Friday, April 2, 2021

लौट के फिर न आए ...

 


 हर्ष बुरी तरह निराश है. लॉकडाउन खत्म हुए नौ महीने बीतने को हैं. सरकारी मुखारविंदों से मंदी खत्म होने उद्घोष झर रहे हैं. रैलियां, चुनाव, मेले सब कुछ तो हो रहे हैं, बस उसकी नौकरी नहीं लौट रही.

हर्ष जैसे लोग पहले भी बहुत ज्यादा नहीं थे जिनके पास मासिक पगार वाली ठीक ठाक नौकरी थी. हर्ष जैसे गिनती के लोग टैक्स दे पाते हैं, और अपने खर्च के जरि‍ए कई परिवारों को जीविका देते हैं. कोविड से पहले 2019-20 में वेतनभोगियों की तादाद करीब 8.6 करोड़ थी जो अप्रैल 2020 में घटकर 6.8 करोड़ और जुलाई में घटकर 6.7 करोड़ रह गई (सीएमआईई).

लॉकडाउन खत्म होने के बाद, पहले से कम मजदूरी और कभी भी निकाले जाने के खतरे के तहत असंगठित दिहाड़ी कामगारों को कुछ काम मिलने लगा है, लेकिन संगठित नौकरियों के बाजार में स्थायी मुर्दनी छाई है.

आर्थि‍क मंदी की गर्त से वापसी के सफर में नौकरी पेशा बहुत पीछे क्यों छूटते जा रहे हैं? कोविड के बाद नौकरियां क्यों नहीं लौट रही हैं? इसके‍ लिए कोविड के पहले की तस्वीर देखनी होगी.

भारत में संगठित क्षेत्र के रोजगारों का बाजार पहले से बहुत छोटा है. जिसका दुर्भाग्य कोवि‍ड की आमद से पहले ही जग चुका था.

1,703 प्रमुख और बड़ी कंपनियों की बैलेंस शीट का आकलन (केयर रेटिंग्स, नवंबर 2020) बताता है कि कोविड से पहले 2019-20 में भारत की 60 फीसद कॉर्पोरेट नौकरियां केवल पांच उद्योग या सेवाओं (सूचना तकनीक 20.8, बैंक 18, ऑटोमोबाइल 7.5, हेल्थकेयर 6.4, वित्तीय सेवाएं 6.1 फीसद ) में थीं. इनमें करीब 39 फीसद कॉर्पोरेट रोजगार केवल बैंक और सूचना तकनीक में केंद्रित हैं.

मंदी कोविड से पहले ही आ गई थी इसलिए प्रमुख कंपनियों में नई नियुक्तियों में दो फीसद गिरावट दर्ज की गई. 2018-2019 में प्रमुख कंपनियों ने करीब 2.55 लाख कर्मचारी रखे थे जबकि‍ वित्त वर्ष 2020 में केवल 1.38 लाख नई भर्तियां हुईं.

उपरोक्त पांच उद्योग और सेवाओं के अलावा उपभोक्ता उत्पाद, बीमा, रिटेल, स्टील, भवन निर्माण व रियल एस्टेट, केमिकल और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेट नौकरियों वाले अन्य प्रमुख क्षेत्र हैं. इनमें केवल बैंक और उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों ने 2018-2019 की तुलना में 2019-20 ज्यादा भर्तियां की. अन्य सभी क्षेत्रों में नए रोजगारों की संख्या घट गई थी.

बैंकिंग-वित्तीय सेवाएं, अचल संपत्ति‍, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्र लोगों की आय व खपत मांग पर केंद्रित हैं. मंदी के बाद मांग खत्म होने से इनमें नए अवसर बनते नहीं दिख रहे हैं. बैंकिंग में कोविड से पहले तक नए रोजगार बन रहे थे, वहां फंसे हुए कर्ज, सरकारी बैंकों का विलय और निजीकरण रोजगारों की बढ़त पर भारी पड़ने वाला है.

