Friday, August 16, 2019

डुबाने की लत



इंडिगो की उड़ान में पूरे जतन से आवभगत में लगी एयर होस्टेस को अंदाजा नहीं होगा कि उनकी शानदार (अभी तक) कंपनी के निदेशक आपस में क्यों लड़ रहे हैं? सेबी किस बात की जांच कर रहा है? जेट एयरवेज के 20,000 से अधिक कर्मचारियों को यह समझ में नहीं आया कि उनकी कंपनी के मालिक या बोर्ड ने ऐसा क्या कर दिया जिससे कंपनी के साथ उनकी खुशियां भी डूब गईं. आम्रपाली से मकान खरीदने वालों को भी कहां मालूम था कि कंपनी किस कदर हेराफेरी कर रही थी! 

सरकारी कंपनियों का कुप्रबंध, हमारी अकेली मुसीबत नहीं है. भारत अब चमकते ब्रान्ड और कंपनियों का कब्रिस्तान बन रहा है. सत्यम, एडीएजी (अनिल अंबानी समूह), वीडियोकॉन, सहारा, मोदीलुफ्त, रोटोमैक, जेपी समूह, नीरव मोदी, गीतांजलि जेम्स, जेट एयरवेज, किंगफिशर, यूनीटेक, आम्रपाली, आइएलऐंडएफएस, स्टर्लिंग बायोटेक, भूषण स्टील...यह सूची खासी लंबी हो सकती है...टाटा, फोर्टिस और इन्फोसिस के बोर्ड में विवादों या कैफे कॉफी डे में संकट से हुए नुक्सान (शेयर कीमत) को जोड़ने के बाद हमें अचानक महसूस होगा कि भारत के निजी प्रवर्तक तो कहीं ज्यादा बड़े आत्माघाती हैं. 

किसी कंपनी के प्रबंधन या खराब कॉर्पोरेट गवर्नेंस से हमें फर्क क्यों नहीं पड़ता? कंपनियों का बुरा प्रबंधन, किसी खराब सरकार जितना ही घातक है. सरकार को तो फिर भी बदला जा सकता है लेकिन कंपनियों के प्रबंधन को बदलना असंभव है.

भारत में खराब कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जितनी बड़ी कंपनियां डूबी हैं, या प्रवर्तकों के दंभ और गलतियों ने जितनी समृद्धि का विनाश (वेल्थ डिस्ट्रक्शन) किया है वह मंदी से होने वाले नुक्सान की तुलना में कमतर नहीं है.

दरअसल, यह तिहरा विनाश है.

एकशेयर निवेशक अपनी पूंजी गंवाते हैं. जैसे, कुछ साल पहले तक दिग्गज (आरकॉम, वीडियोकॉन, यूनीटेक, वोडाफोन, सुजलॉन) कंपनियों के शेयर अब एक दो रुपए में मिल रहे हैं.

दोइनमें बैंकों की पूंजी (पीएनबी-नीरव मोदी) डूबती है जो दरअसल आम लोगों की बचत है और

तीसराअचानक फटने वाली बेकारी जैसे जेट एयरवेज, आरकॉम, यूनीनॉर.

देश में कॉर्पोरेट गवर्नेंस यानी कंपनी को चलाने के नियम कागजों पर दुनिया में सबसे सख्त होने के बावजूद घोटालों की झड़ी लगी है. कंपनियों के निदेशक मंडलों के कामकाज सिरे से अपारदर्शी हैं. इन्हें ठीक करने का जिम्मा प्रवर्तकों पर है, जिनकी बोर्ड में तूती बोलती है. इंडिगो या फोर्टिस में विवाद के बाद ही इन कंपनियों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की कलई खुली. टाटा संस के बोर्ड ने सायरस मिस्त्री को शानदार चेयरमैन बताने के कुछ माह बाद ही हटा दिया. इन्फोसिस का निदेशक मंडल, कभी विशाल सिक्का तो कभी पूर्व प्रवर्तक नारायणमूर्ति का समर्थक बना और इस दौरान निवेशकों ने गहरी चोट खाई.

