Friday, June 10, 2022

असली ताकत तो इधर है




अमेरिकी राष्‍ट्रपतियों के इतिहास में, जो बाइडेन को क्‍या जगह मिलेगी, यह वक्‍त पर छोड़‍िये फिलहाल तो ब्‍लादीम‍िर पुतिन  की युद्ध लोलुपता से अमेरिका को वह एक ध्रुवीय दुनिया गढ़ने का मौका मिल गया है जिसकी कोश‍िश में बीते 75 बरस में. अमेरिका के 13 राष्‍ट्रपति इतिहास बन गए.

आप यह मान सकते हैं क‍ि युद्ध के मैदान में रुस का खेल अभी खत्‍म नहीं हुआ है लेक‍िन युद्ध के करण बढी महंगाई के बाद ग्‍लोबल मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर अब अद्व‍ितीय है. मुद्रा बाजार में अन्‍य करेंसी के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की ताकत बताने वाला डॉलर इंडेक्‍स 20 साल के सर्वोच्‍च स्‍तर पर है.

अमेरिका ने फ‍िएट करेंसी (व्‍यापार की आधारभूत मुद्रा) की ताकत के दम पर रुस के विदेशी मुद्रा भंडार को (630 अरब अमेर‍िकी डॉलर) को बेकार कर दिया है. पुतिन का मुल्‍क ग्‍लोबल व‍ित्‍तीय तंत्र से बाहर है. इसके बाद तो चीन भी लड़खड़ा गया है.

विश्‍व बाजार में अमेरिकी डॉलर की यह ताकत निर्मम है और चिंताजनक है.

एसे आई ताकत

अमेर‍िकी डॉलर का प्रभुत्‍व जिस इतिहास की देन है अब फिर वह नई करवट ले रहा है.

दूसरे विश्‍व युद्ध में पर्ल हार्बर पर जापानी हमले ने दुनिया की मौद्रिक व्‍यवस्‍था की बाजी पलट दी थी. इससे पहले तक अमेरिका दूसरी बड़ी जंग में  सीधी दखल से दूर था. जापान की बमबारी के बाद, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्‍टन चर्चिल जंगी जहाज लेकर अमेरिका पहुंच गए और तीन हफ्ते के भीतर अमेरिका को युद्ध में दाख‍िल हो गया. यह न होता तो हिटलर शायद ब्रिटेन को भी निगल चुका होता.

जुलाई 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौता हुआ. गोल्‍ड स्‍टैंडर्ड के साथ (अमेरिकी डॉलर और सोने की विन‍िमय दर) आया. दुनिया के देशों ने अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडान बनाना शुरु कर दिया. 1945 में हिटलर की मौत और दूसरे विश्‍व युद्ध की समाप्‍त‍ि से पहले ही अमेरिकी डॉलर का डंका बजने लगा था.

अमेरिकी में आर्थि‍क चुनौतियों और फ्रांस के राष्‍ट्रपत‍ि चार्ल्‍स ड‍ि गॉल के कूटनीतिक वार के बाद अमेरिकी राष्‍ट्रपत‍ि रिचर्ड निक्‍सन ने 1971 में गोल्‍ड स्‍टैंडर्ड तो खत्‍म कर दिया लेक‍िन तब तक अमेरिकी डॉलर दुनिया की जरुरत बन चुका था. 

डॉलर कितना ताकतवर

अमेरिकी डॉलर की ताकत है कितनी? बकौल फेड रिजर्व ग्‍लोबल जीडीपी में अमेरिका का हिस्‍सा 20 फीसदी है मगर मुद्रा की ताकत देख‍िये क‍ि दुनिया में विदेशी मुद्रा भंडारों में अमेरिकी डॉलर का हिस्‍सा (2021) करीब 60 फीसदी था.

डॉलर, अमेरिका की दोहरी ताकत है. व्‍यापार व निवेश के जरिये विदेशी मुद्रा भंडारों में पहुंचे अमेरिकी डॉलरों का का निवेश अमेरिकी बांड में होता है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तरफ से जारी कुल बांड में विदेशी निवेशकों का हिस्‍सा 33 फीसदी है. यूरो, ब्रिटिश पौंड और जापानी येन के बांड में निवेश से कहीं ज्‍यादा.  मौद्रिक साख और ताकत का यह मजबूत चक्र टूटना  मुश्‍क‍िल है.

 नकदी के तौर पर भी डॉलर खूब इस्‍तेमाल होता है 2021 की पहली ति‍माही में करीब 950 अरब अमेरिकी डॉलर के बैंकनोट दुनिया विदेश में थे यह बाजार में उपलब्‍ध कुल नकद अमेरिकी डॉलर का लगभग आधा है.

विश्‍व के लगभग 80% निर्यात इनवॉयस, 60% विदेशी मुद्रा बांड और ग्‍लोबल बैंकिंग की करीब 60% देनदारियां भी अमेरिकी डॉलर में हैं.

विकल्‍प क्‍या 

दुनिया के देश एक दूसरे अपनी मुद्राओं में विनिमय क्‍यों नहीं करते ? क्‍यों क‍ि दुनिया की कोई अमेरिकी डॉलर नहीं हो सकती.

