Friday, April 30, 2021

हम थे जिनके सहारे

 

कोविड के दौरान अस्पताल, ऑक्सीजन, दवा तलाशते और गिड़गिड़ाते हुए भारतीयों को महसूस हुआ होगा-क्या डिजिटल इंडिया वाले ऐसा पोर्टल या ऐप नहीं बना सकते थे जो -कॉमर्स या टैक्सी सर्विस की तरह हमारी भौगोलिक स्थि (जीपीएस) के आधार पर यह बता देता कि कोविड जांच केंद्र, अस्पताल और बिस्तर, ऑक्सीजन, फार्मेसी, क्लिनिक आसपास कहां मिल सकते हैं और कब क्या मिलेगा?

कोविड के बाद दुनिया में कहीं भी रातोरात हजारों अस्पताल नहीं बन गए. अनेक देशों ने तकनीकों के योजनाबद्ध प्रयोग डाटा प्रबंधन से मौजूदा स्वास्थ्य ढांचा ठीक कर असंख्य जिंदगियां बचाई हैं.

भारत की भयानक असफलता पर तर्क देखि 100 करोड़ लोगों को अस्पताल कैसे दे सकते हैं? 100 करोड़ लोग मांग भी कहां रहे हैं. देश में सक्रिय मामले (135 करोड़ पर 30 लाख, 28 अप्रैल 2021 तक) एक फीसद से कम हैं. उनमें भी क्सीजन और गंभीर इलाज वाली दवाओं के जरूरतमंद 10 फीसद हैं. इनके लिए 29 राज्यों में 'सिस्टमयानी अस्पताल, ऑक्सीजन और दवाओं की कमी कभी नहीं थी.

फिर भी, उभरतेसुपरपॉवरऔर विश्व की फार्मेसी में मौतों की लाइन इसलिए लग गई क्योंकि हम डिजिटली अभागे भी साबि हुए हैं. प्रचार ऐप बनाने में मशगूल डिजिटल इंडिया कोविड प्रबंधन में नई तकनीकों का उतना इस्तेमाल भी नहीं कर सका जितना कोलंबिया, मैसेडोनिया, कुवैत, सऊदी अरब, पाकिस्तान जैसे देशों ने कर लिया. संकट के बाद आम लोगों ने ट्विटर सूचनाओं के डैशबोर्ड बनाकर जिस तरह मदद की, उसी के जरिए दसियों देशों में स्वाथ्य सेवाओं का डिजिटल पुर्नजन्म हो गया.

संयुक्त राष्ट्र वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और मैकेंजी के अध्ययन बताते हैं कि सूचनाओं के प्रसारण, सेवाओं-संसाधनों की मॉनीटरिंग उपलब्धता, संक्रमण पर अंकुश, -हेल्थ मरीजों की मॉनीटरिंग में डिजिटल तकनीकों के प्रयोग ने महामारी से लड़ने का तरीका ही बदल दिया.

जर्मनी ने अचूक डाटा बेस प्रबंधन से अस्पतालों, बिस्तरों, ऑक्सीजन और दवा आपूर्ति की मॉनीटरिंग की. ब्रिटेन ने अपने पुराने नेशनल हेल्थ सिस्टम का कायाकल्प करते हुए इन्फ्लुएंजा नेट जैसे प्रयोगों से सामान्य जुकाम वालों के साथ पुराने बीमारों पर भी नजर रखी.

दक्षि कोरिया ने कोवि के बाद दो पखवाड़े में संपर्क रहित ड्राइव थ्रू टेस्टिंग शुरू कर दी, सिंगापुर सहित पूर्वी एशिया और यूरोप ने गूगल के नेटवर्क के सहारे कांटेक्ट्र ट्रेसिंग के अचूक मॉडल बनाए. कई देशों ने अपनी दवा दुकानों को जोड़कर जांच और साधनों की आपूर्ति सुचारू कर ली.

