Friday, March 5, 2021

चमत्कारी राहत


अबक्या घोर मंदी के बावजूद बेरोजगारी रोकी जा सकती है?

क्या अर्थव्यवस्था की आय टूटने के बाद भी आम लोगों की कमाई में नुक्सान सीमित किए जा सकते हैं या कमाई बढ़ाई जा सकती है?

असंभव लगता है लेकिन असंभव है नहीं? 

बेकारी और मंदी के बीच पेट्रोल-डीजल पर टैक्स लगाकर और किस्म-किस्म की महंगाई बढ़ाकर, सरकारें हमें गरीब कर सकती हैं तो महामंदी के बीच सरकारें ही अपनी आबादी को गरीब होने बचा भी सकती हैं. मंदी के बावजूद आम लोगों की कमाई बढ़ाने का यह करिश्मा दुनिया के बड़े हिस्से में हुआ है, वह भी सामूहिक तौर पर.

मैकेंजी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, यह आर्थिक पैमानों किसी चमत्कार से कम नहीं है कि

= 2019 और 2020 की चौथी व दूसरी तिमाही में यूरोप में जीडीपी करीब 14 फीसद सि‍कुड़ गया तब भी रोजगार में गिरावट केवल 3 फीसद रही जबकि लोगों की खर्च योग्य आय (डिस्पोजेबल इनकम) में केवल 5 फीसद की कमी आई

= अमेरिका में तो जीडीपी 10 फीसद टूटा, रोजगार भी टूटे लेकिन लोगों की खर्च योग्य आय 8 फीसद बढ़ गई!

= कोविड के बाद जी-20 देशों ने मंदी और महामारी के शि‍कार लोगों की मदद पर करीब 10 खरब डॉलर खर्च किए, जो 2008 की मंदी में दी गई सरकारी मदद से तीन गुना ज्यादा था और दूसरे विश्व युद्ध के बाद जारी हुए आर्थिक पैकेज यानी मार्शल प्लान से 30 गुना अधि‍क था. अलबत्ता इस पैकेज का बड़ा होना उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना कि इनके जरिए उभरने वाला एक नया कल्याणकारी राज्य, जो हर तरह से अनोखा था.

= यूरोपीय समुदाय की सरकारों ने करीब 2,342 डॉलर और अमेरिका ने प्रति व्यक्ति 6,752 डॉलर अति‍रिक्त खर्च किए. सरकारों की पूरी सहायता रोजगार बचाने (कुर्जाबेत-जर्मन, शुमेज पार्शिएल-फ्रांस, फर्लो ब्रिटेन, पे-चेक प्रोटेक्शन-अमेरिका) और बेरोजगारों को सीधी मदद पर केंद्रित थी. यूरोप के अधि‍कांश देशों ने इस तरह की मदद पर सामान्य दिनों से ज्यादा खर्च किया.

= सरकारों ने आम लोगों की बचत संरक्षित करने और आवासीय, चि‍कित्सा की लागत को कम करने पर खर्च किया. यूरोप के देशों ने मकान के किराए कम किए, कर्मचारियों को अनिवार्य पेंशन भुगतान (स्वि‍ट्जरलैंड, आइसलैंड, नीदरलैंड) में छूट दी गई या सरकार ने उनके बदले पैसा जमा किया और शि‍क्षा संबंधी खर्चों की लागत घटाई गई.

= सामाजिक अनुबंधों की इस व्यवस्था में निजी क्षेत्र सरकार के साथ था. हालांकि कंपनियों को कारोबार में नुक्सान हुआ, दीवालिया भी हुईं, लेकिन यूरोप और अमेरिका में कंपनियों ने सरकारी प्रोत्साहनों जरिए रोजगारों में कमी को कम से कम रखा और कर्मचारियों के बदले पेंशन व बीमा भुगतानों का बोझ उठाया.