इसके बाद सूचना तकनीक, उपभोक्ता उत्पाद (एफएमसीजी) और स्वास्थ्य सेवाएं बचती हैं जहां कोविड लॉकडाउन के दौरान 'गए' रोजगारों की एक सीमा तक वापसी हो सकती है. हालांकि यहां भी कोविड के बीच नई तकनीक के सहारे श्रम लागत में कटौती के नए रास्ते अपनाए जा रहे हैं इसलिए बड़े पैमाने पर नए रोजगार आने की उम्मीद नहीं दिखती. 

2008-9 की मंदी ने यूरोप और अमेरिका में जो तबाही मचाई थी वही भारत में होता दिख रहा है. उस मंदी के बाद वित्तीय सेवाएं, भवन निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग, बिजनेस सर्विसेज, मझोले स्तर के रोजगार बड़े पैमाने पर खत्म हो गए थे. इसलिए ही कोविड के दौरान वहां की सरकारों ने रोजगार बचाने में पूरी ताकत झोंक दी. भारत में भी मझोले स्तर के रोजगार खत्म हुए हैं. 

कोवि‍ड वाला वित्तीय वर्ष बीतते महसूस हो रहा है कि बीते एक साल में जितना आर्थि‍क उत्पादन पूरी तरह खत्म हुआ है उसका अधि‍कांश नुक्सान संगठित क्षेत्र के रोजगारों के खाते में गया है. 

सनद रहे कि कॉर्पोरेट और संगठित नौकरियों की संख्या पहले से बहुत कम थी. कोविड से ऐसे कामगारों कुल तादाद 47 करोड़ थी, जिसमें केवल पांच करोड़ पीएफ (भविष्य निधि‍) और करीब तीन करोड़ कर्मचारी बीमा के तहत हैं.

नौकरियों का अर्थशास्त्र बताता है कि अर्थव्यवस्था मंदी से भले ही उबर जाए पर लंबी बेकारी असंख्य लोगों को रोजगार के लायक नहीं रखती. भारत में बेरोजगारी में 2018 में (एनएसएसओ) ही 45 साल के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी थी. मंदी के बाद यह सूखा अब और लंबा हो रहा है.

कंपनियों को नौकरियां बचाने और बढ़ाने पर बाध्य करने और खाली सरकारी पदों को भरने की दूर, हमारी सरकारें बेरोजगारी पर बात भी नहीं करना चाहतीं. अमेरिकी उप राष्ट्रपति हर्बट हंफ्रे कहते थे कि अगर भूख, गरीबी, खराब सेहत और तबाह जिंदगियां अस्वीकार्य हैं तो बेरोजगारी का कोई न्यूनतम स्तर कैसे स्वीकार हो सकता है! 

बेरोजगारी जीवन का अपमान है, यह राष्ट्रीय शर्म है लेकिन भारत में यह शर्म केवल बेरोजगारों को आती है, सरकारों को नहीं. हम अजीब दौर में हैं, जहां सरकार कारोबारों को फॉर्मल यानी संगठित बनाने की मुहिम में लगी है लेकिन रोजगार बाजार में अस्थायी (असंगठित) नौकरी और कम वेतन अब नया नियम होने वाले हैं.

Friday, March 26, 2021

कानूनों की अराजकता !

 


भारत में कानून का राज है या नियमों की अराजकता? 

क्या सरकारी नीतियां और नियम अदूरदर्शि‍ता के कारण नौकरशाहों के मनमानेपन का अभयारण्य बन चुके हैं.

क्या कारोबारी अनि‍श्चितता और संकट के बीच कानून हमारी मदद की बजाए उत्पीड़न का जरिया बन जाते हैं?

अगर अभी तक आप इन सवलों को पूछने से डरते थे तो अब जरूर पूछि‍ए क्योंकि सरकार खुद इससे सहमत हो रही है, हालांकि कर कुछ नहीं रही है.