वीडियोकॉन को गलत ढंग से कर्ज देने के बाद भी चंदा कोचर आइसीआइसीआइ में बनी रहीं. येस बैंक के एमडी सीईओ राणा कपूर को हटाना पड़ा या कि आइएलऐंडएफएस ने असंख्य सब्सिडियरी के जरिए पैसा घुमाया और बोर्ड सोता रहा. नजीरें और भी हैं. कंपनियों पर प्रवर्तकों के कब्जे के कारण स्वतंत्र निदेशक नाकारा हो जाते हैं, नियामक ऊंघते रहते हैं, किसी की जवाबदेही नहीं तय हो पाती और अचानक एक दिन कंपनी इतिहास बन जाती है.

भारतीय कंपनियों के प्रमोटर, पैसे और बैंक कर्ज के गलत इस्तेमाल के लिए कुख्यात हो रहे हैं. आम्रपाली के फोरेंसिक ऑडिट से ही यह पता चला कि मालिकों ने चपरासी और निचले कर्मचारियों के नाम से 27 से ज्यादा कंपनियां बनाई, जिनका इस्तेमाल हेराफेरी के लिए होता था. ताकतवर प्रमोटर, बैंक, रेटिंग एजेंसियों और ऑडिट के साथ मिलकर एक कार्टेल बनाते हैं जो तभी नजर आता है जब कंपनी कर्ज में चूकती या डूबती है जैसा कि आइएलऐंडएफएस में हुआ. 

प्रवर्तकों के दंभ और गलत फैसलों से हुए नुक्सान की सूची (जैसे टाटा नैनो, किंगफिशर) भी लंबी है. जल्द से जल्द बड़े हो जाने के लालच में भारतीय उद्यमी बैंक कर्ज और रसूख के सहारे ऐसे उद्योगों में उतर जाते हैं जहां न उनका तजुर्बा है, न जरूरत. मकान बनाते-बनाते आम्रपाली फिल्म बनाने लगी और अनिल अंबानी समूह वित्तीय सेवाएं चलाते-चलाते राफेल की मरम्मत का काम लेने लगे. पश्चिम की कंपनियां लंबे समय तक एक ही कारोबार में रहकर निवेशकों और उपभोक्ताओं को बेहतर रिटर्न व सेवाएं देती हैं जबकि भारत की 80 फीसदग्रेटकंपनियां पूंजी पर रिटर्न गंवाकर या कर्ज में फंस कर बहुत कम समय में औसत स्तर पर आ जाती हैं.

कंपनियों में खराब गवर्नेंस से सरकारें क्यों फिक्रमंद होने लगीं? उन्हें तो इनसे मिलने वाले टैक्स या चुनावी चंदे से मतलब है. प्रवर्तकों का कुछ भी दांव पर होता ही नहीं. डूबते तो हैं रोजगार और बैंकों का कर्ज. मरती है बाजार में प्रतिस्पर्धा. जाहिर है कि इस नुक्सान से किसी नेता की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

Saturday, August 10, 2019

सुधार की हार



Art- Asit 
ठीक ही कहते थे रोनाल्ड रेगनसरकारें समस्याओं का समाधान नहीं करतीं बल्कि उन्हें नए क्रम में पुनर्गठित कर देती हैंदो साल पुरानी भारत की दूसरी आजादी यानी जीएसटी को लेकर अगर आपको भी ऐसा ही महसूस होता है तो अब देश के संवैधानिक ऑडिटर यानी सीएजी को अपने दर्द से इत्तेफाक करता हुआ पाएंगे.

सीएजी ने जीएसटी की ‘समग्र असफलता’ का रिपोर्ट कार्ड संसद को सौंप दिया हैजिसे पढ़ते हुए बरबस 30 जून, 2017 की मध्य रात्रि याद आ जाती है जब जगमगाते संसद भवन और दिग्गजों से सजे सेंट्रल हॉल में युगांतरकारी जीएसटी अवतरित हुआ थाचैनल-चैनल घूमकर बधाई गाते हुए सरकार के मंत्री बता रहे थे कि जीएसटी के अवतार के बाद

·       कारोबार करना दुनिया में सबसे आसान हो जाएगा
·       टैक्स चोर तो दिखेंगे ही नहीं        
·       सरकार का खजाना भर जाएगा
·       देश की विकास दर में कम से दो फीसद का इजाफा तो तय समझिए 

जीएसटी पर सीएजी की ताजा रिपोर्ट 1991 के बाद भारत के सबसे बडे़ आर्थिक सुधार की श्रद्धांजलि है.