पहली शर्त है मुद्रा की साख-  करेंसी के की पीछे मजबूत राजकोषीय व्‍यवस्‍था ही करेंसी स्‍टोर वैल्‍यू बनाती है . एक दशक पहले तक यूरो को अमेरिकी डॉलर का प्रतिद्वंद्वी माना गया था लेकि‍न यूरो के पीछे कई छोटे देशों की अर्थव्‍यवस्‍थायें हैं. किसी भी एक देश में उथल पुथल से यूरो लड़खड़ा जाता है.

विदेशी मुद्रा भंडारों में यूरो का हिस्‍सा केवल 21 फीसदी है.  ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन, युआन का हिस्‍सा और भी कम है. 

मुद्रा का मुक्‍त रुप से ट्रेडेबल या व्‍यापार योग्‍य दूसरी शर्त है इसी से  करेंसी की करेंसी यानी गति तय होती है. चीन का युआन दावेदार नहीं बन पाता.  दुनिया का सबसे बडा निर्यातक अपनी करेंसी को कमजोर रखता है, मुद्रा संचालन साफ सुथरे नहीं हैं. इसलिए युआन को विदेश्‍ी मुद्रा भंडारों में दो फीसदी जगह भी नहीं मिली है.

मुद्रा की स्‍थ‍िरता सबसे जरुरी शर्त है. 2008 के वित्‍तीय संकट के बाद मुद्रा स्‍थ‍िरता सूचकांक में अमेरिकी डॉलर करीब 70 फीसदी स्‍थिर रहा है, यूरो 20 फीसदी पर है. येन और युआन काफी नीचे हैं. स्‍थ‍िरता अमेरिकी डॉलर बडी ताकत है.

क्रिप्‍टोकरेंसी के साथ डॉलर के विकल्‍प की कुछ बहसें शुरु हुईं थीं. अलबत्‍ता कोविड के बाद  क्रिप्‍टोकरेंसी बुलबुला फूट गया और रुस पर प्रतिबंधों से डॉलर की क्रूर रणनीतिक ताकत भी सामने आ गई.

इतिहास की वापसी 

अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्‍व दूसरे विश्‍व के बाद पूरी तरह स्‍थाप‍ित हो गया था.  डॉलर की ताकत के दम पर यूरोप की मदद के लिए 1948 में अमेरिका ने 13 अरब डॉलर का मार्शल प्‍लान (वि‍देश मंत्री जॉर्ज सी मार्शल)   लागू किया था. युद्ध से तबाह यूरोप के करीब 18 देशों को इसका बड़ा लाभ मिला. हालांक‍ि यही प्‍लान शीत युद्ध की शुरुआत भी था. यूरोप में रुस व अमेरिकी खेमों में नाटो (1948-49) और वारसा संधि (1955) में बंट गया.

अब फिर महामारी और युद्ध का मारा यूरोप अमेरिका ऊर्जा व रक्षा जरुरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर हो रहा है डॉलर की इस नई ताकत के सहारे अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडेन एक तरफ यूरोप को रुस के हिटलरनुमा खतरे बचने की गारंटी दे रहे है तो दूसरी तरफ एश‍िया में चीन डरे देशों नई छतरी के नीचे जुटा रहे हैं.  अमेरिकी डॉलर की बादशाहत इन्‍हीं हालात से निकली थी.  महंगा होता अमेरिकी कर्ज डॉलर को नई मौद्रिक ताकत दे रहा है. इसलिए यूरो, युआन,रुपया सबकी हालत पतली है.

विदेशी मुद्रा बाजार वाले कहते हैं डॉलर अमेरिका का सबसे मजबूत सैन‍िक है. यह कभी नहीं हारता. दूसरी करेंसी को बंधक बनाकर वापस अमेरिका के पास लौट आता है


Sunday, June 5, 2022

जाने कहां गए वो दिन ?


राजामणि‍ टैक्‍सी खरीदना चाहते हैं. उनको याद है कि उनके दोस्‍त महेशबाबू ने चार साल पहले  टैक्‍सी ली थी. महेशबाबू को बैंक कर्ज नहीं दे रहे थे.  कर्ज महंगा तो मिला लेक‍िन फाइनेंस कंपनी से कर्ज की मदद मिल गई . टैक्‍सी चलने लगी. लॉकडाउन में नुकसान हुआ लेक‍िन महेश बाबू खींचतान कर बुरा वक्‍त काट ले गए

राजामण‍ि को भी बैंक कर्ज नहीं दे रहा. उनके पास कमाई का कोई ठोस जरिया नहीं है. और अब वह कंपनी बंद हो गई है जिससे महेशबाबू को कर्ज मिला था. निजी महाजनों से कर्ज लेने का मतलब है सूदखोरी की चपेट में आना.

