Sunday, March 19, 2023

ढोल में पोल


 


 

बीते पंद्रह साल में दुनिया में कहीं भी किसी जगह कंप्‍यूटर की पढ़ाई कर रहा कोई छात्र छात्रा अगर थक कर सो जाता था  तो उसका अवचेतन उसके जगा कर कहता था आराम मत करपढ़ क्‍यों कि गूगलफेसबुकट‍ि्वटरअमेजनमाइक्रोसॉफ्ट की नौकरी तेरा इंतजार कर रही है  और वह फिर उठ कर कोडिंग के मंत्र रटने लगता था.

यह करोड़ों उम्‍मीदें अब माकायोशी सनोंसैम बैंकमैन फ्रायड (एफटीएक्‍स क्रिप्‍टो एक्‍सचेंज वाले) मार्क ज़कबरर्गोंजेफ बेजोसोंइलॉन मस्‍कोंसत्‍या नाडेलासुंदर पि‍चाइयोंबायजू रविद्रन आदि को किस नाम से बुलाना चाहेंगी...जिन्‍होंने मिलकर हजारों नौकर‍ियां खत्‍म कर दीं. इनके भारतीय सहोदर यानी चमकदार स्‍टार्ट अप सैंकडों कर्मचारियों का काम से निकाल चुके हैं र पठा चुके हैं. और उस पर तुर्रा यह कि बेरोजगारी की यह हैलोवीन पार्टी तो अभी शुरु हुई है

न्‍यू इकोनॉमी के यह  सितारे और दूरदर्श‍िता प्रेरणा पुंज इन निवेशकों के बीच किस नाम इन्‍हें पुकारेंगे जाएंगे ज‍िनकी भारी पूंजी इनमें से कई कंपनियों के शेयर खरीदकर स्‍वाहा हो गई.

क्‍या आप इन सब कीर्त‍ि कहानियों के नायकों को ठग कहना चाहेंगे

क्‍या आपने कारोबारों को विराट तमाशा कहना चाहेंगे जो दरअसल एक फर्जीवाड़ा है

ठह‍िरये

गुस्‍सा मत करिये

हम आपकी भावनायें समझते हैं

जॉन केनेथ गॉलब्रेथ नाम के बड़े अर्थशास्‍त्री गुज़रे हैं यह ठगी या फर्जीवाड़े  वाली थ्‍योरी हमें उन्‍हीं ने बताई थी

गॉलब्रेथ 1940 के दशक में फॉरच्‍यून पत्रि‍का के संपादक थे. वह  हार्वर्ड के प्रोफेसर थे. जॉन एफ केनेडी के एडवाइजर थे. उनका भारत से करीबी रिश्‍ता था. वह 1960 के दशक में भारत में अमेरिका राजदूत रहे थे

गॉलब्रेथ ने एक किताब ल‍िखी थी.  नाम है द ग्रेट क्रैश1929

गॉलब्रेथ ने इस किताब में बताया था कि कुछ ऐसे कारोबार हैं जिनकी एक कृत्रिम वैल्‍यू बनाई जाती है और लंबे वक्‍त तक लाखों लोग उसमें भरोसा करते रहे हैं. गॉलब्रेथ ने इस कारोबारी मॉडल के लिए ‘बेजल’ शब्‍द का प्रयोग किया . बेजल अंग्रेजी के ‘इंबेजलमेंट’ से बना है जिसका मतलब है ठगीगबन या पैसों का चोरी. अंग्रेजी शब्‍दकोषों में बेज़ल का भी अर्थ कुछ ठगी लूट जैसा ही मिलता है

क्‍या दुनिया की सबसे प्रख्‍यातसंभावनामय कंपरियां गॉलब्रेथ की बेजल थ्‍योरी को सच साबित कर रही हैं. ? मांग में जरा गिरावटआर्थ‍िक उठापटक का एक छोटा सा दौर या पूंजी की जरा सी महंगाई से इनकी चूलें क्‍यों हिल गईंक्‍या हमारी सदी के सबसे चमकदार कारोबार भीतर से इतने खोखले हैं कि हजारों की संख्‍या में नौकर‍ियां खत्‍म करने लगे?  क्‍या दरअसल इनके बिजनेस मॉडल दुनिया का सबसे दिलचस्‍प आर्थि‍क अपराध हैं जैसा कि बेजल ने कहा था ?

युद्ध और महंगाई के बीच अचानक फट पड़ी बेरोजगारी से बदहवास दुनिया समझने की कोशि‍श कर रही है उसे बताया गया है वह सच है या फिर जो छ‍िपाया गया था वही सच था.

आइये समझते हैं कि दुनिया को गॉलब्रेथ ही नहीं  वॉरेन बफे के साथी और बर्कशायर हैथवे  वाली चार्ली मुंगेर के भी कुछ सूत्र याद आ रहे है जो सामूहिक भ्रम में भुला दिये गए थे.

 

सबसे बड़ी उलटबांसी 

दुनिया को आर्थ‍िक संकटों का इतिहास भर तजुर्बा है. इन संकटों के दो परिवार हैं. पहला काल्‍पनिक मांग या कमॉड‍िटी की कीमतें चढ़ जाने से फूले गुब्‍बारे जैसे कि  17 वीं नीदरलैंड में ट्यूलिप खरीदने दौड़ पड़े कारोबारी हों या फिर  ब्रिटेन में साउथ सी कंपनी के शेयरों की तेजी या फिर असंख्‍य पोंजी स्‍कीमें या दूसरा जरुरत से कहीं ज्‍यादा निवेश जैसे 18 वीं सदी के यूरोप में रेलवे और कैनाल बबल से लेकर 1980 में जापान और 2006 में अमेरिका का रियल इस्‍टेट बबल और 2002 का डॉट कॉम बबल.. दोनों किस्‍म के संकटों के पीछे पूंजी बैंकों से या शेयर बाजार से आती है तो यही डूबते हैं

इस बार कुछ एसा हो रहा है जिसकी प्रकृति और तरीका देखकर सर चकरा जाता है. महामारी के दो साल के दौरान दुनिया इस बात मुतमइन पर हो चुकी थी कि टेकएज आ गई है. यानी तकनीकों का स्‍वर्ण युग शुरु हो गया है. यह युग तो महामारी से पहले से ही तैयार था लेक‍िन घरों में बंद लोगों के आर्थ‍िक और सामाजिक व्‍यवहार  बाद बीते साल तक अगर होई यह कहता कि स्‍टार्ट अप डूब जाएंगे या फेसबुक छंटनी करेगी तो शायद उसे सोशल मीडिया पर शहीद कर‍ दिया जाता

लेक‍िन 2022 के आख‍िरी महीने तरफ बढ़ रही दुनिया यह मान रही है कि तकनीकी उद्योग में डॉटकॉम बबल से बड़ा गुब्‍बारा फूट गया है. चौतरफा हाय तोबा मची है. कहीं क्रिप्‍टो एक्‍सचेंज डूब रहे हैं ड‍ि फाई यानी ड‍िसेंट्रालाइज फाइनेंस की मय्यत उठाई जा रही है तो कहीं ई वाहन वाली कंपनियों के माल‍िक फ्रॉड में पकड़े जा रहे हैं तो कहीं सॉफ्टवेयर क्‍या हार्डवेयर तक बनाने वाली कंपनियां नया निवेश बंद कर रही हैं. भारत के मशहूर यूनीकॉर्न पूंजी की कमी से कॉक्रोच में बदल रहे हैं.