जीएसटी के तहत कारोबारी सहजता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेसको तलाशने निकले सीएजी को क्या मिला?

ऑडिटर ने रजिस्ट्रेशन सिस्टम की पड़ताल से शुरुआत की जो करदाता के लिए जीएसटी के तिलिस्म का प्रवेश द्वार हैपता चला कि कई जरूरी सूचनाएं गलत भरी जा रही हैंयहां तक कि कंपोजिशन स्कीम (छोटे टैक्सपेयर के लिए टर्न ओवर आधारित जीएसटीका गलत फायदा लिया जा रहा है.

निर्माता और सप्लायर की इनवॉयस यानी बिल का शत प्रतिशत  (रियल टाइममिलान जीएसटी का सबसे बुनियादी सुधार था क्योंकि इसके आधार पर कच्चे माल पर चुकाया गया कर वापस (रिफंडहोना थायह व्यवस्था कभी लागू नहीं हो सकीनतीजतनजीएसटी में जमकर फ्रॉड हुएएक करदाता ने 6 लाख करोड़ रुके रिफंड का दावा कर दियाजिसे बाद में सुधारा गया.

पंजीकरणहिसाब-किताब (इनवॉयस मिलानकी तरह ही टैक्स भुगतान का सिस्टम भी घिसट रहा हैडेबिट क्रेडिट कार्ड से टैक्स भुगतान आज तक शुरू नहीं हुआइन असफलताओं के चलते औसतन 60 फीसद करदाता ही रिटर्न फाइल करते हैं.

सीएजी ने दुख के साथ सूचित किया कि जीएसटी आने के बाद कर ईमानदारी तो नहीं बढ़ी अलबत्ता चोरी काफी बढ़ गई है.

कर नियमों के पालननए करदाताओं और खपत (कर दरों में रियायत के कारणमें बढ़ोतरी की मदद से राजस्व बढ़ना था लेकिन यह सुधार तो सरकारी खजानों को बहुत महंगा पड़ा हैजीएसटी लागू होने से पहले (2016-17) में सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी की दर 21.33 फीसद थी जो घटकर करीब एक-चौथाई यानी 5.80 फीसद (2017-18) रह गईजीएसटी में कई टैक्स शामिल किए गए थेउनसे मिलने वाले राजस्व की तुलना में केंद्र की जीएसटी से कमाई दस फीसद (2017-18) घट गई.

ऑडिटर की रिपोर्ट यह भी बताती है कि सरकार ने अंतर्राज्यीय कारोबार पर लगने वाले आइजीएसटी को राज्यों के साथ बांटने में संविधान के नियमों का उल्लंघन कियाइसमें कई राज्यों के साथ भेदभाव हुआ हैइस गफलत पर सीएजी की मुहर के बाद राज्य मुखर हो सकते हैं.

लगभग 122 पेज की यह रिपोर्ट नियमों में बार-बार बदलावजीएसटीएन में तकनीकी खामियांगलत गणनाओं की पड़ताल करते हुए कहती हैसरकार को यह समझना चाहिए था कि जीएसटी जैसे विशाल और जटिल सिस्टम में जरा सी चूक बड़े नुक्सान व असुविधा का सबब बनेगी लेकिन यहां तो दो साल से जीएसटी का संक्रमण पूरा होता ही नहीं दिख रहा है.

याद रखना जरूरी है कि उस मध्य रात्रि के जीएसटी अवतरण की गहमागहमी के बीच देश की विकास दर दो फीसद बढ़ने का सपना भी दिखाया गया थाजीएसटी में असंख्य बदलाव हुए लेकिन इस सुधार के बाद न केवल हर प्रमुख उत्पाद की खपत गिरी है बल्कि आर्थिक विकास दर हर तिमाही नए गड्ढे तलाश रही है.

सबसे गंभीर बात यह है कि वित्त मंत्रालय ने तमाम लानत-मलामत के बावजूद सीएजी को जीएसटी के अखिल भारतीय आंकड़े का ऑडिट करने की छूट नहीं दीसीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ये खामियां फील्ड ऑडिट के आधार पर पाई हैंइसलिए यह सीमित ऑडिट है.