भारत का हेल्थ पोर्टल बीमारों के आंकड़ों से आगे नहीं निकल सका लेकिन फ्रांस जैसे बड़े देश ही नहीं, बुल्गारिया, युगांडा, क्यूबा, अफगानिस्तान, स्लोवाकिया, मलेशिया, किर्गिस्तान, कुवैत, इथियोपिया, ग्रीस जैसे अनेक देशों ने तकनीक का बेजोड़ इस्तेमाल किया. जबकि भारत में तो ऑक्सीजन और दवा की आपूर्ति की मॉनीटरिंग का तंत्र भी नहीं बन सका.

हमें चौंकना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र ने डिजिटल गवर्नेंस के सफल प्रयोगों में पाकिस्तान को शामिल किया है, जिसके नेशनल इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी बोर्ड ने सभी जरूरतों को एक ऐप से जोड़ने के साथ देश में भर फैले कोवि सहायता संसाधनों (अस्तपाल, दवा) आदि की भौगोलिक मैपिंग कर ली. यहां तक कि दवा की कालाबाजारी रोकने का तंत्र भी जोड़ा गया.

अमेरिका में 80 टेलीहेल्थ सेवाओं को आपात मंजूरी मिली तो शंघाई ने 11 ऑनलाइन अस्पताल खड़े कर दिए जबकि भारत में दवा और ऑक्सीजन खरीदने के लिए सीएमओ की चिट्ठी जरूरी बना दी गई. पूरी दुनिया में ऑनलाइन फार्मेसी पलक झपकते दवा पहुंचा रही हैं लेकिन भारत में लोग इंजेक्शन के लिए लाइन में लगे हैं.

भारत का आरोग्य सेतु सुर्खियां बनाकर विलीन हो गया. इसमें सूचनाओं की सुरक्षा बेहद कमजोर थी लेकिन प्रामाणि अध्ययन मानते हैं कि ज्यादातर देशों में कोविड के वक्त जो डिजिटल सेवाएं बनाई गईं उनमें निजता और गोपनीयता को पूरी तरह सुरक्षि किया गया था. भारत में जब थोथी आत्मप्रशंसा के महोत्सव चल रहे थे, तब कोवि आते ही कई देशों में प्रमुख तकनीकी कंपनियां और सरकारी नियामक, सूचना प्रबंधन, सेवा डिलिवरी और मॉनीटरिंग की नई प्रणालियां लागू कर रहे थे. इस तैयारी ने कोविड से उनकी लड़ाई तरीका ही बदल दिया.

दवा, ऑक्सीजन के लिए गिड़गिड़ाना और दयावानों से मदद की गुहार करना हरगिज जनभागीदारी नहीं है. जान बचाने की ये आखिरी कोशिशें, गर्व के नहीं शर्म के लायक हैं. महामारी ने बताया है कि हमारी तकनीकी तरक्की पूरी तरह पाखंड है. भारत का सिस्टम असफल नहीं हुआ, क्षमताएं नहीं चुकी हैं. सिस्टम तो जड़ है, जीवंत तो इसे चलाने वाले होते हैं लेकिन उन्होंने उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल राजनैतिक प्रचार के लिए किया, व्यवस्था बनाने के लिए नहीं. और बढ़ते संक्रमण के बावजूद जीत का ऐलान कर दिया. 

गुस्से और दुख के संदेशों से भड़कने वाला भारतीय निजाम यह सोच ही नहीं पाता कि जिन आंकड़ों को छिपाया जा रहा है, उन्हीं के जरिए तो संसाधन और संक्रमण के प्रबंधन मॉनीटरिंग का अचूक तंत्र बना कर महामारी के मारों को दर-दर भटक कर मरने से बचाया जा सकता था.

Friday, April 23, 2021

जवाबदेही का बही-खाता

 


भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी गई गुजरी है कि इसे राजनीति‍क श्रेय लेने की होड़ के काबिल भी नहीं समझा जाता. इसकी अहमियत सरकारी मेलों और तीर्थ यात्राओं जि‍तनी भी नहीं है. यह बात 2018 में एक बड़े अफसर ने कही थी जो सेहत का महकमा संभाल चुके थे और स्वाइन फ्लू की तबाही से लड़ रहे थे.