कम से कम यह टेकएज तो नहीं जिसका सपना देखते हुए दुनिया महामारी का भवसागर पार कर आई है.

टेक एज की नई सुर्ख‍ियां

दुनिया में बहुत से लोग यह मानते थे कार कंपनियां बंद हो सकती हैं , सिनेमाघरों का वक्‍त खत्‍म हो सकता हैकिसी मौसम की फसल कहीं भी उगाई जा सकती है लेक‍िन तकनीकों की दुनिया में कभी मंदी नहीं आएगी. यह उद्योग फ्यूचर प्रूफ है यानी भविष्‍य की गारंटी है. अब यहां कुछ एसी सुर्ख‍ियां बन रही हैं

-    अमेरिका की हर बड़ी तकनीक कंपनी या तो रोजगार में छंटनी कर रही है या नही भर्त‍ियां बंद कर चुकी है.  केवल अक्‍टूबर महीने‍ में अमेरिका को आईटी उद्योग में करीब 50000 नौकर‍ियां गईं है. इनमें से कई लोग एसे हैं जिन्‍हें दो महीने पहले ही नौकरी में रखा गया था. फेसबुक टि‍्टवरअमेजनटेस्‍लानेटफ‍ि्लक्‍स , कई क्रिप्‍टो एक्‍चेंजईवेहक‍िन कंपनियां नौकर‍ियां खत्‍म कर रही हैं भारत में भी सभी बड़े स्‍टार्ट अप छंटनी कर रही हैं. अब तक  20000 लोगों को गुलाबी पर्ची थमाई जा चुकी है

-    क्रिप्‍टो की दुनिया डूब रही है. वॉयजल और सेल्‍स‍ियस के बाद तीसरा बडा एक्‍सचेंज एफटीएक्‍स दीवालिया हो गया है. इसके मालिक सैम बैंकमैन फ्रायड को पत्र‍िकाओं ने नए युग का जे पी मोर्गन कहा था. जिन्‍होंने 1907 अमेरिका की सरकार को कर्ज देकर संकट से उबारा था.  

-    मासायोशी सन के सॉफबैंक को इस साल अप्रैल जून की त‍िमाही में 913 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. मासायोशी सन ने स्‍टार्ट अप निवेश से तौबा कर ली है. कई कंपनियों में वह अपनी हिस्‍सेदारी बेचना चाहते हैं. सन का सॉफ्बैंक वेंचर कैपिटल बाजार के आव‍िष्‍कारक था. उसने सिल‍िकॉन वैली स्‍टार्ट अपर 100 अरब डॉलर के साथ  स्‍टार्ट अप इन्‍वेस्‍ट‍िंग का नया युगशुरु कर दिया था.  बहुतों ने सन को वन मैन बबल मेकर की उपाध‍ि से नवाजा था. यह उपाध‍ि अब सही साबित हो रही है.  

-    2022 की तीसरी तिमाही में वेंचर कैपिटल फंड‍िंग बीते साल के मुकाबले 53 फीसदी और पिछली त‍िमाही से 33 फीसदी घटी है. इस सितंबर तक भारत में स्‍टार्ट अप फंडिंग बीते साल की तुलना में 80 फीसदी कम हो गई है

 

-    पूरी दुनिया में यूनीकॉर्न की संख्‍या कम हो रही है. जो मौजूद हैं वह बुरी तरह लहूलुआन हैं. भारत में ओयो प्रति मिनट 76000 रुपयेपेटीएम 60000 रुपयेस्‍व‍िगी करीब 25000 रुपयेपीबी फिनटेक करीब 22000 रुपये और जोमाकोकार ट्रेड नायकमोबीक्‍व‍िक 2000 से 5000 रुपये प्रति म‍िनट का नुकसान उठा रहे हैं.

-    तकनीकी शेयरों का प्रतिनिध‍ि अमेरिकी सूचकांक नैसडैक गहरी मंदी में है. यह बीते बरस से 35 फीसदी टूट चुका है. बीते साल दस साल में यह सबेस तेज गिरावट है.  

क्‍या बदल गया अचानक?

बीते दो साल में दो बड़े बदलाव हुए और आश्‍चर्य है कि इनका सबसे ज्‍यादा असर उस क्षेत्र पर हो रहा है जो शायद मंदी की संभावना से परे था

पहला - अब तक यह रहस्‍य नहीं रह गया है कि दुनिया में कर्ज महंगा होने से पूंजी की आपूर्ति कम हुई है.  2010 के बाद आमतौर पर कर्ज दरें न्‍यूनतम रहीं. बीच एक बार कुछ बढ़त आई तो प्राइवेट फंड आना शुरु हो गए. सस्‍ती पूंजी अब लौटने के साथ प्राइवेट फंड भी लौटने लगे हैं

 

 

 

दूसरा -  ऑनलाइन कारोबारों को नियम बदल रहे हैं या नियामकों की सख्‍ती कर रहे हैं. क्र‍िप्‍टो फिनटेक इसकी नजीर हैं. अमेर‍िका से लेकर भारत तक अमेजनगूगलफेसबुक आदि के बाजार एकाध‍िकार पर निर्णायक कार्रवाई शुरु हो गइ है. यूरोपीय जीडीपीडीआर उपभोक्‍ताओं को राइट टू बी फॉरगॉटेन दे रहा है यानी उसकी सूचना सिस्‍टम में नहीं रहनी चाहिए.    सूचना तकनीक कंपन‍ियों को इस बात के लिए बाध्‍य किया जा रहा है वह उपभोक्‍ताओं को इस बात का अध‍िकार दें कि उन्‍हें ट्रैक किया जा या नहीं

इसका नतीजा यह है कि  न्‍यू इकोनॉमी दुनिया बदल रही है. टारगेटेड विज्ञापन जो डाटा मार्केटिंग की बुनियाद है अब वही डगमगा गई है. मेकेंजी का मानना है कि  कुकीज और  आइडेंट‍िफायर फॉर एडवरटाइजर्स (आईडीएफ) के बंद होने के बादइस सेवाओं का इस्‍तेमाल करने वाली कंपनियों को मार्केट‍िंग पर 10 से 20 फीसदी ज्‍यादा खर्च करना होगा.

बस इतने से हिल गया सब ?

