Friday, October 2, 2020

राहत ऐसी होती है !


मुंबई में दो साल तक काम करने के बाद, सितंबर 2019 में कीर्ति की मेहनत कामयाब हुई, जब उसे लंदन की मर्चेंट बैंकिंग फर्म में नौकरी मिल गई. वह लंदन को समझ पाती इससे पहले कोविड गया. नौकरी खतरे में थी. लेकिन अप्रैल में ही उसकी कंपनी सरकार की जॉब रिटेंशन स्कीम (नौकरी बचाओ सब्सिडी) में शामिल हो गई. पगार कुछ कटी लेकिन नौकरी बच गईबहुत नुक्सान नहीं हुआ.

भारत में उसका भाई सिद्धार्थ इतना खुशकिस्मत नहीं रहा. जि स्टार्ट-अप में वह तीन साल से काम कर रहा था अप्रैल में वह बंद हो गया. आर्किटेक्ट पिता को कोविड के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. कीर्ति की नौकरी (यूके सरकार की जॉब रिटेंशन स्कीम) ही थी जो इस आपदा में उसके परिवार के काम रही थी.

कोविड की तबाही शुरू हुए छह महीने बीतने के अब आर्थिक फैसलों के असर समझने की कोशि हो रही है. दुनिया के देशों ने अपने समग्र आर्थिक उपाय रोजगारों को बचाने पर केंद्रित कर दिए हैं, जबकि भारत सरकार छंटनी और बेरोजगारी के विस्फोट पर उपाय तो दूर, सवाल भी सुनना नहीं चाहती.

जानना जरूरी है कि इस संकट में दुनिया के अन्य देश अपने लोगों का कैसे ख्याल रख रहे हैं.

वेतन संरक्षण या पगार सब्सिडी सरकारों के रोजगार बचाओ अभियानों का सबसे बड़ा हिस्सा है. भारत में जब हर चौथे कर्मचारी की पगार कटी है तब ब्रिटेन कीफर्लो’, जर्मनी की कुर्जरबेट जैसी स्कीमों सहित फ्रांस, इटली, कनाडा, मलेशिया, हांगकांग, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, डेनमार्क और सिंगापुर सहित 35 देशों में कंपनियों को सब्सिडी और फर्लो बोनस दिए जा रहे हैं. अमेरिका में छोटे उद्योगों को तकरीबन मुफ्त कर्ज मिल रहा है ताकि कर्मचारियों की तनख्वाहें कटें. इन सभी देशों में कर्मचारियों के 70 से 84 फीसद तक वेतन संरक्षित किए गए हैं. इन स्कीमों का लाभ मध्य वर्ग को मिला है जिससे बाजार में मांग बनाए रखने में मदद मिली है. बीमारी में वेतन काटे जाने इलाज आदि की रियायतें अलग से हैं.

अमेरिका, दक्षि कोरिया, चीन (प्रवासी श्रमिकों के लिए), कनाडा, आयरलैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों ने बेकार हुए लोगों और परिवारों को बेकारी भत्ते दिए हैं या मौजूदा भत्तों की दर बढ़ाई है. इसका लाभ कम आय वालों को मिला है.

अमेरिका, स्वीडन, डेनमार्क, कनाडा, आयरलैंड, फ्रांस सहित करीब दो दर्जन देशों ने अपने यहां स्वरोजगारों के लिए सब्सिडी और नुक्सान भरपाई की स्कीमें शुरू की हैं, जिनमें उनके हर माह हुए नुक्सान का 60 से 70 फीसद हिस्सा वापस हो रहा है. उनके टैक्स माफ किए गए हैं.

ज्यादातर स्कीमें छोटे उद्योगों में रोजगार बचाने पर केंद्रित हैं जबकि बड़ी कंपनियों को टैक्स रियायतें देकर नौकरियां और वेतन कटौती रोकने के लिए प्रेरित किया गया है. रोजगार बचाने की स्कीमों के कारण लोगों के वेतन संरक्षि हैं इसलि कोवि का डर बीतते ही मांग लौट आएगी. यूरोप और अमेरिका में तेज वापसी (V) का आकलन इसी पर आधारित है.