मंदी के बीच रोजगार महफूज रहे तो अमेरिका में 2020 की तीसरी में तिमाही में बचत दर (खर्च योग्य आय के अनुपात में) 16.1 यानी दोगुनी तक बढ़ गई. यूरोप में बचत दर 24.6 फीसद दर्ज की गई.

अब जबकि उपभोक्ताओं की आय भी सुरक्षि‍त है और बचत भी बढ़ चुकी है तो मंदी से उबरने के लिए जिस मांग का इंतजार है वह फूट पडऩे को तैयार है. वैक्सीन मिलने के बाद कारोबार खुलते ही यह ईंधन अर्थव्यवस्थाओं को दौड़ा देगा.

यकीनन अमेरिका और यूरोप की सरकारें बीमारी और मौतें नहीं रोक सकीं, देश की अर्थव्यवस्था को नुक्सान भी नहीं बचा पाईं लेकिन उन्होंने करोड़ों परिवारों को बेकारी-गरीबी की विपत्ति‍ से बचा लिया.

जहां सरकारें ऐक्ट ऑफ गॉड के सहारे टैक्स थोप रही हैं या निजी कंपनियां रोजगार काट कर मुनाफे कूट रही हैं, ये कल्याणकारी राज्य उनके लिए आइना हैं. पूंजीवादी मुल्कों ने इस महामारी में सरकार और समुदाय के बीच अनुबंध यानी सोशल कॉन्ट्रैक्ट जैसा इस्तेमाल किया वह भारत में क्यों नहीं हो सकता था?

सनद रहे कि भारत में कोविड पूर्व की मंदी और बेरोजगारी की वजह से लोगों की खर्च योग्य आय (डि‍स्पोजेबल इनकम) करीब 7.1 फीसद टूट चुकी थी. लॉकडाउन के दौरान भारत के जीडीपी में गिरावट की अनुपात में लोगों की खर्च योग्य आय में गिरावट कहीं ज्यादा रही है.  

भारत में आम परिवारों की करीब 13 लाख करोड़ रुपये की आय मंदी नि‍गल गई (यूबीएस सि‍क्योरिटीज). इसके बाद महंगाई आ धमकी है जो कमाई और बचत खा रही है. 

भारत दुनिया में खपत पर सबसे ज्यादा और दोहरा-तिहरा टैक्स लगाने वाले मुल्कों में है. हम कभी इस टैक्स का हिसाब नहीं मांगते, पलट कर पूछते भी नहीं कि हम उन सेवाओं के लिए सरकार को भी पैसा देते हैं, जिन्हें हम निजी क्षेत्र से खरीदते हैं या सरकार से उन्हें हासिल करने के लिए हम रिश्वतें चढ़ाते हैं. हम कभी फिक्र नहीं करते कि कॉर्पोरेट मुनाफों में बढ़त से रोजगारों और वेतन क्यों नहीं बढ़ते अलबत्ता संकट के वक्त हमें जरूर पूछना चाहिए कि हम पर भारी टैक्स लगाने वाला भारत का भारत का कल्याणकारी राज्य किस चुनावी रैली में खो हो गया है.

 

Friday, February 26, 2021

... मगर हकीकत है


जीडीपी के ताजा आंकड़े देखकर, एक आंकड़ेबाज अर्थव्यवस्था में वी’ (V) वाली रिकवरी पर व्यापारी से भिड़ गया जो मंदी से बुरी तरह त्रस्त था. व्यापारी बोला, 2020 जनवरी में मेरी कमाई सौ रु. थी, लॉकडाउन के बाद 20 रु. रह गई. आपके हिसाब से यह अगले साल 40 रु. हो जाएगी यानी दोगुनी बढ़त! लेकिन मेरा 60 रु. का नुक्सान कहां गया? इस तरह तो 100 रु. की कमाई पर पहुंचने में मुझे पांच साल लगेंगे.


