Friday, January 8, 2021

एक और अवसर

 


यह जो आपदा में अवसर नाम का मुहावरा है न, इसका मुलम्मा चाहे बिल्कुल उतर चुका हो लेकिन फिर भी आपदाओं को सलाम कि वे अवसर बनाने की ड‍्यूटी से नहीं चूकतीं.

आपको वैक्सीन कब तक मिलेगी और किस कीमत पर यह इस पर निर्भर होगा कि भारत का कल्याणकारी राज्य कितना कामयाब है? वेलफेयर स्टेट के लिए यह दूसरा मौका है. पहला अवसर बुरी तरह गंवाया गया था जब लाखों प्रवासी मजदूर पैदल गिरते-पड़ते घर पहुंचे थे और स्कीमों-संसाधनों से लंदी-फंदी सरकार इस त्रासदी को केवल ताकती रह गई थी.

विज्ञान और फार्मा उद्योग अपना काम कर चुके हैं. ताजा इतिहास में दुनिया का सबसे बड़ा सामूहिक वैक्सिनेशन या स्वास्थ्य परियोजना शुरू हो रही है. सवाल दो हैं कि एक, अधिकांश लोगों को आसानी से वैक्सीन कब तक मिलेगी और दूसरा, किस कीमत पर?

इनके जवाब के लिए हमें वैक्सीन राष्ट्रवाद से बाहर निकल कर वास्तविकता को समझना जरूरी है, ताकि वैक्सीन पाने की बेताबी को संभालते हुए हम यह जान सकें कि भारत कब तक सुरक्षित होकर आर्थिक मुख्यधारा में लौट सकेगा.

क्रेडिट सुइस के अध्ययन के मुताबिक, भारत को करीब 1.66 अरब खुराकों की जरूरत है.

विज्ञान और उद्योग ने वैक्सीन प्रोजेक्ट पूरा कर लिया है. भारत में करीब 2.4 अरब खुराकें बनाने की क्षमता है. इसके अलावा सिरिंज, वॉयल, गॉज आदि की क्षमता भी पर्याप्त है. पांच कंपनियां (अरबिंदो फार्मा, भारत बायोटेक, सीरम इंस्टीट्यूट, कैडिला और बायोलॉजिकल ई) इसका उत्पादन शुरू कर चुकी हैं. भारत के पास उत्पादन की क्षमता मांग से ज्यादा है. अतिरिक्त उत्पादन निर्यात के लिए है.

जब पर्याप्त वैक्सीन है तो समस्या क्या? सबसे बड़ी चुनौती वितरण तंत्र की है. जिन वैक्सीनों का प्रयोग भारत में होना है उन्हें 2 से -8 डिग्री पर सुरक्षित किया जाना है. चार कंपनियां, स्नोमैन, गतिकौसर, टीसीआइएल और फ्यूचर सप्लाइ चेन के पास यह कोल्ड स्टोरेज और परिहवन की क्षमता है. लेकिन वे अधिकतम 55 करोड़ खुराकों का वितरण संभाल सकती हैं जो भारत की कुल मांग के आधे से कम है.

यह कंपनियां टीकाकरण के अन्य कार्यक्रमों को सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं. वितरण की क्षमता बढ़ाए जाने की गुंजाइश कम है क्योंकि कोविड के बाद यह क्षमता बेकार हो जाएगी. अगर सब कुछ ठीक चला तो भी इस साल भारत में 40 से 50 करोड़ लोगों तक वैक्सीन पहुंचना मुश्किल होगा.

सरकारी और निजी आकलन बतात है कि वैक्सीन देने (दो खुराक) के लिए सरकारी व निजी स्वास्थ्य नेटवर्क के करीब एक करोड़ कर्मचारियों की जरूरत होगी. यानी नियमित स्वास्थ्य सेवाओं के बीच वैक्सीन के लिए लंबी कतारों की तैयारी कर लीजिए.

टीका लगने के बाद बात खत्म नहीं होती. उसके बाद ऐंटीबॉडी की जांच कोरोना वैक्सीन के शास्त्र का हिस्सा है. यानी फिर पैथोलॉजिकल क्षमताओं की चुनौती से रू--रू होना पड़ेगा.