1930 की महामंदी के बाद उभरी आर्थि नीतियों (अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट को अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड केंज का खुला पत्र) की रोशनी में सरकारों ने यह गांठ बांध ली थी कि रोजगार बचाना और बढ़ाना ही मंदी से उबरने का एकमात्र तरीका है. अप्रैल से लेकर अगस्त के दौरान यूरोप में करीब 5 करोड़ रोजगार बचाए (ओईसीडी रिपोर्ट) गए हैं. अमेरिका में सितंबर के आखिरी सप्ताह तक करीब 2.6 करोड़ बेरोजगारों को बेकारी सहायता मिली. छोटे उद्योगों में वेतन संरक्षण कार्यक्रम के तहत 520 अरब डॉलर के कर्ज (इन्हें बाद में माफ कर दिया जाता है) बांटे जा चुके हैं.

दूसरी तरफ, इसी दौरान भारत में 12.2 करोड़ रोजगार खत्म हुए (सीएमआइई) जिसमें 66 लाख नौकरियां मध्य वर्गीय हैं. करीब 72 लाख करोड़ के खर्च (केंद्र और राज्य), किस्म-किस्म के टैक्स, बैंकों से मनचाहे कर्ज के बावजूद हमारी सरकारों के पास इस सबसे मुश्कि वक्त में हमारे लिए कुछ नहीं है. सरकार ने 20 करोड़ महिला जनधन खातों में तीन माह में केवल 1,500 रुपए (आठ दिन की मनरेगा मजदूरी के बराबर) दी है जिस पर मंत्री और समर्थक लहालोट हुए जा रहे हैं.

भारत में मंदी गहराने के आकलन यूं ही नहीं बरस रहे. वास्तविकता से कोसों दूर खड़ी सरकार बेकारी और महामंदी से परेशान लोगों को कर्ज लेने की राह दिखा रही है या कि भूखों को विटामिन खाने की सलाह दी जा रही है. सबको मालूम है, मांग केवल खपत से आएगी और हर महीने जब बेकारों की तादाद बढ़ रही हो तो कारोबार में नया निवेश कौन करेगा. हमें याद रखना होगा कि सरकारें हमारी बचत और टैक्स पर चलती हैं. और जीविका पर इस सबसे बड़े संकट में हमें हमारे हाल पर छोड़ रही हैं.

शेक्सपियर के जूलियस सीजर में कैसियस और ब्रूटस का संवाद याद आता हैः खोट हमारे सितारों में नहीं है / हम ही गए बीते हैं.

 


Friday, September 25, 2020

आबादी का अर्ध सत्य

 

तमाम पापड़ बेलने और धक्के खाने के बाद समीर को इस जनवरी में नौकरी मिली थी और अप्रैल में छुट्टी हो गई. लॉकडाउन दौरान व्हाट्सऐप मैसेज पढ़-पढ़कर वह बिल्कुल मान ही बैठा था किबढ़ती आबादी उसकी बेकारी की वजह है. वह तो भला हो उसके एक पुराने टीचर का जिनसे मिले कुछ तथ्य पढ़कर उसे समझ में आया कि जब भी सरकारें बेरोजगारी पर घिरती हैं तो उनके सलाहकार और पैरोकार बढ़ती आबादी का दकियानूसी स्यापा क्यों शुरू कर देते हैं?


चालाक राजनीतिशोर की ताकत से सच समझने की क्षमता तोड़ देती हैं. यह समझ गंवाते ही लोग तथ्य और झूठ का फर्क ही भूल जाते हैं. वे मुसीबतों के लिए खुद को ही कोसने लगते हैं और जिम्मेदारों से सवाल पूछना बंद कर देते हैं. समीर और असंख्य बेरोजगारों के साथ यही हो रहा है. उनके दर्द को आबादी बढ़ने के अर्ध सत्य में लपेटा जा रहा है.


2011 की जनगणना और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज के शोध के आधार पर आर्थिक समीक्षा (2018-19) ने जनसंख्या को लेकर ताजे आंकड़े दिए हैं, उसके बाद रोजगार न दे पाने में विफलता पर सरकार के बचाव में दूसरे तर्क गढ़े जाने चाहिए.


