अदालत के सामने गिड़गिड़ा रही है। दीपावली पर शुद्ध और पवित्र लक्षमी की आराधना करते हुए, काली लक्ष्‍मी की ताकत बढ़ने की खबरें हमें मायूस करती हैं।
ताकतवर मायाजाल
भारतीय पिछले सप्‍ताह जब महंगाई में दीवाले का हिसाब लगा रहे थे तब दुनिया को यह पता चला कि वित्‍तीय सूचनायें छिपाने वाले मुल्‍कों की संख्‍या 72 ( 2009 में 60) हो गई है। प्रतिष्ठित संगठन टैक्‍स जस्टिस नेटवर्क की ताजी पड़ताल ने यह भ्रम खत्‍म कर दिया कि कर स्‍वर्गों के खिलाफ जी20 देशों की दो साल पुरानी मुहिम को कोई कामयाबी मिली है। कर स्‍वर्ग में करीब 11.5 ट्रिलियन डॉलर छिपे हैं। काली लक्षमी के इन अंत:पुरों में करीब पचास फीसदी पैसा (1.6 ट्रिलियन डॉलर-ग्‍लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी रिपोर्ट 2006) विकासशील देशों से जाता है। इन के कारण विकासशील देश हर साल करीब एक ट्रिलियन डॉलर का टैक्‍स गंवाते हैं। पैसा भेजने वाले पांच प्रमुख देशों में भारत शामिल है। चीन इनका अगुआ है। टैक्‍स जस्टिस नेटवर्क का फाइनेंशियल सीक्रेसी इंडेक्‍स 2011 बताता है कि केमैन आइलैंड

Monday, October 17, 2011

ये जो अमेरिका है !!