राजामण‍ि जैसों के लिए बड़ा कठिन वक्‍त शुरु हुआ है. इस फेहर‍िस्‍त में छोटे उद्योग, गांवों ट्रैक्‍टर खरीदने वाले, व्‍यापारी आदि भी शामिल हैं जिनके लिए कर्ज की ख‍िड़की सरकारी या निजी बैंकों में नहीं बल्‍क‍ि  शैडो बैंकों में खुलती थी. वक्‍त ने कुछ एसा पलटा खाया कि भारत की शैडो बैंकिंग का युग खत्‍म हो रहा है. बदलते कानून, नई तकनीकें और महंगा होता कर्ज भारत की विवादि‍त और क्रांतिकारी शैडो बैंकिंग को इति‍हास में दफ्न करने जा रहे हैं 

शैडो बैंकिंग से हमारा मतलब एनबीएफसी से है यानी नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी से. यानी वे बैंक जैसी कंपन‍ियां जो कर्ज तो दे सकती थीं लेक‍िन बैंकों की तरह डिपॉजिट नहीं ले सकती थीं. यह कर्ज के लिए धन कहां से लातीं थी इसकी कहानी जरा लंबी और पेचीदा है क्‍यों कि इस कहानी में इनके ध्‍वस्‍त होने का इतिहास छिपा है.

पहले यह समझना ठीक रहेगा कि किस तरह शैडो बैंकिंग यानी एनबीएफसी  ने कोविड से पहले तक भारत बाजार कर्ज की पूरी तस्‍वीर ही बदल दी थी.

भारत में नई एनबीएफसी बनाने की रफ्तार में 2010 के बाद तेजी आई. 2012 के बाद भारत की बैंकिंग ढांचा लड़खड़ाने लगा था. यह ट‍ि्वन बैलेंस शीट की उलझन का दौर था. भारी कर्ज में डूबी कंपन‍ियों के कारोबार टूट रही थे. सरकारी बैंकों का  बकाया का कर्ज  फंसने लगा था. 2014 तक यह हालत और गंभीर हो गई. बैंकों को कर्ज से हाथ पीछे खींचने पड़े. अगले चार साल में पूरे बैंकिंग सिस्‍टम में  एनपीए यानी फंसे हुए कर्ज का स्‍तर (कुल कर्ज के अनुपात में ) दोगुना हो गया.

 

2014 वह वक्‍त था जब भारत में शैडो बैंकिंग का उदय हुआ. एनबीएफसी की कतार लग गई. कई प्रमुख औद्योगिक घरानों और बड़े निवेशक इस कारोबार में कूद पड़े. उद्योगों से उपभोक्‍तओं तक कर्ज बांटने की कमान इन कंपनियों ने संभाल ली. इन कंपनियों के पास बैंकों की तरह आम लोगों से बचत जुटाने की छूट नहीं थी लेक‍िन कर्ज बांटने की इजाजत थी. बांटने के लिए यह पैसा इन्‍हें बैंकों से मिलता था. बैंक इन्‍हें सीधा कर्ज भी देते थे और इनके बांड में निवेश करते थे  

 

बैंक अपने फंसे कर्ज के कारण नए कर्ज रोक रहे थे. 2014 के ब्‍याज दर कम होने से बाजार में पूंजी भी थी. नोटबंदी (2016) के बाद बैंकों के पास काफी बचत मौजूद थी. इधर  2012 से 2017 के बीच बड़ी मात्रा में लोगों की बचतें म्‍युचुअल फंड के पास पहुंचने लगी थीं. इस दौरान में इनके पास उपलब्‍ध निवेश धन (एसेट अंडर मैनेजमेंट ) में सालाना 22.1 फीसदी के दर बढ़ा.   बैंक और म्‍युचुअल फंड की बचतें यह बचतें एनबीएफसी कर्ज देने या उनके बांड में निवेश में इस्‍तेमाल हुई.


कर्ज की पायलट सीट पर आ गई भारत की शैडो बैंकिंग. मुख्‍य बैकिंग अब पीछे से इन्‍हें पैसा दे रही थी. यही वह दौर था जब भारत में लगभग 10-11 अलग अलग तरह के एनबीएफसी बने जिनमें आटो, हाउस‍िंग, माइक्रो फाइनेंस आद‍ि प्रमुख थे. 

रिजर्व बैंक के आंकडे बताते हैं कि 2014 से 2017  तक कुल कर्ज में बैंकों का हिस्‍सा 62 फीसदी से घटकर 35 फीसदी रह गया. 2013 से 2017 के बीच एनबीएफ का कर्ज वितरण सालाना 13.1 फीसदी और 2017 से 2019 के बीच 23.4 फीसदी की गत‍ि से बढ़ा. 2018-19 तक यानी  कोविड से पहले  वाण‍िज्‍य‍िक कर्ज में खासतौर पर उद्योगों को कर्ज में एनबीएफसी बैंकों की बराबरी पर आ गए थे. 2020 की पहली छमाही तक शैडो बैंकिंग का कुल कर्ज वितरण 23 लाख करोड़ पहुंच रहा था.