भारत के मौजूदा वैक्सीन कार्यक्रम बच्चों के लिए हैं और सीमित व क्रमबद्ध ढंग से चलते हैं. यह पहला सामूहिक एडल्ट वैक्सीन कार्यक्रम है जिसमें कीमत और वितरण की चुनौती एक-दूसरे से गुंथी हुई हैं. यदि सरकार बड़े पैमाने पर खुद सस्ती वैक्सीन बांटती है तो वितरण की लागत उसे उठानी होगी. भारी बजट चाहिए यानी सबको वैक्सीन मिलने में लंबा वक्त लगेगा. सब्सिडी के बगैर वितरण लागत सहित दो खुराकों की कीमत करीब 5,000 रुपए तक होगी, हालांकि वितरण तंत्र पर्याप्त नहीं है. यानी कोरोना की संजीवनी उतनी नजदीक नहीं है जितना बताया जा रहा है. 

स्वास्थ्यकर्मियों के बाद वैक्सीन पाने के लिए 50 साल से अधिक उम्र के लोगों के चुनने के पैमाने में पारदर्शिता जरूरी है. वैक्सीन वितरण को भारत केवीआइपी पहलेसे बचाना आसान नहीं होगा. 

 मुमकिन है कि क्षमताओं व संसाधनों की कमी से मुकाबिल सरकार यह कहती सुनी जाए कि सबको वैक्सीन की जरूरत ही नहीं है लेकिन उस दावे पर भरोसा करने से पहले यह जान लीजिएगा कि भारत में कोविड पॉजिटिव का आंकड़ा संक्रमण की सही तस्वीर नहीं दिखाता है. अगस्त से सितंबर के बीच 21 राज्यों के 70 जिलों में हुए सीरो सर्वे के मुताबिक, कोविड संक्रमण, घोषित मामलों से 25 गुना ज्यादा हो सकता है. यानी वैक्सीन की सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं है.

भारत की वैक्सीन वितरण योजना को अतिअपेक्षा, राजनीति और लोकलुभावनवाद से बचना होगा. यह कार्यक्रम लंबा और कठिन है. सनद रहे कि केवल 27 करोड़ की आबादी वाला इंडोनेशिया अगले साल मार्च तक अपने 50 फीसद लोगों को टीका लगा पाएगा.

हमें याद रखना चाहिए कि भारत अनोखी व्यवस्थाओं वाला देश है जो कुंभ मेले जैसे बड़े आयोजन तो सफलता से कर लेता है लेकिन लाखों प्रवासी श्रमिकों को घर नहीं पहुंचा पाता या सबको साफ पानी या दवा नहीं दे पाता. इसलिए वैक्सीन मिलने तक 2020 को याद रखने में ही भलाई है.

Friday, January 1, 2021

तकनीक की तिजोरी

 


लॉकडाउन के साथ ही सुयश की पढ़ाई छूट गई, न स्मार्ट फोन न इंटरनेट.

दिल्ली की दमघोंट सुबहों में घरों में काम करने वाली उसकी मां खांसते हुए बताती है कि साहब के घर पानी ही नहीं, हवा साफ करने की मशीन भी है. काम तलाश रहे सुयश के पिता को यह तो मालूम है कि आने वाले दिनों में कोविड वैक्सीन लगे होने की शर्त पर काम मिलने की नौबत आ सकती है लेकिन यह नहीं मालूम कि वह अपने पूरे परिवार के लिए कोविड वैक्सीन खरीद भी पाएंगे या नहीं.

कोविड के बाद की दुनिया में आपका स्वागत है.

21वीं सदी का तीसरा दशक सबसे पेचीदा उलझन के साथ शुरू हो रहा है. महामारी के बाद की इस दुनिया में तकनीकों की कोई कमी नहीं है. लेकिन बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होगी जो जिंदगी बचाने या बेहतर बनाने की बुनियादी तकनीकों की कीमत नहीं चुका सकते. जैसे कि भारत में करीब 80 फीसद छात्र लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं में हिस्सा नहीं (ऑक्सफैम सर्वेक्षण) ले सके.