याद कीजिये इस अमेरिका को आपने पहले कब देखा था। दुनिया को पूंजी, तकनीक निवेश, सलाहें, बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां और सपने बांटने वाला अमेरिका नहीं बल्कि बेरोजगार, गरीब, मंदी पीडित, सब्सिडीखोर, कर्ज में डूबा, बुढाता और हांफता हुआ अमेरिका।  न्‍यूयार्क, सिएटल, लॉस एंजल्‍स सहित 70 शहरों की सड़कों पर फैले आंदोलन में एक एक दूसरा ही अमेरिका उभर रहा है। चीखते, कोसते और गुस्‍साते अमेरिकी लोग (आकुपायी वाल स्‍ट्रीट आंदोलन) अमेरिकी बाजारवाद और पूंजीवाद पर हमलावर है। राष्‍ट्रपति ओबामा डरे हुए हैं उनकी निगाह में शेयर बाजार व बैंक गुनहगार हैं। न्‍यूयार्क के मेयर माइकल ब्‍लूमबर्ग को अमेरिका की सड़कों पर कैरो व लंदन जैसे आंदोलन उभरते दिख रहे हैं। इन आशंकाओं में दम है, अमेरिका से लेकर कनाडा व यूरोप तक 140 शहरों में जनता सड़क पर आने की तैयारी में है। आर्थिक आंकड़ों से लेकर सामाजिक बदलावों तक और संसद से लेकर वित्‍तीय बाजार तक अमेरिका में उम्‍मीद की रोशनियां अचानक बुझने लगी हैं। लगता है मानो दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्‍क में कोई तिलिस्‍म टूट गया है या किसी ने पर्दा खींच कर सब कुछ उघाड़ दिया है। महाशक्ति की यह तस्‍वीर महादयनीय है।
बेरोजगार अमेरिका
अमेरिकी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां करीब दो ट्रिलियन डॉलर की नकदी पर बैठी हैं!! लेकिन रोजगार नहीं हैं। सस्‍ते बाजारों में उत्‍पादन से मुनाफा कमाने के मॉडल ने अमेरिका को तोड़ दिया है। अमेरिका के पास शानदार कंपनियां तो हैं मगर रोजगार चीन, भारत थाइलैंड को मिल रहे हैं। देश में बेकारी की बढोत्‍तरी दर पिछले दो साल 9 फीसदी पर बनी हुई है। इस समय अमेरिका में करीब 140 लाख लोग बेकार  हैं। अगर आंशिक बेकारी को शामिल कर लिया जाए तो इस अमीर मुल्‍क में बेकारी की दर 16.5 हो जाती है। लोगों को औसतन 41 हफ्तों तक कोई काम नहीं मिल रहा है। 1948 के बाद बेकारी का यह सबसे भयानक चेहरा है। बेरोजगारी भत्‍ते के लिए सरकार के पास आवेदनों की तादाद कम नहीं हो रही है। बैंक ऑफ अमेरिका ने 30000 नौकरियां घटाईं हैं जबकि अमेरिकी सेना ने पांच वर्षीय भर्ती कटौती अभियान शुरु कर दिया। आलम यह है कि कर्मचरियों को बाहर का रास्‍ता दिखाने की रफ्तार 212 फीसदी पर है। पिछले माह अमेरिका में करीब सवा लाख लोगों की नौकिरयां गई हैं। इस बीच नौकरियां बढ़ाने के लिए ओबामा का 447 अरब डॉलर का प्रस्‍ताव प्रतिस्‍पर्धी राजनीति में फंस कर संसद में (इसी शुक्रवार को) गिर गया है, जिसके बाद रही बची उम्‍मीदें भी टूट गईं हैं। अमेरिका अब गरीब (अमेरिकी पैमानों पर) मुल्‍क में तब्‍दील होने लगा है।
गरीब अमेरिका
अमेरिकी यूं ही नहीं गुस्‍साये हैं। दुनिया के सबसे अमीर मुल्‍क में 460 लाख लोग बाकायदा गरीब (अमेरिकी पैमाने पर) हैं। अमेरिका में गरीबी के हिसाब किताब की 52 साल पुरानी व्‍यवस्‍था में निर्धनों की इतनी बड़ी तादाद पहली बार दिखी है। अमेरिकी सेंसस ब्‍यूरो व श्रम आंकड़े बताते हैं कि देश में गरीबी बढ़ने की दर 2007 में 2.1 फीसदी थी जो अब 15 फीसदी पर पहुंच गई है। मध्‍यमवर्गीय परिवारों की औसत आय 6.4 फीसदी घटी है। 25 से 34 साल के करीब 9 फीसदी लोग (पूरे परिवार आय के आधार पर) गरीबी की रेखा से नीचे हैं। यदि व्‍यक्तिगत आय को आधार बनाया जाए तो आंकड़ा बहुत बड़ा होगा। लोगों की गरीबी कर्ज में डूबी सरकार को और गरीब कर रही है। अमेरिका के करीब 48.5 फीसदी लोग किसी न किसी तरह सरकारी सहायता पर निर्भर हैं। अमेरिका का टैक्‍स पॉलिसी सेंटर कहता है कि देश के 46.5 फीसदी परिवार केंद्र सरकार कोई टैक्‍स नहीं देते यानी कि देश की आधी उत्‍पादक व कार्यशील आबादी शेष आधी जनसंख्‍या से मिलने वाले टैक्‍स पर निर्भर है। यह एक खतरनाक स्थिति है। अमेरिका को इस समय उत्‍पादन, रोजगार और ज्‍यादा राजस्‍व चाहिए जबकि सरकार उलटे टैक्‍स बढ़ाने व खर्च घटाने जा रही है।
बेबस अमेरिका  
इस मुल्‍क की कंपनियां व शेयर बाजार देश में उपभोक्‍ता खर्च का आंकड़ा देखकर नाच उठते थे। अमेरिका के जीडीपी में उपभोक्‍ता खर्च 60 फीसदी का हिस्‍सेदार है। बेकारी बढने व आय घटने से यह खर्च कम घटा है और अमेरिका मंदी की तरफ खिसक गया। अमेरिकी बचत के मुरीद कभी नहीं रहे इसलिए उपभोक्‍ता खर्च ही ग्रोथ का इंजन था। अब मंदी व वित्‍तीय संकटों से डरे लोग बचत करने लगे हैं। अमेरिका में बंद होते रेस्‍टोरेंट और खाली पड़े शॉपिंग मॉल बता रहे हैं कि लोगों ने हाथ सिकोड़ लिये हैं। किसी भी देश के लिए बचत बढ़ना अच्‍छी बात है मगर अमेरिका के लिए बचत दोहरी आफत है। कंपनियां इस बात से डर  रही हैं अगर अमेरिकी सादा जीवन जीने लगे और बचत दर 5 से 7 फीसदी हो गई तो मंदी बहुत टिकाऊ हो जाएगी।  दिक्‍कत इ‍सलिए पेचीदा है क्‍यों कि अमेरिका में 1946 से 1964 के बीच पैदा हुए लोग, (बेबी बूम पीढ़ी) अब बुढ़ा रहे हैं। इनकी कमाई व खर्च ने ही अमेरिका को उपभोक्‍ता संस्‍कृति का स्‍वर्ग बनाया था। यह पीढ़ी अब रिटायरमेंट की तरफ है यानी की कमाई व खर्च सीमित और चिकित्‍सा पेंशन आदि के लिए सरकार पर निर्भरता। टैक्‍स देकर के जरिये अमेरिकी सरकार को चलाने यह पीढ़ी अब सरकार की देखरेख में अपना बुढ़ापा काटेगी। मगर इसी मौके पर सरकार कर्ज में डूब कर दोहरी हो गई है।
अमेरिका आंदोलनबाज देश नहीं है। 1992 में लॉस एंजल्‍स में दंगों (अश्‍वेत रोडनी किंग की पुलिस पिटाई में मौत) के बाद पहली बार देश इस तरह आंदोलित दिख रहा है। अमेरिकी शहरों को मथ रहे आंदोलनों का मकसद और नेतृत्‍व भले ही अस्‍पष्‍ट हो मगर पृष्‍ठभूमि पूरी दुनिया को दिख रही है। मशहूर अमेरिकन ड्रीम मुश्किल में है,  बेहतर, समृद्ध और संपूर्ण जिंदगी व बराबरी के अवसरों ( इपिक ऑप अमेरिका- जेम्‍स ट्रुसलो एडम्‍स) का बुनियादी अमेरिकी सपना टूट रहा है। इस भयानक संकट के बाद दुनिया को जो अमेरिका मिलेगा वह पहले जैसा बिल्‍कुल नहीं होगा। अपनी जनता की आंखों में अमेरिकन ड्रीम को दोबारा बसाने के लिए अमेरिका को बहुत कुछ बदलना पड़ेगा। चर्चिल ने ठीक ही कहा था कि अमेरिका पर इस बात के लिए भरोसा किया जा सकता है कि वह सही काम करेगा लेकिन कई गलतियों के बाद। ... अमेरिका का प्रायश्चित शुरु हो गया है।
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Monday, October 10, 2011