मंदी में आर्थिक उत्पादन सिकुड़ जाने से आंकड़ों की समझ गड्डमड्ड हो जाती है. इसलिए प्रतिशत ग्रोथ के बजाए वास्तविक आंकड़े यानी उत्पादन की ठोस कीमत को पढऩा चाहिए. अगले दो साल तक भारत में जीडीपी को लेकर खासा भ्रम रहेगा. इसलिए सच समझना जरूरी है.


=  कोविड से पहले 2019-20 में अर्थव्यवस्था मंदी में थी. कुल उत्पादन का वास्तविक मूल्य (महंगाई हटाकर) 146 लाख करोड़ रु. था, जो 2020 में टूटकर 134 लाख करोड़ रु. रह गया. यह 2021-22 में बमुश्किल 149 लाख करोड़ रु. होगा.


=   अगर कोविड न हुआ होता और अर्थव्यवस्था केवल पांच फीसद की दर से बढ़ रही होती तो वित्त वर्ष 2022 में अर्थव्यवस्था का आकार 160.59 लाख करोड़ रु. होता. अब इसे हासिल करने के लिए 2022 में करीब 20 फीसद की विकास दर चाहिए.


=   आइएमएफ के मुताबिक, भारत में प्रति व्यक्ति आय को 2020 के स्तर पर लौटने में 2024 आ जाएगा.


मंदी से निकलने के जद्दोजहद के बीच जीडीपी को लेकर जब कई भ्रम टूट ही रहे हैं तो भारत में इसकी पैमाइश के तौर तरीकों पर भी नए सिरे से विचार करने की जरूरत है.


डेविड रोजलिंग, अपनी दिलचस्प किताब, द ग्रोथ डिल्यूजन में जीडीपी को कुजनेत्स का राक्षस कहते हैं. जीडीपी के जनक सिमोन कुजनेत्स, अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़े थे. 1933 में राष्ट्रपति फ्रेड्रिक रूजवेल्ट ने, उन्हें नेशनल एकाउंट का बनाने का काम सौंपा. कुजनेत्स ने सभी गतिविधियों को एक आंकड़े में समेट दिया. यही मायावी फॉर्मूला भारत के कुल उत्पादन के मूल्य को आबादी से बांट कर मुकेश अंबानी और दिहाड़ी मजदूर की कमाई बराबर कर देता है.


भारत में ग्रोथ की पैमाइश उत्पादन के आधार पर होती है, लोगों की कमाई में बढ़त से नहीं. 2015 में नेशनल एकाउंट्स में नया फॉर्मूला (ग्रॉस वैल्यू एडेडकच्चे माल और दूसरे इनपुट निकालने के बाद उत्पादन का मूल्य) फॉर्मूला जोड़ा गया तो वह भी सप्लाइ या आपूर्ति की तरफ से था, मांग या खपत की तरफ से नहीं. अरविंद सुब्रह्मण्यम (2018 तक सरकार के आर्थिक सलाहकार) ने जून 2019 में अपने एक अध्ययन में साबित किया कि यह नया पैमाना ग्रोथ को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है.


भारत को मंदी के बीच आर्थिक प्रगति को नापने का तरीका बदलना चाहिए, मसलन,


g राष्ट्रीय जीडीपी को उत्पादन या आपूर्ति की तरफ से मापा जा सकता है. लेकिन राज्य (एसडीपी) और जिला विकास दर (डीडीपी) की नापजोख मांग और आय के आधार पर होनी चाहिए. इससे स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में विकास की सही तस्वीर मिलेगी.


g राष्ट्रीय, राज्य और जिला पर मीडियन इनकम यानी मध्यवर्ती आय (सर्वोच्च और न्यूनतम के बीच) का आकलन जरूरी है. इससे गरीबी में कमी और मध्य वर्ग के विस्तार को मापा जाना सकता है.


g जेनुइन प्रोग्रेस, हैपीनेस, वेल बीइंग इंडेक्स जैसे पैमानों से जिला स्तर पर सामाजिक सेवाओं की गुणवत्ता और प्रभाव को मापा जा सकता है.