आर्थि‍क समीक्षा (2020-21) ने पूरा अध्याय छापकर यह बताया है कि भारत में कानूनों का पालन समस्या नहीं है मुसीबत तो कानूनों की अति यानी ओवर रेगुलेशन है. सनद रहे कि यह समीक्षा कोरोना काल के बाद आई है, जिसमें सरकार ने प्लेग काल (1897) के महामारी कानून तहत कई आपातकालीन अधि‍कार समेट लिए.

यदि आप ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (कारोबारी सहजता) की रैंकिंग में भारत की तरक्की पर लहालोट हो जाते हों, तो अब आपकी भावनाएं आहत हो सकती हैं. कारोबारी सहजता के समानांतर एक और सूचकांक है जिसे वर्ल्ड रूल ऑफ लॉ इंडेक्स (वर्ल्ड जस्टि‍स प्रोजेक्ट) कहते हैं जो सरकारी नियम-कानूनों के प्रभावी पालन की पैमाइश करता है; इसके तहत बगैर दबाव के नियमों के पालन, प्रशासनिक देरी और लंबी प्रक्रियाओं के आधार पर वि‍भि‍न्न देशों की रैंकिंग की जाती है.

नियमों के पालन में 128 देशों के बीच भारत, खासी ऊंची रैंकिंग (45—रिपोर्ट 2020) रखता है यानी कि दुष्प्रचार के विपरीत भारत में नियमों का अनुपालन बेहतर है. अलबत्ता कानूनों को लागू करने में नौकरशाही की बेजा दखल के मामले में भारत की रैंकिंग बेहद घटि‍या है. इसलिए कानून या नियमों के असर यानी उनसे होने वाले फायदे सीमित हैं.

वर्ल्ड रूल ऑफ लॉ इंडेक्स की रोशनी में ही यह स्पष्ट होता है कि कारोबारी सहजता के सूचकांक के तहत नया कारोबार शुरू करने और जमीन के पंजीकरण जैसे पैमानों पर भारत की साख की इतनी दुर्दशा (रैंकिंग 136 और 154—2020) क्यों है.

भारत को निवेशक क्यों बिसूरते हैं और दावों के उलटे जमीन पर हालात कैसे हैं, इसे मापने के लिए आर्थि‍क समीक्षा ने क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के एक अध्ययन का हवाला दिया है. अध्ययन बताता है कि भारत में सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद भी एक कंपनी को बंद करने 1,570 दिन लगते हैं. आप कारोबार बंद के करने के पांच साल बाद ही मुतमइन हो सकते हैं कि अब कोई सरकारी नोटिस नहीं आएगा.

आर्थि‍क समीक्षा इतिहास बने इससे पहले हमें समझना होगा कि नियम और कानूनों का होना, उसे मानने की प्रक्रियाएं निर्धारित करना एक बात है और उन कानूनों का प्रभावी होना बि‍ल्कुल दूसरी बात.

भारत में कानून इस तरह गढ़े जाते हैं कि जैसे बनाने वालों ने भविष्य देख रखा है. नीति बनाने वाले कभी यह मानते नहीं कि भविष्य अनि‍श्चित है. जीएसटी ताजा उदाहरण है जो छह माह में औंधे मुंह जा गिरा. दीवालियापन कानून में एक साल के भीतर अध्यादेश लाकर बदलाव करना पड़ा.

कानून या नियम कभी संपूर्ण या स्थायी नहीं होते. वक्त अपनी तरह से बदलता है और अनिश्चितता के बीच जब नियम छोटे या अधूरे पड़ते हैं तो अफसरों की पौ बारह हो जाती है. उनके विवेकाधि‍कार ही नियम बन जाते हैं. वे कानून का पालन करते हुए इसे तोड़ने के तरीके बताते हैं. मसलन, भारत में ऐप बेस्ड टैक्सी (ओला-उबर) लंबे समय तक गैर वाणि‍ज्यि‍क लाइसेंस पर चलती रहीं. या बुखार की सस्ती और जेनरि‍क दवा, एक दवा जोड़कर महंगी कर दी जाती है.