बैंक बलिदान पर्व

ग्रीस डूबने को तैयार है.. इसे यूं भी लिखा जा सकता है कि यूरोप के तमाम के बैंक डूबने को तैयार हैं। किसी देश का ,दीवालिया होने उसे खत्‍म नहीं कर देता है मगर ग्रीस के कर्ज चुकाने में चूकते ही कई बैंकों के दुनिया के नक्‍शे मिटने की नौबत आ जाएगी। दुनिया ग्रीस को बचाने के लिए बेचैन है ही नहीं, जद्दोजहद तो पूरी दुनिया के बैंकों, खासतौर पर यूरोप के बैंकों को महासंकट से बचाने की है। लीमैन और अमेरिका के कई बैंकों के डूबने के तीन साल के भीतर दुनिया में दूसरी बैंकिंग त्रासदी का मंच तैयार है। यूरोप में बैंकों के बलिदान का मौसम शुरु हो चुका है। डरे हुए वित्‍तीय नियामक बैंको को यानी आग के दरिया से गुजारने की योजना तैयार कर रहे हैं, ताकि जो बच सके बचा लिया जाए। बैंकों पर सख्‍ती की ताजी लहर भारत (स्‍टेट बैंक रेटिंग में कटौती) तक आ पहुंची है। यूरोप के संकट से बैंकों की दुनिया और दुनिया के बैंकों की सूरत व सीरत बदलना तय है।
बैंकों की बदहाली
370 बिलियन डॉलर के कर्ज से दबे ग्रीस के दीवालिया होते ही यूरोप के बैंकों में बर्बादी का बडा दौर शुरु होने वाला है। यह कर्ज तो बैंकों ने ही दिया है। बैंकों को यदि ग्रीस पर बकाया कर्ज का 40 फीसदी हिस्‍सा भी माफ करना पड़ा तो उनके बहुत बड़ी पूंजी डूब जाएगी। अपनी सरकार के कर्ज में सबसे बडे हिस्‍सेदार ग्रीस के बैंक तो उड़ ही जाएंगे। यूरोप के बैंक व सरकारें मिलकर ग्रीस के कर्ज में 60 फीसदी की हिस्‍सेदार हैं। इनमें भी फ्रांस, जर्मनी, इटली के बैंकों का हिस्‍सा काफी बड़ा है। इसलिए फ्रांस के दो प्रमुख बैंक बीएनपी पारिबा और क्रेडिट एग्रीकोल अपनी रेटिंग खो चुके हैं। पुर्तगाल, आयरलैंड व इटली भी कर्ज संकट में है और इन्‍हें कर्ज देने वाले बैंक ब्रिटेन, जर्मनी व स्‍पेन के हैं। यानी पूरे यूरोप के बैंक खतरे