फार्मास्यूटिकल उद्योग ने एक साल से भी कम समय में वैक्सीन बनाकर अपनी क्षमता साबित कर दी. करोड़ों खुराकें बनने को तैयार हैं. लेकिन बहुत मुमकिन है कि दुनिया की एक बड़ी आबादी शायद कोविड की वैक्सीन हासिल न कर पाए. महंगी तकनीकों और उन्हें खरीदने की क्षमता को लेकर पहले से उलझन में फंसे चिकित्सा क्षेत्र के लिए वैक्सीन तकनीकी नहीं बल्कि आर्थि-सामाजिक चुनौती है. भारत जैसे देशों में जहां सामान्य दवा की लागत भी गरीब कर देती हो वहां करोड़ों लोग वैक्सीन नहीं खरीद पाएंगे और कितनी सरकारें ऐसी होंगी जो बड़ी आबादी को मुफ्त या सस्ती वैक्सीन दे पाएंगी.

वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां पेटेंट के नियमों पर अड़ी हैं. रियायत के लिए डब्ल्यूटीओ में भारत-दक्षिण अफ्रीका का प्रस्ताव गिर गया है. कोवैक्स अलायंस और ऐस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के सस्ते होने से उम्मीद है लेकिन प्रॉफिट वैक्सीन बनाम पीपल्स वैक्सीन का विवाद अभी सुलझा नहीं है.

विकासशील देशों को सस्ती वैक्सीन मिलने की उम्मीद कम ही है. सरकारें अगर लागत उठाने लगीं तो बजट ध्वस्त, नया भारी कर्ज और नए टैक्स. ऊपर से अगर इन देशों को वैक्सीन देर से मिली तो अर्थव्यवस्थाओं के उबरने में समय लगेगा.

वैक्सीन का विज्ञान तो जीत गया लेकिन अर्थशास्त्र बुरी तरह फंस गया है. 

आरोग्य सेतु ऐप की विफलता और लॉकडाउन के दौरान बढ़ी अशिक्षा के बीच करीबी रिश्ता है. भारत में अभी भी करीब 60 फीसद फोन स्मार्ट नहीं हैं यानी फीचर फोन हैं. आरोग्य सेतु अपने तमाम विवादों के अलावा इसलिए भी नहीं चल सका कि शहर से गांव गए अधिकांश लोग के पास इस ऐप्लिकेशन को चलाने वाले फोन नहीं थे.

जिस ऑनलाइन शिक्षा को कोविड का वरदान कहा गया उसने 80 फीसद भारतीय छात्रों एक साल पीछे कर दिया, क्योंकि या तो उनके पास स्मार्ट फोन नहीं थे या इंटरनेट. ग्रामीण इलाकों में बमुश्कि 15 फीसद लोगों के पास ही नेट कनेक्टिविटी है. भारत की आधी आबादी के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है. और यदि उन्हें इंटरनेट मिल भी जाए तो केवल 20 फीसद लोग डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल (सांख्यिकी मंत्रालय) कर सकते हैं.

मुसीबत तकनीक की नहीं बल्किउसे खरीदने की क्षमता है. इसलिए दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में एक दिल्ली में अधिकांश आबादी उन लोगों की तुलना में पांच से दस साल कम (न्यूयार्क टाइम्स का अध्ययन) जिएंगे जिनके पास एयर प्यूरीफायर हैं. 

अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष आर्थिक बेहतरी मापने के लिए एक नए सूचकांक का इस्तेमाल कर रहा है जिसे वेलफेयर मेज़र इंडेक्स कहते हैं. उपभोग, खपत, जीवन प्रत्याशा, मनोरंजन और खपत असमानता इसके आधार हैं. 2002 से 2019 के बीच भारत जैसे विकासशील देशों की वेलफेयर ग्रोथ करीब 6 फीसद रही है जो उनके प्रति व्यक्तिवास्तविक जीडीपी से 1.3 फीसद ज्यादा है यानी कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया.

कोविड के बाद इस वेलफेयर ग्रोथ में 8 फीसद की गिरावट आएगी. यानी जिंदगी बेहतर करने पर खर्च में कमी होगी. 

चिकित्सा, शिक्षा, पर्यावरण, संचार में तकनीकों की कमी नहीं है लेकिन इन्हें सस्ता करने के लिए बड़ा बाजार चाहिए लेकिन आय कम होने और गरीबी बढ़ने से बाजार सिकुड़ रहा है इसलिए जिंदगी बचाने और बेहतर बनाने की सुविधा बहुतों को मिल नहीं पाएंगी.