क्या सच में भारत की आबादी बढ़ रही है?


नहीं. आबादी की सालाना वृद्धि दर की गणना के फॉर्मूले के आाधार पर भारत में आबादी बढ़ने की दर अब केवल 1.3 फीसद (2011-16) रह गई है जो 1971 से 1981 के बीच में 2.5 फीसद थी. यह रफ्तार अब दक्षिण एशिया (1.2 फीसद) के प्रमुख देशों के आसपास है और निम्न मझोली आय वाले देशों की वृद्धि दर (1.5 फीसद) से कम है (विश्व बैंक). यानी ऊंची आबादी वृद्धि दर (2 से 2.5 फीसद) के दिन पीछे छूट चुके हैं.


आंकड़ों के भीतर उतरने पर आबादी को लेकर हमारी चिंताएं और कम होती जाती हैं. दक्षिण भारत और बंगाल, पंजाब, असम, हिमाचल, महाराष्ट्र, ओडिशा सहित 13 राज्यों यानी करीब आधे भारत में आबादी बढ़ने की दर एक फीसद नीचे आ गई है जो कि यूरोप के लगभग बराबर है.


यहां तक कि जनसंख्या में तेजी बढ़ोतरी के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान हरियाणा में भी आबादी बढ़ने की रफ्तार में आश्चर्यजनक गिरावट आई है. दस राज्य जो एक फीसद से ज्यादा की आबादी वृद्धि दर दर्ज कर रहे हैं वहां भी वृद्धि दर दो फीसद से काफी नीचे है.


भारत में आबादी रफ्तार रोकने का यह चमत्कार हुआ कैसे? 1971 से 2016 के बीच भारत में टोटल फर्टिलिटी रेट या प्रजनन दर (मातृत्व आयु के दौरान प्रति महिला बच्चों का जन्म या पैदा होने की संभावना) घटकर आधी (5.3 से 2.3) रह गई है. इसका यह नतीजा हुआ कि भारत के करीब 13 राज्यों में अब रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी दर 2.1 फीसद से नीचे आ गई है. यह बेहद महत्वपूर्ण पैमाना है जो बताता है कि अगली पीढ़ी को लाने के लिए प्रति महिला कम से कम 2.1 बच्चे होना अनिवार्य है. दक्षिण और पश्चिम के राज्यों में यह दर अब 1.4 से 1.6 के बीच आ गई है यानी दो से कम बच्चे सबसे अच्छे माने जा चुके हैं.


फर्टिलिटी रेट में कमी हमेशा आय बढ़ने के साथ होती है लेकिन भारत ने गरीबी और कम आय के बीच यह चमत्कार किया है. यही वजह है 2031 तक भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर घटकर एक फीसद आ जाने का आकलन है जो 2041 तक 0.5 फीसद रह जाएगी. यानी जनसंख्या वृद्धि के मामले में हम विकसित देशों बराबर खड़े होंगे.


आबादी बढ़ने का अर्ध सत्य बुरी तरह हार चुकाा हैं. हां, रोजगारों पर बहस और तेज होनी चाहिए क्योंकि बीते दो दशक के बदलावों के बाद आबादी में आयु वर्गों का जो औसत बदलेगा उससे... 

 

2021 से 31 के बीच करीब 97 करोड़ और इसके अगले दस वर्षों में लगभग 42 करोड़ लोग (श्रमजीवी आबादी) काम करने की ऊर्जा से भरपूर होंगे

इनके लिए अगले दो दशकों में प्रति वर्ष क्रमश: एक करोड़ और 50 लाख रोजगार चाहिए

मौजूदा प्रजनन दर पर 2041 तक युवा आबादी का अनुपात अपने चरम पर पहुंच चुका होगा. इसके बाद भारत बूढ़ा हो जाएगा. दक्षिण के राज्यों में बुढ़ापा 2030 से ही शुरू हो जाएगा

कहां हैं वे लोग जो भारत की युवा आबादी को उसकी सबसे बड़ी ताकत या संभावनाओं का खजाना कह रहे थे. कहीं वे ही तो आबादी नियंत्रण कानून की जरूरत का स्यापा तो नहीं कर रहे!