Monday, October 3, 2011

पलटती बाजी

ह यूरोप और अमेरिका के संकटों का पहला भूमंडलीय तकाजा था, जो बीते सपताह भारत, ब्राजील, कोरिया यानी उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं के दरवाजे पर पहुंचा। इस जोर के झटके में रुपया, वॉन (कोरिया), रिएल (ब्राजील), रुबल, जॉल्‍टी(पोलिश), रैंड (द.अफ्रीका) जमीन चाट गए। यह 2008 के लीमैन संकट के बाद दुनिया के नए पहलवानों की मुद्राओं का सबसे तेज अवमूल्‍यन था। दिल्‍ली, सिओल, मासको,डरबन को पहली बार यह अहसास हुआ कि अमेरिका व यूरोप की मुश्किलों का असर केवल शेयर बाजार की सांप सीढ़ी तक सीमित नहीं है। वक्‍त उनसे कुछ ज्‍यादा ही बडी कीमत वसूलने वाला है। निवेशक उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं में उम्‍मीदों की उड़ान पर सवार होने को तैयार नहीं हैं। शेयर बाजारों में टूट कर बरसी विदेशी पूंजी अब वापस लौटने लगी है। शेयर बाजारों से लेकर व्‍यापारियों तक सबको यह नई हकीकत को स्‍वीकारना जरुरी है कि उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं के लिए बाजी पलट रही है। सुरक्षा और रिर्टन की गारंटी देने वाले इन बाजारों में जोखिम का सूचकांक शिखर पर है।
कमजोरी की मुद्रा
बाजारों की यह करवट अप्रत्याशित थी, एक साल पहले तक उभरते बाजार अपनी अपनी मुद्राओं की मजबूती से परेशान थे और विदशी पूंजी की आवक पर सख्‍ती की बात कर रहे थे। ले‍किन अमेरिकी फेड रिजर्व की गुगली ने उभरते बाजारों की गिल्लियां बिखेर दीं। फेड  का ऑपरेशन ट्विस्‍ट, तीसरी दुनिया के मुद्रा बाजार में कोहराम की वजह बन गया। अमेरिका के केंद्रीय बैंक ने देश को मंदी से उबारने के लिए में छोटी अवधि के बांड बेचकर लंबी अवधि के बांड खरीदने का फैसला किया। यह फैसला बाजार में डॉलर छोडकर मुद्रा प्रवाह बढाने की उम्‍मीदों से ठीक उलटा था। जिसका असर डॉलर को मजबूती की रुप में सामने आया। अमेरिकी मुद्रा की नई मांग निकली और भारत, कोरिया, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील के केद्रीय बैंक जब तक बाजार का बदला मिजाज समझ पाते तब तक इनकी मुद्रायें डॉलर के मुकाबले चारो खाने चित्‍त

Monday, September 26, 2011

वो रही मंदी !

