Sunday, November 13, 2022

महंगाई ज्‍यादा बुरी है या मंदी ?


 

 

  

एक्‍शन सिनेमा के शौकीन 2009 की फिल्‍म वाचमेन को नहीं भूल सकते.  यह दुविधा और असमंजस का सबसे रोमांचक फिल्‍मांकन है 1980 का दशक अमेरिका में कॉमिक्‍स के दीवानेपन का दौर था. लोग ब्रिट‍िश कॉमिक लेखक एलन मूर के दीवाने थे जिन्‍होंने कॉमिक्‍स की दुनिया को कुछ सबसे मशूर चरित्र दिये. यह मूवी एलन मूर की प्रख्‍यात कॉमिक्‍स वाचमेन पर आधारित थी जिसे फिल्‍म हालीवुड के स्‍टार एक्‍शन फिल्‍म प्रोड्यूसर लॉरेंस गॉर्डन ने बनाया था जो ब्रूस विलिस की एतिहा‍स‍िक फिल्‍म डाइ हार्ड के निर्माता भी थे.

वाचमेन मूवी का खलनायक ओजिमैंड‍ियास कुछ एसा करता है जिसे सही ठहराना जितना मुश्‍क‍िल है. वह गुड विलेन है यानी अच्‍छा खलनायक. उतना ही उसे गलत ठहराना. विज्ञान, न्‍यूक्‍लियर वार और एक्‍शन पर केंद्रित इस मूवी में मानव जाति‍ को नाभिकीय तबाही से बचाने के लिए ओजिमैंड‍ियास दुनिया के अलग हिस्‍सों में बड़ी तबाही बरपा करता है और नाभिकीय हमला टल जाता है. इस मूवी का प्रसि‍द्ध संवाद नाइट आउल और ओजिमैंडिआस के बीच है.

नाइट आउल - तुमने लाखों को मरवा दिया

ओजिमैंडिआस अरबों लोगों को बचाने के लिए

केंद्रीय बैंक यानी गुड विलेन

दुनिया के केंद्रीय बैंक भी गुड विलेन बन गए हैं. उन्‍होंने महंगाई को मारने के लिए ग्रोथ को मार दिया है. यानी मंदी बुला ली है.

लेक‍िन क्‍या उन्‍होंने सही किया है.

कैसे तय हो कि  महंगाई ज्‍यादा बुरी शय है या मंदी ज्‍यादा बुरी बला?

तो अब हम आपको सीधे बहस के बीचो बीच ले चलते हैं इसके बाद तो फिर  जाकी रही भावना जैसी

महंगाई सबसे बड़ी बुराई

इत‍िहास गवाह है कि महंगाई आते ही मौद्रिक नियामकों के तेवर बदल जाते है. हर कीमत पर अर्थव्‍यवस्‍था की ग्रोथ में सस्‍ते कर्ज का ईंधन डालने वालने बैंकर बला के क्रूर हो जाते हैं. यूरोप को देख‍िये मंदी न आए यह तय करने के लिए बीते एक दशक से ब्‍याज दर शून्‍य पर रखी गई लेक‍िन अब महंगाई भड़की तो मंदी का डर का खत्‍म हो गया.

यूरोप और अमेरिका जहां वित्‍तीय निवेश की संस्‍कृति भारत से ज्‍यादा मजबूत है वहां महंगाई के खतरे के प्रति गहरा आग्रह है. मंदी को उतना बुरा नहीं माना जाता. महंगाई का खौफ इसलिए बड़ा है क्‍यों कि वेतनों में बढ़ोत्‍तरी की गति सीमित रहती है. इसलिए जब भी कीमतें बढ़ती हैं जो जिंदगी जीने की लागत बढ़ जाती है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आय सीम‍ित है

हमारे पास जो भी है और उसकी जो भी कीमत है, महंगाई उस मूल्‍य को कम कर देती है. लोग याद करते हैं कि 1970 की महंगाई ने अमेरिका के लोगों को क्रय शक्‍ति (पर्चेज‍िंग पॉवर) का नुकसान 1930 की महामंदी से ज्‍यादा था.

महंगाई को मंदी के मुकाबले ज्‍यादा घातक यूं भी कहा जाता क्‍यों ि‍क यह पेंशनर और युवाओं दोनों को मारती है. जिंदगी जीने के लागत बढ़ने से युवाओं की बचत का मूल्‍य घटता है जो उनके सपनों पर भारी पड़ता है जैसे कि अगर कोई तीन साल बाद मकान लेना चाहता है तो महंगाई से उसकी लागत बढ़ाकर उसे पहुंच से बाहर कर दिया. इधर ब्‍याज या पेंशन पर गुजारा करने वाले रिटायर्ड की सीम‍ित आय महंगाई के सामने पानी भरती है.

महंगाई बचत की दुश्‍मन है और बचत टूटने से अर्थव्‍यवस्‍था का भविष्‍य संकट में पड़ता है अलबत्‍ता सरकारों को महंगाई से फर्क नहीं पड़ता क्‍यों कि आज के खर्च के लिए वह जो कर्ज दे रहें उसे आगे कमजोर मुद्रा में चुकाना होता है लेक‍िन न‍िवेशकों और उद्योगों की मुश्‍किल पेचीदा हो जाती है.