कुछ परेशान करने वाले सवाल हैं      

पहला - क्‍या ब्‍याज दर बढ़ना इतना बड़ा बदलाव था जिससे फेसबुक जैसों का पूरा कारोबार ही लडखड़ा जाए. इन कंपन‍ियों को प्रति कर्मचारी राजस्‍व और मुनाफे में अग्रणी माना जाता है. जैसे कि 2021 में फेसबुक का प्रति कर्मचारी मुनाफा पांच लाख डॉलर था और राजस्‍व करीब 16 लाख डॉलर.

 

  

दूसरा – कंपनियों को पहले से पता था कानून बदलेंगे. पूरी दुनिया के नियामक बीते एक पांच छह साल से सूचना तकनीक कंपन‍ियों को  निजता के अधकिारों की सुरक्षा से लैस करने की कोशि‍श कर रहे हैं. भविष्‍य की तैयारी करने वाली कंपनियों के लिए नियमों का बदलाव इतना बड़ा झटका था कि सब बिखर जाए

यहां हम वापस जॉन केनेथ गॉलब्रेथ की तरफ लौटते हैं. उनकी बेजेल थ्‍योरी कहती है कि किसी संपत्‍त‍ि कारोबार का संभावना या कृत्रि‍म कीमत को बढ़ाने का फर्जीवाड़ा लंबा चल सकता है. क्‍यों कि इससे यह कारोबारी मॉडल इसके नियंता को मुनाफा देता है जबक‍ि गंवाने वाले नुकसान को महसूस नहीं कर पाते.  यही बेजल है. यानी इंबेजलमेंट.

यह सबको पता था है कि बीते एक दशक में  65 फीसदी वेंचर कैपिटल निवेश डूब गए (कोर‍िलेशन वेंचर्स का अध्‍ययन) डूब गए. केवल 2 से 3 फीसदी निवेश पर दस से बीस गुना रिटर्न दियाकेवल एक फीसदी से 20 फीसदी से ज्‍यादा और आधा फीसदी ने 50 गुना या अध‍िक रिटर्न दिया है. 2014 तक कुल वेंचर कैपिटल फाइनेंस 482 अरब डॉलर था जिसमें केवल दस कंपनियों के पास का वैल्‍यूएशन 213 अरब डॉलर था यानी कुल निवेश का आधा.

बाकी केवल बेजल है ?

तकनीकी शेयरों के सूचकांक नैसडक का करीब 51 फीसदी रिटर्न केवल पांच कंपनियों से आता है. जबकि केवल 25 कंपनियां इस सूचकांक के कुल 75 फीसदी रिटर्न की जिम्‍मेदार हैं.

बाकी स‍ब क्‍या बेजल है ?

गालब्रेथ कहते थे कि इस पूरे प्रपंच कुछ बडे संकट छिपे रहते हैं जो बाद में फटते हैं जैसे कि  क्रिप्‍टो कंपनियों और एक्‍सचेंज के एदीवालिया होने का अंदाज नहीं है जब दिन अच्‍छे होते हैंकारोबारों का सही मूल्‍य छ‍िपा रहता है. प्राइस डिस्‍कवरी नहीं होती. लोग समझते हैं कि पूंजी तो आ‍ती रहेगी. जब वक्‍त का पह‍िया दूसरी तरफ जाता है तो सच उभरते हैं. जांच पड़ताल होती है कारोबारी नैतिकता के सवाल उठते हैं.

बेजल का गुब्‍बारा फूट जाता है.

अदर पीपुल्‍स मनी के लेखक जॉन के कहते हैं यह बेजल बड़ा मजेदार है इसमें कई लोग एक साथ एक ही संपत्‍त‍ि का इस्‍तेमाल करते रहते हैं. उन्‍हे पता भी नहीं होता कोई दूसरा भी यही कर रहा है.

क्‍या पूरे सूचना तकनीक कारोबार में यही होता रहा है

किसे नहीं पता था कि

क्‍यों कि चैनलों चर्चाओं में सुर्ख‍ियों में रहने वाले सभी आईटी सूरमाओं को  पता था कि डिज‍टिल अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा तो हमारे खाने-पीनेपहनने-ओढ़नेखरीदने-बेचनेतलाशने-मिटानेसुनने कहने की खरबों की सूचनाओं पर केंद्रित हैइन्‍हीं की वजह से यह सेवायें मुफ्त थीं मगर हम बेचे जा रहे थे और इस कारोबार के आकाश छूते वैल्‍यूएशन बताये जा रहे थे.

यह पूरा आभासी कारोबार वास्‍तव‍िक खरीद को बढ़ाने पर केंद्र‍ित था. ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग खरीद कर सकें. अब मांग ही नहीं होगी यात्रा ही घट जाएगीाहोटल ही नहीं बुक होंगे तो इन्‍हे इन्‍हें लेकर हमारी  सूचनाओं का क्‍या होगा.

सन 2000 में चार्ली मुंगेर ने कहा था कि अगर किसी संपत्‍ति‍ का कृत्रि‍म बाजार मूल्‍य उसके वास्‍तविक आर्थ‍िक मूल्‍य से ज्‍यादा बढाते हुए इस सीमा तक ले जाया जाता है जहां उसे रखने वाले खुद को अमीर मानने लगे. स्‍टार्ट अप में यही हुआ है. मुंगेर इसे ‘फेबजल’ कहा था है. किसी कारोबार की संभावनाओं का एक मूल्‍य हो सकता है लेक‍िन जब वास्‍तविक अर्थव्‍यवस्‍था से यह पूरी तरह कट जाता है तो फिर यह पोंजी में बदल जाता है. क्र‍िप्‍टो इसका उदाहरण बन रहा है

 

सूचना तकनीक बाजार में नौक‍र‍ियों का जो कत्‍ले आम मचा है. कंपनियां जिस तरह अपने कारोबारी विस्‍तार रोक रही हैं उसके बाद असल‍ियत से बाबस्‍ता होने का वक्‍त आ गया है. देा बडे बदलाव सामने दिख रहे हैं

एक – सूचना तकनीक सेवाओं के मुफ्त का युग खत्‍म होगा. इलॉन मस्‍क यही करने जा रहे हैं. महंगाई के बीच कौन कौन ई मेल या सोशल मीड‍िया सेवाओं को पैसा देगा इससे इन कारोबारों की वास्‍तविक वैल्‍यू तय होगी. यानी गालब्रेथ और मुंगेर इनकी कारेाबारे में जमीनी आर्थि‍क सच का असर दिखेगा

दूसरा- दुनिया को बहुत जल्‍दी इस सवाल का जवाब तलाशना होगा कि क्‍या कारोबार के इस तौर तरीके और कृत्र‍िम वैल्‍यूएशन से जीडीपी को बढ़ाकर दिखाया गया. अब अगर स्‍टार्ट डूबेंगे तो क्‍या दुनिया की आर्थ‍िक विकास दर और गिरेगी?

 

तकनीकी कारोबारों की दुनिया का नया युग शुरु होता है अब ..  