 शैडो बैंकिंग का लीमैन मौका

फिर आया 2018, जहां अमेरिका के लीमैन ब्रदर्स की बैंक की तर्ज पर पर  भारत की शैडों बैंकिंग साइकिल स्‍टैंड पर खड़ी साइकिलों की तरह गिरने लगी. भारत की एनबएफसी कर्ज को बांट कर उसे प्रतिभूत‍ियों में बदल रही थी यानी सिक्‍योरिटाइज कर रही थीं. बाजार में पूंजी सस्‍ती थी, बैंक और म्‍युचुअल उनके बांड में पैसा लगा रहे थे. एनबीएफ छोटी अवध‍ि का कर्ज लेकर लंबी अवध‍ि के लिए बांट रही थीं. लिया गया कर्ज सस्‍ता था और बांटा गया महंगा. सामान्‍य तौर पर एनबीएफसी उनको कर्ज दे रही थीं जिन्‍हें बैंक कर्ज लेने लायक नहीं मानते थे. अर्थव्‍यवस्‍था में ढांचागत मंदी आ चुकी थी, एनबीएफसी के कर्ज की क‍िश्‍तें टूटने लगीं, कर्ज डूबने लगे. एनबीएफस का कर्ज सिक्‍यूराइटजेशन 2018 में 1.99 लाख करोड़ तक पहुंच गया था लेक‍िन इनका बिजनेस मॉडल दरक गया था

पहले डूबी देवान हाउस‍िंग जहां 30000 करोड़ का कर्ज घोटाला हुआ और फिर भारत की एनबीएफस की लीमैन आईएलएफस का पतन हुआ. इन्‍हें कर्ज देने वाले बैंक और म्‍युचुअल फंड भी संकट में आ गए.

सनद रहे कि 2014 के बाद कर्ज की सप्‍लाई में इनका हिस्‍सा बहुत बड़ा था. भरपूर कर्ज बांटने का सरकारी अभियान इनके कंधों पर था इसल‍िए सरकार ने बैंकों के जरिये इनके पैकेज, बेलआउट का इंतजाम किया लेक‍िन निवेश हाथ क्‍या कोहनी भी जला चुके थे. वे एनबीएफसी के लिए सख्‍त और बैंकों जैसे नियम मांग रहे थे इसल‍िए शैडो बैंकिंग अस्‍ताचल की तरफ बढ़ चली. यहीं से भारत की शैडो बैंक‍िंग को लेकर नियम कानूनों का मि‍जाज बदलने लगा.

2018 के बाद इस एनबीएफ की दुनिया में तीन बड़े भूचाल आए हैं. इनको समझना जरुरी है ताकि हमें पता चल सके कि राजामणि‍ को जैसों कर्ज मिलना कयों मुश्‍क‍िल हो गया है.

1- आईएलएफएस के डूबने के बाद रिजर्व बैंक को शैडो बैंकिंग की दरारें नजर आईं. नियम बदले गए. एनबीएफसी को बैंकों तरह संकट के लिए रिजर्व बनाने होंगे. एनपीए घोष‍ित करने होंगे. कर्ज फंसने की सूरत बैंकों की तर्ज इन्‍हें सख्‍त नियमों (पीसीए) में बांधा जाएगा. अब केवल बड़ी एनबीएफसी ही टिकेंगी लेक‍िन उन्‍हें बहुत पूंजी लगानी होगी

2- दूसरा भूचाल तकनीक की दुनिया से आया. फिनटेक के बाद नई तरह व‍ित्‍तीय सेवायें. एनबीएफसी केवल कर्ज बांटने में सक्रिय थे. इस बीच बैकों व अन्‍य वित्‍तीय कंपनियों में पेमेंट, वालेट, यूपीआई,  ऑनलाइन पेमेंट, आदि सेवाओं का  पूरा पोर्टफोलियो बना लिया. सरकारी और निजी बैंक तेजी से से आगे गए आ गए.  कर्ज के कारोबार तक सीम‍ित एनबीएफसी इस होड़ में अब दौड़ नहीं पाएंगे

3- तीसरा सबसे बड़ा झटका कर्ज की महंगाई है. एनबीएफसी सस्‍ते कर्ज के युग में उभरे थे. यह वित्‍तीय प्रणाली के आर‍बि‍ट्राज पर चलते थे. बैंकों व बांड के जरिये सस्‍ता कर्ज उठाकर आगे बांटते थे. कर्ज महंगा होने के बाद यह संभावान चुक गई है. एनबीएफसी के लिए फंड की लागत में बेतहाशा बढ़ोत्‍तरी हो रही हैं दूसरी तरफ महंगे कर्ज के लेनदार घट हैं

 

चार अप्रैल का दिन भारत के वित्‍तीय बाजार की एक और बड़ी करवट थी जब एचडीएफसी के एचडीएफसी बैंक में विलय का एलान हुआ. देश की सबसे बड़ी हाउस‍िंग फाइनेंस कंपनी एचडीएफसी जो कि एनबीएफसी है, वह सबसे बड़ी निजी बैंक में विलय होने जा रही थी. यह विलय अभी मंजूर‍ियों में फंसा है लेक‍िन बाजार ने समझ लिया था कि जब नए कानूनों में बैंकों और एनबीएफसी में अंतर नहीं बचा दो का क्‍या फायदा. अचरज नहीं कि बची हुए बड़ी एनबीएफसी या तो बैंकों के लाइसेंस लें लें या किसी बैंक की गोद में समा जाएं.