सरकारें मंदी से नहीं महंगाई से डरती हैं क्‍यों? 

महंगाई के बीच यह तय करना मुश्‍क‍िल होता है कि किसकी मांग बढ़ेगी और किसकी कम होगी. मांग आपूर्ति का पूरा गणित ध्‍वस्‍त! एसे में निवेशक और उद्योग गलत जगह निवेश कर बैठते हैं जिनमें महंगाई के बाद मांग टूट जाती है.

महंगाई खुद को ही ताकत देती है. कीमत बढ़ने से डर से लोग जरुरत से ज्‍यादा खरीदते हैं. बाजार में पूंजी ज्‍यादा हो तो महंगाई को और ईंधन. यही वजह है कि बैंक पूंजी की प्रवाह सिकोड़ते हैं.

पूरी दुनिया की सरकारें महंगाई को संभालने में मंदी से ज्‍यादा मेहनत इसल‍िए करती हैं कि महंगाई बढ़ते ही वेतन बढ़ाने का दबाव बनता है. इस वक्‍त यूरोप और लैटिन अमेरिका में यही हो रहा है. 1970 में महंगाई के दबाव कंपनियों को वेतन बढ़ाने पड़े और स्‍टैगफ्लेशन आ गई.

स्‍टैगफ्लेशन यानी उत्‍पादन में गिरावट और महंगाई दोनों एक साथ होना सबसे बुरी बला है. मंदी से ज्‍यादा बुरी बला क्‍यों कि नियामक मानत‍े हैं कि मंदी लंबी नहीं चलती. हाल के दशकों में तो यह एक दो साल से ज्‍यादा उम्रदराज नहीं होती.

 

कर्ज महंगा होने से संपत्‍त‍ियों की कीमत टूटती हैं और अंतत: अर्थव्‍यवस्‍था में कम कीमत पर नई खरीद आती है. मंदी से रोजगारों पर असर पड़ता है लेक‍िन महंगाई को सबसे बुरी बला मानने वाले कहते हैं कि वह अस्‍थायी है. महंगाई में नए रोजगार नहीं आते और जो हैं उनकी कमाई घटती जाती हैं

बैंकर यह मानते हैं कि मंदी दूर सकती है लेक‍िन महंगाई एक बार लंबी हो जाए तो फिर मुश्‍क‍िल से काबू आती है क्‍यों कि इसके बढ़ते जाने की धारणा इसे ताकत देती है. यह वजह है कि पूरा नियामक समुदाय महंगाई का लक्ष्‍य तय करता है और इसके बढ़ने पर हर कीमत पर इसे रोकने लगता है.

मंदी ज्‍यादा बुरी है

मंदी के पक्ष में भी तर्क कम नहीं है

2007 के बाद वाली मंदी, से हुआ नुकसान महंगाई की तुलना में कहीं ज्‍यादा है. तभी तो शेयर न‍िवेशक जो कर्ज महंगा करने वाले केंद्रीय बैंकों को बिसूर रहे हैं.

यह धारणा गलत है कि महंगाई पूरी अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभाव‍ित करती है जबकि मंदी अस्‍थायी तौर पर केवल रोजगारों में कमी करती है. उनका तर्क है कि मंदी पूरी अर्थव्‍यवस्‍था में कमाई कम कर देती है. सभी संसाधनों मसलन पूंजी, श्रम आदि का इस्‍तेमाल क्षमता से कम हो जाता है. 2007 से 2009 की मंदी के दौरान दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था को करीब 20 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ जो पूरी दुन‍िया के एक साल के कुल आर्थ‍िक उत्‍पादन से ज्‍यादा था. उसके बाद दुनिया की विकास दर में कभी पहले जैसी तेजी नहीं आई.

महंगाई से कहां कम होती कमाई ?  

महंगाई रोकने के लिए बैंकों कर्ज महंगा करो मुहिम के खिलाफ यह तर्क दिये जा रहे हैं कि महंगाई सकल आय (सभी कारकों को मिलाकर) कम नहीं करती. एक व्‍यक्‍ति की बढी हुई लागत दूसरे की इनकम है भाई. कच्‍चा तेल महंगा हुआ तो कंपनियों की आय बढ़ी. कीमतें बढती हैं तो किसी न किसी की आय भी तो बढती है. यह आय का पुर्नव‍ितरण है. जैसे महंगाई के साथ कंपनियों की बढ़ती कमाई और उस पर शेयर धारकों का बेहतर रिटर्न. अरे महंगाई से तो राष्‍ट्रीय आय बढती है क्‍यों कि सरकारों का टैक्‍स संग्रह ज्‍यादा होता है.