 

 


Friday, December 23, 2022

ये उन दिनों की बात है


 

शाम की बात है.. डा. वाटसन ने कमरे के अंदर कदम रखा ही था कि शरलक होम्‍स बोल उठे

आज पूरा दिन आपने क्‍लब में मस्‍ती की है

डा. वाटसन ने चौकते हुए कहा कि आपको कैसे पता

आज पूरा दिन लंदन में बार‍िश हुई

इसके बीच भी अगर कोई व्‍यक्‍ति‍ साफ सुथरे जूतों और चमकते हुए हैट के साथ आता है तो स्‍वाभाविक है क‍ि वह बाहर नहीं था

डा. वाटसन ने कहा यू आर राइट शरलक

यह स्‍वाभाविक है

होम्‍स ने कहा क‍ि हमारे आस-पास बहुत से घटनाक्रम स्‍वाभाविक ही हैं लेक‍िन हम उन्‍हें पढ़ नहीं पाते

यह किस्‍सा इसलिए मौजूं है क्‍यों कि दुनिया इस वक्‍त बड़ी बेज़ार है.  मंदियां बुरी होती हैं लेक‍िन इस वक्‍त भरपूर मंदी चाहती है लेक‍िन जिससे महंगाई से पीछा छूटे मगर मंदी है कि आती ही नहीं ...

क्‍या कहीं कुछ एसा तो नहीं जो स्‍वाभाविक है मगर दिख नहीं पा रहा है. इसलिए पुराने सिद्धांत ढह रहे हैं और कुछ और ही होने जा रहा है.  

महंगाई मंदी युद्ध महामारी सबका इतिहास है लेक‍िन वह बनता अलग तरह से है. बड़ी घटनायें एक जैसी होती हैं मगर उनके ताने बाने फर्क होते हैं. मंदी महंगाई की छाया में एक नया इतिहास बन रहा है.

एश‍िया के देश चाहते हैं कि अमेरिका में टूट कर मंदी आए क्‍यों कि जब महंगाई काट रही हो तो वह मंदी बुलाकर ही हटाई जा सकती है. यानी मांग तोड़ कर कीमतें कम कराई जा सकती हैं. अमेरिका में मंदी आने देरी की वजह ब्‍याज दरें बढ़ रही हैं. डॉलर मजबूत हो रहा है बहुत से देशों के विदेशी मुद्रा भंडार फुलझडी की तरह फुंके जा रहे हैं. सरकारों का प्राण हलक में आ गया है.  

विश्‍व बैंक की जून 2022 रिपोर्ट बताती है कि सभी विकसित देशों और उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं की महंगाई उनके केंद्रीय बैंकों के लक्ष्‍य से काफी ऊपर हैं. एसा बीती सदी में कभी नहीं हुआ. ब्‍याज दरें बढ़ने एश‍िया वाले बुरी तरह संकट में हैं क्‍यों कि यहां महामारी ने बहुत तगड़े घाव किये हैं;    

अर्थशास्‍त्री कहते हैं कि ब्‍याज दरें बढ़ें तो मंदी आना तय. क्‍यों कि रोजगार कम होंगे, कंपन‍ियां खर्च कम करेंगी, बाजार में मांग टूटेगी फिर महंगाई कम होगी. पह‍िया वापसी दूसरी दिशा में घूम पड़ेगा. मंदी की मतलब है कि तीन माह लगातार नकारात्‍मक विकास दर.

अमेरिका फेडरल रिजर्व 2022 में अब तक ब्‍याज दर में तीन फीसदी यानी 300 प्रतिशतांक की बढ़ोत्‍तरी कर चुका है. दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक अब तक कुल 1570 बेसिस प्‍वाइंट यानी करीब 16 फीसदी की बढत कर चुके हैं.

 

 

इसके बाद महंगाई को धुआं धुआं हो जाना चाहिए था लेक‍िन

कुछ ताजा आंकड़े देख‍िये

-    अमेरिका में उपभोक्‍ताओं की खपत मांग सितंबर में 11 फीसदी बढ़ गई.

-    अमेरि‍का सितंबर में बेरोजगारी बढ़ने के बजाय 3.5 फीसदी कम हो गई

-    फ्रांस में मंदी नहीं आई है केवल आर्थि‍क विकास दर गिरी है.

-    जर्मनी में महंगाई 11 फीसदी पर है लेक‍िन सितंबर की तिमाही में मंदी की आशंक को हराते हुए विकास दर लौट आई

-    कनाडा में अभी मंदी के आसार नहीं है. 2023 में शायद कुछ आसार बनें

-    आस्‍ट्रेलिया में बेरोजगारी दर न्‍यूनतम है. कुछ ति‍माही में विकास दर कम हो सकती है लेक‍िन मंदी नहीं आ रही

-    जापान में विकास दर ि‍गरी है येन टूटा है मगर मंदी के आसार नहीं बन रहे

-    ब्राजील में महंगाई भरपूर है लेक‍िन जीडीपी बढ़ने की संभावना है

-    बडी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में केवल ब्रिटेन ही स्‍पष्‍ट मंदी में है 

सो किस्‍सा कोताह कि महंगाई थम ही नहीं रही. अमेरिका में ब्‍याज दर बढ़ती जानी है तो अमेरिकी डॉलर के मजबूती दुन‍िया की सबसे बड़ी मुसीबत है जिसके कारण मुद्रा संकट का खतरा है

कुछ याद करें जो भूल गए

क्‍या है फर्क इस बार .; क्‍यों 1970 वाला फार्मूला उलटा पड़ रहा है जिसके मुताबि‍क महंगी पूंजी से मांग टूट जाती है.

शरलक होम्‍स वाली बात कि कुछ एसा हुआ जो हमें पता मगर दिख नहीं रहा है और वही पूरी गण‍ित उलट पलट कर रहा है

राष्‍ट्रपति बनने के बाद फेड रिजर्व गवर्नर जीरोम पॉवेल को खुल कर बुरा भला कह रहे थे कि उन्‍होंने 2018 में वक्‍त पर ब्‍याज दरें नहीं घटाईं. फेड और व्‍हाइट हाउस के रिश्‍तों को संभाल रहे थे तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री स्‍टीवेन मंच‍ेन जो पूर्व इन्‍वेस्‍टमेंट बैंकर हैं

किस्‍सा शुरु होता है 28 फरवरी 2020 से. इससे पहले वाले सप्‍ताह में जीरोम पॉवेल रियाद में थे जहां प्रिंस सलमान दुनिया के 20 प्रमुख देशों के वित्‍त मंत्र‍ियों और केंद्रीय बैंकों का सम्‍मेलन किया था. वहां मिली सूचनाओं के आधार पर फेड ने समझ लिया था कि अमेरिकी सरकार संकट की अनदेखी कर रही है.

28 फरवरी को तब तक अमेरिका में कोविड के केवल 15 मरीज थे, दो मौतें थे. राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप इस वायरस को सामान्‍य फ्लू बता रहे थे. 28 फरवरी की सुबह जीरोम पॉवल ने वित्‍त मंत्री मंचेन के साथ अपनी नियमित मुलाकात की और उसके बाद रीजलन फेड प्रमुखों के साथ फोन कॉल का सिलस‍िला शुरु हो गया.

