Friday, February 5, 2021

आखिरी रास्ता

 


सरकारी कंपनियों और संपत्ति‍यों की बिक्री पर गुस्साने से पहले बजट के आंकड़े करीब से पढि़ए, आत्मनिर्भरता का सबसे निर्मम सत्य वहां छिपा है. शुक्र है कि सरकार ने यह सच स्वीकार कर लिया कि आम लोगों की बचत निचोडऩे और टैक्स लगाने की अधि‍कतम सीमा आ चुकी है.

आर्थि‍क समीक्षा ने कहा कि मंदी थमने के बावजूद बेकारी में बढ़ोतरी जारी रह सकती है (इकोनॉमिक हिस्टीरिसिस). इसके बावजूद सरकार मंदी के जख्मों पर मरहम तो दूर, रुई भी इसलिए नहीं रख सकी क्योंकि मंदी में सारे विकल्प सूख गए हैं. अब अगर बचत और टैक्स से अलग नए संसाधन नहीं जुटाए गए तो सरकार मंदी के बीच लंबी महंगाई और संकट बुला बैठेगी.

सिर्फ बचत से नहीं बचेगी मुसीबत

2021 में केंद्र सरकार का घाटा पांच दशक के सर्वोच्च स्तर 9.5 फीसद पर है. राज्यों को मिलाकर कुल घाटा जीडीपी के अनुपात में 20 फीसद पर पहुंच रहा है. (जीडीपी 193 लाख करोड़ रु. और घाटा 38-39 लाख करोड़ रु.) सरकारी कंपनियों के बाजार कर्ज और बजट से छिपाए गए ऋणों को मिलाने के बाद यह राशि‍ और बड़ी हो जाती है. 

इस घाटे की भरपाई के लिए सरकार हमारी वित्तीय बचत का कर्ज के तौर पर इस्तेमाल करती है. 2018 के आंकड़ों के मुता‍बिक, भारत की 51 फीसद वित्तीय बचतें बैंक में हैं जो सरकार को कर्ज देते हैं. करीब 19 फीसद बचत बीमा में, 13 फीसद प्रॉविडेंट फंड/लघु बचत स्कीमों में और 14 फीसद शेयर-म्युचुअल फंड आदि में हैं.

इन बचतों का 50 फीसद हिस्सा (2018-19) सरकारी (केंद्र और राज्य) कर्ज बटोर ले जाते हैं. हमारी बचत वाली जेब में सरकार का हाथ चौड़ा होता जा रहा है. 2020-21 में बजट में लघु बचतों से 5 लाख करोड़ रु. उधार लिए जाएंगे जो बजट के शुरुआती आकलन का दोगुना है. यानी बैंक में रखी बचत से सरकार के घाटे पूरे होंगे और छोटी बचत स्कीमों के फंड का इस्तेमाल भी होगा. 

अब जानिए, सबसे डरावना सच! जीडीपी के अनुपात में भारत की वित्तीय बचत 6.5 फीसद है. यानी केवल 12-13 लाख करोड़ रु. और सरकार का कर्ज इस साल करीब 39 लाख करोड़ रु. हो गया है. अगर हमारी पूरी बचत (12-13 लाख करोड़ रु.) होम कर दी जाए तो भी इसकी भरपाई नहीं हो सकती क्योंकि हम सब जि‍तना बचा रहे हैं, अकेले सरकारों की कर्ज जरूरत उसकी दोगुनी है.

निचोडऩे की सीमा

लोग रियायत चाहते थे लेकिन यह बजट पेट्रोल-डीजल पर ऊंचा टैक्स बनाए रखेगा. नया सेस आया है. सरकार अगले साल की पहली तिमाही में सरकारी उपक्रम विनिवेश की गति देखेगी. अगर गाड़ी तेज नहीं चली तो फिर नए टैक्स लगाए बिना 2021-22 के घाटे को नियंत्रित (लक्ष्य 6.8 फीसद) करना असंभव होगा. 