महंगाई न हो तो इनकम का यह नया बंटवारा करेगा कौन? कुछ लोगों को लगता है कि महंगाई की तुलना में वेतन मजदूरी की वृद्ध‍ि दर कम है लेक‍िन जैसे ही मंदी के वजह रेाजगार घटती है वेतन बढ़ोत्‍तरी के बजाय कमी होने लगती है क्‍यों कि ज्‍यादा लोग बाजार में काम मांग रहे होते हैं. दरअसल मंदी को न केवल बेकारी लाती है बल्‍क‍ि जो काम पर है उनकी कमाई की संभावना को भी सीमित कर देती है.

मंदी से ज्‍यादा बुरा बताने वाले कहते हैं कि केंद्रीय बैंकों को एकदम ब्‍याज दरों में तेज बढ़त नहीं करनी चाहिए बल्‍क‍ि महंगाई को धीरे धीरे ठंडा होने देना चाहिए. क्‍यों कि इतिहास बताता है कि महंगाई घाव तात्‍कालिक होते हैं मंदी का घाव वर्षों नहीं भरता.

 

महंगाई और मंदी के बीच चुनाव जरा मुश्‍क‍िल है ?

पुराने अर्थशास्‍त्री  महंगाई के राजनीतिक अर्थशास्‍त्र एक सूत्र बताते हैं

दरअसल बीते डेढ दशक में दुनिया में महंगाई नहीं आई. सस्‍ते कर्ज के सहारे समृद्ध लोगों ने खूब कमाई की. स्‍टार्ट अप से लेकर शेयर तक धुआंधार निवेश किया. यही वह दौर था जब दुनिया में आय असमानता सबसे तेजी से बढी.

 

 

 

 

इस असमानता कम करने के दो ही तरीकें या तो वेतन बढ़ाये जाएं अध‍िकांश लोगों की आय बढ़े, जो अभी संभव नहीं है तो फिर दूसरा तरीका है कि शेयर, अचल संपत्‍ति‍, सोना जैसी संपत्‍त‍ियां जहां ससती पूंजी लगाई गई है उनकी कीमतों में कमी हो ताकि असमानता दूर हो सके.

महंगाई इन संपत्‍ति‍यों कीमत करती है और इसलि‍ए निवेशकों को सबसे ज्‍यादा नुकसान होता है. अब आप चाहें तो कह सकते कि केंद्रीय बैंक दरअसल महंगाई कम कर के दरअसल निवेशकों को हो रहा नुकसान कम करना चाहते हैं. दूसरा पहलू यह भी होगा कि इस कमी से आम लोगों की कमाई में परोक्ष कमी भी तो बचेगी.

 

भारत को महंगाई और आर्थ‍िक सुस्‍ती दोनों साथ लंबा वक्‍त गुजारने का तजुर्बा है लेक‍िन इस बहस में आप तय कीजिये महंगाई ज्‍यादा बुरी है या मंदी


Friday, October 21, 2022

क‍िंग कोल की वापसी


साल 1306 ब्रिटेन की गर्म‍ियां. नाइट्स, बैरन्‍स बिशप्‍स
यानी ब्रिटेन के सामंत गांवों में मौजूद अपनी रियासत और किलों से दूर लंदन आए थे. जहां संसद का पहला प्रयोग हो रहा था.

सामंतों का स्‍वागत किया लंदन की आबोहवा में घुली एक अजीब सी गंध ने. एक तीखी चटपटी सी महक जो नाक से होकर गले तक जा रही थी

यह गंध कोयले की थी.

उस वक्‍त तक लंदन के कारीगर लकड़ी छोड़ कर एक काले पत्‍थर को जलाने लगे थे.

सामंतों ने  धुआं धक्‍कड़ का विरोध व‍िरोध किया तो सम्राट एडवर्ड कोयले इस्‍तेमाल रोक दिया. पाबंदी ने बहुत असर नहीं कि‍या. तो सख्‍ती हुई जुर्माने लगे, फर्नेस तोड़ दी गईं.

 

मगर वक्‍त कोयले के साथ था. 1500 में ब्रिटेन में ऊर्जा की क‍िल्‍लत हो गई. ब्रिटेन दुनिया का पहला देश हो गया जहां कोयले का संगठित और व्‍यापक खनन शुरु हुआ. पहली औद्योगिक क्रांति कोयले के धुंए में लिपट धरती पर आई.

करीब 521 साल बाद दुनिया को फिर कोयले के धुएं से तकलीफ महसूस हुई. धुआं-धुआं आबोहवा पृथ्‍वी का तापमान बढ़ाकर विनाश कर रही थी.  

नवंबर 2021 में ग्‍लासगो में दुनिया की जुटान में तय हुआ कि 2030 तक विकस‍ित देश और 2040 तक विकासशील देश कोयले का इस्‍तेमाल बंद कर देंगे. इसके बाद थर्मल पॉवर यानी कोयले वाली बिजली नहीं होगी.

भारत-चीन राजी नहीं थे मगर 40 देशों ने कोयले से तौबा कर ली. 20 देशों ने यह भी तय किया कि 2022 के अंत से कोयले से बिजली वाली परियोजनाओं वित्‍त पोषण यानी कर्ज आदि बंद हो जाएगा. बैंकरों में  मुनादी पिट गई. नई खदानों पर काम रुक गया.