वित्त मंत्रालय में बनी आर्थि‍क समीक्षा कहती है कि भारत के नीति निर्माता (सांसद, विधायक और अफसर) निरीक्षण या पर्यवेक्षण (सुपरविजन) और नियमन (रेगुलेशन) का फर्क नहीं समझ पाते.

नियम ठोस हैं, उन्हें समझा जा सकता है जबकि सुपरिवजन अदृश्य है. लचर और अदूरदर्शी कानूनों की मदद से नौकरशाही सुपरविजन को नए अलि‍खि‍त नियमों बदल देती है और भ्रष्टाचार व मनमानापन लहलहाने लगता है.

जीएसटी से लेकर खेती के ताजा कानूनों तक हमें बार-बार यह पता चला है कि सरकारें, उनसे संवाद ही नहीं करतीं जिनके लिए कानून बनाए जाते हैं. नीतियां बनाने में संवाद, शोध बहस नदारद है. दंभ व तदर्थवाद से निकल रहे नियम व कानून, वक्त के तेज बदलाव के सामने ढह जाते हैं और अफसरों को मनमानी ताकत सौंप देते हैं. हम नियम-कानून मानते हैं लेकिन वे प्रभावी नहीं हैं. उनसे हमारी जिंदगी बेहतर नहीं होती.

आर्थि‍क समीक्षा ने भारत में बढ़ती कारोबारी सहजता के प्रचार का नगाड़ा फोड़ दिया है. इसलिए सरकार बहादुर अगर ऐसा कोई दावा करें तो उन्हें इस समीक्षा की याद जरूर दिलाइएगा. और हां, खुद को कोसना बंद कीजिए, हम कानून पालन करने वाला समाज हैं, खोट तो कानूनों में है, उन्हें बनाने और लागू करने वालों में है, हम सब में नहीं. हम तो कानूनों की अराजकता के शि‍कार हैं!

Friday, March 19, 2021

सबसे बड़ा उलट-फेर

 


भारत में यह फर्क अब खासा महत्वपूर्ण होने वाला है कि आप किस राज्य में रहते हैं और रोजगार का मौका कौन से राज्य में मिलता है. यह बात हरियाणा या झारखंड में राज्य के निवासियों को रोजगार (निर्धारित वेतन सीमा से नीचे) देने की शर्त तक सीमित नहीं है बल्कि रोजगारों और लोगों के जीवन स्तर में बेहतरी भविष्य में इस तथ्य से तय होगा कि विभि‍न्न राज्य मंदी के बाद आने वाले सबसे बड़े वित्तीय उलट-फेर को कैसे संभाल पाते हैं.

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में मंदी की बहस से निकलकर अब राज्यों की तरफ देखने की जरूरत है, लॉकडाउन ने जिनकी अर्थव्यवस्थाओं की बुरी गत बना दी है. राज्यों के अपने राजस्व नुक्सान तो अलग हैं, ऊपर से उन्हें जीएसटी के हिस्से में इस वित्त वर्ष में केंद्र से करीब तीन लाख करोड़ रुपए कम मिले. अगले साल भी इतनी ही कमी रहनी है.

 

जोर का झटका

राज्यों की कमाई या राजस्व को बहुत बड़ा झटका लगने वाला है. केंद्र ने राज्य सरकारों को जीएसटी में नुक्सान की भरपाई की जो गारंटी दी है, वह 2023 में खत्म हो जाएगी. 15वें वित्त आयोग ने अपनी ताजा रिपोर्ट में इसे बढ़ाने की कोई सिफारिश नहीं की है. इस गारंटी के खत्म होने से राज्यों के राजस्व का पूरा संतुलन बदल जाएगा और नुक्सान की भरपाई का इंतजाम उन्हें खुद करना होगा.