टैक्स की सुइयां केवल केंद्रीय बजट तक सीमित नहीं हैं. राज्यों के पास सरकारी कंपनियां बेचने की सुविधा नहीं है इसलिए अब 29 बजट नए टैक्स लगाएंगे या बिजली-पानी जैसी सेवाओं की दरें बढ़ाएंगे.

भारतीय अर्थव्यवस्था के दो सुलगते यथार्थ इस बजट से खुलकर सामने आ गए हैं:

एकआम लोगों की आय, खपत और बचत के हर हिस्से पर भरपूर टैक्स है. सरकार की कमाई का 53 फीसद टैक्स से आता है.

दोआम लोगों की करीब 50 से 55 फीसद बचत सरकार कर्ज के रूप में ले लेती है जिस पर महंगाई दर से भी कम रिटर्न मिलता है.

गौर करिए कि इतने भारी संसाधन पचाने के बावजूद बजट हमारी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं लाता. अर्थव्यवस्था में कुल पूंजी निवेश की पांच फीसद जरूरत भी सरकार पूरी नहीं कर पाती. इसी तरह कुल रोजगारों का पांच फीसद हिस्सा भी सरकार नहीं देती.

सरकारी कंपनियों में लगा बजट से निवेश, बैंक की एफडी जितना रिटर्न भी नहीं देता. इसलिए जहिर है, इन्हें बेचने से संसाधन मिलेंगे और हर साल इन पर लगने वाली पूंजी भी बचेगी. फिर भी अगर इनकी बिक्री से किसी को राजनैतिक चिढ़ होती हो तो इतिहास बताता है कि इतनी ही चिढ़ भाजपा और उसके विचार परिवार को भी होती रही है. सरकारें विनिवेश से हमेशा डरती हैं लेकिन अब कोई विकल्प नहीं है.

टैक्स अधि‍कतम सीमा तक लग चुके हैं, कमाई और मंदी के बीच हम कितनी और बचत करेंगे. अगर सरकारी कंपनियां नहीं बि‍कीं तो

करेंसी छाप कर सरकार कर्ज लेगी, किल्लतों के बाजार में कम सामान के पीछे ज्यादा पैसा यानी महंगाई, रुपए की कमजोरी, बचतों पर रिटर्न का विनाश

टैक्स लगाने के नए तरीकों का आवि‍ष्कार होगा

इसलिए सरकारी सेल के विरोध के बजाए सरकार का खर्च घटने की मांग होनी चाहिए, जिससे टैक्स कम होने का रास्ता खुले न कि इस महासेल से आने वाली पूंजी को भी सरकारी खर्च का दानव निगल जाए.

सरकार समझ रही है कि अर्थव्यवस्था की वित्तीय जमीन मजबूत किए बि‍ना आत्मनिर्भरता का कोई मतलब नहीं है. हमें भी समझना होगा कि वित्तीय तौर पर बदहाल सरकार हम पर किस कदर भारी पड़ सकती है.

Saturday, January 30, 2021

सबसे बड़ी कसौटी

 


अगर आप बजट से तर्कसंगत उम्मीदें नहीं रखते या हकीकतों से गाफिल हैं तो फिर निराश होने की तैयारी रखि‍ए!

क्या कहा वित्त मंत्री बोल चुकी हैं कि यह बजट अभू‍तपूर्व होने वाला है? 

यकीनन इस बजट को अभूतपूर्व ही होना चाहिए, उससे कम पर काम भी नहीं चलेगा क्योंकि भारत 1952 के बाद सबसे बुरी आर्थि‍क हालत में है.

यानी कि बीरबल वाली कहानी के मुताबिक दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी में चंद्रमा से गर्मी मिल जाए या दो मंजिल ऊंची टंगी हांडी पर खि‍चड़ी भी पक जाए लेकिन यह बजट पुराने तौर तरीकों और एक दिन की सुर्खि‍यों से अभूतपूर्व नहीं होगा. कम से कम इस बार तो बजट की पूरी इबारत ही बदलनी होगी क्योंकि इसे दो ही पैमानों कसा जाएगा:

क्या लॉकडाउन में गई नौकरियां बजट के बाद लौटेंगी?