डा नाज था हमें अपने विश्‍व बैंकों, आईएमएफों, जी 20, जी 8, आसियान, यूरोपीय समुदाय, संयुक्‍त राष्‍ट्र की ताकत पर !! बड़ा भरोसा था अपने ओबामाओं, कैमरुनों, मर्केलों, सरकोजी, जिंताओ, पुतिन, नाडा, मनमोहनों की समझ पर !!..मगर किसी ने कुछ भी नहीं किया। सबकी आंखों के सामने मंदी दुनिया का दरवाजा सूंघने लगी है। उत्‍पादन में चौतरफा गिरावट, सरकारों की साख का जुलूस, डूबते बैंक और वित्‍तीय तंत्र की पेचीदा समस्‍यायें ! विश्‍वव्‍यापी मंदी के हरकारे जगह जगह दौड़ गए हैं। ... मंदी के डर से ज्‍यादा बड़ा खौफ यह है कि बहुपक्षीय संस्‍थाओं और कद्दावर नेताओं से सजी दुनिया का राजनीतिक व आर्थिक नेतृत्‍व उपायों में दीवालिया है। यह पहला मौका है जब इतने भयानक संकट को से निबटने के लिए रणनीति बनाना तो दूर  दुनिया के नेता साझा साहस भी नहीं दिखा रहे हैं। यह अभूतपूर्व विवशता, दुनिया को दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद सबसे भयानक आर्थिक भविष्‍य की तरफ और तेजी से धकेल रही है।
मंदी पर मंदी
मंदी की आमद भांपने के लिए ज्‍योतिषी होने की जरुरत नहीं है। आईएमएफ बता रहा है कि दुनिया की विकास दर कम से कम आधा फीसदी घटेगी। अमेरिका में बमुश्किल 1.5 फीसदी की ग्रोथ रहेगी जो अमेरिकी पैमानों पर शत प्रतिशत मंदी है। पूरा यूरो क्षेत्र अगर मिलकर 1.6 फीसदी की रफ्तार दिखा सके तो अचरज होगा। जापान में उत्‍पादन की विकास दर शून्‍य हो सकती है। यूरो जोन में कंपनियों के लिए ऑर्डर करीब 2.1 फीसदी घट गए हैं। यूरो मु्द्रा का इस्‍तेमाल करने वाले 17 देशों में सेवा व मैन्‍युफैक्‍चरिंग सूचकांक दो साल के न्‍यूनतम

Monday, September 19, 2011

शुद्ध स्‍वदेशी संकट

क्या हमारी सरकार दीवालिया (जैसे यूरोप) हो रही है?  क्या हमारे बैंक (जैसे अमेरिका) डूब रहे हैं? क्या हमारा अचल संपत्ति बाजार ढह (जैसे चीन) रहा है?  क्या हम सूखा, बाढ़ या सुनामी (जैसे जापान) के मारे हैं ? इन सब सवालों का जवाब होगा एक जोरदार नहीं !! तो फिर हमारी ग्रोथ स्टोरी त्रासदी में क्यों बदलने जा रही है ? हम क्यों औद्योगिक उत्पाहदन में जबर्दस्त गिरावट, बेकारी और बजट घाटे की समस्याओं की तरफ बढ़ रहे हैं। हम तो दुनिया की ताजी वित्तीय तबाही से लगभग बच गए थे। हमें तो सिर्फ महंगाई का इलाज तलाशना था, मगर हमने मंदी को न्योत लिया। भारतीय अर्थव्यवस्था का ताजा संकट विदेश से नहीं आया है इसे देश के अंदाजिया आर्थिक प्रबंधन, सुधारों के शून्य और खराब गवर्नेंस ने तैयार किया है। हमारी की ग्रोथ का महल डोलने लगा है। नाव में डूबना इसी को कहते हैं।
महंगाई का हाथ
महंगाई का हाथ पिछले चार साल से आम आदमी के साथ है। इस मोर्चे पर सरकार की शर्मनाक हार काले अक्षरों में हर सप्ताह छपती है और सरकार अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के पीछे छिपकर भारतीयों को सब्सिडीखोर होने की शर्म से भर देती है। भारतीय महंगाई अंतरराष्ट्री य कारणों से सिर्फ आंशिक रुप से प्रेरित है। थोक कीमतों वाली (डब्लूपीआई) महंगाई में सभी ईंधनों (कोयला, पेट्रो उत्पाद और बिजली) का हिस्सां केवल