दोपहर 2.30 बजे जीरोम पॉवेल ने एक चार लाइन का बयान आया. जिसमें ब्‍याज दर घटाने का संकेत दिया गया था. कोविड का कहर शुरु नहीं हुआ था मगर फेड ने वक्‍त से पहले कदम उठाने की तैयारी कर ली थी. बाजार को शांति मिली.

 

इसके तुरंत बाद पॉवेल और मंचेन ने जी 7 देशों के वित्‍त मंत्र‍ियों की फोन बैठक बुला ली. यह लगभग आपातकाल की तैयारी जैसा था. तब तक अमेरिका में कोविड से केवल 14 मौतें हुईं थी लेक‍िन इस बैठक में ब्‍याज दरें घटाने का सबसे बड़ा साझा अभ‍ियान तय हो गया.

तीन मार्च और 15 मार्च के फेड ने दो बार ब्‍याज दर घटाकर अमेरिका में ब्‍याज दर शून्‍य से 0.25 पर पहुंचा दी. कोव‍िड से पहले ब्‍याज दर केवल 1.5 फीसदी था. 2008 के बाद पहली बार फेड ने अपनी नियम‍ित बैठक के बिना यह फैसले किये थे. सभी जी7 देशों में ब्‍याज दरों में रिकार्ड कमी हुई.

बात यहीं रुकी नहीं इसके बाद अगले कुछ महीनों तक फेड ने अमेरिका के इत‍िहास का सबसे बड़ा कर्ज मदद कार्यक्रम चलाया. करीब एक खरब डॉलर के मुद्रा प्रवाह से फेड ने बांड खरीद कर सरकार, बड़े छोटे उद्योग, म्‍युनिसपिलटी, स्‍टूडेंट, क्रेड‍िट कार्ड आटो लोन का सबका वित्‍त पोषण किया.

 

 

 

कोवि‍ड के दौरान अमेरिक‍ियों की जेब में पहले से ज्‍यादा पैसे थे और उद्योगों के पास पहले से ल‍िक्‍व‍िड‍िटी.

इस दौरान जब एक तरफ वायरस फैल रहा था और दूसरी तरफ सस्‍ती पूंजी.

कोविड से मौतें तो हुईं लेक‍िन अमेरिका और दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था वायरस से आर्थ‍िक तबाही से बच गईं. यही वजह थी कि कोविड की मौतों के आंकडे बढने के साथ शेयर बाजार बढ़ रहे थे. भारत के शेयर बाजारों इसी दौरान विदेशी निवेश केरिकार्ड बनाये

तो अब क्‍या हो रहा है

यह सब सिर्फ एक साल पहले की बात है और हम इस स्‍वाभाव‍िक घटनाक्रम के असर को नकार कर ब्‍याज दरें बढ़ने से महंगाई कम होने की उम्‍मीद कर रहे हैं. जबकि बाजार में कुछ और ही हो रहा है

अमेरिका में महंगाई दर के सात आंकडे सामने हैं. 1980 के बाद कभी एसा नहीं हुआ कि महंगाई सात महीनों तक सात फीसदी से ऊपर बनी रहे

 

 

मंदी को रोकने और महंगाई को ताकत देने वाले तीन कारक है सामने दिख रह हैं

जेबें भरी हैं ...

2020 में अमेर‍िका के परिवारों की नेट वर्थ यानी कुल संपत्‍त‍ि 110 खरब डॉलर थी साल 2021 में यह 142 ट्र‍िल‍ियन डॉलर के रिकार्ड पर पहुंच गई. 2022 की पहली ति‍माही में इसे 37 फीसदी की बढ़ोत्‍तरी दर्ज हुई. यह 1989 के बाद सबसे बड़ी बढ़त है. यही वह वर्ष था जब फेड ने नेटवर्थ के आंकड़े जुटाने शुरु किये थे.

संपत्‍त‍ि और समृद्ध‍ि में इस बढ़ोत्‍तरी का सबसे बड़ा फायदा शीर्ष दस फीसदी लोगों को  मिला.

 

लेक‍िन नीचे वाले भी बहुत नुकसान में नहीं रहे. आंकड़ो  के मुताबिक सबसे नीचे के 50 फीसदी लोगों की संपत्‍ति‍ जेा 2019 में 2 ट्रि‍लियन डॉलर थी अब करीब 4.4 ट्र‍िलियन डॉलर है यानी करीब दोगुनी बढ़त.

एसा शायद उन अमेरिका में रेाजगार बचाने के लिए कंपनियों दी गई मदद यानी पे चेक प्रोटेक्‍शन ओर बेरोजगारी भत्‍तों के कारण हुआ.

अमेर‍िका में बेरोजगारी का बाजार अनोखा हो गया. नौकर‍ियां खाली हैं काम करने वाले नहीं हैं.

इस आंकडे से यह भी पता चलता है कि अमेर‍िका के लोग महंगाई के लिए तैयार थे तभी गैसोलीन की कीमत बढ़ने के बावजूद उपभोक्‍ता खर्च में कमी नहीं आई है.

कंपनियों के पास ताकत है  

कोविड के दौरान पूरी दुनिया में कंपनियों के मुनाफे बढे थे. खर्च कम हुए और सस्‍ता कर्ज मिला. महंगाई के साथ उन्‍हें कीमतें बढ़ने का मौका भी मिल गया. अब कंपनियां कीमत बढाकर लागत को संभाल रही हैं निवेश में कमी नहीं कर रहीं. अमेरिका में कंपनियों के प्रॉफ‍िट मार्जिन का बढ़ने का प्रमाण इस चार्ट में दिखता है

भारत में भी कोविड के दौरान रिकार्ड कंपनियों ने रिकार्ड मुनाफे दर्ज किये थे. वित्‍त वर्ष 2020-21 में जब जीडीपीकोवडि वाली मंदी के अंधे कुएं में गिर गया तब शेयर बाजार में सूचीबद्ध भारतीय कंपन‍ियों के मुनाफे र‍िकार्ड 57.6 फीसदी बढ़ कर 5.31 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गए. जो जीडीपी के अनुपात में 2.63 फीसदी है यानी (नकारात्‍मक जीडीपी के बावजूद) दस साल में सर्वाध‍िक.

यूरोप और अमेरिका भारत से इस ल‍िए फर्क हैं कि वहां कंपनियां महंगे कर्ज के बावजूद रोजगार कम नहीं कर रही हैं. नई भर्त‍ियां जारी हैं. अमेरिका में ब्‍याज दरें बढ़ने के बाद सितंबर तक हर महीने गैर कृषि‍ रोजगार बढ़ रहे हैं यह बढ़त पांच लाख से 2.5 लाख नौकर‍ियां प्रति माह की है.