भारत को लंबे वक्त तक धीमी ग्रोथ के साथ जीना होगा. फिर भी प्रमुख जिले अगर दहाई के अंकों और राज्य 7-8 फीसद की औसत विकास दर हासिल कर पाते हैं तो 6-7 फीसद की स्थायी राष्ट्रीय जीडीपी दर के जरिए बड़ी आबादी की जिंदगी में क्रमश: बेहतर कर सकती है.


दरअसल, कमाई, रोजगार, जीवन स्तर और संपत्ति सही पैमाइश के बिना जीडीपी से कुछ समझ नहीं आता. आर्थिक असमानता सूझ देने वाले इतालवी सांख्यिकीविद कोलाराडो गिनी का फॉर्मूला (गिनी कोइफिशिएंट) बताता है कि भारत की दस फीसद आबादी के पास 77 फीसद संपत्ति, यूं ही नहीं है.


कोविड के बीच बीती मई में चीन ने जीडीपी को नापने का पैमाना बदल दिया. अब वह तरक्की की पैमाइश उत्पादन में बढ़ोतरी (मूल्य के आधार पर) नहीं बल्कि रोजगार से करेगा. चीन की सरकार छह फीसद ग्रोथ नहीं बल्कि जनता के लिए (रोजगार, बुनियादी जीविका, स्वस्थ प्रतिस्पर्धी बाजार, भोजन और ऊर्जा की आपूर्ति, स्थानीय सरकारों को ज्यादा ताकत) जैसी गारंटियां सुनिश्चित करने वाली है.


मंदी जाने तक जीडीपी के आंकड़े हमें हैरान रखेंगे. इनमें एक तरफ कंपनियों के मुनाफे बढ़ते नजर आएंगे और दूसरी तरफ बेकारी और गरीबी. जब भारत में तेज ग्रोथ वाले वर्षों (2012 से 2018) में भी बेकारी बढ़ी और ग्रामीण व नगरीय कमाई कम हुई तो अब तो घोर मंदी है. इसलिए जीडीपी के आंकड़ों को अपनी कमाई, खपत और बचत से नापना बेहतर है ताकि खुशफहमी में जोखिम लेने से बचा जा सके.

Saturday, February 20, 2021

महंगाई की कमाई

 

भारत में सरकार महंगाई बढ़ाती ही नहीं बल्कि बढ़ाने वालों को बढ़ावा भी देती हैं! सरकारों को समझदारी का मानसरोवर मानने वालेे एक उत्साही  , यह सुनकर भनभना उठेे. क्या कह रहे हो? सरकार ऐसा क्यों करेगी? जवाब आया कि रेत से सिर निकालिए. प्रसिद्ध अर्थविद् मिल्टन फ्रीडमन के जमाने से लेकर आज तक दुनिया का प्रत्येक अर्थशास्त्री यह जानता रहा है कि महंगाई ऐसा टैक्स है जो सरकारें बगैर कानून के लगाती हैं.

पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स और बेकारी व गरीबी के बीच, मांग के बिना असंख्य उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी मौसमी उठा-पटक की देन नहीं है. भारत की आर्थि‍क नीतियां अब फ्रीडमन को नहीं, ऑस्ट्रियन अर्थविद् फ्रेडरिक वान हायेक को भी सही साबित कर रही हैं, जो कहते थे, अधि‍कांश महंगाई सरकारें खुद पैदा करती हैं, अपने फायदे के लिए.

यानी कि सरकारों की प्रत्यक्ष नीतियों से निकलने वाली महंगाई, जो सिद्धांतों का हिस्सा थीं, वह भारत में हकीकत बन गई है.