शैडो बैंकिंग के पतन के साथ देश के कर्ज के बाजार में दो बहुत बड़े  बदलाव हो रहे हैं. 

एक-                     कर्ज अब आमतौर पर महंगा होगा और कर्ज देने वाले कम बचेंगे

दो-                         दो- बहुत बड़ा तबका बैंकों से कर्ज नहीं ले पाएगा क्‍यों कि उनके पास मजबूत बिजनेस मॉडल नहीं है और बैंक उनके साथ जोखिम नहीं ले सकते.

भारत इस समय करीब 3 ट्र‍िल‍ियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था है जिसमें कर्ज का हिसस करीब 1.6 ट्रिल‍ियन डॉलर है. बैंक कर्ज का जीडीपी से अनुपात 56 फीसदी है जबक‍ि कारपोरेट कर्ज जीडीपी का 90 फीसदी. विक‍स‍ित देशों में प्राइवेट कर्ज जीडीपी अनुपात 200 फीसदी से ऊपर है. स्‍टेट बैंक का आकलन है कि भारत मे 5 ट्रि‍ल‍ियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनने के लिए करीब एक ट्र‍िल‍ियन डॉलर के कर्ज बांटने होंगे...

सरकार को कर्ज बाजार और कर्ज विकल्‍पों की नियमावली नए स‍िरे लिखनी होगी. लेक‍िन सरकारों के पास वक्‍त कहां है?


Friday, May 27, 2022

सबसे सनसनीखेज मोड़

 


 

नाइट श्‍यामलन की मास्‍टर पीस फ‍िल्‍म सिक्‍थ सेंस (1999) एक बच्‍चे की कहानी है जिसे मरे हुए लोगों के प्रेत दिखते हैं. मशहूर अभिनेता ब्रूस विलिस इसमें मनोच‍िक‍ित्‍सक बने हैं जो इस बच्‍चे का इलाज करता है दर्शकों को अंत में पता चलता है कि मनोवैज्ञान‍िक डॉक्‍टर खुद में एक प्रेत है जो मर चुका है और उसे खुद इसका पता नहीं है. फिल्‍ के एंटी क्‍लाइमेक्‍स ने उस वक्‍त सनसनी फैला दी थी

सुप्रीम कोर्ट के ताजे फैसले से जीएसटी की कहानी में सनसनीखेज मोड आ गया है जो जीएसटी काउंसिल जो केंद्र राज्‍य संबंधों में ताकत की नई पहचान थी, सुप्रीम कोर्ट ने उसके अधिकारों सीमि‍त करते हुए राज्‍यों को नई ताकत दे दी है. अब एक तरफ राज्‍यों पर पेट्रोल डीजल पर वैट घटाकर महंगाई कम करने दबाव है दूसरी तरफ राज्‍य सरकारें अदालत से मिली नई ताकत के दम पर अपनी तरह से टैक्‍स लगाने की जुगत में हैं क्‍यों कि जून के बाद राज्‍य कों केंद्र से मिलने वाला जीएसटी हर्जाना बंद हो जाएगा

2017 में जब भारत के तमाम राज्‍य टैक्‍स लगाने के अधिकारों को छोड़कर जीएसटी पर सहमत हो रहे थे, तब यह सवाल खुलकर बहस में नहीं आया अध‍िकांश राज्‍य, तो औद्योग‍िक  उत्‍पादों  और सेवाओं उपभोक्‍ता हैं, उत्‍पादक राज्‍यों की संख्‍या  सीमित हैं. तो इनके बीच एकजुटता तक कब तक चलेगी. महाराष्‍ट्र और  बिहार इस टैक्‍स प्रणाली से  अपनी अर्थव्‍यवस्‍थाओं की जरुरतों के साथ कब तक न्‍याय पाएंगे?

अलबत्‍ता  जीएसटी की शुरुआत के वक्‍त यह तय हो गया था कि जब तक केंद्र सरकार राज्‍यों को जीएसटी होने वाले नुकसान की भरपाई करती रहेगी. , यह एकजुटता बनी रहेगी. नुकसान की भरपाई की स्‍कीम इस साल जून से बंद हो जाएगी. इसलिए दरारें उभरना तय है 

 

कोविड वाली मंदी से जीएसटी की एकजुटता को पहला झटका लगा था. केंद्र सरकार राज्‍यों को हर्जाने का भुगतान नहीं कर पाई. बड़ी रार मची. अंतत: केंद्र ने राज्‍यों के कर्ज लेने की सीमा बढ़ाई.  मतलब यह कि जो संसाधन राजस्‍व के तौर पर मिलने थे वह कर्ज बनकर मिले. इस कर्ज ने राज्‍यों की हालत और खराब कर दी.

इसलिए जब राज्‍यों को पेट्रोल डीजल सस्‍ता करने की राय दी जा रही तब  वित्‍त मंत्रालय व जीएसटी काउंस‍िल इस उधेड़बुन में थे कि जीएसटी की क्षत‍िपूर्ति‍ बंद करने पर राज्‍यों को सहमत कैसे किया जाएगा? कमजोर अर्थव्‍यवस्‍था वाले राज्‍यों का क्‍या होगा?