यह नई असमानता की शुरुआत है. यहीं नहीं कि कोविड के दौरान कंपनियों की कमाई बढ़ी और रोजगार कम हुए बल्कि अप्रैल से जुलाई के बीच भारत के अरबपतियों की कमाई में 423 अरब डॉलर का इजाफा हो गया.

तकनीकों की कमी नहीं है. अब, सरकार को लोगों की कमाई बढ़ाने के ग्लोबल प्रयास करने होंगे नहीं तो बहुत बड़ी आबादी आर्थिक असमानता की पीठ पर बैठकर तकनीकी असमानता की अंधी सुरंग में उतर जाएगी, जिसके बाद तेज ग्रोथ लंबे वक्त के लिए असंभव हो जाएगी. कोविड के बाद जिन नई तकनीकों में भविष्य देखा जा रहा है वह भविष्य केवल मुट्ठी भर लोगों का हो सकता है.

 

Friday, December 25, 2020

हंगामा है यूं बरपा

 


अब से दो साल पहले दिसंबर 2018 में जब गूगल प्रमुख सुंदर पिचाई एकाधिकार के मामले में अमेरिकी कानून निर्माताओं के कठघरे में थे उस दौरान जारी हुए फोटो और वीडियो ने लोगों को चौंका दिया. कांग्रेस की सुनवाई के दौरान पिचाई के पीछे तीसरी पंक्ति में काली टोपी वाले मुच्छड़ रिच अंकल पेनीबैग्स नजर आ रहे थे जो मशहूर मोनोपली गेम के प्रतीक पुरुष हैं. उनकी मौजूदगी किसी फोटोशापीय कला का नमूना नहीं था. अमेरिका के एक वकील ग्रीडी मोनोपली मैन की वेशभूषा में, इस मामले की प्रत्येक सुनवाई में बाकायदा ठीक उस जगह मौजूद रहे थे जहां से वह तस्वीरों का हिस्सा बन सकें और लोगों को बाजार का विद्रूप और एकाधि‍कारवादी चेहरा नजर आता रहे. 

संयोग ही है कि बीते सप्ताह जब विश्व की सबसे बड़ी तकनीकी मोनोपली यानी गूगल और फेसबुक पर अमेरिका में ऐंटीट्रस्ट (प्रतिस्पर्धा खत्म करने) कानून की कार्रवाई शुरू हुई तब उसी दौरान भारत में भी बहुत से लोग सुधारों के फैसलों के पीछे किसी कॉर्पोरेट मुच्छड़ मैन का अक्स देख रहे थे. 

उदारीकरण और मुक्त बाजार ने भारत में सबसे कम समय में सर्वाधि‍क आबादी की गरीबी दूर की है, इसलिए इस पर उठते शक-शुबहे गहरी पड़ताल की मांग करते हैं. 

निजीकरण, निजी भागीदारी, मुक्त बाजार पर शक बेवजह नहीं है. बाजार पर भरोसा दो ही वजह से बनता है. एक, रोजगार यानी कमाई या आय बढ़ने से और दूसरा, उत्पादन का सही मूल्य मिलने से. इन्हीं दोनों वजह से पूंजीवाद को सबसे अधिक सफलता मिली है, इस व््यवस्था में बाजार सबको अवसर देता है और सरकार संकटों के समाधान करती है. बाजार इसके बदले कीमत वसूलता है और सरकार टैक्स. 

बाजारों के सबसे बुरे दिनों का नाम ही मंदी है. नौकरियां खत्म होती हैं. कर्ज डूबने लगते हैं और सरकार से राहत मांगी जाने लगती है. और तब बाजार लोगों का तात्कालिक शत्रु बन जाता है. भारत में भी बाजार इस समय खलनायक है लेकिन दंभ और आत्ममुग्धता में सरकार उसे संकटमोचक बनाकर पेश कर रही है. लोग बुरी तह चिढ़ रहे हैं.

भारत में कंपनियों के रिकॉर्ड मुनाफों के बीच रिकॉर्ड बेरोजगारी है. इसी बीच सरकार ने कंपनियों को नौकरियां लेने की ताकत से (श्रम सुधार) से लैस कर दिया. 

किसानों को आय में बढ़ोतरी के लिए सीधी मदद चाहिए न कि उन्हें उस बाजार के हवाले कर दिया जाए तो खुद मंदी का मारा है.