सरकारी कर्मियों के डीए से लेकर लाखों निजी कंपनियों में काटे गए वेतन वापस हो जाएंगे.

ऐसा इसलिए कि भारत की अर्थव्यवस्था की तासीर ही कुछ फर्क है. हमारी अर्थव्यवस्था अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोपीय समुदाय की पांत में खड़ी होती है जहां आधे से ज्यादा जीडीपी (56-57 फीसद) आम लोगों के खपत-खर्च से बनता है. यह प्रतिशत चीन से करीब दोगुना है.

केंद्र सरकार पूरे साल में जि‍तना खर्च (कुल बजट 30 लाख करोड़ रुपए) करती है, उतना खर्च आम लोग केवल दो माह में करते हैं. और करीब से देखें तो देश में होने वाले कुल पूंजी निवेश (जिससे उत्पादन और रोजगार निकलते हैं) में केंद्रीय बजट का हिस्सा केवल 5 फीसद है, इसलिए बजट से कुछ नहीं हो पाता.

केंद्र और राज्य सरकारें साल में कुल 54 लाख करोड़ रुपए खर्च करते हैं जो जीडीपी का 27 फीसद है. यह खर्च भी तब ही संभव है जब लोगों की जेब में पैसे हों और वे खर्च करें. इस खपत से वसूला गया टैक्स सरकारों को मनचाहे खर्च करने का मौका देता है. जो कमी पड़ती है उसके लिए सरकार लोगों की बचत में सेंध लगाती है, यानी बैंकों से कर्ज लेती है.

सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेजों के ढोल पीट लिए लेकिन अर्थव्यवस्था उठ नहीं पाई क्योंकि इस मंदी में अर्थव्यवस्था की बुनियादी ताकत यानी आम लोगों की खपत 9.5 फीसद सिकुड़ (बीते साल 5.30 फीसद की बढ़त) गई. कंपनियों के निवेश से लेकर टैक्स और जीडीपी तक सब कुछ इसी अनुपात में गिरा है.

मंदी दूर करने के लिए वित्त मंत्री को तय करना होगा कि पहले वे सरकार का बजट ठीक करना चाहती हैं या आम लोगों का और, यकीन मानिए यह चुनाव बहुत आसान नहीं होने वाला.

भारत में सरकार जितनी बड़ी होती जाती है आम लोगों के बजट उतने ही छोटे होते जाते हैं. मंदी और बेकारी के बीच (सस्ते कच्चे तेल के बावजूद) केंद्र सरकार ने सड़क-पुल बनाने के वास्ते पेट्रोल-डीजल महंगे नहीं किए बल्कि‍ वह अपने दैत्याकार खर्च के लिए हमें निचोड़ रही है. केंद्र का 75 फीसद खर्च (रक्षा, सब्सि‍डी, कर्ज पर ब्याज, वेतन-पेंशन) तो ऐसा है जिस पर कैंची चलाना असंभव है.

मंदी तो आम लोगों का बजट ठीक होने से दूर होगी. यानी कि लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा छोडऩा होगा या पेट्रोल-डीजल सस्ता करना होगा, बड़े पैमाने पर टैक्स घटाना होगा.

लेकिन सतर्क रहिए हालात कुछ ऐसे हैं कि अपने बजट की खातिर सरकार हमारा बजट बिगाड़ सकती है. यानी कि कोरोना या जीएसटी सेस लगाया जा सकता है. ऊंची आय वालों पर इनकम टैक्स और पूंजी लाभ कर दर बढ़ सकती है.

मुसीबत यह है कि सरकार अपने खर्च के जुगाड़ के लिए टैक्स आदि थोपने के बाद भी व्यापक खपत को रियायत नहीं देती. रियायतें कंपनियों को मिलती हैं, जिन्होंने मंदी में दिखा दिया कि वे रियायतों को मुनाफे में बदलती हैं, रोजगार और मांग में नहीं.