बकौल वित्‍त आयोग जीएसटी से केंद्र व राज्‍य को करीब 4 लाख करोड़ का  सालाना नुकसान हो रहा है. जीएसटी में भी प्रभावी टैक्‍स दर 11.4 फीसदी है जिसे बढ़ाकर 14 फीसदी किया जाना है, जो रेवेन्‍यू न्‍यूट्रल रेट है यानी इस पर सरकारों को नुकसान नहीं होगा.

जीएसटी काउंसिल 143 जरुरी उत्‍पादों टैक्‍स दर 18 फीसदी से 28 फीसदी करने पर विचार कर रही है ताकि राजस्‍व बढ़ाया जा सके.

 

इस हकीकत के बीच यह सवाल दिलचस्‍प हो गया है कि क्‍या केंद्रीय एक्‍साइज ड्यूटी में कमी के बाद राज्‍य सरकारें पेट्रोल डीजल पर टैक्‍स घटा पाएंगी? कुछ तथ्‍य पेशेनजर हैं

- 2018 से 2022 के बीच पेट्रो उत्‍पादों से केंद्र सरकार का राजस्‍व करीब 50 फीसदी बढ़ा लेक‍िन राज्‍यों के राजस्‍व में केवल 35 फीसदी की बढ़त हुई. यानी केंद्र की कमाई ज्‍यादा थी

-    2016 से 2022 के बीच केंद्र का कुल टैक्‍स संग्रह करीब 100 फीसदी बढ़ा लेक‍िन राज्‍यों इस संग्रह में हिस्‍सा केवल 66 फीसदी बढ़ा.  केंद्र के राजस्‍व सेस और सरचार्ज का हिस्सा 2012 में 10.4 फीसद से बढ़कर 2021 में 19.9 फीसद हो गया है. यह राजस्‍व राज्‍यों के साथ बांटा नहीं जाता है. नतीजतन राज्‍यों ने जीएसटी के दायर से से बाहर रखेग गए  उत्‍पाद व सेवाओं मसलन पेट्रो उत्‍पाद , वाहन, भूमि पंजीकरण आदि पर बार बार टैक्‍स बढ़ाया है    

-    केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी के लिए वित्‍त आयेाग के नए फार्मूले से केंद्रीय करों में आठ राज्यों (आंध्रअसमकर्नाटककेरलतमिलनाडुओडिशातेलंगाना और उत्तर प्रदेश) का हिस्सा 24 से लेकर 118 (कर्नाटक) फीसद तक घट सकता है (इंडिया रेटिंग्‍स रिपोर्ट)   

-    केंद्र से ज्‍यादा अनुदान के लिए राज्‍यों को शि‍क्षाबिजली और खेती में बेहतर प्रदर्शन करना होगा.  इसके लिए बजटों से खर्च बढ़ानाप पडेगा.

-    कोविड की मंदी के बाद राज्यों का कुल कर्ज जीडीपी के अनुपात में 31 फीसदी की र‍िकार्ड ऊंचाई पर है. पंजाब, बंगाल, आंध्र , केरल, राजस्‍थान जैसे राज्‍यों का कर्ज इन राज्‍यों जीडीपी (जीएसडीपी)  के अनुपात में 38 से 53 फीसदी तक है.

 भारत में केंद्र और राज्‍यों की अर्थव्‍यवस्‍थाओं के ताजा हालात तो बता रहे हैं  

-    जीएसटी की हर्जाना बंद होने से जीएसटी दरें बढ़ेंगी. केंद्र के बाद राज्‍यों ने पेट्रोल डीजल सस्‍ता किया तो जीएसटी की दरों में बेतहाशा बढ़ोत्‍तरी का खतरा है. जो खपत को कम करेगा

-    केंद्र और राज्‍यों का सकल कर्ज जीडीपी के अनुपात 100 फीसदी हो चुका है. ब्‍याज दर बढ़ रही है, अब राज्‍यों 8 फीसदी पर भी कर्ज मिलना मुश्‍क‍िल है

 

भारत का संघवाद बड़ी कश्‍मकश से बना था.  इतिहासकार ग्रेनविल ऑस्‍ट‍िन ल‍िखते हैं क‍ि यह बंटवारे के डर का असर था कि 3 जून 1947 को भारत के बंटवारे लिए माउंटबेटन प्लान की घोषणा के तीन दिन के भीतर ही भारतीय संविधान सभा की उप समिति ने बेहद ‌शक्तिशाली अधिकारों से लैस केंद्र वाली संवैधानिक व्यवस्था की सिफारिश कर दी.

1946 से 1950 के बीच संविधान सभा में, केंद्र बनाम राज्‍य के अध‍िकारों पर लंबी बहस चली. (बलवीर अरोराग्रेनविल ऑस्टिन और बी.आरनंदा की किताबें) यह डा. आंबेडकर थे जिन्‍होंने ताकतवर केंद्र के प्रति संविधान सभा के आग्रह को संतुलित करते हुए ऐसे ढांचे पर सहमति बनाई जो संकट के समय केंद्र को ताकत देता था लेकिन आम तौर पर संघीय (राज्यों को संतुलित अधिकारसिद्धांत पर काम करता था.