 

और कर्ज की मांग भी नहीं टूटी

सबसे अचरज का पहलू यह है कि ब्‍याज दरों में लगातार बढोत्‍तरी के बावजूद प्रमुख बाजारों में कर्ज की मांग कम नहीं हो रही है. कंपनियां शायद यह मान रही हैं कि मंदी नहीं आएगी इसलिए वे कर्ज में कमी नहीं कर रहीं. अमेरिका जापान और यूके में कर्ज की मांग 7 से 10 फीसदी की दर से बढ रही है. भारत में महंगे ब्‍याज के बावजूद कर्ज की मांग अक्‍टूबर के पहले सप्‍ताह में 18 फीसदी यानी दस साल के सबसे ऊंचे स्‍तर पर पहुंच गई है.

 

 

 

 

 

 

 

 

इसलिए एक तरफ जब दुनिया भर के केंद्रीय बैंक मंदी की अगवानी को तैयार बैठे हैं शेयर बाजारों में कोई बड़ी गिरावट नहीं है.

 

कमॉड‍िटी कीमतों में कोई तेज‍ गिरावट भी नहीं हो रही है. तेल और नेचुरल गैस तो खैर खौल ही ही रहे हैं लेकिन अन्‍य कमॉडिटी भी कोई बहुत कमजोर पड़ी हैं. ब्लूबमर्ग का कमॉडि‍टी सूचकांक सितंबर तक तीन माह में केवल चार फीसदी नीचे आ आया है.

 

 

 

 

 

तो अब संभावना क्‍या हैं

मौजूदा कारकों की रोशनी में अब मंदी को लेकर दो आसार हैं.

एक या तो मंदी बहुत सामान्‍य रहेगी

या फिर आने में लंबा वक्‍त लेगी

मंदी न आना अच्‍छी खबर है या चिंताजनक

मंदी का देर से आना यानी  महंगाई का ट‍िकाऊ होना है

तो फिर ब्‍याज दरों में बढ़त लंबी चलेगी

और डॉलर की मजबूती भी

जिसकी मार से दुनिया भर की मुद्रायें परेशान हैं

तो आगे क्‍या

दुनिया ने मंदी नहीं तो स्‍टैगफ्लेशन चुन ली है

यानी आर्थ‍िक विकास दर में गिरावट और महंगाई एक साथ

क्‍या स्‍टैगफ्लेशन मंदी से ज्‍यादा बुरी होती है ..

महंगाई क्‍यों मजबूत दिखती है 

ये नहीं तो कुछ नहीं


 

 

यूरोप के देश कई हफ्तों से यही तो सुनने के लिए व्‍याकुल थे. अगस्‍त के आख‍िरी सप्‍ताह में जर्मनी ने एलान क‍र दिया कि पुतिन का ब्‍लैकमेल नहीं चलेगा. जर्मनी में गैस के 80 फीसदी भंडार भर चुके हैं. अगले साल तक रुस निर्भरता और खत्‍म हो जाएगी.

इस एलान के वक्‍त रुस ने जर्मनी को गैस ले जाने वाली नॉर्डस्‍ट्रीम पाइपलाइन से तीन दिन तक सप्‍लाई बंद कर दी थी. सितंबर के पहले सप्‍ताह में यह आपूर्ति पूरी तरह रोक दी गई. लेक‍िन इस बीच जर्मनी ने न केवल छह माह में अपनी ऊर्जा सुरक्षा का बंदोबस्त कर ल‍िया बल्‍क‍ि महंगाई थामने के लिए महंगी बिजली के बदलने लोगों को राहत देने का पैकेज भी तैयार कर लिया.

यूक्रेन पर रुस के हमले के बाद यूरोप ने रिपॉवर ईयू कार्यक्रम प्रारंभ किया था. जिसका मकसद 2027 तक रुस पर ऊर्जा निर्भरता खत्‍म करना था. एलएनजी का आयात इस कार्यक्रम का आधार था. ाीजभी जर्मनी के द बंदरगाहों विलहेल्‍मसहैवेन और ब्रूंसबुटल, यूरोप की इस नई ताकत का आधार हैं.

विलहेल्‍मसहैवेन यह शहर नॉर्थ सी खाड़ी में जर्मनी का प्रमुख डीप वाटर बंदरगाह है जो एम्‍स और वीजर नदियों की बीच जेड डेल्‍टा में स्‍थ‍ित है ब्रूंसबुटेल भी नॉर्थ सी में एल्‍ब नदी के मुहाने पर स्‍थित है. कील नहर दुनिया का सबसे व्‍यस्‍त मानवन‍िर्मित वाटरवे यानी जलमार्ग है.

यह दोनों ही जर्मनी में आयात‍ित एलएनजी के नए केंद्र हैं. यहां जर्मनी ने चार  floating storage and regasification units (FSRUs) लगाये हैं. इन्‍हे तैरते हुए गैस टर्मिनल समझ‍िये जहां तरल एलएएनजी जमा होती है और  उसे गैस में बदला जाता है. बूंसबुटेल के दूसरी तरफ यानी एल्‍ब नदी के पास हैम्‍बर्ग के करीब पोर्ट ऑफ स्‍टेड में भी ठीक इसी तरह के टर्मिनल बन रहे हैं .बाल्‍ट‍िक तट पर ल्‍युबम‍िन में भी तैरते हुए गैस टर्मिनल एलएनजी जमा करेंगे.

एलएनजी आयात की क्षमतायें बढ़ाकर जर्मनल ने रिपॉवर ईयू

2021 में जर्मनी की जरुरत की 55 फीसदी गैस रुस से आती थी जो इस साल जून में घटकर 26 फीसदी रह गया. अब जर्मनी अगले साल तक रुस पर निर्भरता पूरी तरह खत्‍म करने की तरफ बढ़ गया है.

यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था जर्मनी की गैस में बढ़ती आत्‍मनिर्भरता यूरोप के लिए ठीक वैसा ही अवसर है जैसा कि 1970 में अमेरिका में हुआ था जब इजरायल अरब युद्ध में, इज़रायल के समर्थन पर अरब देशों ने अमेरिका का तेल का निर्यात बंद कर दिया था. इसके बाद अमेरिका ने नए ऊर्जा स्रोतों, शेल और गैस में निवेश किया. यही गैस आज पुतिन के ब्‍लैकमेल को जवाब देने के लिए यूरोप के काम भी आ रही है.

 

भारत की ऊर्जा पहेली

लौटते हैं अपने मुल्‍क की तरफ

यूरोप पूरा घटनाक्रम भारत के लिए कई जरुरी नसीहतों से लबरेज़ है. प्रधानमंत्री ने इस साल स्‍वाधीनता दिवस पर अपने संबोधन में ऊर्जा आत्‍मनिर्भरता की हुंकार लगाई. हालांकि बात उन्‍होंने इलेक्‍ट्र‍िक वाहनों के संदर्भ में की थी. इससे ज्‍यादा कुछ कहना मुश्‍कि‍ल भी था क्‍यों कि 2022 भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे निराशाजनक या कहें कि अपशकुनी साल बन गया है.