सनद रहे कि जीएसटी कानून के प्रारंभिक प्रारूप की धारा 65 के तहत सीएजी को जीएसटी काउंसिल से सूचनाएं तलब करने का अधिकार था लेकिन अक्तूबर 2017 में जीएसटी काउंसिल ने इस सुधार की निगहबानी से सीएजी को दूर कर दिया. 

समझा जा सकता है कि सरकार जीएसटी से सीएजी को क्यों दूर रखना चाहती थी.

एक घटिया सुधार ने अर्थव्यवस्था के दो साल बर्बाद कर दिएजीएसटी का समग्र ऑडिट और इस विफलता पर सरकार की जवाबदेही अब लोकतंत्र का तकाजा है.


Friday, August 2, 2019

क्या होगा, कौन से पल में!


आर्थिक नीतियों की अनिश्चितता सबसे बड़ी मुसीबत हैयह पूंजी और कारोबार की लागत बढ़ाती हैखराब व उलझन भरे कानूनरोज-रोज के बदलावमनचाही रियायतेंनियमों की असंगत व्याख्याएं और कानूनी विवाद...इसके बाद नया निवेश तो क्या आएगामौजूदा निवेश ही फंस जाता है.


गर आपको लगता है कि यह सरकार से नाराज किसी उद्यमी का दर्द है या किसी दिलजले अर्थशास्त्री की नसीहत है तो संभलिए...ऊपर लिखे शब्द ताजा आर्थिक समीक्षा (2018-19) में छपे हैं जो भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का ख्वाब दिखाती हैसमीक्षा भी उसी टकसाल का उत्पाद है जहां से इस साल का बजट निकला है.

आर्थिक समीक्षा फैसलों में अनिश्चितता के बुरे असर को तफसील से समझाती है तो फिर बजट ऐसा क्यों है जिसके बाद हर तरफ मंदी के झटके कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं?
क्या यह कहा जाए कि सरकार के एक हाथ को दूसरे की खबर नहीं हैया इस पर संतोष किया जाए कि सरकार का एक हाथ कम से कम यह तो जानता है कि अजब-गजब फैसले और नीतियों की उठापटक से किस तरह की मुसीबतें आती हैं.

चंद उदाहरण पेश हैं:

ऑटोमोबाइल उद्योग जब अपने ताजा इतिहास की सबसे भयानक मंदी से उबरने के लिए मदद मांग रहा है तब सरकार ने पुर्जों के आयात पर भारी कस्टम ड‍्यूटी लगा दीपेट्रोल-डीजल पर सेस बढ़ गयापुरानी गाडि़यां बंद करने के नए नियम और प्रदूषण को लेकर नए मानक लागू हो गएगाडि़यों के रजिस्ट्रेशन की फीस बढ़ाने का प्रस्ताव है और उन इलेक्ट्रिक वाहनों को टैक्स में रियायत दी गई जो अभी बनना भी नहीं शुरू हुए यानी पुर्जे-बैटरी चीन से आयात होंगे.

नीतियों में उठापटक उद्योग पर कुछ इस तरह भारी पड़ी कि गाड़ियां गोदामों में जमा हैंडीलरशिप बंद हो रही हैंऑटोमोबाइल संगठित उद्योग क्षेत्र का करीब 40 फीसद हैजिससे वित्तीय सेवाएं (लोन), सहयोगी उद्योग (ऑटो कंपोनेंटऔर सर्विस जैसे रोजगार गहन उद्योग जुड़े हैंइस उद्योग में भारी बेकारी की शुरुआत हो चुकी है.

अब मकानों की तरफ चलते हैं

इस उद्योग को मंदी नोटबंदी से पहले ही घेर चुकी थीमांग में कमी और कर्ज के बोझ से फंसा यह उद्योगजैसे ही नोटबंदी के भूकंप से उबरा कि इसे रेरा (नए रियल एस्टेट कानूनसे निबटना पड़ारेरा एक बड़ा सुधार था लेकिन इससे कई कंपनियां बंद हुईंबैंकों का कर्ज और ग्राहकों की उम्मीदें डूबीं.