निजीकरण में कोई खोट नहीं लेकिन चौतरफा बेकारी के बीच जीविका को लेकर डर लाजिमी है. खासतौर पर जब लोग देख रहे हैं कि कुछ निजी कंपनियां बाजारों  पर कब्जा कर रही हैं.

महामंदी और महामारी एक साथ सबसे बड़ी मुसीबत है. महामारी सरकारों की साख पर भारी पड़ती है क्योंकि दुनिया की कोई सरकार महामारियों से निबट नहीं सकती. महामंदी बाजार की साख तोड़ देती है इसलिए दुनिया की तमाम सरकारें कंपनियों को रोजगार बचाने के लिए बजट से पैसे दे रही हैं ताकि बाजार और लोगों के बीच विश्वास को बना रहे. 

मशहूर अर्थविद् जॉन मेनार्ड केंज ने 1930 की महामंदी के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट को लिखा थाःआपकी चुनौती दोहरी है. मंदी से भी उबारना है और सुधार भी होने हैं जो अर्से से लंबित हैं. मंदी से मुक्ति के लिए तेज और तत्काल नतीजे चाहिए. सुधारों में जल्दबाजी मंदी से उबरने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती, जिससे सरकार की नीयत पर शक बढ़ेगा और लोगों का भरोसा टूटेगा.’

सरकार के सलाहकारों पता चले कि प्रत्येक सुधार 1991 वाला नहीं होता. बीते ढाई दशक में लोगों में आर्थिक सुधारों के फायदों और नुक्सानों की समझ बनी है. मंदी की चोट खाए लोग आय और जीवन स्तर में ठोस बेहतरी समझ कर सुधार स्वीकार कर पाएंगे. इसके लिए सुधारों का क्रम ठीक करना होगा.

भारत में बाजार और लोगों के रिश्ते बीते दो-तीन साल से काफी बदले हैं. जनवरी 2020 में एडलमैन के मशहूर ग्लोबल ट्रस्ट बैरोमीटर सर्वे ने बताया था कि भारत, दुनिया के उन 28 प्रमुख बाजारों में पहले नंबर पर था जहां सबसे बड़ी संख्या में (74 फीसद) लोग बाजार और पूंजीवाद से निराश हैं. यानी कि कोरोना की विपत्तिसे पहले ही बाजार से लोगों का भरोसा उठने लगा था जिसकी बड़ी वजह आय में कमी और बेकारी थी.

सनद रहे कि अच्छे सुधार बाजार को ताकत देते हैं जबकि खराब सुधार बाजार की पूरी ताकत कुछ हाथों में थमा देते हैं. यह सुनिश्चित करना होगा कि सुधारों के पीछे वाल स्ट्रीट मूवी का प्रसिद्ध गॉर्डन गीको नजर न आए जो कहता था कि लालच के लिए कोई दूसरा बेहतर शब्द नहीं है इसलिए लालच अच्छा है.

भारत के आर्थिक सुधार संवेदनशील मोड़ पर हैं. 2020 बाजार के प्रति गुस्से के साथ बिदा हो रहा है. मुक्त बाजार को खलनायक बनने से रोकना होगा. गुस्साए लोग सरकार तो बदल सकते हैं, बाजार नहीं. मुक्त बाजार पर विश्वास टूटा तो सब बिखर जाएगा क्योंकि कोई सरकार कितनी भी बड़ी हो, वह बाजार से मिल रहे अवसरों का विकल्प नहीं हो सकती.

 

Friday, December 18, 2020

बेदम हुए बीमार ...

 


इतिहास के किसी भी काल खंड में, किसी भी सरकार के मातहत यह कल्पना नहीं की गई होगी कि भारत में लोग 90 रुपए लीटर का पेट्रोल खरीदेंगे, जबकि कच्चे तेल कीमत मंदी के कुएं (प्रति बैरल 50 डॉलर से भी कम) में बैठी हो. भयानक मंदी और मांग के सूखे के बीच कंपनियां अगर कीमतें बढ़ाने लगें तो आर्थिक तर्क लड़खड़ा जाते हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन याद आते हैं कि हमारा कुल इतिहास सरकारों की सूझबूझ का लेखा-जोखा है.