यह साल ऊर्जा की संसाधनों की खौलती कीमतों के बीच  भारत ऊर्जा सुरक्षा के कमजोर होते जाने का है. सैकड़ों सुर्ख‍ियों के बीच क्‍या हमें याद है कि 2015 में सरकार ने तय किया था आयात‍ित कच्‍चे तेल पर निर्भरता को 2022 में दस फीसदी घटा दिया जाएगा. 2022 की वह साल भी है जब भारत थर्मल कोल यानी बिजली के लिए कोयले के आयात बंद करने का एलान कर चुका था. यह एलान बीते बरस कोयला मंत्रालय के एक चिंतन श‍िविर में हुआ था, जो गुजरात के केवड़‍िया में आयोजित किया गया था.

कोयले और तेल के साथ नेचुरल गैस की आपूर्ति भी घट रही है.

सनद रहे कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा केवल रुस यूक्रेन युद्ध के कारण मुश्‍क‍िल में नहीं आई यहां तो मुसीबत पुरानी है और लंबी लंबी बातों के बीच उत्‍पादन में गिरावट बढ़ती गई है इधर लीथि‍यम, बैटरी, तकनीक, सोलर सेल्‍स और हाइड्रोजन फ्यूल के आयात पर निर्भरता के बाद पूरा ऊर्जा क्षेत्र भी आयात का मोहताज हो गया है जो विदेशी मुद्रा भंडार के ल‍िए किसी संकट की पदचाप है.

 

सबसे पहले देखते हैं कच्‍चे तेल की तरफ .. जहां कुछ चाहते थे कुछ और ही हो गया है.

 

तेल में यह क्‍या हुआ

इस साल अप्रैल से अगस्‍त के बीच भारत में कच्‍चे तेल के आयात का बिल करीब 99 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इससे पहले मार्च 2022 तक भारत का तेल आयात 2021 के मुकाबले दोगुना बढ़कर 119 अरब डॉलर हो गया था.

यदि हम इसे रुस यूक्रेन युद्ध के कारण तेल की कीमतों में लगी का आग का असर मानते हैं तो दरसअल यह रेत में सर डाल देने जैसा है.

2015 में सरकार ने लक्ष्‍य रखा था कि 2022 तक तेल आयात पर भारत की निर्भरता 87 फीसदी से घटाकर 77 फीसदी और 2030 तक 50 फीसदी कर दी जाएगी. लेक‍िन हुआ इसका उलटा. 2015 से तेल आयात पर भारत की निर्भरता बढ़ने लगी. सरकार के पेट्रोल‍ियम प्‍लानिंग एंड एनाल‍िसिस सेल के आंकड़ो के अनुसार जून 2022 में भारत अपनी जरुरत का  87 फीसदी तेल आयात करने लगा. वह भी इतनी ऊंची कीमतों पर .

 

अब आइये आपको भारत की ऊर्जा सुरक्षा के खलनायक से मिलवाते हैं. भारत में कच्‍चे तेल का घरेलू उत्‍पादन वित्‍त वर्ष 2022 में 28 साल के न्‍यूनतम स्‍तर पर आ गया.

भारत में बुनियादी उद्योगों का एक सूचकांक है जिसमें मासिक आधार पर तेल, कोयला, स्‍टील, बिजली आदि उद्योगों के उत्‍पादन वृद्धि का आकलन किया जाता है. इस सूचकांक के आधार पर बीते चार बरस से भारत का कच्‍चा तेल उत्‍पादन लगातार गिर रहा है.

ओएनजीसी सबसे बड़ा खलनायक है. दूसरी सरकारी कंपनी ऑयर इंडिया है. इन दोनों पर घरेलू उत्‍पादन का दारोमदार है. इनका उत्‍पादन लगातार गिर रहा है. ओएनजीसी में तेल उत्‍पादन का बुरा हाल है.  कंपनी का तेल उत्‍पादन बीते चार साल में करीब 10 से 16 फीसदी गिरा है. नए रिजर्व जोड़ने की रफ्तार करीब 35 फीसदी टूटी है. देश की शीर्ष तेल खोज कंपनी अपने पूंजी खर्च का इस्‍तेमाल भी नहीं कर पा रही है.

 

सरकार कंपन‍ियां ही नहीं निजी क्षेत्र के घरेलू कच्‍चे तेल उत्‍पादन में भी गिरावट आ रही है. भारत के तेल कुएं सूख रहे हैं. ड्राइ वेल्‍स सबसे बड़ी समस्‍या हैं. तेल की खोज में निवेश नहीं हुआ है इसलिए जितने भंडार थे वह निचोड़े जा चुके हैं. नए भंडार उपलब्‍ध नहीं हैं. अगर आप अपने ज़हन पर जोर डालकर बीते वर्षों में आई तेल खोज नीति यानी एनईएलपी और एचईएलपी की याद कर पूछना चाहते हैं कि उनसे क्‍या नए स्रोत नहीं मिले? तो आपको पता चले कि यह नीतियां असफलता का सबसे बड़ा स्‍मारक बन चुकी हैं

1999 से 2016 तक तेल ब्‍लॉक आवंटन की कोश‍िशें लगभग असफल रहीं. कोई बड़ी विदेशी कंपनी आई नहीं और जिन कंपन‍ियों ने लाइसेंस ल‍िये भी वह ब्‍लॉक छोड़कर निकल गईं. 2018 की तेल खोज लाइसेंस नीति में 127 ब्‍लॉक आवंट‍ित हुए हैं उत्‍पादन किसी में नहीं हो रहा है.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का आकलन है कि इलेक्‍ट्रि‍क वाहनों के आने बावजूद 2040 तक भारत में क्रूड ऑयल की मांग कम से 7 मिल‍ियन बैरल प्रत‍िद‍िन के हिसाब से बढ़ेगी.

आप खुद अंदाज लगा सकते हैं कि लगातार महंगे कच्‍चे तेल की बीत भारत की तेल आत्‍मनिर्भरता का क्‍या हश्र होने वाला है.

 

कोयले की ट्रेजडी

भारत इस साल करीब 76 मिल‍ियन टन कोयला आयात करेगा. जो बीते कई वर्षों का रिकार्ड है. भारत की 90 फीसदी बिजली थर्मल यानी कोयला आधारित है. इस साल कोयले का आयात करीब 40 फीसदी बढ़ा है. यह आयात बीते कई बरसों में कोयले की सबसे महंगी कीमत पर होगा. 

कोयले की त्रासदी, क्रूड ऑयल से ज्‍यादा दर्दनाक है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे कोयला खनन वाला देश है. पांचवा सबसे बड़ा कोयला भंडार है. बीते साल अक्‍टूबर में सरकार ने दावा किया कि कोयला उत्‍पादन बढ़ रहा है. इस साल यानी 2022 से थर्मल कोल का आयात बंद हो जाएगा लेक‍िन इस साल पूरी आपूर्ति चरमरा गई. जनवरी के बाद बिजली घर बंद होने लगे. सरकार को न केवल कोयला आयात को बढ़ावा  देना पड़ा बल्‍क‍ि देश की सबसे बड़ी कोयला उत्‍पादक कंपनी कोल इंड‍िया खुद ही इंपोर्टर होगई.