दरअसल, जिस मौके का इंतजार था वह अब आ पहुंचा है. इस युवा आबादी के अलावा भारत के पास और कुछ नहीं है. भविष्य की खपत, ग्रोथ, निवेश, बचत सब इस पर निर्भर है. भारत को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सुपर पावर या विश्व गुरु जो भी बनना है उसके लिए 15 साल का वक्त है और यही युवा उसका माध्यम हैं. सियासत का अधिकांश वक्त, इसी युवा को भरमाने, लठियाने, धमकाने, ठगने और लड़ाने में जाता है.

Friday, September 18, 2020

पांव के नीचे जमीन नहीं

 

प्रधान की भैंस तालाब के गहरे पानी में फंस गई. सलाहकारों ने गांव के सबसे दुबले और कमजोर व्यक्तिको आगे करते हुए कहा कि इसमें जादू की ताकत है, यह चुटकियों में भैंस खींच लाएगा. दुर्बल मजदूर को तालाब के किनारे ले जाकर भैंस की रस्सी पकड़ा दी गई. सलाहकार नारे लगाने लगे और देखते-देखते बेचारा मजदूर भैंस के साथ तालाब में समा गया.

इस घटना को देखकर आया एक यात्री अगले गांव में जब यह किस्सा सुना रहा था तब कोई एक बड़ा नेता टीवी पर देश को यह बता रहा था कि जीडीपी के -24 फीसद टूटने पर सवाल उठाने वाले नकारात्मक हैं. लॉकडाउन के बीच भी खेती की ग्रोथ नहीं दिखती?  नए कानूनों की गाड़ी लेकर निजी कंपनियां खेतों तक पहुंच रही हैं. मंदी बस यूं गई, समझो.

मंडियों में निजी क्षेत्र के दखल के कानूनों में नए बदलावों पर भ्रम हो सकता है लेकिन इस पर कोई शक नहीं कि दिल्ली का निजाम खेती की हकीकत से गाफिल है. उसे अभी भी लगता है कि उपज की मार्केटिंग में निजी क्षेत्र को उतार कर किसानों की कमाई बढ़ाई जा सकती है जबकि खेती की दरारें बहुत चौड़ी और गहरी हो चुकी हैं.

जहां समर्थन मूल्य बढ़ाने के बावजूद 2019 में किसानों को तिमाही वजीफा देना पड़ा था, उस खेती को महामंदी से उबारने की ताकत से लैस बताया जा रहा है. पहली तिमाही में 3.4 फीसद की कृषिविकास दर चमत्कारिक नहीं है. खेती के कुल उत्पादन मूल्य (जीवीए) में बढ़ोतरी बीते बरस से खासी कम (8.6 से 5.7 फीसद) है. यानी उपज का मूल्य न बढ़ने से, पैदावार बढ़ाकर किसान और ज्यादा गरीब हो गए.

खेती में आय पिछले चार-पांच वर्षों से स्थिर है, बल्कि महंगाई के अनुपात में कम ही हो गई है. 81.5 फीसद ग्रामीण परिवारों के पास एक एकड़ से कम जमीन है. जोत का औसत आकार अब घटकर केवल 1.08 एकड़ पर आ चुका है. नतीजतन, भारत में किसान की औसत मासिक कमाई (प्रधानमंत्री के वजीफे सहित) 6,000 रुपए से ज्यादा नहीं हो पाती. यह 200 रुपए रोज की दिहाड़ी है जो कि न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम है. क्या हैरत कि 2018 में 11,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की.

90 फीसद किसान खेती के बाहर अतिरिक्त दैनिक कमाई पर निर्भर हैं. ग्रामीण आय में खेती का हिस्सा केवल 39 फीसद है जबकि 60 फीसद आय गैर कृषिकामों से आती है. खेती से आय एक गैर कृषिकामगार की कमाई की एक-तिहाई (नीति आयोग 2017) है. जो शहरी दिहाड़ी से हुई बचत गांव भेजकर गरीबी रोक रहे थे लॉकडाउन के बाद वे खुद गांव वापस पहुंच गए हैं.