मंदी से दुनिया परेशान है लेकिन भारत के इतिहास की सबसे खौफनाक मंदी के नाखूनों में बढ़ती कीमतों का जहर भरा जा रहा है. आर्थिक उत्पादन के आंकड़े मांग की तबाही के सबूत हैं, बेकारी बढ़ रही है और वेतन घट रहे हैं फिर भी खुदरा महंगाई छह माह के सर्वोच्च स्तर पर है. यहां तक कि रिजर्व बैंक को कर्ज सस्ता करने की प्रक्रिया रोकनी पड़ी है.

आखिर कहां से आ रही है महंगाई?

कुछ अजीबोगरीब सुर्खियां! सीमेंट छह महीने में 7 फीसद (दक्षिण भारत में बढ़ोतरी 18 फीसद) महंगा हो चुका है. दो माह में मिल्क पाउडर (पैकेटबंद दूध का आधार का स्रोत) की कीमतें 20 फीसद बढ़ी हैं यानी दूध महंगा होगा. वोडाफोन आइडिया ने फोन दरों में 6 से 8 फीसद की बढ़ोतरी की है. अब अन्य कंपनियों की बारी है. 2020 में चौथी बार मोबाइल फोन सेट की कीमत बढ़ने वाली है. डीजल महंगा होने से ट्रकों के किराए 10-12 फीसद तक बढ़ चुके हैं.

बीते छह महीने में स्टील 30 फीसद, एल्युमिनियम 40 फीसद और तांबा 70 फीसद महंगा हुआ है. खाद्य महंगाई तो थी ही, बुनियादी धातुओं की कीमत और ट्रकों का भाड़ा बढ़ने के कारण फैक्ट्री महंगाई ने बढ़ना शुरू कर दिया है.

मांग की अभूतपूर्व कमी के बीच भी कीमतें इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि...

कंपनियों को अर्थव्यवस्था में ग्रोथ जल्दी लौटने की उम्मीद नहीं है. अब जो बिक रहा है उसे महंगा कर घाटे कम किए जा रहे हैं इसलिए कच्चे माल से लेकर उत्पाद और सेवाओं तक मूल्यवृद्धि का दुष्चक्र बन रहा है

आत्मनिर्भरता जब आएगी तब आएगी लेकिन असंख्य उत्पादों पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर और आयात में सख्ती से सरकार ने लागत बढ़ा दी है.

सरकार के लिए भी यह महंगाई ही अकेली उम्मीद है. जीएसटी के मासिक संग्रह में दिख रही बढ़ोतरी बिक्री नहीं, कीमतें बढ़ने से आई है क्योंकि अधिकांश उत्पादों पर मूल्यानुसार (एडवैलोरैम) टैक्स लगता है. अप्रैल से अक्तूबर के बीच सभी टैक्सों का संग्रह घटा है जो मांग और आय टूटने का सबूत है. बढ़त केवल पेट्रो उत्पाद पर लगने वाले टैक्स (40 फीसद) में हुई है.

इतनी महंगाई से सरकार का काम नहीं चलेगा. जीएसटी का घाटा पूरा करने के लिए जो कर्ज लिए गए हैं, उन्हें चुकाने के लिए राज्य स्तरीय टैक्स व बिजली-पानी की दरें बढ़ेंगी.

महंगाई खपत खत्म करती है. भारत का 55 फीसद जीडीपी आम लोगों की खपत से आता है जो वर्तमान मूल्यों पर करीब 153 लाख करोड़ रुपए है. क्रिसिल का आकलन है कि अगर खुदरा महंगाई एक फीसद बढ़े तो जीने की लागत 1.53 लाख करोड़ रुपए बढ़ जाती है.

महंगाई गरीबी की दोस्त है, बचत की दुश्मन है. खाद्य महंगाई एक फीसदी बढ़ने से खाने पर खर्च करीब 0.33 लाख करोड़ रुपए बढ़ जाता है. समझना मुश्किल नहीं कि बेरोजगारी और कमाई टूटने के बीच कम आय वाले लोग महंगाई से किस कदर गरीब हो रहे होंगे.

बचत पर भी हम कमा नहीं, गंवा रहे हैं क्योंकि बैंकों में एफडी (मियादी जमा) पर औसत ब्याज दर (4.5-5.5 फीसद) महंगाई दर से करीब दो से ढाई फीसद कम है. सनद रहे कि खुदरा महंगाई दर आठ फीसद के करीब है.