एंग्‍लो आस्‍ट्रेल‍ियन माइन‍िंग दिग्‍गज रिओ टिंटो ने आस्‍ट्रेल‍िया की अपनी खदान में 80 फीसदी हिस्‍सेदार बेच कर कोयले को श्रद्धांजलि की कारोबारी रजिस्‍ट्री कर दी थी.

लौट आया काला सम्राट  

कोयला मरा नहीं.

फंतासी नायक या भारतीय दोपहर‍िया टीवी सीरियलों के हीरो के तरह वापस लौट आया. पुतिन ने यूक्रेन पर हमला कर दुनिया की ऊर्जा योजनाओं को काले सागर में डुबा दिया. पर्यावरण की सुरक्षा के वादे और दावे पीछे छूट गए. पूरी दुनिया कोयला लेने दौड़ पड़ी है. सबसे आगे वे ही हैं जो कोयले का युग बीतने की दावत बांट रहे थे

दुनिया की करीब 37 फीसदी बिजली कोयले से आती है इस‍का क्षमता का अध‍िकांश हिस्‍सा यूरोप से बाहर स्‍थापित था. यूरोस्‍टैट के आंकड़ों के मुताबिक 2019 तक यूरोप की अपनी केवल 20 फीसदी ऊर्जा के लिए कोयले का मोहताज था. बाकी ऊर्जा सुरक्षित स्रोतों और गैस से आती थी.

यूरोप 2025 तक अपने अध‍िकांश कोयला बिजली संयंत्र खत्‍म करने वाला था लेक‍िन अब रुस की गैस न मिलने के बाद बाद आस्‍ट्र‍िया जर्मनी इटली और नीदरलैंड ने अपने पुराने कोयला संयंत्र शुरु करने का एलान किया है.

इंटरनेशनल इनर्जी एजेंसी (आईईए)  ने बताया है कि यूरोपीय समुदाय में कोयले की खपत 2022 में करीब 7 फीसदी बढ़ेगी जो 2021 में 14 फीसदी बढ़ चुकी है. पूरी दुनिया में कोयले की खपत इस साल यानी 2022 में 8 बिल‍ियन टन हो जाएगी जो 2013 की रिकार्ड खपत के बराबर है.

कोयले की कीमत भी चमक उठी है. इस मई में यह 400 डॉलर प्रति टन के रिकार्ड स्‍तर पर को छू गई.

माइन‍िंग डॉट कॉम और इन्‍फोरिसोर्स ने बताया कि विश्‍व के ताजा खनन न‍िवेश में कोयले अब तांबे से आगे है 2022-23 में करीब 81 अरब डॉलर की 1863 कोयला परियोजनायें सक्रिय हैं 2022 के जून तक दुनिया की कोल सप्‍लाई चेन में निवेश रिकार्ड 115 अरब डॉलर पर पहुंच गया था इसके बड़ा हिस्‍सा चीन का है.

दुनिया के बैंकर और कंपन‍ियां कोयले को पूंजी दे रहे हैं. इंडोनेश‍िया दुनिया सबसे बड़ा न‍िर्यातक और पांचवा सबसे बड़ा कोयला उत्‍पादक है यहां के माइनिंग उद्योग को सिटी ग्रुप, बीएनपी पारिबा, स्‍टैंडर्ड एंड चार्टर्ड का कर्ज जनवरी 2022 में 27 फीसदी बढ़ा है. एश‍िया की कोयला जरुरतों के लि‍हाज से इंडोनेश‍िया सबसे बड़ा सप्‍लायर है.

अमेरिका कोयले का स्‍व‍िंग उत्‍पादक है. बीते बरस चीन ने आस्‍ट्रेल‍िया से कोयला आयात पर रोक लगाई थी उसके बाद अमेरिका का कोयला निर्यात करीब 26 फीसदी बढ़ा है..

 

भारत और चीन की बेचैनी

 

रुस, इंडोनेशिया और आस्‍ट्रेल‍िया कोयले सबसे बड़े निर्यातक है इनके बाद दक्षि‍ण अफ्रीका और कनाडा आते हैं. चीन, जापान और भारत से सबसे बड़े आयातक हैं अब यूरोप भी इस कतार में शामिल होने जा रहा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी बता रही है भारत और चीन की मांग ने बाजार को हिला दिया है. इनकी कोयला खपत पूरी दुनिया कुल खपत की दोगुनी है.

दुनिया की आधी कोयला मांग तो केवल चीन से निकलती है.चीन की 65 फीसदी बिजली कोयले से आती है. उसके पास कोयले का अपना भी भारी भंडार है. गैस की महंगाई और कि‍ल्‍लत के कारण यहां नई खनन परियोजनाओ में निवेश बढ़ाया जा रहा

भारत में इस साल फरवरी में कोयले का संकट आया. महाकाय सरकारी कोल कंपनी कोल इंड‍िया आपूर्तिकर्ता की जगह आयातक बन गई. इस साल भारत का कोयला आयात बीते साल के मुकाबले तीन गुना हो गया है..ईआईए का अनुमान है कि भारत में कोयले की मांग इस साल 7 से 10 फीसदी तक बढ़ेगी.