इस बीच भवन निर्माण के कच्चे माल और मकानों की बिक्री पर भारी जीएसटी लग गयाजिसे ठीक होने में दो साल लगेजीएसटी के सुधरते ही कर्ज की पाइपलाइन सूखने (एनबीएफसी संकटलगी और अब सरकार ने वह सुविधा भी वापस ले ली जिसके तहत बिल्डरमकान की डिलीवरी तक ग्राहकों के बदले कर्ज पर ब्याज चुकाते थेआम्रपाली पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश (सरकारी कंपनी अधूरे मकान बनाएगीपूरे उद्योग में नई उठापटक की शुरुआत करेगा.

निर्माणखेती के बाद रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत हैउद्योग में चरम मंदी है. 30 शहरों में करीब 13 लाख मकान बने खड़े हैं और लाखों अधूरे हैंनीतियों की अनिश्चितता ने इस उद्योग को भी तोड़ दिया है.

नमूने और भी हैंएक साल पहले तक सरकार सोने की खरीद को हतोत्साहित (गोल्ड मॉनेटाइजेशन-नकदीकरणकर रही थी और इसमें काले धन के इस्तेमाल को रोक रही थीअब अचानक बजट में सोने पर आयात शुल्क बढ़ा दिया गयाजिससे अवैध कारोबार और तस्करी बढ़ेगीआभूषण निर्यात (रोजगार देने वाला एक प्रमुख उद्योगप्रतिस्पर्धा से बाहर हो रहा है.

आम लोगों की बचत जब 20 साल और बैंक जमा दर दस साल के न्यूनतम स्तर पर हैतब बचत स्कीमों पर ब्याज दर घटा दी गईबैंक डिपॅाजिट पर भी ब्याज दर घट गईकेवल एक शेयर बाजार था जो निवेशकों को रिटर्न दे रहा थाउस पर भी नियम व टैक्स थोप (बाइबैक पर टैक्सनए पब्लिक शेयर होल्डिंग नियमदिए गएबजट के बाद से बाजार लगातार गिर रहा है और निवेशकों को 149 अरब डॉलर का नुक्सान हो चुका है.

आकस्मिक व लक्ष्य विहीन नोटबंदी, 300 से अधिक बदलावों वाले (असफलबकौल सीएजीजीएसटी और तीन साल के भीतर एक दर्जन से ज्यादा संशोधनों से गुजरने वाले दिवालियापन (आइबीसीकानून 2016 को नहीं भूलना चाहिए और न ही टैक्सों के ताजे बोझ को जिसने मंदी से कराहती अर्थव्यवसथा को सकते में डाल दिया है.

अनिश्चितता का अपशकुनी गिद्ध (ब्लैक स्वानभारत की अर्थव्यवस्था के सिर पर बैठ गया हैसरकार की आर्थिक समीक्षा ठीक कहती है कि ‘‘अप्रत्याशित फैसलों और नीतिगत उठापटक का वक्त गयाअगर निवेश चाहिए तो नीति बनाते समय उसकी निरंतरता की गारंटी देनी होगी.’’


Friday, July 26, 2019

डर के आगे जीत है


ऐसा अक्सर नहीं होता जब प्रत्येक उदारीकरण और विदेशी मेलजोल पर बिदकने वाले स्वदेशी और अर्थव्यवस्था को खोलने के परम पैरोकार उदारवादी एक ही घाट पर डुबकी लगाते नजर आएं.

मोदी सरकार का फैसला है कि भारत अब बॉन्ड के जरिए विदेशी बाजारों से कर्ज लेगा. ये बॉन्ड भारत की संप्रभु साख (सॉवरिन रेटिंग) पर आधारित होंगे. इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. सरकार के विचार परिवार वाले रूढ़िवादी स्वदेशियों को लगता है कि इससे आसमान फट पड़ेगा और उदारवादियों को लगता है कि सुर्खियां बटोरने के शौक में मोदी सरकार एक गैर-जरूरी कोशिश कर रही है जो मुश्किल में डालेगी.

दोनों ही बेमतलब डरा रहे हैं. जबकि इस डर के आगे जीत है. यहां से एक बड़े सुधार की शुरुआत हो सकती है.