इस बेहद मुश्किल वक्त में जब सरकारें जिंदगी के दर्द कम करने की कोशिश करती हैं तब भारत यह साबित कर रहा है अगर इस समय कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल हो जाए तो मौजूदा टैक्स पर पेट्रोल 150 रुपए प्रति लीटर हो जाएगा.

1970 से पहले तक स्टैगफ्लेशन यानी मंदी और महंगाई की जोड़ी आर्थिक संकल्पनाओं से भी बाहर थी क्योंकि कीमतें मांग-आपूर्ति का नतीजा मानी जाती थीं. 1970 के दशक में राजनैतिक कारणों (इज्राएल को अमेरिका के समर्थन पर तेल उत्पादक देशों का बदला) से तेल की आग भड़कने के बाद पहली बार यह स्थापित हुआ कि अगर ईंधन महंगा हो जाए तो मंदी और महंगाई एक साथ भी आ सकती हैं. तब से आज तक स्टैगफ्लेशन की संभावनाओं में ईंधन की कीमत को जरूरी माना गया था. लेकिन भारत यह साबित कर रह रहा है, बेहद सस्ते कच्चे तेल और मजबूत रुपए (सस्ते आयात) के बावजूद भारी टैक्स और आर्थिक कुप्रबंध से मंदी के साथ महंगाई (स्टैगफ्लेशन) की मेजबानी जा सकती है.

पीठ मजबूत रखिए, महामंदी लंबी चलेगी क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था अब  खाद्य, ईंधन, फैक्ट्री और नीतिगत चारों तरह की महंगाई की मेजबानी कर रही है.

 

Friday, December 11, 2020

धुआं-सा यहां से उठता है


एक गांव के लोग भरपूर पैदावार के बाद भी गरीब होते जा रहे थे. मांग थी नहीं, सो कीमत नहीं मिलती थी. निजाम ने कहा बाजार में नए कारोबारी आएंगे. लोग समझ नहीं पाए कि समस्या मांग की कमी है या या व्यापारियों की? भ्रम फैला, सब गड्मड् हो गया. हैरां थे अपने अक्स पे घर के तमाम लोग, शीशा चटख गया तो हुआ एक काम और.

कृषिबिलों की बहस यह है कि किसान बाजार में अपना नुक्सान बढ़ते जाने को लेकर आशंकित हैं. केंद्र सरकार समझा नहीं पा रही है कि निजी कंपनियों के आने या कॉन्ट्रेक्ट खेती से किसानों की आय कैसे बढ़ेगी?

उत्पादन और बाजार से रिश्ता ही असली है, बाकी सब मोह-माया है. इस मामले में भारतीय खेती 2012 से ज्यादा बुरे हाल में है. तब आ रही कंपनियां, कम से कम, सप्लाइ चेन, प्रोसेसिंग, कोल्ड चेन में निवेश कर एक विशाल रिटेल मार्केट बनाकर किसानों के लिए बाजार बनाने का वादा तो कर रहीं थीं लेकिन अब तो जिनबड़ोंके लिए तंबू ताना जा रहा है, पता नहीं वे आएंगे भी नहीं या नहीं.

समझना जरूरी है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फूड फैक्ट्री (सबसे बड़ा अनाज, फल-सब्जी-मछली उत्पादक, दूध उत्पादक, सबसे बड़ी मवेशी आबादी और 95.2 अरब अंडों का सालाना उत्पादन) गरीबी ही क्यों पैदा करती है.

वोट की गरज से सरकारें समर्थन मूल्य के जरिए खूब उगाने का लालच देती है और फिर कुल उपज का केवल 13 फीसद हिस्सा खरीदकर बाजार बिगाड़ देती हैं. बची हुई उपज समर्थन मूल्य से काफी कम कीमत पर बिकती है. 2014 के बाद खेती चिरंतन मंदी में है, आय घट रही है. गांवों में मुसीबत है, यह सरकार भी मानती है.

80 फीसद किसान एक एकड़ से कम जोत वाले हैं, समर्थन मूल्य तो दूर वे क्या खाएं और क्या बेचें, इसी में निबट जाते हैं. गांवों में 60 फीसद आय गैर खेती कामों से आती है.

खाद्य बाजार निन्यावे के फेर में है. न निवेश है, न किसानों को सही कीमत और न ही उपभोक्ताओं को अच्छे उत्पाद.