सब कुछ उलट पलट

ग्रीनहाउस गैस रोकने वाले इस साल कोयले से रिकार्ड बिजली बनायेंगे. नौ फीसदी की बढ़त के साथ यह उत्‍पादन इस साल 10350 टेरावाट पर पहुंच जाएगा.

कोयला दुनिया का सबसे अध‍िक कार्बन गहन जीवाश्‍म ईंधन है. पेरिस समझौते का लक्ष्‍य था इसकी खपत घटाकर ग्‍लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्‍स‍ियस कम किया जाएगा.

2040 तक कोयले को दुनिया से विदा हो जाना था. लेक‍िन तमाम हिकारत, लानत मलामत के बाद भी कोयला लौट आया है. अब अगर  दुनिया को धुंआ रहित कोयला चाहिए एक टन कोयले को साफ करने यानी सीओ2 कैच का खर्चा 100 से 150 डॉलर प्रति टन हो सकता है. बकौल ग्‍लोबल कॉर्बन कैप्‍चर एंड रिसोर्स इंस्‍टीट्यूट के मुताबिक दुनिया को हर साल करीब 100 अरब डॉलर लगाने होंगे यानी अगले बीच साल में 650 बिल‍ियन से 1.5 ट्रि‍ल‍ियन डॉलर का निवेश.

यानी धुआं या महंगी बिजली दो बीच एक को चुनना होगा ..

और यह चुनाव आसान नहीं होने वाला.

 

आने से जिनके आए बहार



 

नागपुर के लालन जी अग्रवाल तपे हुए निवेशक हैं. उन्‍हें पता है कि किस्‍मत की हवा कभी नरम कभी गरम होती ही है लेक‍िन अगर भारत में लोगों का खर्च बढ़ता रहेगा तो तरक्‍की का पहिया चूं चर्र करके चलता रहेगा.

त्‍योहारों की तैयारी के बीच कुछ सुर्ख‍ियां उन्‍हें सोने नहीं देतीं.  भारत में छोटी कारें और कम कीमत वाले बाइक-स्‍कूटरों के ग्राहक लापता हो गए हैं सस्‍ते मोबाइल हैंडसेट की मांग टूट रही है.किफायती मकानों की‍ बिक्री नहीं बढ़ रही.

कहां फंस गई क्रांति

बीते चार बरस में एंट्री लेवल कारों की बिक्री 25 फीसदी कम हुई है. एसयूवी और महंगी (दस लाख से ऊपर) की कारों की मांग बढ़ी है. देश की सबसे बडी कार कंपनी मारुति के चेयरमेन आर सी भार्गव को कहना पड़ा कि छोटी कारों का बाजार खत्‍म हो रहा है.

जून 2022 की तिमाही में सस्‍ती (110 सीसी) बाइक की बिक्री करीब 42 फीसदी गिरी. 125 सीसी के स्‍कूटर का बाजार भी इस दौरान करीब 36 फीसदी सिकुड़ गया.. सिआम के मुताबिक वित्‍त वर्ष 2022 में भारत में दुपह‍िया वाहनों की बिक्री दस साल के न्‍यूनतम स्‍तर पर आ गई.

दुनिया में आटोमोबाइल क्रांति फोर्ड की छोटी कार मॉडल टी से ही शुरु हुई थी लेक‍िन इसका दरख्‍त भारत की जमीन पर उगा. 2010 तक दुनिया की सभी प्रमुख कार कंपनियां भारत में उत्‍पादन या असेंम्‍बल‍िंग करने लगीं.

वाहनों की बिक्री का आख‍िरी रिकॉर्ड 2017-18 में बना था जब 33 लाख कारें और दो करोड बाइक बिकीं. इसके बाद बिक्री ग‍िरने लगी.  फाइनेंस कंपनियां डूबीं, कर्ज मुश्‍क‍िल हुआ, सरकार ने प्रदूषण को लेकर नियम बदले. मांग सिकुड़ने लगी. इसके बाद आ गया कोविड.  अब छोटी कारों और सस्‍ती बाइकों बाजार सिकुड़ रहा है जबक‍ि महिंद्रा की प्रीमियम कार स्‍कॉर्प‍ियो एन को जुलाई में 30 मिनट में एक लाख बुकिंग ि‍मल गईं.

मोबाइल में यह क्‍या

मोबाइल बाजार में भी जून त‍िमाही में 40000 रुपये से ऊपर के  मोबाइल फोन की बिक्री करीब 83 फीसदी बढ़ी जबक‍ि सस्‍ते 8000 रुपये के मोबाइल की बिक्री में गिरावट आई. काउंटरप्‍वाइंट रिसर्च की रिपोर्ट और उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि 10000 रुपये तक मोबाइल की बिक्री की करीब 25 फीसदी सिकुड गया है. पुर्जों की कमी कारण मोबाइल हैंडसेट महंगे हुए हैं.. ऑनलाइन शिक्षा का प्रचलन बढने के बाद भी सस्‍ते स्‍मार्ट फोन नहीं बिके.