सरकार बार-बार खेती की हकीकत समझने में चूक रही है. याद है न समर्थन मूल्य पर 50 फीसद मुनाफे का वादा और उसके बाद बगलें झांकना या 2014 में भूमि अधिग्रहण कानून की शर्मिंदगी भरी वापसी. अब आए हैं तीन नए कानून, जो उपज के बाजार का उदारीकरण करते हैं और व्यापारियों के लिए नई संभावनाएं खोलते हैं.

फसलों से उत्पाद बनाने की नीतियां कागजों पर हैं. सरकार के दखल से उपजों का बाजार बुरी तरह बिगड़ चुका है. किसान ज्यादा उगाकर गरीब हो रहा है. जब सरकार ही उसे सही कीमत नहीं दे पाती तो निजी कारोबारी क्या घाटा उठाकर किसान कल्याण करेंगे.

कृषिमें अब दरअसल यह होने वाला हैः

खरीफ में अनाजों का बुवाई बढ़ना अच्छी खबर नहीं है. लॉकडाउन में नकदी फसलों में नुक्सान के कारण किसान फिर अनाज उगाने लगे हैं, जहां उन्हें कभी फायदे का सौदा नहीं मिलता.

घटती मांग के बीच अनाज की भरमार होने वाली है. खेती भी मंदी की तरफ मुखातिब है, स्थानीय महंगाई से किसान को कुछ नहीं मिलता बल्कि उपभोक्ता इस बोझ को उठाता है.

करीब 50 करोड़ लोग या 55 फीसद ग्रामीणों के पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. देश में 90 लाख मजदूर मौसमी प्रवासी (जनगणना 2011) हैं, जो खेती का काम बंद होने के बाद शहर में दिहाड़ी करते हैं. लॉकडाउन के बाद ये सब निपट निर्धनता की कगार पर पहुंच गए हैं.

जरूरत से ज्यादा मजदूर, मांग से ज्यादा पैदावार और शहरों से आने वाले धन के स्रोत बंद होने से ग्रामीण आय में कमी तय है.

बीते 67 सालों में जीडीपी की वृद्धि दर 3 से 7.29 फीसद पर पहुंच गई लेकिन खेती की विकास दर 2 से 3 फीसद के बीच झूल रही है. इस साल भी कोई कीर्तिमान बनने वाला नहीं है. जीडीपी में केवल 17 फीसद हिस्से वाली खेती इस विराट मंदी से क्या उबारेगी. यह मंदी तो 43 फीसद रोजगारों को संभालने वाली इस आर्थिक गतिविधिको नई गरीबी की फैक्ट्री में बदलने वाली है.

सरकार को दो काम तो तत्काल करने होंगे. एकअसंख्य स्कीमों को बंद कर यूनिवर्सल बेसिक इनकम की शुरुआत और दूसरा न्यूनतम मजदूरी दर को महंगाई से जोड़ना.

सनद रहे कि गांवों के पास मंदी का इलाज होने या ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत बताने वाले सिर्फ भरमा रहे हैं. गांवों की हकीकत दर्दनाक है. शहर जब तक मंदी की गर्त से निकल कर तरक्की की सीढ़ी नहीं चढ़ेंगे गांव उठकर खड़े नहीं होंगे.

Friday, September 11, 2020

ईमानदार टैक्सपेयर की डायरी

 


इनकम टैक्स का रिटर्न भरने के बाद कागजों को संभालते हुए अनुपम टीवी से उठती आवाज सुनकर ठहर गए. प्रधानमंत्री ईमानदार करदाताओं का उत्साह बढ़ा रहे थे.

निजी कंपनी में काम करने वाले अनुपम ने 30 फीसद तनख्वाह गंवाकर, कोविड के बाद किसी तरह नौकरी बचाई है. लाखों वेतनभोगी करदाताओं की तरह उनकी ईमानदारी पर कोई फूल नहीं बरसाता लेकिन अनुपम न केवल टैक्स चुकाने में ईमानदार हैं बल्किअपने कमाई-खर्च का हिसाब-किताब भी पक्का रखते हैं.