सरकारें हमें कभी अपने दायि‍त्व नहीं बतातीं, वे तो केवल श्रेय के ढोल पीटती हैं और बहुतेरे उन पर नाच उठते हैं. तबाही, हाहाकार और मौतों के बाद ही ये जाहिर होता है कि जिंदगी से जुड़ी जरूरतों को लेकर योजनाबद्ध और नीति‍गत गफलत हमेशा बनाए रखी जाती है.

हमें आश्चर्य होना चा‍हि‍ए कि महामारी की पहली लहर में जहां छोटे-छोटे बदलावों के आदेश भी दिल्ली से जारी हो रहे थे वहीं ज्यादा भयानक दूसरी लहर के दौरान राज्यों को उनकी जिम्मेदारियां गिनाई जाने लगीं. जबकि पहली से दूसरी लहर के बीच कानूनी तौर पर कुछ नहीं बदला.

बीते साल कोविड की शुरुआत के बाद केंद्र ने महामारी एक्ट 1897/अध्यादेश 2020) और आपदा प्रबंधन कानून 2005 का इस्तेमाल किया था. इन दोनों केंद्रीय कानूनों के साथ संविधान की धारा 256 अमल में आ गई और राज्यों के अधि‍कार सीमित हो गए. इन्हीं कानूनों के तहत बीते बरस लॉकडाउन लगाया, बढ़ाया, हटाया गया और असंख्य नियम (केंद्र के 987 आदेश) तय हुए जिन्हें राज्यों ने एक साथ लागू किया. यह स्थि‍ति आज तक कायम है.

अब जबकि भयानक विफलता के बीच बीमार व मरने वाले राजनीतिक सुविधा के मुताबिक राज्यों के तंबुओं में गिने जा रहे हैं तो यह सवाल सौ फीसदी मौजूं है कि अगर आपका कोई अपना ऑक्सीजन की कमी से तड़पकर मर गया या जांच, दवा, अस्तपाल नहीं मिला तो इसका दिल्ली जिम्मेदार है या सूबे का प्रशासन?

भारत में स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है लेकिन सेहत से जुड़ा प्रत्येक बड़ा फैसला केंद्र लेता है, स्वास्थ्य सेवाएं देना राज्यों की जिम्मेदारी लेकिन वह कैसे दी जाएंगी यह केंद्र तय करता है. बीमारी नियंत्रण की स्कीमों, दवा के लाइसेंस, कीमतें, तकनीक के पैमाने, आयात, निजी अस्पतालों का प्रमाणन, अनेक वैज्ञानिक मंजूरियां, ऑक्सीजन आदि के लिए लाइसेंस, वैक्सीन की स्वीकृतियां सभी केंद्र के पास हैं. तभी तो कोविड के दौरान जांच, इलाज से लेकर वैक्सीन तक प्रत्येक मंजूरी केंद्र से आई.

स्वास्थ्य पर कुल सरकारी खर्च का 70 फीसदी बोझ, राज्य उठाते हैं जो उनकी कमाई से बहुत कम है इसलिए केंद्र से उन्हें अनुदान (15वां वित्त आयेाग-70,000 करोड़ रुपए पांच साल के लिए) और बीमारियों पर नियंत्रण के लिए बनी स्कीमों के माध्यम से पैसा मिलता है. इस सबके बावजूद भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी का केवल 1.26%  (प्रति व्यक्ति में श्रीलंका से कम) है.

हकीकत यह है कि अधि‍कांश लोगों की जिंदगी निजी स्वास्थ्य ढांचा ही बचाता है. हमें उसकी लागत उठानी होती है जो हम उठा ही रहे हैं. नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017 के मुताबिक, भारत में स्वास्थ्य पर 70 फीसदी खर्च निजी (अस्पताल, उपकरण, दवा, जांच) क्षेत्र से आता है. केंद्र और राज्य केवल टैक्स वसूलते हैं. सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं हेल्थ ब्यूरोक्रेसी को पालने के लिए चलती हैं. सरकारें भी चाहती हैं कि कम से कम लोग उनसे सस्ता इलाज मांगने आएं.