याद रहे कि पिछले बजट भी कमजोर नहीं थे इसलिए 2016 में अर्थव्यवस्था गिरी तो गिरती चली गई. भारतीय बजट आंख पर पट्टी बांधे व्यक्ति की तरह चुनिंदा हाथों में पैसा रखते-उठाते रहते हैं, बीते एक साल में यही हुआ है. मदद बेरोजगारों को चाहिए थी और विटामिन कंपनियों को दिया गया. लोगों की जेब में पैसे बचने चाहिए थे तो टैक्स बढ़ाकर पेट्रोल-डीजल खौला दिए गए इसलिए लॉकाडाउन हटने के बाद महंगाई और बेरोजगारी गहरा गए.

बीते एक बरस में मंदी दूर करने की सभी कोशि‍शें हो चुकी हैं. बजट आंकड़े खुली किताब हैं. बड़ी योजनाओं पर खर्च तो दूर, ऐक्ट ऑफ गॉड की शि‍कार केंद्र सरकार के पास राज्यों को टैक्स में हिस्सा देने के संसाधन भी नहीं हैं. इसलिए बजट को केवल अधि‍क से अधि‍क लोगों की आय में सीधी बढ़त पर केंद्रित करना होगा. महामंदी से जंग लोगों को लडऩी है. अगले एक साल में करोड़ों परिवारों का बजट नहीं सुधरा तो मंदी का इलाज तो दूर, संसाधनों की कमी से सरकार के कई अनि‍वार्य खर्च भी संकट में फंस जाएंगे.

Saturday, January 23, 2021

बात निकलेगी तो.....


 

बी‌ती सदियों में दुनिया की प्रेरणा रहा अमेरिका 21वीं सदी में नसीहतों का अनोखी पाठशाला बन गया है. बीते दशक में उसने दुनिया को वित्तीय सबक दिए थे तो इस बार वह लोकतंत्र और गवर्नेंस के सबक की सबसे कीमती किताब बन गया है.

गवर्नेंस और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बात करते हुए भले ही हमें उबासी आती हो लेकिन असफल राजव्यवस्था (फेल्ड स्टेट) और अफरातफरी के बीच थोड़ा वक्त गुजारते ही सरकारी संस्थाओं से उम्मीद और भरोसे का मतलब समझ में आ जाता है. कोविड की महामारी और अमेरिकी चुनाव नतीजों ने पूरी दुनिया की संस्थाओं से अपेक्षा और उन पर विश्वास के नए अर्थ दिए हैं.

बाइडन के शपथ ग्रहण पर हमें अमेरिका के दो चेहरे नजर आए. एक तरफ महामारी के सामने बिखर जाने वाला दुनिया का सबसे समृद्ध और ताकतवर मुल्क और दूसरी तरफ ऐसा देश जिसकी संस्थाओं ने सिरफिरे राष्ट्रपति की सभी कुटिल कोशि‍शों के बावजूद लोकतंत्र को बिखरने बचा लिया.

तकनीक संपन्न अमेरिका का कोरोना के सामने बिखर जाना आश्चर्यजनक था जबकि जर्मनी, फिनलैंड, आइसलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे, न्यूजीलैंड, ताइवान (सभी में महिला नेतृत्व) ने महामारी का सामना बेहतर तरीके से किया. लैटिन अमेरिका में ब्राजील और मेक्सि‍को का बुरा हाल हुआ लेकिन उरुग्वे व कोस्टारिका जैसे देश संभले रहे.

वर्ल्ड गवर्नेंस इंडिकेटर (विश्व बैंक) बताता है कि पारदर्शिता और सरकारी व्यवस्था के उत्तरदायि‍त्व के पैमानों पर, बीते दशकों में अमेरिका की रैंकिंग (29वें और भ्रष्टाचार में 25वीं) लगातार गिरी है, जबकि जर्मनी और नॉर्डिक देश बेहतर रैंकिंग हासिल करते रहे.