विदेशी कर्ज भारत के लिए नया नहीं है. सरकार को बहुपक्षीय संस्थाओं (विश्व बैंक, एडीबी) और देशों (जैसे बुलेट ट्रेन के लिए जापान) से कर्ज मिलता रहा है. यह कर्ज देशों या संस्था और देश के बीच होता है. कर्ज बाजार का इस पर कोई असर नहीं होता. भारतीय  कंपनियां अपनी साख के बदले दुनिया भर से कर्ज लेती हैं, जो सरकार के खाते में दर्ज नहीं होता.
सरकार के अधिकांश कर्ज देश के भीतर से आते हैं और रुपए में होते हैं. यह कर्ज डॉलर में होगा और डॉलर में ही चुकाना होगा. डॉलर महंगा होने से यह कर्ज बढ़ेगा.

दुनिया के अन्य देशों की तरह, जो विश्व के बाजारों से कर्ज लेते हैं, भारत की साख की रेटिंग होगी. भारत के बॉन्ड दुनिया के बाजारों में सूचीबद्ध होंगे.

भारत शुरुआत में केवल कुल दस अरब डॉलर जुटाना चाहता है. फायदा यह कि यह कर्ज घरेलू बाजार की तुलना में लगभग आधी लागत पर मिलेगा. इस बॉन्ड के बाद देशी बाजार से सरकार कुछ कम कर्ज लेगी.

इस पहल से भारत को तत्काल कोई खतरा नहीं है. इस तरह के विदेशी कर्ज, जोखिम के जिन पैमानों पर मापे जाते हैं, उनमें भारत की स्थिति बेहतर है. जीडीपी के अनुपात में भारत का कुल संप्रभु विदेशी कर्ज केवल 3.8 फीसद है. विदेशी मुद्रा (428 अरब डॉलर) कर्ज अनुपात भी 75 फीसद के बेहतर स्तर पर है.

इस तरह के बॉन्ड के मामले में भारत की तुलना ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, मेक्सिको, फिलीपींस और थाईलैंड से होनी चाहिए. भारत की कुल आय के अनुपात में विदेशी कर्ज 19.8 फीसद (इंडोनेशिया, मेक्सिको 35 फीसद से ज्यादा) है. इसमें संप्रभु गांरटी पर लिया गया विदेशी कर्ज तो चीन व थाईलैंड की तुलना में बहुत कम है.

स्वदेशी और वामपंथी तो 1991 और 95 में भी डरा रहे थे लेकिन भारत अगर उदारीकरण न करता तो ज्यादा बड़ा नुक्सान होता. डराने वालों को खबर हो कि भारत में भरपूर विदेशी पूंजी पहले से है. शेयर बाजारों में विदेशी निवेश (433 अरब डॉलर) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआइ (325 अरब डॉलर), दरअसल सरकार (309 अरब डॉलर) और कंपनियों पर कुल विदेशी कर्ज (104 अरब डॉलर)  से भी ज्यादा है.

इसलिए दस अरब डॉलर के सॉवरिन कर्ज से प्रलय नहीं आ जाएगी, बल्कि अगर मोदी सरकार इस फैसले पर आगे बढ़ती है तो एक बड़ी आर्थिक पारदर्शिता उभरेगी. भारत को पहली बार ग्लोबल डॉलर सूचकांक का हिस्सा बनना होगा. इस दर्जे की बड़ी कीमत है और जोखिम भी.

भारत सरकार को अपने सभी वित्तीय आंकड़े पारदर्शी करने होंगे और घाटा या कर्ज छिपाने की आदत छोड़नी होगी. सरकार हमें केंद्र और राज्यों के कर्ज व घाटे की आधी अधूरी तस्वीर दिखाती है. बैंकों के एनपीए, एनबीएफसी का कर्ज, बजट से बाहर रखे जाने वाले कर्ज जैसे छोटी बचत स्कीमें या सरकारी कंपनियों पर लदा कर्ज, क्रेडिट कार्ड आदि के कर्ज, सरकारी कंपनियों का घाटा...दुनिया के निवेशकों अब आर्थिक सेहत की कोई भी जानकारी छिपाना महंगा पड़ेगा.