यही नहीं, वित्त आयोग ने केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी का फॉर्मूला भी बदल दिया है. नई व्यवस्था में जनसंख्या नियंत्रण, स्वास्थ्य व शि‍क्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के पैमाने भी जोड़े गए हैं. इंडिया रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय करों में आठ राज्यों (आंध्र, असम, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश) का हिस्सा 24 से लेकर 118 (कर्नाटक) फीसद तक घट जाएगा. महाराष्ट्र, गुजरात, अरुणाचल के हिस्से में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो रही है.

केंद्र के टैक्स में सेस और सरचार्ज का हिस्सा बढ़ता जा रहा है, जिनमें राज्यों को हिस्सा नहीं मिलता. केंद्रीय टैक्स राजस्व में इनका हिस्सा 2012 में 10.4 फीसद से बढ़कर 2021 में 19.9 फीसद हो गया है.

वित्त आयोग ने केंद्र से राज्यों को जाने वाले अनुदानों में बढ़ोतरी की सिफारिश की है लेकिन शि‍क्षा, बिजली और खेती के लिए केंद्रीय अनुदान बेहतर प्रदर्शन की शर्त पर मिलेंगे. बेहतर काम के लिए राज्यों को ज्यादा खर्च या निवेश करना होगा जबकि खजाने और ज्यादा खाली हो जाएंगे.

कर्ज का अंबार

कोविड की मंदी ने केवल केंद्र के बजट को ही ध्वस्त कर सरकार को बैंकों व सरकारी संपत्ति‍यों की सेल लगाने पर बाध्य नहीं किया है, राज्यों की हालत और ज्यादा खराब है. मौजूदा वित्त वर्ष में (7 अप्रैल से 16 मार्च तक) 28 राज्य और 2 केंद्र शासित प्रदेश मिलकर बाजार से रिकॉर्ड 8.24 लाख करोड़ रुपए का कर्ज उठा चुके हैं. यह कर्ज पिछले वित्त वर्ष से 31 फीसद ज्यादा है.

मध्य प्रदेश, झारखंड और सिक्किम पिछले साल की तुलना में दोगुने से ज्यादा कर्ज उठा चुके हैं. कर्ज पर ब्याज की दर ज्यादातर राज्यों के लिए 7 फीसद से ऊपर हैं.

जीएसटी में नुक्सान की भरपाई पर केंद्र के इनकार के बाद अगले साल राज्यों को 2.2 लाख करोड़ रु. अति‍रिक्त कर्ज उठाने होंगे. अगले साल राज्यों के कुल कर्ज दस लाख करोड़ रु. से ऊपर निकल सकते हैं.

अगले दो साल में संघीय अर्थव्यवस्था में दो बड़े बदलाव होने हैं:

जीएसटी की क्षतिपूर्ति खत्म होने और केंद्रीय करों के हिस्से में कटौती कई बड़े राज्यों में जिंदगी और कारोबारी लागत बढ़ाएगी. सरकारों को बिजली, रोड ट्रांसपोर्ट, भूमि पंजीकरण की दरें बढ़ानी होंगी, जरूरी खर्चे काटने होंगे और निजीकरण तेज करना होगा.

राज्यों पर कर्ज की देनदारी का नया चक्र शुरू होगा जिसके लिए संसाधन नाकाफी हैं.

नई दुनिया में (अपवादों को छोड़कर) सफलता केवल प्रतिभा या क्षमता से तय नहीं होती है बल्कि‍ इससे बहुत बड़ा फर्क पड़ता है कि वह अमेरिका में पैदा हुआ है या तीसरी दुनिया के किसी देश में. यही वह ओवेरियन लॉटरी (जन्म स्थान का सौभाग्य) है जिसे मशहूर निवेशक वारेन बफे की जीवनी द स्नोबॉल में दिलचस्प ढंग से समझाया गया है. यह सिद्धांत भारत के राज्यों पर भी लागू होने वाला है क्योंकि तेज विकास के पिछले वर्षों में क्षेत्रीय असमानता बढ़ती चली गई है.