अमेरिका में सरकारी संस्थाओं का क्षरण तो तेज रहा लेकिन ट्रंप के भरसक विध्वंस के बावजूद अमेरिका की लोकतांत्रिक संस्थाएं टिकी रहीं और संक्रमण को संभाल लेंगे गईं.

वायरस के सामने कुछ देश मजबूत और आधुनिक नए प्रयोगों से लैस नजर आए और कुछ पूरी तरह बिखरते हुए. जैसे कि कनाडा ने महामारी के दौरान अपने अस्सी साल पुराने स्कि‍ल डेवलपमेंट कार्यक्रम (1940) को पूरी तरह बदल दिया. इटली ने करीब पांच लाख परिवारों को चाइल्डकेयर की सुविधा उपलब्ध कराई. डेनमार्क ने नौकरियां गंवाने की कगार पर खड़े 90 फीसद लोगों को वेतन दिया. ब्रिटेन निजी कर्मचारियों के 80 फीसद औसत वेतन सरकारी मदद से संरक्षि‍त किए.

इनके विपरीत भारत को दुनिया का सबसे लंबा लॉकडाउन लगाकर 1952 के बाद सबसे बुरी आर्थि‍क चोट इसलिए आमंत्रि‍त करनी पड़ी क्योंकि हमारी व्यवस्थाएं महामारी में टिकने या खुद को तेजी से बदलने की क्षमता नहीं रखती थीं. भारत में सरकार ने प्लेग काल (1897) के महामारी कानून के सहारे ताकत तो समेट ली लेकिन तरीके नहीं बदले इसलिए मंदी के मारों को नीतिगत और आर्थि‍क मदद प्रभावी नहीं हो सकी.

कोवि‍ड ने बताया कि जिन देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा मजबूत व पारदर्शी था, संस्थाओं व समुदाय के बीच गहरा तालमेल था, सरकारें सच का सामना कर रही थीं, वहां कोविड से लडऩे में सफलता मिली और मुश्कि‍लों से निबटने के नए तरीके ईजाद हुए. सरकारी कर्ज और घाटे सभी जगह बढ़े लेकिन कुछ सरकारों ने संसाधनों को सेहत और जीविका बचाने पर केंद्रित किया और नतीजे हासिल किए.

इतिहास कहता है कि बड़े बदलाव बड़ी राजनैतिक अफरातफरी से निकलते हैं. रूस में जार युग के पतन के बाद (इटली-जर्मनी तक) ने बदलावों का एक दौर चला जो विश्व युद्ध के बाद लोकतंत्रों की वापसी और विश्व सहमति की स्थापना के बाद ही खत्म हुआ. महमारियां भी कम बड़े बदलाव नहीं लातीं. टायफायड न फैला होता स्पार्टा को एथेंस पर जीत (30 बीसी) न मिलती. रोमन लड़कर नहीं मरे. उनका पतन प्लेग (तीसरी सदी) से हुआ था. छोटी चेचक माया और इंका सभ्यताओं को निगल गई और 14वीं सदी के प्लेग ने यूरोप की सामंती प्रणाली को ध्वस्त कर औद्योगीकरण की राह खोली.

फिर क्या अचरज कि बाइडन की जीत से दुनिया में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के नए राजनैतिक अभि‍यान की शुरुआत हो और महामारी के सबक विश्व में सरकारों के कामकाज के तरीके बदल दें.

सत्तर वर्षीय गणतंत्र वाले भारतीय अगर अमेरिका की उथल-पुथल और महामारी से कुछ सीखना चाहें तो उन्हें क्या करना होगा? उन्हें पलट कर यह देखना होगा जब भारत अपने इतिहास की सबसे बड़ी आपदा से जूझ रहा था तब उसके गणतंत्र की संस्थाएं क्या कर रही थीं? सड़कों पर भटकते मजदूरों को देखकर संसद-विधानसभाओं में सरकार से कितने सवाल किए गए? सबसे बड़ी अदालत किसे न्याय दे रही थी? क्या नियामक यह जांच रहे थे कि राहतों का काम पारदर्शी ढंग से हो रहा है?