सरकारें बहुत कुछ कर नहीं सकती थीं, सिवाय इसके कि भारी टैक्स निचोड़ कर फूल रहा हमारा निजाम आंकड़ों और सूचनाओं की मदद से कम से कम निजी क्षेत्र के जरिए ऑक्सीजन, दवा, बेड की सही जगह, समय और सही कीमत पर आपूर्ति की अग्रिम योजना बना लेता और हम बच जाते. इनसे इतना भी नहीं हुआ. लोग क्षमताओं की कमी से नहीं सरकारों के दंभ और लापरवाही से मर रहे हैं.

अगर नसीहतें ली जानी होतीं तो कोविड के बीच बीते बरस ही 15वें वित्त आयोग ने सुझाया था कि स्वास्थ्य को लेकर समवर्ती सूची में नए विषय (अभी केवल मेडिकल शि‍क्षा और परिवार नियोजन) जोड़े जाने चाहिए ताकि राज्यों को अधि‍कार मिलें और वे फैसले लेने की क्षमताएं बना सकें. 2017 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जन स्वास्थ्य (महामारी प्रबंधन) अधि‍नियम का एक प्रारूप बनाया था जिसमें केंद्र और राज्य की जिम्मेदारियां तय करने के प्रावधान थे. पता नहीं किस वजह से इसको फाइलों में हमेशा के लिए सुला दिया गया.   

हम ऐसी सरकारों के दौर में है जो दम तोड़ती व्यवस्था से कहीं ज्यादा बुरे प्रचार से डरती हैं. श्मशानों पर भीड़, ऑक्सीजन की कमी से तड़पते लोग, ट्वि‍टर पर जांच और दवा के लिए गिड़गिड़ाते संदेश-प्रचार संसार के लिए मुसीबत हैं इसलिए तोहमतें बांटने का प्रचार तंत्र सक्रिय हो गया है.

पश्चिम की तुलना में पूरब का सबसे बड़ा फर्क यह है कि यहां के राजनेता गलतियां स्वीकार नहीं करते, नतीजतन पहले चरण में डेढ़ लाख मौतों के बाद भी कुछ नहीं बदला. अब हम भारतीय राजनीति के सबसे वीभत्स चेहरे से मुखाति‍ब हैं जहां महामारी और गरीबी के महाप्रवास के बीच असफल सरकारों ने हमें राज्यों के नागरिकों में बदलकर एडिय़ां रगड़ते हुए मरने को छोड़ दिया है.

Friday, April 16, 2021

घुटती सांसों का ‘उत्सव’

 


भारत के लिए चुनाव, कुंभ और महामारी में क्या अंतर या समानता है? बात इन आयोजनों के सुपर स्प्रेडर बनने के खतरे की नहीं है. हमें तो इस बात पर अचरज होना चाहिए कि जो मुल्क दुनिया का सबसे बड़ा और लंबा चुनाव करा लेता है, भरपूर कोविड के बीच कुंभ जैसे मेले और आइपीएल जैसे भव्य महंगे तमाशे जुटा लेता है वह महामारी की नसीहतों के बावजूद अपने थोड़े से लोगों को अस्पताल, दवाएं और ऑक्सीजन नहीं दे पाता.

डारोन एसीमोग्लू और जेम्स जे राबिंसन ने दुनिया के इतिहास, राजनीति और सरकारों के फैसले खंगालकर अपनी मशहूर कि‍ताब व्हाइ नेशंस फेल में बताया है कि दुनिया के कुछ देशों में लोग हमेशा इसलिए गरीब और बदहाल रहते हैं क्योंकि वहां की राजनैतिक और आर्थिक संस्थाएं बुनियादी तौर पर शोषक हैं, इन्हें लोगों के कल्याण की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के मूल्यों पर बनाया ही नहीं जाता, इसलिए संकटों में व्यवस्थाएं ही सबसे बड़ी शोषक बन जाती हैं.

कोविड की दूसरी लहर ने हमें बताया कि एसीमोग्लू और राबिंसन क्यों सही हैं? क्या हमारे पास क्षमताएं नहीं थीं? क्या संसाधनों का टोटा था? नहीं. शायद हमारा दुर्भाग्य हमारी संवेदनहीन सियासत और उसकी संस्थाएं लिख रही हैं.