महंगाई को बहुत से कद्रदान जरूरी शय बताते हैं लेकिन यह इस पर निर्भर है कि महंगाई का कौन सा संस्करण है. अच्छी महंगाई में मांग और खपत के साथ कीमतें बढ़ती हैं (डिमांड पुल इन्फ्लेशन). यानी मूल्यों के साथ कमाई (वेज पुश) भी बढ़ती है लेकिन भारत में सरकार ने महंगाई परिवार की सबसे दुर्गुणी औलाद को गोद ले लिया है, जिसमें मांग नहीं बल्कि उत्पादन और खपत की लागत बढ़ती है. यह कॉस्ट पुश इन्फ्लेशन है जो अब अपने विकराल रूप में उतर आई है.

महंगाई का यही अवतार अमीरों को अमीर और गरीबों को और ज्यादा निर्धन बनाता है. लागत बढ़ाने वाली महंगाई अक्सर टैक्स की ऊंची दरों या ईंधन कीमतों से निकलती है. सबसे ताजा वाकया 2008 के ब्रिटेन का है, जब दुनिया में बैंकिंग संकट के बाद गहरी मंदी के बीच वहां महंगाई बढ़ी, जिसकी वजह से मांग नहीं बल्कि टैक्स और देश की मुद्रा पाउंड स्ट‌र्लिंग के अवमूल्यन के कारण आयातों की महंगाई थी.

भारत का पूरा खपत टैक्स ढांचा सिर्फ महंगाई बढ़ाने की नीति पर केंद्रित है. जीएसटी, उत्पाद या सेवा की कीमत पर लगता है, यानी कीमत बढऩे से टैक्स की उगाही बढ़ती है. खपत पर सभी टैक्स देते हैं और इसलिए सरकार खपत को हर तरह से निचोड़ती है. केंद्र और राज्यों में एक ही उत्पाद और सेवा पर दोहरे-तिहरे टैक्स हैं, टैक्स पर टैक्स यानी सेस की भरमार है. आत्मनिर्भरता के नाम पर महंगी इंपोर्ट ड्यूटी है, यही महंगाई बनकर फूट रहा है.

भारत सस्ते उत्पादन के बावजूद महंगी कीमतों वाला मुल्क है. पेट्रोल-डीजल सस्ते उत्पादन के बावजूद टैक्स के कारण जानलेवा बने हुए हैं. दक्षिण एशि‍या के 12 प्रमुख देशों की तुलना में भारत में बिजली की उत्पादन लागत सबसे कम है (वुड मैकेंजी रिपोर्ट) लेकिन हम लागत की तीन गुनी कीमत भरते हैं. टैक्स वाली महंगाई भूमि, धातुओं, ऊर्जा, परिवहन को लगातार महंगा कर रही है जिसके कारण अन्य उत्पाद व सेवाएं महंगी होती हैं. ताजा महंगाई के आंकड़े बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था अब मौसमी नहीं बल्कि बुनियादी महंगाई (कोर इन्फ्लेशन) की शि‍कार है, जो मांग न होने के बावजूद इसलिए बढ़ रही है क्योंकि लागत बढ़ रही है.  

महंगाई अब सरकार, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज कंपनियों का साझा उपक्रम है. टैक्स पर टैक्स थोपकर सरकारें उत्पादकों को कीमतें बढ़ाने की खुली छूट दे देती हैं. अप्रत्यक्ष टैक्स उत्पादक नहीं देते, यह तो उपभोक्ता की जेब से निकलता है, इसलिए कंपनियां खुशी-खुशी कीमत बढ़ाती हैं. मसलन, बीते साल अगस्त से दिसंबर के बीच स्टील की कीमत 37 फीसद बढ़ गई और असंख्य उत्पाद महंगे हो गए.