बीते एक साल ने हमें सि‍खाया है कि ताकतवर नेतृत्व, अकूत संसाधन, भीमकाय व्यवस्थाएं कुछ नहीं हैं. जिन देशों की संस्थाएं मजबूत व पारदर्शी थीं उन्होंने लोगों की जिंदगी और लोकतंत्र दोनों की रक्षा की है. यह वक्त है जब हम अपनी संवैधानिक संस्थाओं जैसे संसद, विधानसभाओं, अदालतों, नियामकों, विकेंद्रीकरण के बारे में सोचें क्योंकि इनकी परीक्षा का मौका कभी भी आ सकता है.

Saturday, January 16, 2021

भविष्य की मुद्रा

 


इतिहास, बड़ी घटनाओं से नहीं बल्कि उनकी प्रति‍क्रिया में हुए बदलावों से बनता है. दूसरा विश्व युद्ध घोड़े की पीठ पर बैठकर शुरू हुआ था लेकिन खेमे उखड़ने तक एटम दो हिस्सों में बांटा जा चुका था. इतिहास बनाने वाले असंख्य बड़े आवि‍ष्कार इसी युद्ध के खून-खच्चर से निकले थे.

कोविड के दौरान भी पूर्व और पश्चि‍म, दोनों ही जगह नई वित्तीय दुनिया की नींव रख दी गई है. सितंबर-अक्तूबर में जब भारत मोबाइल ऐप्लिकेशन पर प्रतिबंध जरिए चीन को 'सबक सि‍खा रहा था उस वक्त कई अर्थव्यवस्थाएं निर्णायक तौर पर डिजिटल और क्रिप्टो मुद्राओं की तरफ बढ़ चली थीं.

चीन ने इस बार भी चौंकाया. अक्तूबर में शेनझेन में पीपल्स बैंक ऑफ चाइना (चीन का रिजर्व बैंक) ने डिजि‍टल युआन का पहला परीक्षण किया. दक्षि‍णी चीन की तकनीक व वित्तीय गतिवि‍धि‍यों का केंद्र, शेनझेन चीन के सबसे नए शहरों में एक है. शहर के प्रशासन ने 15 लाख डॉलर की एक लॉटरी निकाली. विजेताओं को मोबाइल पर डिजिटल युआन का ऐप्लिकेशन मिला, जिसके जरिए वे शेनझेन की 3,000 दुकानों पर खरीदारी कर सकते थे.

यह संप्रभु डिजिटल करेंसी की शुरुआत थी. इधर, सितंबर में अमेरिका के नैसडैक में सूचीबद्ध कंपनी माइक्रोस्ट्रेटजी को शेयर बाजार नियामक (एसईसी) अपने फंड्स (425 मिलियन डॉलर) बिटक्वाइन में रखने की छूट दे दी और इस तरह अमेरिका में क्रिप्टोकरेंसी को आधि‍कारिक मान्यता मिल गई.

दिसंबर 2020 आते आते बिटक्वाइन की कीमत एक साल में 295 फीसद बढ़ गई क्योंकि महामारी के दौरान निवेशकों ने अपने फंड्स का एक हिस्सा सोने की तरह बिटक्वाइन में रखना शुरू कर दिया.

क्रिप्टोकरेंसी 2009 से सक्रिय हैं. बिटक्वाइन (ब्लॉकचेन तकनीक आधारित) एक कोऑपरेटिव करेंसी (इस जैसी 6000 और) है.

ई-करेंसी बाजार का सबसे संभावनामय घटनाक्रम यह है कि दुनिया के करीब आधा दर्जन देशों के केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) की तैयारी शुरू कर रहे हैं. यही वजह है महामारी के दौरान, चीन और अमेरिका के घटनाक्रम क्रिप्टो व डिजि‍टल करेंसी के भविष्य का निर्णायक मोड़ बन गए हैं.