इस बॉन्ड से मिलने वाली राशि नहीं बल्कि यह महत्वपूर्ण होगा कि भारत अपने जोखिम का प्रबंधन कैसे करता है अब पूरी दुनिया को वित्तीय पारदर्शिता का विश्वास दिलाना होगा जिसके आधार पर भारत की संप्रभु साख तय होगी जो बताएगी कि दुनिया के बाजार में हम कहां खड़े हैं. जो रेटिंग हमें विदेश में मिलेगी, देश का बाजार भी उसी हिसाब से कर्ज देगा.
ग्रीस, तुर्की, अर्जेंटीना, थाईलैंड, ब्राजील के जले निवेशक अब किसी को बख्शते नहीं हैं. बदहाल आर्थिक प्रबंधन के कारण इन मुल्कों को बॉन्ड बाजार में बड़ी सजा झेलनी पड़ी. सनद रहे कि ग्रीस इसलिए डूबा क्योंकि उसने अपना घाटा छिपाया था. बॉन्ड बाजार झूठ से सबसे ज्यादा बिदकता है.

अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सलाहकार जेम्स कारविल कहते थे कि अगर मुझे दोबारा अवतार मिले तो मैं राष्ट्रपति या पोप नहीं बल्कि बॉन्ड मार्केट बनूंगा, जो हर किसी को डरा सकता है.

बॉन्ड आने दीजिए, दुनिया का डर ही भारत सरकार को अपने तौर-तरीके बदलने में मदद करेगा.

Sunday, July 21, 2019

अभिशप्त समृद्धि


भारत दुनिया के सोने-चांदी की भट्टी बन गया हैसारी रोमन संपत्ति खिंच कर वहां जा रही है.’’—प्लिनी द एल्डर (77 ईस्वीयह लिखने से पहले मुजरिस (कोचीन के निकटमें भारतीय समृद्धि का जलवा देखकर लौटा थाअगले दशकों में रोम की इतनी संपत्ति भारत आ गई कि शक सम्राट कनिष्क ने रोमन सिक्कों को ढाल कर अपनी मुद्राएं चला दींअंततरोमन सम्राट सेप्टिमस (193-211 .) ने अपने सिक्कों में सोने की मात्रा कम कर दीयह इतिहास में मुद्रा के आधार मूल्य में कमी (डिबेसमेंटका पहला उदाहरण था.

प्लिनी जैसी ही शिकायत 16वीं सदी में पुर्तगालियों को और 17वीं सदी में अंग्रेजों को हुई थी कि भारत दुनिया भर की समृद्धि खींच लेता है.

अलबत्ता प्लिनी के 2000 साल बादभारत में संपत्ति की आवाजाही का ताजा इतिहास लिखने वाला यह बताने को मजबूर होगा कि 21वीं सदी में भारत की समृद्धि खिंच कर अमेरिकायूरोप और ऑस्ट्रेलिया जाने लगीयह काला धन नहीं था जो अवैध रास्तों से विदेश जाता थायह तो उद्यमियों की जायज संपत्ति या मुनाफा था जो उन्होंने भारत में कारोबार से कमाया था लेकिन वे इसका संग्रह दुनिया के दूसरे देशों में कर रहे थे.

इस बजट में सुपर रिच यानी दो करोड़ से पांच करोड़ रुपए से अधिक ऊपर की आय वालों पर 42.7 फीसद टैक्स के बाद हमारे वामपंथी कलेजों पर भले ही ठंडक पड़ गई होहम यह कह सकते हों कि चीनजापानकनाडाफ्रांसयूके की तरह हम भी अपने अमीरों पर भरपूर टैक्स लगा रहे हैंदरअसलहमने अपने पैर पर ‘बजट’ मार लिया है.

हमारी टैक्स नीति का दकियानूसीपन अमीरों पर ज्यादा टैक्स वाले देशों से काफी फर्क रखता हैइस टैक्स से सरकार को एक साल में बमुश्किल 8,000 करोड़ रुपए मिलेंगे लेकिन कहीं ज्यादा संपत्ति इसके कारण उन देशों में चली जाएगी जहां टैक्स की दर कम है यानी औसतन 20 फीसदइस अहम फैसले से संपत्ति को वैध ढंग से भी भारत से बाहर ले जाने की होड़ बढ़ेगीअवैध रास्ते तो पहले से ही खुले थे.