मंदी के बीच इस तरह की महंगाई, एक के बाद दूसरी लागत बढऩे का दुष्चक्र रचती है, जिसमें हम बुरी तरह फंस रहे हैं. अगर आपको लगता है कि यह मुसीबतों के बीच मुनाफाखोरी है तो सही पकड़े हैं. जीएसटी के तहत जो टैक्स दरें घटीं उन्हें कंपनियों ने उपभोक्ताओं से नहीं बांटा यानी कीमतें नहीं घटाईं. जीएसटी की ऐंटी प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी ने एचयूएल, नेस्ले से लेकर पतंजलि तक कई बड़े नामों को 1,700 करोड़ रुपए की मुनाफाखोरी करते पकड़ा. लेकिन इस फैसले के खि‍लाफ कंपनियां हाइकोर्ट में मुकदमा लड़ रही हैं और मुनाफाखोरी रोकने वाले प्रावधान को जीएसटी से हटाने की लामबंदी कर रही हैं.

अक्षम नीतियों और भारी टैक्स के कारण ईंधन, ऊर्जा और अन्य जरूरी सेवाओं की कीमत उनकी लागत से बहुत ज्यादा है. मंदी में मांग तो बढऩी नहीं है इसलिए जो बिक रहा है महंगा हो रहा है. कंपनियों ने बढ़ते टैक्स की ओट में, बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं पर थोप कर मुनाफा संजोना शुरू कर दिया है. वे एक तरह से सरकार की टैक्स वसूली सेवा का हिस्सा बन रही हैं. कंपनियां सारे खर्च निकालने के बाद बचे मुनाफे पर टैक्स देती हैं और उसमें भी 2018 में सरकार ने उन्हें बड़ी रियायत (कॉर्पोरेट टैक्स) दी है.

तो क्या भारत ‘क्रोनी इन्फ्लेशन’ का आविष्कार कर रहा है?

Friday, February 12, 2021

गुम राह की तलाश


डिजिटल करेंसी, सरकारी कंपनियों के निजीकरण और फसलों की सही कीमत के बीच क्या रिश्ता है? सरकार इन तीनों को ही टालना चाहती थी लेकिन वक्त ने इनको अपरिहार्य बना दिया. तीन साल से दायें-बायें कर रहा और प्रतिबंधों पर टिका निजाम अंतत: डि‍जिटल करेंसी के लिए कानून लाने पर मजबूर हो गया. ठीक इसी तरह बजट के घाटे ने यह हालत कर दी कि अब खुलकर कहना पड़ा कि सार्वजनिक कंपनियों के निजीकरण के अलावा कोई रास्ता नहीं है.

बदलता वक्त बेहद तेज आवाज में सरकार को बता रहा है कि भारत में फसलों का पारदर्शी और उचित मूल्य (प्राइस रियलाइजेशन) तय करने के सुधारों का वक्त आ गया है. आंदोलन कर रहे किसान दिल्ली का तख्त नहीं बस यही सुधार तो मांग रहे हैं. और सरकार फसल मूल्यों की पारदर्शी व्यवस्था के बगैर हवा में फसलों का बाजार खड़ा कर देना चाहती है. इसलिए शक सुलग उठे और किसानों का ध्वस्त भरोसा अब किसान महापंचायतों में उमड़ रहा है.

किसानों को अचानक सपना नहीं आया कि वह उठकर समर्थन मूल्य की गारंटी मांगने लगे और न ही वह ऐसा कुछ मांग रहे हैं जो सरकार के एजेंडे में नहीं था. सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के जिस वादे को बार बार दोहरा रही थी, फसलों की सही कीमत (केवल सीमित सरकारी खरीद नहीं) उसका अपरिहार्य हिस्सा रही है. इन बिलों से पहले तक तैयार हुए तीन आधि‍कारिक दस्तावेज बताते हैं कि किसानों की आय बढ़ाने के लक्ष्य के तहत फसल मूल्य सुधारों के एजेंडे पर काम चल रहा था, जिससे किसान भी अन‍भि‍ज्ञ नहीं थे.

फसल की वाजिब कीमत के अलावा कृषि‍ सुधार और हैं क्या? खेती की जमीन बढ़ नहीं सकती. फसलों का विविधीकरण, नई तकनीकों के इस्तेमाल करने, खेती में निजी निवेश बढ़ाने या फिर छोटे किसानों की आय बढ़ाने के सभी उपाय इस बात पर केंद्रित हैं कि उत्पादक (किसान) को अधि‍कांश उत्पादन (फसल) की सही कीमत कैसे मिले. खेती में तरक्की के सभी रास्ते इससे ही निकलते हैं.