स्वीडन का रिक्सबैंक (दुनिया का सबसे पुराना केंद्रीय बैंक) ई-क्रोना का परीक्षण कर रहा है. सिंगापुर की मौद्रिक अथॉरिटी ने सरकारी निवेश कंपनी टेमासेक और जेपी मॉर्गन चेज के साथ ई-करेंसी का परीक्षण पूरा कर लिया है. बहामा और वेनेजुएला भी रास्ते हैं. इन सबमें चीन सबसे आगे है.

दुनिया के केंद्रीय बैंक ई-करेंसी ला क्यों रहे हैं? इसलिए क्योंकि ऑनलाइन पेमेंट की व्यवस्था कुछ ही कंपनियों के हाथ (क्रेडिट कार्ड, मोबाइल वालेट) केंद्रि‍त हो रही है जो मौद्रिक व्यवस्था की लिए चुनौती बन सकती है. आइएमएफ का नया अध्ययन बताता है कि ई-करेंसी से वित्तीय संचालनों को सस्ता कर बड़ी आबादी तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाई जा सकती हैं और महंगाई  पूंजी का प्रवाह संतुलित कर मौद्रिक नीति को प्रभावी बनाया जा सकता है.

केंद्रीय बैंक ई-करेंसी की डिजाइन, कानूनी बदलाव, साइबर सिक्योरिटी और निजता के सुरक्षा के जटिल मुद्दों पर काम कर रहे हैं.

तकनीकों के इस सुबह के बीच डि‍जिटल इंडिया बदहवास सा है. 2018 में जब कई देशों में डिजिटल करेंसी पर काम शुरू हुआ तब रिजर्व बैंक ने क्रिप्टोकरेंसी के सभी संचालनों पर रोक लगा दी. क्रिप्टोकरेंसी खरीदना-बेचना अवैध हो गया.

सुप्रीम कोर्ट को यह प्रति‍बंध नहीं जंचा. इंटरनेट मोबाइल एसोसिएशन जो भारत में क्रिप्टो एक्सचेंज चलाते हैं उनकी याचिका पर मार्च 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक के आदेश को रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी के लिए कोई कानून ही नहीं है इसलिए प्रतिबंध नहीं लग सकता. कारोबार फिर शुरू हो गया. ताजा खबरों के मुताबिक, स्थानीय क्रिप्टो एक्सचेंज में कारोबार दस गुना बढऩे की खबर थी.

बीते अगस्त में सुना गया था कि सरकार एक कानून बनाकर क्रिप्टोकरेंसी पर पाबंदी लगाना चाहती है जबकि दिसंबर में यह खबर उभरी कि बिटक्वाइन कारोबार पर जीएसटी लग सकता है.

इधर, बीती जनवरी में नीति आयोग ने एक शोध पत्र में ब्लॉकचेन तकनीकों का समर्थन करते हुए बताया कि इनके जरिए भारत में 2030 तक 3 ट्रिलियन डॉलर के कारोबार किया जा सकता है.

संप्रभु ई-करेंसी अब दूर नहीं हैं. स्टैंडर्ड ऐंड पुअर अगले साल क्रिप्टोकरेंसी इंडेक्स लाने जा रहा है लेकिन भारत के निजाम का असमंजस खत्म नहीं होता.

हम कम से कम चीन-सिंगापुर से तो सीख ही सकते हैं, क्योंकि इतिहास बताता है कि तकनीकों की बस में जो पहले चढ़ते हैं वही आगे रहते हैं.

मार्को पोलो लिखता है कि 13वीं सदी में कुबलई खान ने शहतूत की छाल से बने कागज पर पहली बार गैर धात्विक करेंसी शुरू की. खान का आदेश था यह मुद्रा सोने-चांदी जितनी मूल्यवान है. इसे मानो या मरो. यूरोप ने मार्को पोलो को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन वक्त ने साबित किया कि मंगोल सुल्तान वक्त से आगे चल रहा था.