कोविड की पहली लहर के वक्त स्वास्थ्य क्षमताओं की कमी सबसे बड़ी चुनौती थी. अप्रैल 2020 में 15,000 करोड़ रु. का पैकेज आया. दावे हुए कि बहुत तेजी से विराट हेल्थ ढांचा बना लिया गया है तो फिर कहां गया वह सब?

बहुत-से सवाल हमें मथ रहे हैं जैसे कि

अप्रैल से अक्तूबर तक ऑक्सीजन वाले बि‍स्तरों की संख्या 58,000 से बढ़ाकर 2.65 लाख करने और आइसीयू और वेंटीलेटर बेड की संख्या तीन गुना करने का दावा हुआ था. कहा गया था कि ऑक्सीजन, बडे अस्थायी अस्पताल, पर्याप्त जांच क्षमताएं, क्वारंटीन सेंटर और कोविड सहायता केंद्र हमेशा तैयार हैं. लेकिन एक बार फिर अप्रैल में जांच में वही लंबा समय, बेड, ऑक्सीजन, दवा की कमी पहले से ज्यादा और ज्यादा बदहवास और भयावह!!

कोविड के बाद बाजार में नौ नई वेंटीलेटर कंपनियां आईं. उत्पादन क्षमता 4 लाख वेंटीलेटर तक बढ़ी लेकिन पता चला कि मांग तैयारी सब खो गई है. उद्योग बीमार हो गया.

 भारत में स्वास्थ्य क्षमताएं बनी भी थीं या सब कुछ कागजी था अथवा कुंभ के मेले की तरह तंबू उखड़ गए? सनद रहे कि दुनिया के सभी देशों ने कोविड के बाद स्वास्थ्य ढांचे को स्थानीय बना दिया क्योंकि खतरा गया नहीं है.

स्वास्थ्यकर्मियों की कमी (1,400 लोगों पर एक डॉक्टर, 1,000 लोगों पर 1.7 नर्स) सबसे बड़ी चुनौती थी, यह जहां की तहां रही और एक साल बाद पूरा तंत्र थक कर बैठ गया.

क्षमताओं का दूसरा पहलू और ज्यादा व्याकुल करने वाला है.

बीते अगस्त तक डॉ. रेड्डीज, साइजीन और जायडस कैडिला के बाजार में आने के बाद (कुल सात उत्पादक) प्रमुख दवा रेमिडि‍सविर की कमी खत्म हो चुकी थी. अप्रैले में फैवीफ्लू की कालाबाजारी होने लगी. इंजेक्शन न मिलने से लोग मरने लगे.

दुनिया की वैक्सीन फार्मेसी में किल्लत हो गई क्योंकि अन्य देशों की सरकारों ने जरूरतों का आकलन कर दवा, वैक्सीन की क्षमताएं देश के लिए सुरक्षित कर लीं. कंपनियों से अनुबंध कर लिए. और हमने वैक्सीन राष्ट्रवाद का प्रचार किया?

इतना तो अब सब जानते हैं कि कोविड को रोकने के लिए एजेंसि‍यों के बीच संवाद, संक्रमितों की जांच और उनके जरिए प्रसार (कांटैक्ट ट्रेसिंग) को परखने का मजबूत और निरंतर चलने वाला तंत्र चाहिए लेकिन बकौल प्रधानमंत्री सरकारें जांच घटाकर और जीत दिखाने की होड़ में लापरवाह हो गईं. यह आपराधि‍क है कि करीब 1.7 लाख मौतों के बावजूद संक्रमण जांच, कांटैक्ट ट्रेसिंग और सूचनाओं के आदान-प्रदान का कोई राष्ट्रव्यापी ढांचा या तंत्र नहीं बन सका.

दवा, ऑक्सीजन, बेड के लिए तड़पते लोग, गर्वीले शहरों में शवदाह गृहों पर कतारें...वि‍‍श्व गुरु, महाशक्ति, डिजिटल सुपरपावर या दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता का यह चेहरा खौफनाक है. यदि हम ऐसे निर्मम उत्सवप्रिय देश में बदल रहे हैं जहां सरकारें एक के बाद एक भव्य महाकुंभ, महाचुनाव और आइपीएल करा लेती हैं लेकिन महामारी के बीच भी अपने लोगों को अस्पताल, दवाएं, आक्सीजन यहां तक कि शांति से अंतिम यात्रा के लिए श्मशान भी नहीं दिला पातीं तो हमें बहुत ज्यादा चिंतित होने की जरूरत है.