करीब 47 साल के अनुपम टैक्सपेयर्स के उस सबसे बड़े समुदाय का हिस्सा हैं, कमाई, खर्च या रिटर्न पर जिनका ज्यादातर टैक्स पहले कट (टीडीएस) जाता है. आयकर विभाग के मुताबिक, (2019) व्यक्तिगत करदाता हर साल करीब 34 लाख करोड़ रुपए की आय घोषित करते हैं, जिनमें 20 लाख करोड़ रुपए की आय वेतनभोगियों की होती है. 2.33 करोड़ रिटर्न इसी श्रेणी के लोगों के होते हैं.

प्रधानमंत्री की बात सुनने के बाद अनुपम ने इनकम टैक्स रिटर्न को सामने रखकर डायरी निकाल ली. वे ईमानदारी का हिसाब लगाकर उस पर गर्व कर लेना चाहते थे.

डायरी के पन्नों पर सबसे पहले चमका वह मोटा टैक्स जो उनकी कंपनी हर महीने, तनख्वाह देने से पहले ही काट लेती है. इसके बाद उनकी गिनती में आया वह टैक्स जो उनके बैंक ने बचत (एफडी) पर ब्याज से काटा.

अनुपम ने बच्ची की पढ़ाई की फीस के लिए पुराना मकान बेचा था, जिसे बैंक कर्ज से खरीदा था. तबादले के कारण अब वह दूसरे शहर में किराये पर रहे थे. मकान रजिस्ट्री से पहले उन्हें टैक्स जमा करना पड़ा और फिर कैपिटल गेन्स चुकाना पड़ा. डायरी के अगले पन्नों में यह भी दर्ज था कि उनके पेंशनयाफ्ता बुजुर्ग माता-पिता ने भी मोटा टैक्स दिया था.

यहां तक आते-आते अनुपम और उनके घर में कमाने वालों के कुल इनकम टैक्स का आंकड़ा उनके चार महीने के वेतन से ज्यादा हो गया था.

अनुपम किसी पारंपरिक मध्यवर्गीय की तरह खर्च काहिसाब भी लिखते थे. हाउस टैक्स और वाटर टैक्स, टोल टैक्स सब वहां दर्ज था. खाने के सामान, दवा, कपड़ों, फोन-ब्रॉडबैंड के बिल और दूसरी सेवाओं पर खर्च देखते हुए अनुपम ने जीएसटी का मोटा हिसाब भी लगा लिया. 

बीते कई वर्षों से अनुपम के परिवार की आय का करीब 35 से 45 फीसद हिस्सा टैक्स जा रहा रहा था. ईमानदारी पर गर्व करने के बाद अनुपम सोचने लगे कि इतने टैक्स के बदले सरकार से क्या मिलता है?

गिनती फिर शुरू हुई. सरकारी शिक्षा या अस्पताल? बच्चे तो निजी स्कूल और कोचिंग में पढ़ते हैं. इलाज निजी अस्पताल में होता है. हेल्थ बीमा का प्रीमियम भरते हैं, रोजमर्रा के इलाज का खर्च किसी बीमा से नहीं मिलता. दवाओं पर दबाकर टैक्स लगता है. इनकम टैक्स रिटर्न बता रहा था कि उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए सेस भी दिया है.

सरकारी परिवहन का इस्तेमाल न के बराबर था. ट्रेन यात्रा गैर सब्सिडी वाले दर्जों में होती है. कार कर्ज पर ली थी. पेट्रोल पर भारी टैक्स दे रहे हैं, कार के रजिस्ट्रेशन और सड़क निर्माण का सेस देने के बाद टोल भी भर रहे हैं. बिजली महंगी होती जाती है. अपार्टमेंट में पावर बैक अप पर दोहरा पैसा लगता है. बैंक अपनी सेवाओं पर फीस वसूलते हैं. सरकारी भुगतानों में देरी पर पेनाल्टी लगती है और हर बरसात में टूटती सड़कें बताती हैं कि उनके टैक्स का क्या इस्तेमाल हो रहा है.

अनुपम को याद आया कि जो सरकारी व्यवस्था उनके टैक्स से चलती बताई जाती है, उससे मुलाकात के तजुर्बे कितने भयानक रहे हैं. आधार में पता बदलवाने से लेकर बूढे़ पिता के पेंशन दस्तावेजों की सालाना औपचारिकता तक हर सरकारी सेवा ने उन्हें नोच (रिश्वत) लिया है.