एफ्रेशिया बैंक के ग्लोबल माइग्रेशन रिव्यू  2018 के मुताबिकबीते बरस दुनिया में करीब 1.08 लाख अमीरों ने अपने पते बदले यानी कि वह जिन देशों में थेउन्हें छोड़ गए. 2017 की तुलना में यह संख्या 14 फीसदी ज्यादा हैकरीब 12,000 अमीरों ने ऑस्ट्रेलिया और 10,000 ने अमेरिका को ठिकाना बनाया. 4,000 के करीब कनाडा मेंदो हजार स्विट‍्जरलैंड और अमीरात (प्रत्येकऔर एक हजारन्यूजीलैंडग्रीसइज्राएलपुर्तगाल और स्पेन (प्रत्येकमें बस गए. 

समृद्धि गंवाने वाले मुल्कों में भारत तीसरे नंबर पर हैकरीब 5,000 धनाड्य बीते बरस भारत छोड़ गए. 15,000 चीनियों और 12,000 रूसियों ने अपने वतन को अलविदा कहा. 2018 में तुर्कीफ्रांसयूके और ब्राजील से 2,000 से 4,000 सुपर रिच बोरिया-बिस्तर बांधकर उड़ गए.

इससे पहले 2017 में करीब 7,000 भारतीय सुपर रिच विदेश में बस गए थेमोर्गन स्टेनले ने बीते बरस अपने एक अध्ययन में बताया था कि 2014 के बाद करीब 23,000 समृद्ध लोग या परिवार भारत छोड़कर विदेश में जा बसे.

यानी कि ताजा बजट में नए टैक्स का कहर टूटने से पहले ही औसतन 7,000-8,000 सुपर रिच हर साल भारत छोड़ रहे थे.

यह नीरव मोदीविजय माल्या या मेहुल चोकसी जैसा आपराधिक पलायन नहीं है बल्कि वैध समृद्धि का सुविचारित प्रवास हैअमीरी के प्रति पूर्वाग्रह छोड़कर इसे समझना जरूरी है.

  भारत छोड़कर जाने वाले सुपर रिच अपना कारोबार बंद नहीं कर रहे हैंवे यहीं से संपत्ति कमाएंगेअपने कारोबार पर टैक्स भी देंगे लेकिन निजी संपत्ति को किसी ऐसे देश में एकत्र करेंगे जहां टैक्स कम है या संपत्ति के निवेश के वैध रास्ते उपलब्ध हैं.

कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी भी ऐसा ही करती हैजैसे कि अमेजन का भारतीय कारोबार करीब 16 अरब डॉलर का है लेकिन इसके मालिक और दुनिया के सबसे अमीर उद्यमीजेफ बेजोस की संपत्ति से भारत को कुछ नहीं मिलता.

  भारत के सुपर रिच आमतौर पर अपने कारोबार से खूब कमाते हैं क्योंकि रिटर्न काफी अच्छे हैंअजीम प्रेम जी जैसे कुछ एक को छोड़कर कोई बहुत बड़ा जन कल्याण नहीं करतेउन्हें लोककल्याण में लगाने के लिए सरकार को कानूनी और प्रोत्साहनपरक उपाय करने होते हैं.

 टैक्स की मार के कारण इनका देश छोड़ना नीतिगत विफलता हैसरकार इनकी संपत्ति को संजोनेनिवेश करने या उपभोग के अवसर ही नहीं बना पाती ताकि भारत से कमाया पैसा भारत में ही रहे. 

भारत की संस्कृति समृद्धि को अभिशाप नहीं मानती बल्कि इसकी आराधना करती हैचाणक्य बताकर गए हैं कि संपत्ति के बिना संपत्ति प्राप्त करना असंभव हैचाहे जितना प्रयास कर लिया जाएजैसे हाथी को खींचने के लिए हाथी की जरूरत होती है ठीक उसी तरह संपत्ति अर्जित करने के लिए संपत्ति चाहिए.

क्या हम समृद्धि गंवाकर समृद्ध होना चाहते हैं?