संविधान लागू होने के बाद बनने वाली पहली संस्था वित्त आयोग (1951) थी जो आर्थि‍क असमानता के बीच केंद्र व राज्‍य के बीच टैक्‍स व संसाधनों के न्‍यायसंगत बंटवारा करती है  

2017 में भारत के आर्थ‍िक संघवाद के नए अवतार में राज्‍यों ने टैक्‍स लगाने के अध‍िकार जीएसटी काउंसिल को सौंप दिये थे. महंगाई महामारी और मंदी  इस सहकारी संघवाद पर पर भारी पड़ रही थी इस बीच  सुप्रीम कोर्ट जीएसटी की व्‍यवस्‍था में राज्‍यों को नई ताकत दे  दी है. तो क्‍या श्‍यामलन की फिल्‍म स‍िक्‍स्‍थ सेंस की तर्ज पर जीएसटी के मंच पर  केंद्र राज्‍य का रिश्‍तों का एंटी क्‍लाइमेक्‍स आने वाला है?

 

Friday, May 6, 2022

क्‍या से क्‍या हो गया ?




2022 की गर्मियों में भारत में क्‍या हो रहा है

वही जो 2021 में 2011, 2014, 2018 में हुआ था

यानी कोयले की किल्‍लत, बिजली कटौती और केंद्र और राज्‍य सरकारों के बीच आरोपों का लेन देन

इस बार नया क्‍या है?

कोयले की कमी का ताजा संस्‍करण भारत की ऊर्जा की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है. आयात‍ित कच्‍चे तेल के बाद भारत इंपोर्टेड कोयले का मोहताज होने वाला है.

एसी क्‍या मजबूरी है

इस पहले क‍ि इस संकट को कोई रुस यूक्रेन युद्ध से जोड़ दे हमें कुछ जरुरी तथ्‍य देखकर चश्‍मे साफ कर लेने चाहिए

-         भारत में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है और दूसरा सबसे बड़ा उत्‍पादक है. 

-        भारत दुनिया में बिजली का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक हैबिजली की उत्पादन क्षमता बढ़ने की दर 8.9 फीसद है जो  जीडीपी और बिजली की औसत सालाना मांग  (पीक डि‍मांड) बढ़ने से  ज्यादा तेज है.

-         2012 के बाद से पारेषण (ट्रांसमिशनक्षमता 7% की दर से बढ़ी है

फिर भी बीते दस साल में हर दूसरे वर्ष हम बिजली को तरसते हैं

वही पुरानी कहानी

अक्‍टूबर 2021 में  बिजली घरों के पास दो तीन दिन (24 दिन का स्‍टॉक जरुरी)  का कोयला बचा था. कोल इंड‍िया से उत्‍पादन और आपूर्ति बढ़ाने को कहा गया. अक्‍टूबर के अंत में दावा किया गया बिजली घरों के पास कोयला पहुंचा दिया गया है यानी सब ठीक है

ठीक कुछ भी नहीं था. दो महीने बाद जनवरी से मार्च के दौरान बिजली की पीक डिमांड मांग औसत 187 गीगावाट पर पहुंच गई.  गर्मी शुरु होते ही अप्रैल के पहले पखवाड़े में मांग ने 197 गीगावाट की मंजिल छू ली. कोयला आपूर्ति की कमर टूट गई. बिजली उत्‍पादन यानी प्‍लांट लोड फैक्‍टर में एक फीसदी की बढत पर कोयले की मांग करीब 10 मिल‍ियन टन बढ़ जाती है. बिजली की मांग दस फीसदी से ज्‍यादा बढ चुकी है. महाकाय कोल इंडिया के पास  100 मिल‍ियन टन की आपूर्ति तुरंत बढ़ाने की क्षमता नहीं  

आयात‍ित कोयले की कीमत 280-300 डॉलर प्रति टन की ऊंचाई पर है. बिजली कंपनियां अगर इसे खरींदें तो तत्‍काल बिजली महंगी करनी होगी जो संभव नहीं है.

अप्रैल के तीसरे सप्‍ताह तक बिजली घरों के पास कोयला स्‍टॉक   सात साल के सबसे निचले स्‍तर पर आ गया. बिजली एक्‍सचेंज कीमतें  राज्‍य सरकारों की क्षमता के बाहर हो गईं.  

ऊर्जा क्रांति बैठ गई.

भारत की करीब 60 फीसदी बिजली कोयले से आती है. करीब 100  बिजली घर कोयले पर आधार‍ित हैं, 79 घरेलू कोयले पर और 11 आयात‍ित कोयले से चलते हैं.  

भारत में कुल सालाना खपत का 111 गुना ज्‍यादा कोयला भंडार है. कोल इंडिया 7.7 करोड़ टन का उत्‍पादन (2021-22) करती है. जो  8.5 फीसदी की सालाना गति से बढ़ रहा है. दो करोड टन कोयले का सालाना आयात होता है.

फिर संकट क्‍यों ?