डबल इंजन की सरकारों के दावों को चुनावी नमक के साथ निगलना चाहिए क्योंकि कोविड 2016-20 के बीच केवल हरियाणा, कर्नाटक, गुजरात और तेलंगाना की विकास दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही थी (इंडिया रेटिंग्स रिपोर्ट 2021) बाकी सब के जस के तस रहे.

चिरंतन चुनावी चौकसी से निकल कर केंद्र सरकार को मंदी से उबरने के लिए राज्यों के साथ साझा रणनीति बनानी होगी क्योंकि मंदी के बाद किस राज्य में रहने में फायदा होगा यह डबल इंजन की सरकार से नहीं बल्कि‍ टैक्स, कारोबारी, सुविधाओं जीवन की लागत और स्थानीय अर्थव्यवस्था में मांग पर निर्भर होने वाला है.

Friday, March 12, 2021

बचाएंगे तो गंवाएंगे !

बैंकों ने होम लोन ब्याज की दर फिर घटा दी. मकान कर्ज के तलबगार खुश हो सकते हैं लेकिन जो कर्ज लेने की हैसियत नहीं रखते उन्हें परेशान करने वाली इससे बड़ी खबर कोई नहीं है.

मंदी से निकलने की जद्दोजहद में भारत दो नए वर्गों में बंट रहा है. एक तरफ हैं चुनिंदा लोग जो कर्ज ले सकते हैं, क्योंकि वे उसे चुका भी सकते हैं और दूसरी तरफ वे लाखों लोग जो कर्ज नहीं लेते या ले नहीं सकते लेकिन बैंकों में बचत रखते हैं, जिस पर ब्याज टूट रहा है.

बॉन्ड बाजार की घुड़की

बीते तीन माह में छह बार (2013 के बाद पहली बार) बॉन्ड बाजार ने सरकार को घुड़की दी और सस्ती ब्याज दर पर कर्ज देने से मना कर दिया. इस घटनाक्रम का हमारी बचत से गहरा रिश्ता है.

सरकार भारतीय कर्ज बाजार की पहली और सबसे बड़ी ग्राहक है. बैंकों में अधि‍कांश बचत सरकार को कर्ज के तौर पर दी जाती है. सरकार जिस दर पर पैसा उठाती है (अभी 6.15 फीसद दस साल का बॉन्ड), हमें कर्ज उससे ऊंची दर पर (कर्ज लेने वाले की साख के आधार पर ब्याज दरों में अंतर) मिलता है जबकि बचत पर ब्याज की दर सरकारी कर्ज पर ब्याज से कम रहती है.

सरकार से वसूला जाने वाला ब्याज उसके कर्ज की मांग से तय होता है. केंद्र सरकार अगले दो साल (यह और अगला) में करीब 25 लाख करोड़ रुपए का कर्ज लेगी, (राज्य अलग से) जो अब तक का रिकॉर्ड है. यानी बैंकों के पास ज्यादा रिटर्न वाले कर्ज बांटने के लिए कम संसाधन बचेंगे.

मंदी का दबाव है इसलिए बैंकों को सरकार के साथ और कंपनियों को भी सस्ता कर्ज देना है, नतीजतन बचत के ब्याज पर छुरी चल रही है. एफडी पर केवल 4.5 फीसद ब्याज मिल रहा है, अलबत्ता मकान के लिए ऐतिहासिक सस्ती दर पर (औसत 7 फीसद) कर्ज मिल रहा है.