उपज की अंतरराज्यीय बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं है. पहाड़ के फल, केरल का नारियल और उत्तर प्रदेश का आलू पूरे देश में मिलता है. समस्या दरअसल सही कीमत की है, जिसके लिए देश के भीतर प्रसंस्कृत खाद्य की मांग बढ़ानी होगी या फिर निर्यात. दोनों ही मामलों में सरकारों ने बाजार के पैरों पर पूरी कलाकारी से कुल्हाड़ी मारी है. 

1991 के बाद फूड प्रोसेंसिग की संभावनाएं सुनते-सुनते कान पक गए लेकिन भारत में कुल उपज का केवल 10 फीसद (प्रतिस्पर्धा देशों में 40-50) हिस्सा प्रोसेस होता है. इसमें भी अधिकांश प्राइमरी प्रोसेसिंग है, जैसे, धान से चावल, आलू, मछली और मीट को ठंडा रखना आदि. कीमत और कमाई बढ़ाने वाली प्रोसेसिंग नगण्य है.

135 करोड़ की आबादी में खाद्य प्रसंस्करण यह हाल इसलिए है क्योंकि एकटैक्स व लागतों के कारण प्रोसेस्ड फूड महंगा है, और पहुंच से बाहर है. दोखाने की आदतें फर्क हैं. 

कुल औद्योगिक इकाइयों में 15 फीसद खाद्य उत्पाद (इंडस्ट्री सर्वे 2016-17, सीआइआइ फूड प्रो रिपोर्ट 2019) बनाती हैं और उनमें भी 93 फीसद छोटे उद्योग हैं. 45 में केवल एक मेगा फूड पार्क शुरू हो पाया है. प्रोसेसिंग से कीमत और कमाई बढ़ती है, मांग नहीं हो तो कंपनियां आगे नहीं आतीं.

कमाई बढ़ाने का दूसरा विकल्प विदेश का बाजार यानी निर्यात है. लेकिन उत्पादन का महज 7 फीसद हिस्सा निर्यात होता है, उसमें भी ज्यादातर पड़ोस के बाजारों को. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कृषिअर्थव्यवस्था निर्यात के मामले में 13वें नंबर पर (बेल्जियम से भी पीछे) है. 2009 से 2014 तक करीब 27 फीसद सालाना की दर से बढ़ने के बाद कृषिनिर्यात सालाना 12 फीसद की गति से गिर रहा है क्योंकि सरकार को व्यापार उदारीकरण से डर लगता है.

कृषिका विश्व व्यापार तगड़ी सौदेबाजी मांगता है. दुनिया में बेचने के लिए व्यापार समझौते चाहिए. अगर कोई हमारा घी खरीदेगा तो हमें उसका दूध खरीदना होगा.

भारत के पास या तो अमेरिका बनने का विकल्प है, जहां बड़ा घरेलू फूड उत्पाद बाजार है या फिर वियतनाम बनने का, जिसने 1990 के बाद चुनिंदा फसलों में वैल्यू चेन तैयार की. दस साल में 15 मुक्त व्यापार समझौतों किए और जीडीपी में खेती का हिस्सा चार गुना (10 से 36 अरब डॉलर) कर दिया.

अतिरिक्त उपज और मुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दम सुमेरियाई सभ्यता (मेसोपटामिया 7000 ईपू) ने एक विराट खाद्य अर्थव्यवस्था तैयार की थी. महाकाव्य गिल्गामेश बताता है कि महानगर उरुक (मौजूदा बगदाद से 250 किमी दक्षिण) इसका केंद्र था.

भारतीय किसान, अकूत खनिज संपदा पर बसे निपट निर्धन अफ्रीकियों जैसे हो गए हैं, जहां शस्य लक्ष्मी या भरपूर पैदावार गरीबी बढ़ा रही है. बाजार पर उत्पादक का भरोसा उसके श्रम के उचित मूल्य से ही बनता है, इसके बिना हो रहे फैसले सरकार की नीयत पर संदेह बढ़ा रहे हैं. यह सियासत जिस बाजार के नाम पर हो रही है वह तो भारतीय खेती के पास है ही नहीं, नतीजतन किसान, दान के चक्कर में कटोरा गंवाने से डर रहे हैं.