भारत में किसी भी वक्त अधि‍कतम दो फीसदी (बीमार, स्वस्थ) से ज्यादा आबादी संक्रमण की चपेट में नहीं थी लेकिन एक साल गुजारने और भारी खर्च के बाद 28 राज्यों और विशाल केंद्र सरकार की अगुआई में कुछ नहीं बदला. भरपूर टैक्स चुकाने और हर नियम पालन के बावजूद यदि हम यह मानने पर मजबूर किए जा रहे हैं कि खोट हमारी किस्मत में नहीं, हम ही गए गुजरे हैं (जूलियस सीजर-शेक्सपियर) तो अब हमें अपने सवाल, निष्कर्ष और आकलन बदलने होंगे क्योंकि अब व्यवस्था ही जानलेवा बन गई है.

Friday, April 9, 2021

भरम गति टारे नहीं टरी

 


फिल्म अभि‍नेता अक्षय कुमार को कोविड होने की खबर सुनकर डब्बू पहलवान चौंक पड़े. डब्बू को बीते साल पहली लहर में उस वक्त कोरोना ने पकड़ा था, जब डोनाल्ड ट्रंप बगैर मास्क के घूम रहे थे. पहलवान को लगता था कि उनकी लोहा-लाट मांसपेशि‍यों और कसरती हड्डियों के सामने वायरस क्या टिकेगा? लेकिन कोविड से उबरने के बाद, डब्बू ने मोच उतारने की अपनी दुकान से यह ऐलान कर दिया अगर बगैर मास्क वाला आस-पास भी दिखा तो हड्डी तोड़कर ही जोड़ी जाएगी.

अक्षय कुमार को लेकर पहलवान की हैरत लाजिमी है. डब्बू भाई उन करोड़ों लोगों का हिस्सा हैं जो महामारी की शुरुआती लहरों में आशावादी पूर्वाग्रह (ऑप्टि‍मिज्म बायस) का शि‍कार होकर वायरस को न्योत बैठे थे. तब तक बहुत-से लोग यह सोच रहे थे उन्हें कोविड नहीं हो सकता लेकिन अक्षय कुमार के संक्रमित होने तक भारत कोविड से मारों की सूची में दुनिया में तीसरे नंबर पहुंचा चुका था. 

इसके बाद भी महामारी की और ज्यादा विकराल दूसरी लहर आ गई!

कैसे ?

डब्बू पहलवान तो सतर्क हो गए थे लेकिन सितंबर आते-आते लाखों लोग सामूहिक तौर पर उस अति आत्मविश्वास का शि‍कार हो गए जिसका नेतृत्व खुद सरकार कर रही थी. सरकारों ने लॉकडाउन लगाने और उठाने को कोविड संक्रमण घटने-बढऩे से जोड़ दिया जबकि प्रत्यक्ष रूप से लॉकडाउन लगने से कोविड संक्रमण थमने का कोई ठोस रिश्ता आज तक तय नहीं हो पाया.

यहां से भारत की कोविड नीति एक बड़े मनोविकार की चपेट में आ गई जिसे एक्स्पोनेंशि‍यल ग्रोथ बायस कहते हैं. हम समझते हैं कि बढ़त रैखि‍क है जबकि‍ रोज होने वाली बढ़त अनंत हो सकती है. आबादी,  चक्रवृद्धि ब्याज, बैक्टीरिया, महामारियां इसी तरह से बढ़ती हैं.

कहते हैं एक बादशाह से किसी व्यापारी ने अनोखे इनाम की मांग की. उसने कहा कि वह चावल का एक दाना चाहता है लेकिन शर्त यह कि शतरंज के हर खाने में इससे पहले खाने से दोगुने दाने रखे जाएं...64वें खाने का हिसाब आने तक पूरी रियासत में उगाया गया चावल कम पड़ गया!