Saturday, September 17, 2011

भारत का चौथाई औद्योगिक उत्‍पादन चीन का मोहताज

विशेष पोस्‍ट

दैनिक जागरण में 16 सितंबर को प्रकाशित समाचार

चीन का खतरा अब देश की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर भी उसका परोक्ष कब्जा हो गया है। लगभग 26 फीसदी औद्योगिक उत्पादन चीन से आयातित इनपुट या उत्पादों पर निर्भर है, यानी उसकी मुट्ठी में है। यह हैरतअंगेज निष्कर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) का है। एनएसए सचिवालय ने चीन पर हाल में सरकारी विभागों को एक रिपोर्ट दी है। इसके अनुसार चीन ने कई संवेदनशील क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता पर दांत गड़ा दिए हैं। बिजली, दवा, दूरसंचार और सूचना तकनीक के क्षेत्रों में उसका दखल खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। रिपोर्ट के बाद विदेश मंत्रालय व आर्थिक मंत्रालयों में हड़कंप है।
  करीब आठ पेज की यह गोपनीय रिपोर्ट बेहद सनसनीखेज है। एनएसए ने इस साल मार्च में योजना आयोग और अगस्त में आर्थिक मंत्रालयों के साथ बैठक की थी। इसके बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की नीयत और नीतियां साफ नहीं है। चीन दूरसंचार और सूचना तकनीक के क्षेत्रों में अपने दखल का इस्तेमाल साइबर जासूसी के लिए कर सकता है। इस रहस्योद्घाटन ने सरकार के हाथों से तोते उड़ा दिए हैं कि अगले पांच साल में चीन हमारे 75 फीसदी मैन्यूफैक्चरिंग उत्पादन को नियंत्रित करने लगेगा। इस समय देश मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का करीब 26 फीसदी उत्पादन चीन से मिलने वाली आपूर्ति के भरोसे है। एक देश पर इतनी निर्भरता अर्थव्यवस्था को गहरे खतरे

Monday, September 12, 2011

महासंकट ! मेड इन चाइना

अंतरराष्ट्रीय वित्ती‍य संकट की डरावनी कथा अभी पूरी नहीं हुई है। इसका नया अध्याय ठीक पड़ोस में यानी चीन में लिखा जा रहा है। ग्रोथ की दंतकथायें बना चुका चीन का अचल संपत्ति बाजार बस फटने को तैयार है। अमेरिका, दुबई और आयरलैंड में प्रॉपर्टी बाजार में तबाही क्षत विक्षत हो चुके निवेशक अब आंखे फाड़े  ड्रैगन को देख रहे हैं। चीन की ग्रोथ में करीब पंद्रह फीसदी का हिस्सेदार भवन निर्माण क्षेत्र का डूबना विश्वेव्यापी मंदी की ताल ठोंक गारंटी होगी। विकीलीक्स के ताजे खुलासों ने चीन को लेकर पारदर्शिता के पुराने शक फिर उभर आऐ हैं। चीन के कुछ वरिष्ठ नेता अपने देश की शानदार ग्रोथ के आंकड़ों की प्रामाणिकता पर संदेह करते हुए पाए गए हैं। बदकिस्‍मती देखिये कि जब दुनिया मंदी से बचने के लिए चीन की ग्रोथ के कवच का इस्तेमाल करना चाहती है तो  ड्रैगन तो नए संकट की भयानक आग उगलने वाला है।
प्रॉपर्टी का भस्मा्सुर
चीन भवन निर्माण का महासागर है। चीन के उप नगरीय इलाकों की एक हालिया और चर्चित उपग्रह तस्वीर ने दुनिया को दिखाया कि ग्रोथ की झोंक में चीन किस तरह शहर पर शहर बसा रहा है। आकाश चूमती क्रेनें, विशालकाय भवन और निर्माण के करिश्में चीन के नगरों की पहचान हैं। दुनिया यह जानकर हैरत में हैं कि विश्‍व का सबसे जोखिम भरा कारोबार, दरअसल चीन की ग्रोथ में सबसे बड़ा

Monday, September 5, 2011

सोने का क्या होना है ?