घर का सपना

प्रॉपर्टी कंसल्टेंट एनारॉक ने बताया कि साल 2022 की पहली छमाही में घरों की कुल बिक्री में महंगे घरों (1.5 करोड़ से ऊपर) की मांग दोगुनी हो गई. साल 2019 में पूरे साल के दौरान घरों की बिक्र में लग्जरी घरों की हिस्सेदारी महज 7 फीसद थी.

देश के 7 प्रमुख शहरों में साल 2021 में लॉन्च 2.36 लाख नए मकानों में 63 फीसदी मकान मिड और हाई एंड सेगमेंट (40 लाख और 1.5 करोड़) के हैं. नई हाउसिंग परियोजनाओं में अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी घटकर 26 फीसदी रह गई, जो वर्ष 2019 में 40 फीसद थी.

उम्‍मीदों के विपरीत

कोविड से पहले तक बताया जाता कि आटोमबाइल, मोबाइल फोन और मकान ही रोजगार और तरक्‍की इंजन हैं.  

भारत में कारों (प्रति 1000 लोगों पर केवल 22 कारें) वाहनों का बाजार छोटा है केवल 49 फीसदी परिवारों के पास दो पहिया वाहन थे इस के बावजूद 2018 तक आटोमोबाइल भारत की मैन्‍युफैक्‍चरिंग में 49 फीसदी और जीडीपी का 7.5 फीसदी हिस्‍सा ले चुका था. करीब 32 लाख रोजगार यहीं से निकल रहे थे.

सहायक उद्योगों व सेवाओं के साथ 2018 में, भारतीय आटोमोबाइल उद्योग 100 अरब डॉलर के मूल्‍यांकन के साथ दुनिया में चौथे नंबर पर पहुंच गया था. लेक‍िन अब मारुति के चेयरमैन कहते हैं कि छोटी कारें ब्रेड एंड बटर थीं बटर खत्‍म हो गया अब ब्रेड बची है.

आटोमेाबाइल क्रांति सस्‍ती बाइक और छोटी कारों पर केंद्रित थी. यदि इनके ग्राहक नहीं बचे तो भारत में महंगी या इलेक्‍ट्र‍िक कारें में निवेश क्‍यों बढेगा?

मंदी की हवेल‍ियां

हाउसिंग की मंदी  2017 से शुरु हुई थी, नोटबंदी के बाद 2017 में (नाइट फ्रैंक रिपोर्ट) मकानों की बिक्री करीब 7 फीसदी और नई परियोजनाओं की शुरुआत 41 फीसदी कम हुई. मकानों की कीमतें नहीं टूटीं्. जीएसटी की गफलत, एनबीएफसी का संकट, मांग की कमी और  आय कम होने कारण कोविड आने तक यहां    करीब 6.29 लाख मकान ग्राहकों का  इंतजार कर रहे थे.

बड़ी आबादी के पास अपना मकान खरीदने की कुव्वत भले ही  हो लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था में कंस्ट्रक्शन का हिस्सा 15 फीसद (2019) है जो अमेरिकाकनाडाफ्रांस ऑस्ट्रेलिया जैसे 21 बड़े देशों (चीन शामिल नहींसे भी ज्यादा हैयह खेती के बाद रोजगारों का सबसे बड़ा जरिया है.

तो कैसा डिज‍िटल इंड‍िया

2019 तक फीचर फोन बदलने वाले स्‍मार्ट फोन खरीद रहे थे. इसी से डिज‍िटल लेन देन और मोबाइल इंटरनेट का इस्‍तेमाल भी बढ़ा. सस्‍ते फोन की बिक्री घटने से डि‍ज‍िटल सेवाओं की मांग पर असर पड़ेगा. 5जी आने के बाद तो यह बाजार महंगे फोन और महंगी सेवा वालों पर केंद्रित हो जाएगा.

 

कहां गया मध्‍य वर्ग

भारत का उभरता बाजार मध्‍य वर्ग पर केंद्रित था. जिसमें नए परिवार शामिल हो रहे थे.  यही मध्य वर्ग बीते 25 साल में भारत की प्रत्येक चमत्कारी कथा का शुभंकर रहा है नए नगर (80 फीसद मध्य वर्ग नगरीयऔर 60 फीसदी जीडीपी इन्‍हीं की खपत से आता है बीसीजी का आकलन है कि इस वर्ग ने में ने करीब 83 ट्रिलियन रुपए की एक विशाल खपत अर्थव्यवस्था तैयारकी है. मगर प्‍यू रिसर्च ने 2020 में बताया था कि की कोविड की ामर से भारत के करीब 3.2 करोड़ लोग मध्य वर्ग से बाहर हो गए.

क्‍या यही लोग हैं जिनके कारण कारें मकान मोबाइल की बिक्री टूट गई है ? भारी महंगाई और टूटती कमाई इनकी वापसी कैसे होगी?