ईमानदार अनुपम ने पानी पीकर पॉजिटिव होने की कोशिश की.

टैक्स गरीबों के काम तो आता होगा? अचानक डायरी का सबसे पीछे वाला पन्ना खुला, जहां प्रवासी मजदूरों को खाना बांटने का खर्च दर्ज था. अनुपम के टैक्स के बदले सरकार उन्हें क्या ही दे रही थी लेकिन सड़कों पर मरते प्रवासी मजदूर जिनके पास कुछ नहीं था उन्हें भी क्या दे रही थी?

काश! अगर वे कंपनी होते तो घाटे के बदले (वेतन में कटौती) तो टैक्स से छूट मिल जाती या फिर गरीबों को खाना खिलाने का खर्च जन कल्याण में दिखाकर टैक्स बचा लेते.

ऐक्ट ऑफ गॉड के तर्क से उन्हें टैक्स चुकाने से छूट क्यों नहीं मिलती? पारदर्शिता केवल क्या आम करदाता के लिए ही है, सियासी दल कमाई का हिसाब क्यों नहीं देते? सरकार क्यों नहीं बताती कि वह टैक्स का कैसे इस्तेमाल करती है?

सवालों के तूफान से जूझते हुए अनुपम ने अपनी डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा, “करदाता भारत का स्थायी निम्न वर्ग है. उनसे वसूला जा रहा टैक्स उनकी ईमानदारी पर लगा जुर्माना है.”




Friday, September 4, 2020

पैरों तले ज़मीन है या आसमान है

 


अगर आप जीडीपी में -23.9 फीसद की गिरावट यानी अर्थव्यवस्था में 24 मील गहरे गर्त को समझ नहीं पा रहे हैं तो खुशकिस्मत हैं कि आपकी नौकरी या कारोबार कायम है. अगर आपके वेतन या टर्नओवर में 25-30 फीसद की कमी हुई है तो वह जीडीपी की टूट के तकरीबन बराबर है. लेकिन इससे ज्यादा संतुष्ट होना घातक है. इसके बजाए पाई-पाई सहेजने की जरूरत है.

दुनिया में कौन कितना गिरा, इसे छोड़ हम अपने फटे का हिसाब लगाते हैं. यह रहीं 2020-21 की पहली तिमाही के आंकड़े से निकलने वाली तीन सबसे बड़ी (अघोषि) सुर्खियां! इनमें अगले 12 से 24 महीनों का भविष्य निहित है.

अगर इस साल (2020-21) भारत की विकास दर 1.8 फीसद भी रहती तो भी देश का करीब 4 फीसद वास्तविक जीडीपी (महंगाई हटाकर) पूरी तरह खत्म (क्रिसिल मई 2020 रिपोर्ट) हो जाता. पहली तिमाही की तबाही के मद्देनजर यह साल शून्य से नीचे यानी -8 से -11 फीसद जीडीपी दर के साथ खत्म होगा. इस आंकडे़ के मुताबिक, करीब 15 लाख करोड़ रुपए का वास्तविक जीडीपी (6 से 8 फीसद) यानी उत्पादक गतिविधियां हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी. 200 लाख करोड़ के जीडीपी की तुलना में यह नुक्सान बहुत बहुत गहरा है.

स्कूल, परिवहन, पर्यटन, मनोरंजन, होटल, रेस्तरां, निर्माण आदि  उद्योग और सेवाओं में बहुत से धंधे हमेशा लिए बंद हो रहे हैं. यही है बेकारी की वजह और इसके साथ खत्म हो रही है खपत. आपकी पगार या कारोबार जीडीपी के इस अभागे हिस्से से तो नहीं बधा है, जिसके जल्दी लौटने की उम्मीद नहीं है?