नवंबर 2018 में नीति आयोग ने न्यू इंडिया @75 नाम का दस्तावेज बनाया था, जिसकी भूमिका स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखी थी. इसमें 2022 तक कृषि‍ लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) को खत्म कर एग्री प्राइसिंग ट्रिब्यूनल बनाने का लक्ष्य रखा गया. नीति आयोग से कहा गया था कि वह

एमएसपी के समानांतर मि‍निमम रिजर्व प्राइस (एमआरपी) की प्रक्रिया तय करे. इस एमआरपी पर मंडियों में फसल की नीलामी शुरू होनी चाहिए.

  तैयारी यह भी थी कि देश में सरप्लस उत्पादन, देश में कम लेकिन विदेश में ज्यादा और दोनों जगह कम उत्पादन वाली फसलों के लिए एमएसपी से अलग कीमत तय की जाए.

  मंडी कमीशन और फीस का ढांचा बदलने की भी राय थी ताकि किसानों को एमएसपी का प्रतिस्पर्धी मूल्य मिल सके.

अच्छे और खराब मानसून के दौरान अलग-अलग कीमतें तय करने पर भी बात हो रही थी.

यह दस्तावेज किसानों की आय दोगुनी करने वाली समिति की सिफारिशों (सिंतबर 2018) के बाद बना था जिसमें किसानों की समग्र उत्पादन लागत पर कम से कम 50 फीसदी मुनाफा देने की सिफारि‍श की गई थी. इससे पहले 2011 में नरेंद्र मोदी (तब मुख्यमंत्री) की अध्यक्षता वाली समिति एमएसपी को महंगाई से जोडऩे और बाजार में फसल की बिक्री एमएसपी पर आधारित करने के वैधानिक उपाय की राय दे चुकी थी.

ये तैयारियां से पहले सरकार यह स्वीकार कर चुकी थी 

अधि‍कांश फसल (सरकारी खरीद कुल उपज का केवल 13%) लागत से कम कीमत पर बिकती है. विभि‍न्न फसलों में खलिहान मूल्य (हार्वेस्ट प्राइस) बाजार के खुदरा मूल्य से 35 से 63 फीसदी तक कम हैंनीति आयोग

1980 के बाद से अब तक किसानों की आय कभी भी गैर खेतिहर श्रमिकों की आय के एक तिहाई से ज्यादा नहीं हो सकी. यानी 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने को उनकी कमाई सालाना 10.4 फीसदी की दर से बढ़ानी होगी.

इस हकीकत और तैयारी की रोशनी में नए कानूनों पर हैरत लाजिमी है जिनमें फसलों की वाजिब कीमत तय करने की योजना तो दूर समर्थन मूल्य शब्द का जिक्र भी नहीं था. यानी मंदी के बीच किसान अर्से से जिन सुधारों की बाट जोह रहे थे उनकी जगह उन्हें कुछ और दे दिया गया. नतीजा: आशंकाएं जन्मी और विरोध उबल पड़ा.

यहां न सरकार गुमराह है, न किसान. सरकारें आदतन आलसी होती हैं. किसी 'खास’ को फायदा देने के अलावा वे अक्सर संकट और सियासी नुक्सान पर ही जागती हैं. सो कभी कभी आंदोलन भी सुधार का रास्ता खोल देते हैं. फसल मूल्य सुधार जटिल हैं, इनसे तत्काल बड़े राजनैतिक नारे नहीं बनेंगे लेकिन इन सुधारों को अब शुरू करना ही होगा क्योंकि उस विचार को कोई भी ताकत रोक नहीं सकती जिसका समय आ गया है (विक्टर ह्यूगो).