2047 में विकसित देश होने के लक्ष्‍य की रोशनी में यह जान लेना जरुरी है भारत में 2020 में प्रति व्‍यक्‍ति‍ आय (पीपीपी आधार पर) का जो स्‍तर था अमेरिका ने वह 1896 में और यूके ने 1894 में ही हासि‍ल कर लिया था. 2019 के हाउसहोल्‍ड प‍िरामिड सर्वे आंकडो के मुताबिक आज भारत में प्रति परिवार जितनी कारें है वह स्‍तर अमेरिका में 1915 में आ गया था. जीवन स्‍तर की बेहतरी के अन्‍य पैमाने जैसे फ्रिज ,एसी वाश‍िंग मशीन, कंप्‍यूटर ,भारत इन सबमें अमेरिका 75 से 25 साल तक पीछे है

बाकी आप कुछ समझदार हैं ...

Monday, September 12, 2022

मेरी रेवड़ी अच्‍छी उसकी खराब,

 




मैं हमेशा सच बोलता हूं अगर मैं झूठ भी बोल रहा हूं तब भी वह सच ही है.

भारत की राजनीति आजकल रेवड़‍ियों यानी लोकलुभान अर्थशास्‍त्र पर एसे  ही अंतरविरोधी बयानों से हमारा मनोरंजन कर रही है.

वैसे ऊपर वाला संवाद प्रस‍िद्ध हॉलीवुड फिल्‍म स्‍कारफेस (1983) का है. ब्रायन डी पाल्‍मा की इस फिल्‍म में अल पचीनो ने  गैंगस्‍टर टोनी मोंटाना का बेजोड़ अभिनय किया था. इस फिल्‍म ने गैंगस्‍टर थीम पर बने  सिनेमा को  कई पीढ़‍ियों तक प्रभावित कि‍या.

सरकार के अंतरव‍िरोध देख‍िये

नीति आयोग ने बीते साल  कहा कि खाद्य सब्‍सिडी का बिल कम करने के लिए  राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के लाभार्थ‍ियों की संख्‍या को करीब 90 करोड से घटाकर 72 करोड पर लाना चाहिए. इससे सालाना 47229 करोड़ रुपये बचेंगे.

दूसरा, इसी साल जून में नीति आयोग ने कहा कि इलेक्‍ट्र‍िक वाहनों पर सरकारी की सब्‍सि‍डी 2031 तक जारी रहनी चाहिए. ताकि बैटरी की लागत कम हो सके.च्

आप कौन की सब्‍सि‍डी चुनेंगे?

इस वर्ष अप्रैल में केंद्र ने राज्‍यों को सुझाया कि कर्ज और सब्‍स‍िडी कम करने के लिए  सरकारी  सेवाओं को महंगा किया जाना चाहिए.

मगर घाटा तो केंद्र का भी कम नहीं है तो उद्योगों को करीब 1.11 लाख करोड़ रुपये की टैक्‍स रियायतें क्‍यों दी गईं ?

कौन सी रेवड़ी विटामिन है कौन सी रिश्‍वत?

68000 करोड़ रुपये की सालाना किसान सम्‍मान न‍िधि‍ को किस वर्ग में रखा जाए?

14 उद्योगों को 1.97 करोड़ रुपये के जो प्रोडक्‍शन लिंक्‍ड इंसेट‍िव हैं उनको क्‍या मानेंगे हम ?

रेवड‍ियों का बजट

वित्‍त वर्ष 2022-23  में केंद्र सरकार का सब्‍स‍िडी बिल करीब 4.33 लाख करोड़ होगा. इनके अलावा करीब 730 केंद्रीय योजनाओं पर  इस याल 11.81 लाख करोड़ खर्च होंगे. इनमें से कई के रेवड़ि‍त्‍वपर बहस हो सकती है.

केंद्र प्रयोजित योजनायें दूसरा मद हैं जिन्‍हें केंद्र की मदद से राज्‍य लागू करते हैं. इस साल के बजट में इनकी संख्‍या 130 से घटकर 70 रह गई है लेक‍िन आवंटन बीते साल के 3.83 लाख करोड़ रुपये से बढकर 4.42 लाख करोड़ रुपये हो गया है.

राज्‍यों में रेवड़ी छाप योजनाओं की रैली होती रहती है.  इनसे अलग  2020-21 में राज्‍यों का करीब 2.38 लाख करोड़ रुपये स्‍पष्‍ट रुप से सब्‍स‍िडी के वर्ग आता था जो  2018-19 के मुकाबले करीब 12.7 फीसदी बढ़ा है. रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार  बीते बरस राज्‍यों के राजस्‍व में केवल एक फीसदी की बढ़त हुई. राज्‍यों के  राजस्‍व में सब्सिडी का हिस्‍सा अब बढ़कर 19.2 फीसदी हो गया है  

कितना फायदा कितना नुकसान

मुफ्त तोहफे बांटने की बहसें जब उरुज़ पर आती हैं तो किसी सब्‍स‍िडी को उससे मिलने वाले फायदे से मापने का तर्क दिया जाता है.