कोयले में समस्‍या उत्‍पादन की ही नहीं बल्‍क‍ि आपूर्ति और ि‍बजली घरों तक कोयला पहुंचाने की भी है. कोल इंडिया को अगले एक साल कोयला ढुलाई की क्षमताओं मसलन रेल लाइन, ढुलाई तकनीक में करीब 14000 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा

कोल इंडिया मांग का 80 फीसदी कोयला उत्‍पादन करती है लेक‍िन कंपनी का निवेश नहीं बढ़ा है. नई खदानों को खोलने का काम पिछड़ा है. करीब 39 खदानें लंबित मंजूर‍ियों की वजह से अधर में हैं. बीते पांच बरस में कोयला खदानों के निजीकरण कोश‍िश भी सफल नहीं हुई. कोयला नीति में बड़े बदलावों के बाद 2020 में करीब 40 खदानों को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया था मगर नि‍वेश नहीं आया. हाल के कोयला संकट के बाद कोल इंड‍िया ने बंद पड़ी खदानों के निजीकरण की तैयारी की थी मगर बाजार से कोई उत्‍सुकता नहीं दिखी.

गैस तो है ही नहीं

पूरी दुनिया में नेचुरल गैस की ले दे मची है. रुस यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप से लेकर चीन तक गैस की आपूर्ति बढ़ाने के नए उपायों की होड़ है. नेचुरल गैस भविष्‍य का ईंधन है सुरक्षि‍त और सस्‍ता. रिकार्ड तेजी है कीमतों में.

भारत में ऊर्जा की चर्चायें तेल से आगे नहीं निकलती,  नेचुरल गैस पर चर्चा केवल सीएनजी की कीमतें बढ़ने की वजह से होती है.

नेचुरल गैस भी सरकारों के कुछ कहने और कुछ होने का प्रमाण है. सरकार ने यह लक्ष्‍य रखा था कि भारत की ऊर्जा आपूर्ति में गैस का हिस्‍सा 2030 तक आज के 6.4 फीसदी  से बढ़ाकर 15% किया जाएगा.

अलबत्‍ता बीते एक दशक में भारत में नेचुरल गैस का उत्‍पादन लगातार गिर रहा है. 2013 में यह 39 एमएमएससीएम था जो अब 33 एमएमएससीएम है जबकि मांग दोगुानी बढ़कर 63MMSCM पर पहुंच गई. यहां भी उत्‍पादन की खलनायक ओनएनजीसी है जो करीब 61 फीसदी उत्‍पादन करती है.

आयात पर निर्भरता बढ़ रही है क्‍यों कि उर्वरक, बिजली, परिवहन और घरेलू आपूर्ति की मांग सालाना करीब 10 फीसदी की गति से बढ रही है. मांग की आधी गैस आयात होती है. रुस यूक्रेन युद्ध और दुनिया में गैस की कीमतें बढ़ने के बाद भारत की प्रमुख गैस कंपनी को आयात में दिक्‍कत होने लगी. रुस की कंपनी गैजप्रॉम आपूर्ति का प्रमुख स्रोत थी जिस पर प्रत‍िबंध लगा हुआ है.

भारत में एलएनजी टर्मिनल हैं लेक‍िन गैस नहीं है. बीते बरस इन टर्मिनल की केवल 59 फीसदी क्षमता का उपयोग हो सका था. एलएनजी आयात की लागत बढ़ रही है. कीमतों को लेकर तस्‍वीर साफ नहीं होती क्‍येां कि सरकार हर छह माह में कीमतों पर फैसला करती है इसलिए आयात भी कम है.

 

भारत में नए एलएनजी टर्म‍िनल बन रहे हैं. जिनमें बैकों का बड़ा निवेश फंसा है लेक‍िन गैस कहां से आएगी इसकी यह पता नहीं है. यूरोप में गैस की मांग बढ़ने के बाद मध्‍य पूर्व ने अपनी आपूर्ति यूरोप की तरफ मोड़ दी है, भारत को नए स्रोत नहीं मिल रहे हैं

 

नए चुनौतियां

भारत की इलेक्‍ट्र‍िक वाहनों की फैशनेबल चर्चाओं से गुलजार है. हाइड्रोजन और सोलर ऊर्जा की उडाने हैं. बैटरी को लेकर भारत के पास कच्‍चा माल और तकनीक दोनों नहीं है. जबकि बैटरी के ईंधन जैसे लीथि‍यम, कोबाल्‍ट की कीमतें बढ रही हैं. बैटरी तकनीक का आयात ही एक रास्‍ता है. भारत इस साल करीब 13000 करोड़ रुपये के लीथियम का इंपोर्ट करेगा.

यह है सबसे कठिन पहेली

अगले 25 वर्षों में विकस‍ित देश बनने के लक्ष्‍य रखने वाले शायद ऊर्जा सुरक्षा पर बात करने से कतराते हैं. यह भारत की विकास की कोश‍िशों का सबसे बड़ा गर्त है.

ऊर्जा के आइने में आत्‍मनिर्भरता को तो छोड़ि‍ये और छोड़‍िये ग्रोथ की छलांग को यहां तो एक कामचलाऊ विकास दर के लिए भी सस्‍ती ऊर्जा का टोटा होने वाला है.

भारत  दो राहे पर है.

लाख कोश‍िशों के बावजूद भौगोलिक तौर पर भारत के पास बड़े ऊर्जा स्रोत नहीं हैं, चाहे तेल गैस हो या बैटरी खनिज. इसे आयात से ही काम चलेगा. जहां कीमतें नई ऊंचाई पर हैं. कार्टेल हैं और सस्‍ता होने की गुंजायश नहीं है. ऊपर से टूटता घरेलू मुद्रा आयात महंगा करती जाएगाी

दूसरी तरफ बिजल और बिजली चलित वाहनों के लिए कोयला है लेक‍िन तो उसकी निकासी, आपूर्ति पर भारी निवेश चाहिए. इसके बाद पर्यावरण के ल‍िए सुरक्ष‍ित बनाना होगा जो बहुत महंगा सौदा है.

भारत की सरकारें फिलहाल तात्‍कालिक उपायों या सपनों उड़ान में लगी हैं. ऊर्जा सुरक्षा की पूरी नीति पर नये सिरे से तैयारी चाहिए. हम आज के यूरोप या 1970 के अमेरिका से सीख सकते हैं सनद रहे भारत के आर्थ‍िक विकास की गति में स्‍थायी ऊर्जा महंगाई का पत्‍थर बंध चुका है. यह हमें दौड़ने तो दूर तेज चलने भी नहीं देगा.