यह न कहियेगा कि सरकार को  बिजली की मांग बढ़ने, कोयले की आपूर्ति कम पड़ने और रिकार्ड गर्मी का अंदाज नहीं था. कोयले और बिजली की कमी प्राकृतिक नहीं है. यह संकट ऊर्जा सुधारों की सालाना पुण्‍य त‍िथि‍ जैसा बन गया है. इसे समझने में लिए तीन सवालों से मुठभेड़ जरुरी है

पहला – बिजली घरों के पास कोयले के पर्याप्‍त  भंडार क्‍यों नहीं बन पाते

जवाब – बिजली वितरण कंपन‍ियां बिजली उत्‍पादकों को वक्‍त पर बिजली का पैसा नहीं चुकाती हैं. बिजली दरें सरकारें तय करती हैं. सब्‍स‍िडी का पैसा कंपनियों को मिलता नहीं. यहां तक सरकारें अपनी खपत की बिजली का पैसा भी नहीं चुकातीं. पूरा कारोबार उधार का है. बिजली दरें न बढ़ने के कारण बिजली कंपनियां करीब 5.2 लाख करोड़ के नुकसान में हैं.  राज्‍यों पर 1.1 लाख करोड़ रुपये सब्‍सिडी और मुफ्त बिजली के मद में बकाया हैं.

2001 के बाद  के बीच बिजली बोर्ड या वितरण कंपनियों  को बकाए और     कर्ज से उबरने के लिए चार बार कर्ज पैकेज दिये गए लेक‍िन बिजली वितरण कंपनियों पर इस समय बिजली उत्‍पादन कंपनियों का का करीब 1.25 लाख करोड़ बकाया है.

दूसरा सवाल – कोल इंडि‍या  वक्‍त पर आपूर्ति क्‍येां नहीं बढ़ा पाती?

जवाब - कोयले की कुल मांग का 83 फीसदी हिस्‍सा कोल इंडिया से आता है. उत्‍पादन में बढ़त नई खदानों पर निर्भर है जो नौकरशाही और पर्यावरण की मंजूरी के कारण अटकी हैं. कोल इंडिया के पास 35000 करोड़ का सरप्‍लस व रिजर्व लेक‍िन सरकार उससे लाभांश निचोड़ती है. नई खदानों में निवेश वरीयता पर नहीं है

बीते साल अक्‍टूबर में निजी ब‍िजली उत्‍पादकों ने आपूर्ति में कमी को लेकर कोल इंडिया पर जुर्माना लगाने की मांग की थी

तीसरा सवाल -  निजी खदानों का क्‍या हुआ?  

-         कोयला ब्‍लॉक आवंटन घोटाले के बाद 2014 में सब ठीक होने का दावा किया गया लेकिन 2018 में कोयला संकट फिर लौट आया.

-         2020 में
 निजी क्षेत्र को कोयला खदानें देने का फैसला हुआ. 70 फीसदी खदानों के लिए बोलियां ही नहीं आईं. जब कोल इंडिया की खदानों की मंजूरी वक्‍त पर नहीं होती तो निजी निवेशकों की कौन सुन रहा.  

-         इंटरनेशनल इनर्जी फाइनेंस एंड इकोनॉमिक एनाल‍िसिस का  अध्‍ययन बताता है कि भारत के कोयले की गुणवत्‍ता अच्‍छी नहीं है इसलिए निर्यात की संभावना सीमित है.  दुनिया के बैंकर क्‍लाइमेट चेंज की शर्तों के कारण कोयला परियोजनाओं में निवेश कम कर रहे हैं. इसलिए भारत में विदेशी निवेशक नहीं आ रहा . मेगा ग्‍लोबल कंपनी रिओ टिंटो भी 2018 में अपनी आख‍िरी खदान बेचकर भारत से रुखसत हो गई. 

सबसे बड़ी हार

फरवरी 2020 में गुजरात के केवड़‍िया में के चिंतन शि‍व‍िर में  केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने घोषणा की थी कि 2023-24 के वित्‍त वर्ष से भारत बिजली के लिए कोयले (नॉन कोकिंग कोल) का आयात बंद कर देगा लेकिन अब हाल यह है कि राज्‍यों और निजी बिजली घरों को अगस्‍त तक 19 मिल‍ियन टन कोयेल का आयात करने का लक्ष्‍य दे दिया गया है. रुस यूक्रेन युद्ध के बाद विश्‍व बाजार में कोयले की कीमत 45 फीसदी तक बढ़ चुकी है. इस बीच दुनिया की दूसरा सबसे कोयला आयातक मुल्‍क, पांच माह में इतना कोयला इंपोर्ट करने वाला है जितना पूरे साल में होता है.

सनद अभी तक हम केवल कच्‍चे तेल के लिए आयात पर निर्भरता को बिसूरते थे लेक‍िन अब दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा कोयला भंडार रखने वाले भारत के सरकारी बिजली घर भी इंपोर्टेड कोयले पर चलेंगे.

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार जो अब केवल एक साल के लिए पर्याप्‍त है उसके लिए यह बुरी खबर है. क्‍यों कि तेल और कोयला दोनों ही ईंधनों की कीमतों में लगी आग लंबी चलेगी