सोने के सिक्‍कों का प्रचलन !! फिर से ??... अमेरिका के राज्य यूटॉ ने बीते माह एक कानून पारित कर सोने व चांदी के सिक्‍कों का इस्तेमाल कानूनी तौर पर वैध कर दिया !!! सरकारें यकीनन बदहवास हो चली हैं। मगर हमें बेचैन होने से पहले  दूसरी तस्वीर भी देख लेनी चाहिए। बीते सप्तांह सोना ऐतिहासिक ऊंचाई पर जाने के बाद ऐसा टूटा कि (तीन दिन में 200 डॉलर) कि नया इतिहास बन गया। निवेशक कराहते हुए नुकसान गिनते रह गए।... वित्तींय संकटों के तूफान में सोना अबूझ हो चला है। अनोखी तेजी व गिरावट, मांग व आपूर्ति की पेचीदा गणित और सरकारों की ऊहापोह ने सोने की गति को रोमांचक और रहस्‍यमय बना दिया है। डॉलर, यूरो, येन की साख घटते देख, निवेशक सोने पर दांव लगाये जा रहे हैं  और सोने का उत्पादन तलहटी पर है और यह धातु वर्तमान मौद्रिक प्रणाली फिट भी नहीं होती। इसलिए असमंजस चरम पर है। सोने का इतिहास जोखिम भरा है, भविष्‍य अनिश्चित है मगर संकटों का वर्तमान इसे चमका रहा है। दुनिया में सोना नहीं बल्कि यह सवाल ज्यादा चमक रहा हे कि सोने का अब क्या होना है ??
अतीत की परछाईं
सोने को अतीत की रोशनी में परखना जरुरी है। आधुनिक होती दुनिया सोने से दूरी बढ़ाती चली गई है। पंद्रह अगस्त 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अमेरिकी डॉलर सोने की करीब 2000 वर्ष पुरानी गुलामी से आजाद किया था। अमेरिका में गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म होते सरकारों की गारंटी वाली बैंक मुद्रा का जमाना आ गया। गोल्ड स्टैंडर्ड का मतलब था कि कागज की मुद्रा के मूल्य के बराबर सोना लेने की छूट। जबकि इनकी जगह आए बैंकनोट (तकनीकी भाषा में फिएट करेंसी या लीगल टेंडर) सरकारी की गारंटी वाले दस्तावेज हैं, जिनको नकारना गैर कानूनी है। चीन के तांग व सोंग (607 से 1200 ईपू) शासनकालों के दौरान आई नोटों की यह सूझ

Monday, August 29, 2011

नेतृत्‍व का ग्‍लोबल संकट

राक ओबामा, एंजेला मर्केल, निकोलस सरकोजी, डेविड कैमरुन, नातो कान, मनमोहन सिंह, आंद्रे पापेद्रू (ग्रीस), बेंजामिन् नेतान्याहू, रो्ड्रियो जैप्टारो (स्पे न) आदि राष्ट्राध्यक्ष सामूहिक तौर पर इस समय दुनिया को क्या दे रहे हैं ??  केवल घटता भरोसा,  बढता डर और भयानक अनिश्चितता !!!!  सियासत की समझदारी ने बड़े कठिन मौके पर दुनिया का साथ छोड़ दिया है। हर जगह सरकारें अपनी राजनीतिक साख खो रही हैं। राजनीतिक अस्थिरता के कारण इस सप्‍ताह जापान की रेटिंग घट गई। दुनिया के कई प्रमुख देश राजनीतिक संकट के भंवर में है। भारत में अन्ना की जीत सुखद है मगर एक जनांदोलन के सामने सरकार का बिखर जाना फिक्र बढ़ाता है। मंदी तकरीबन आ पहुंची है। कर्ज का कीचड़ बाजारों को डुबाये दे रहा है। इस बेहद मुश्किल भरे दौर में पूरी दुनिया के पास एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसके सहारे उबरने की उम्मीद बांधी जा सके। राजनीतिक नेतृत्व की ऐसी अंतरराष्ट्रीय किल्‍लत अनदेखी है। पूरी दुनिया नेतृत्व के संकट से तप रही है।
अमेरिकी साख का डबल डिप
ओबामा प्रशासन ने स्टैंडर्ड एंड पुअर के मुखिया देवेन शर्मा की बलि ले ली। अपना घर नहीं सुधरा तो चेतावनी देने वाले को सूली पर टांग दिया। मगर अब तो फेड रिजर्व के मुखिया बर्नांकी ने भी संकट की तोहमत अमेरिकी संसद पर डाल दी है। स्टैंडर्ड एंड पुअर ने दरअसल अमेरिका की वित्तींय साख नहीं बल्कि राजनीतिक साख घटाई थी। दुनिया का ताजी तबाही अमेरिका पर भारी कर्ज से नहीं निकली, बल्कि रिपब्लिकन व डेमोक्रेट के झगड़े