कितना अनाज हुआ होगा इसका हि‍साब आप लगाइए...हम तो यह बताते हैं कि वैक्सीन उत्सव के बीच इस जनवरी में सरकार को तीसरे सीरो सर्वे की रिपोर्ट मिल चुकी थी. यह सर्वेक्षण कुल आबादी में संक्रमण की वैज्ञानिक पड़ताल है. मई-जून 2020 के बीच हुए पहले सीरो सर्वे में भारत में एक फीसद से कम आबादी संक्रमित थी. दूसरे सर्वे में (अगस्त-सितंबर 2020) 6.6 फीसद लोगों तक संक्रमण पहुंच गया था और इस फरवरी में जब सरकार के मुखि‍या चुनावी रैलियों में हुंकार रहे थे जब 21.7 फीसद आबादी तक यानी कि हर पांचवें भारतीय तक संक्रमण पहुंच चुका था. संक्रमण में मई से फरवरी तक, यह 21 गुना बढ़त थी यानी अनंत (एक्स्पोनेंशि‍यल) ग्रोथ.

यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिल्वानिया के शोधकर्ताओं (हैपलॉन, ट्रग और मिलरजून 2020) ने पाया कि कई देशों में सरकारें तीन बड़े सामूहिक भ्रम का शि‍कार हुई हैं.

सरकारों ने प्रत्यक्ष हानि (आइडेंटिफियबिल विक्टि‍म इफेक्ट) को रोकने की कामयाबी का ढोल पीटने के चक्कर में लंबे नुक्सानों को नजरअंदाज कर दिया. मौतें कम करने पर जोर इतना अधि‍क रहा कि जैसे ही मृत्यु दर घटी, सब ठीक मान लिया गया.

कोविड से निबटने की रणनीतियां प्रजेंट बायस का शि‍कार भी हुईं. कोविड के सक्रिय केस कम होने का इतना प्रचार हुआ कि जांच ही रुक गई. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में प्रवासी मजदूरों से संक्रमण फैलने की जांच किए बगैर भारत की मजबूत प्रतिरोधक क्षमता का जिंदाबाद किया जाने लगा.

कोविड घटने के प्रचार के बजाए संक्रमि‍तों की आवाजाही पर नजर रखने और टीकाकरण को उसी ताकत से लागू करना चाहिए था जैसे लॉकडाउन लगा था. अलबत्ता लॉकडाउन उठने के साथ पूरी व्यवस्था ही कोविड खत्म होने के महाभ्रम (बैंडवैगन इफेक्ट) का शि‍कार हो गई तभी तो बीते सितंबर में जब दुनिया में दूसरी लहर आ रही थी तब देश के नेता अपने आचरण से बेफिक्र होने लगे थे और मेले, रैलियों, बारातों के बीच लोग मास्क उतारकर कोविड को विदाई देने लगे.

सनद रहे कि भारत में कोविड से मौतें और सक्रिय केस कम (आंकड़े संदिग्ध) हुए थे, संक्रमण नहीं लेकिन लॉकडाउन हटने को कोविड पर जीत समझ लिया गया और सरकार भी वैक्सीन राष्ट्रवाद का बिगुल फूंकती हुई चुनाव के दौरे पर निगल गई.

सभी मनोभ्रम बुरे नहीं होते. सामूहिक अनुभव (एवेलेबिलिटी बायस) तजुर्बे के आधार पर खतरे को समय से पहले भांपने की ताकत देता है. इसी की मदद से कोरिया, ताईवान जैसे कई देशों ने सार्स की विभीषि‍का से मिली नसीहतों को सहेजते हुए खुद को कोविड से बचा लिया.

अलबत्ता, भारत जहां केवल बीते कुछ माह में 1.65 लाख मौतें हुईं थीं, वहां लोग और सरकार मिलकर संक्रमितों की दैनिक संख्या एक लाख रिकॉर्ड (4 अप्रैल 2021) पर ले आए. इस बार भी कोई मसीहा बचाने नहीं आया, हम खुद के ही हाथों फिर ठगे गए.