भारतीय अर्थव्यवस्था खपत का खेल है. जनसंख्या से उठने वाली मांग ही 60 फीसद जीडीपी बनाती है. तिमाही के आंकड़ों की रोशनी में इस साल भारत की 26 फीसद खपत या मांग पूरी तरह स्वाहा (एसबीआइ रिसर्च) हो जाएगी. बीते नौ साल में 12 फीसद सालाना की दर से बढ़ रही खपत 2020-21 में 14 फीसद की गिरावट दर्ज करेगी. यानी कि जो लोग बीते साल 100 रुपए खर्च कर रहे थे वे इस साल 80 रुपए ही खर्च कर पाएंगे.

जीडीपी के विनाश का करीब 73.8 फीसद हिस्सा दस राज्यों के खाते में जाएगा, जिनमें महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश बुरे हाल में होंगे. औसत प्रति व्यक्ति आय इस साल 27,000 रुपए कम होगी लेकिन बड़े राज्यों में प्रति व्यक्तिआय का नुक्सान 40,000 रुपए तक होगा.

केंद्र सरकार ने साल भर के घाटे का लक्ष्य अगस्त में ही हासिल कर लिया. सिकुड़ते जीडीपी के जरिए टैक्स तो आने से रहा, अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए सरकारें अब सिर्फ कर्ज ले सकती हैं या नोट छपवा सकती हैं. सरकारों का बढ़ता कर्ज महंगाई बढ़ाएगा, रुपया कमजोर होगा और घबराएंगे शेयर बाजार.

इन सुर्खियों का असर हमें तीन लोग समझा सकते हैंएक हैं रघुबर जो पलामू, झारखंड से बिजली की फिटिंग का काम करने दिल्ली आए थे. दूसरे, जिंदल साहब जिनकी रेडीमेड गारमेंट की छोटी फैक्ट्री है. तीसरे हैं रोहन जो वित्तीय कंपनी में काम करते हैं.

रघुबर जीडीपी के दिवंगत हो रहे हिस्से से जुड़े थे. अब उन्हें 300 रुपए की दिहाड़ी भी मुश्किल से मिलनी है (सरकारी रोजगार योजना की दिहाड़ी 150-180 रुपए). रघुबर भूखे नहीं मरेंगे लेकिन नई मांग के जरिए जीडीपी बढ़ाने में कोई योगदान भी नहीं कर पाएंगे.

सरकार ज्यादा कर्ज उठाएगी. नए टैक्स लगाएगी यानी अगर रोहन की नौकरी बची भी रही तो उनकी कटी हुई पगार जल्दी नहीं लौटेगी. टैक्स और महंगी जिंदगी के साथ रोहन नया क्या खरीदेंगे, उनका खर्च बीते साल के करीब एक-चौथाई कम हो जाएगा.

जिंदल साहब फैक्ट्री के कपड़े रोहन से लेकर रघुबर तक सैकड़ों लोग खरीदते थे, जिनकी मांग तो गई. फिर जिंदल साहब नए लोगों को काम पर लगाकर अपना उत्पादन क्यों बढ़ाने लगे

सरकार के केवल वही कदम कारगर होंगे जिनसे प्रत्यक्ष रूप से लोगों के हाथ में पैसा पहुंचे. खासतौर पर मध्य वर्ग के हाथ में जो अर्थव्यवस्था में मांग की रीढ़ है. इस एक साल में जितने उत्पादन, कमाई और खपत का विनाश हो रहा है उसके आधे हिस्से की भरपाई में भी सात-आठ तिमाही लगेंगी, बशर्ते लोगों की कमाई तेजी से बढे़ और तेल कीमतों में तेजी या सीमा पर कोई टकराव न टूट पड़े.

अगले महीनों में अगर यह सुनना पड़े कि अर्थव्यवस्था सुधर रही है तो प्रचार को एक चुटकी नमक के साथ ग्रहण करते हुए बीते साल के मुकाबले अपनी कमाई, खर्च या बचत का हिसाब देखिएगा.

लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था कोसिर के बल जमीन में धंसा दिया है और पैर आसमान की तरफ हैं. आने वाली प्रत्येक तिमाही में हमें सिर्फ यह बताएगी कि हम गड्ढा कितना भर पाए हैं. 5-6 फीसद की वास्तविक विकास दर लौटने के लिए 2022-23 तक इंतजार करना होगा.  

देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं

पैरों तले ज़मीन है या आसमान है

दुष्यंत