हमने कमाई महंगाई

बैंकों को अपने सबसे बड़े ग्राहक (सरकार) से कम इतना तो ब्याज चाहिए जो महंगाई से ज्यादा हो. पेट्रोल-डीजल, जिंसों की कीमत बढऩे से महंगाई बढ़ती जानी है. दूसरी तरफ, अपनी कमाई का 50 फीसद हिस्सा ब्याज चुकाने पर खर्च कर रही सरकार को नए कर्ज चुकाने के लिए नए टैक्स लगाने होंगे यानी और महंगाई.

महंगाई तो नहीं रुकती लेकिन रिजर्व बैंक को कर्ज पर ब्याज दरें थाम कर रखनी हैं. नतीजतन, बैंक जमा लागत घटाने के लिए बचतों पर ब्याज काट रहे हैं. भारत की 51 फीसद वित्तीय बचतें बैंक (2018 रिजर्व बैंक) में हैं. बचत पर रिटर्न महंगाई से ज्यादा होना चाहिए ताकि जिंदगी जीने की बढ़ती लागत संतुलित हो सके. लेकिन इन पर मिल रहा ब्याज महंगाई से कम है.

जो कर्ज नहीं लेते उनकी मुसीबत दोहरी है. एक तो नौकरियां गईं और पगार घटी और दूसरा जिन बचतों पर निर्भरता बढ़ी उन पर रिटर्न टूट रहा है. लॉकडाउन के दौरान खर्च रुकने से बैंकों में बचत बढ़ी थी लेकिन इस दौरान बचत पर नुक्सान पहले से कहीं ज्यादा हो गया.

बचत करने वालों का एक छोटा हिस्सा जो शेयर बाजार में निवेश कर रहा है बस उसे ही फायदा है. बड़ी आबादी का सहारा यानी तयशुदा (फिक्स्ड) रिटर्न वाले सभी बचत विकल्प बुरी तरह पिट चुके हैं. छोटी बचत स्कीमों में पैसा लंबे समय के लिए रखना होता है, उनमें बैंक जमा जैसी तरलता नहीं है.

भारत में बैंक ग्राहकों का महज 10-12 फीसद हिस्सा ही कर्ज लेता है, शेष तो बचत करते हैं जिनका नुक्सान बढ़ता जा रहा है. बचतों को टैक्स प्रोत्साहन खत्म हो चुके हैं. नए बजट में पेंशन और ईपीएफ योगदान पर भी इनकम टैक्स थोप दिया है.

पुराने लोग कहते थे कि बाजार में केवल दस रुपए का ऊंट बिक रहा है लेकिन क्या उस ऊंट से इतना काम मिल सकेगा कि चारा खि‍लाने के बाद कुछ बच सके. भारत में कर्ज का यही हाल है.

कर्ज सस्ता ही रहेगा लेकिन कैश फ्लो और नियमित कमाई (महंगाई हटाकर) वाले ही इसके ग्राहक होंगे, जो ब्याज भरने के बाद खर्च के लिए कुछ बचा सकें. कंपनियों के लिए यह आदर्श स्थि‍ति है इसलिए शेयर बाजार में बहार है.

मंदी से भारत की वापसी ‘वी’ (V) की शक्ल में नहीं बल्कि बदनाम ‘के’ (K) की शक्ल में हो रही है. बचत, महंगाई, ब्याज और टैक्स के मौजूदा परिदृश्य में आबादी का छोटा सा हिस्सा ही तेजी से आगे बढ़ेगा जबकि K का निचले हिस्से में मौजूद लाखों लोगों के बढ़ती महंगाई और घटती कमाई के बीच मंदी में गहरे धंसने का खतरा है.

तेज ग्रोथ में भी भारत में बचत की दर कम रही है. इनका आकर्षण लौटाने के लि‍ए फिक्स्ड इनकम वाले नए विकल्प जरूरी हैं. सरकारी कर्ज भी कम करना होगा. अर्थव्यवस्था को बचत चाहिए नहीं तो नोट छपेंगे और महंगाई धर दबोचेगी.