2016 में एनआईपीएफपी ने अपने एक अध्‍ययन में बताया था कि खाद्य शि‍क्षा और स्‍वास्‍थ्‍य के अलावा सभी सब्‍स‍िडी अनुचित हैं. वही सोशल ट्रांसफर उचित हैं जिनसे मांग और बढ़ती हो.  इस पुराने अध्‍ययन के अनुसार 2015-16 में समग्र गैर जरुरी (नॉन मेरिट)  सब्‍स‍िडी जीडीपी के अनुपात में 4.5 फीसदी थीं. कुल सब्‍स‍िडी में इनका हिस्‍सा आधे से ज्‍यादा है और राज्‍यों में इनकी भरमार है.

आर्थ‍िक समीक्षा (2016-17) बताती है कि करीब 40 फीसदी लक्षित लोगों को राशन प्रणाली और 65 फीसदी जरूरतमंदों को मनरेगा का लाभ नहीं मिलता. छह प्रमुख स्कीमों (आवास योजनासर्व शिक्षामिड डे मीलग्राम सड़कमनरेगास्वच्छ भारत) के सबसे कम फायदे उन जिलों को मिले जहां सबसे ज्यादा गरीब आबादी थी.  

यदि शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य को सामाजिक जरुरत मान लिया जाए तो उसके नाम पर लग रहे टैक्‍स  और सेस के बावजूद अधि‍कांश आबादी निजी क्षेत्र से शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य खरीदती है.

सनद रहे कि कंपनियों को मिलने वाली टैक्‍स रियायते, सब्‍स‍िडी की गणनाओं में शामिल नहीं की जातीं.

ब‍िजली का स्‍यापा

ि‍बजली सब्‍स‍िडी भारत का सबसे विद्रूप सच है. उदय स्‍कीम के तहत ज्‍यादातर राज्‍य बिजली बिलों की व्‍यवस्‍था सुधारने  और वितरण घटाने के लक्ष्‍य नहीं पा सके. 31 राज्‍यों और केंद्रशास‍ित प्रदेशों में 2019 के बाद से ब‍िजली की आपूर्ति लागत में सीधी बढत दर्ज की गई.

बिजली दरों का ढांचा पूरी तरह सब्‍स‍िडी केंद्रि‍त है. इसमें सीधी सब्‍स‍िडी भी है उद्योगों पर भारी टैरिफ लगाकर बाकी दरों को कम रखने वाली क्रॉस सब्‍स‍िडी भी.  27 राज्‍यों ने 2020-21 में करीब 1.32 लाख करोड़ रुपये की बिजली सब्‍स‍िडी दी, इसमें 75 फीसदी सब्‍स‍िडी किसानों के नाम पर है.

बिजली वितरण कंपनियां (डिस्‍कॉम) 2.38 लाख करोड की बकायेदारी में दबी हैं. इन्‍हें यह  पैसा बिजली बनाने वाली कंपनियों को देना है. डिस्‍कॉम के खातों में सबसे बड़ी बकायेदारी राज्‍य सरकारों की है जिनके कहने पर वह सस्‍ती बिजली बांट कर चुनावी संभावनायें चमकाती हैं

तो होना क्‍या चाहिए

सरकार रेवड़‍ियों पर बहस चाहती है तो सबसे पहले   केंद्रीय और राज्‍य स्‍कीमों, सब्‍स‍िडी और कंपनियों को मिलने वाली रियायतों की पारदर्शी कॉस्‍ट बेनीफ‍िट एनाल‍िसिस हो  ताकि पता चला कि किस स्‍कीम और सब्‍स‍िडी से किस लाभार्थी वर्ग को ि‍कतना फायदा हुआ.

और जवाब मिल सकें इन सवालों के

कि क्‍या किसानों को सस्‍ती खाद, सस्‍ती बिजली, सस्‍ता कर्ज और एमएसपी सब देना जरुरी है?

सरकारी स्‍कीमों से शिक्षा स्‍वास्‍थ्‍य या किसी दूसरी सेवा की गुणवत्‍ता और फायदों में कितना इजाफा हुआ ?

कंपनियों को मिलने वाली किस टैक्‍स रियायत से कितने रोजगार आए?

अगर सस्‍ती श‍िक्षा और मुफ्त किताबें रेवडी नहीं हैं तो डिजिटल शिक्षा के लिए लैपटॉप या मोबाइल रेवड़ी क्‍यों माने जाएं?

इस सालाना  विश्‍लेषण के आधार पर जरुरी और गैर जरुरी सब्‍स‍िडी  के नियम तय किये जा सकते हैं.

इस गणना के बाद राज्‍यों के लिए राजकोषीय घाटे की तर्ज  रेवड़ी खर्च की सीमा तय की जा सकती है.  राज्‍य सरकारें बजट नियमों के तहत तय करें कि उन्‍हें क्‍या देना है और क्‍या नहीं.

सनद रहे‍ कि कमाना और बचाना तो हमारे लिए जरुरी है संप्रभु सरकारें पैसा छाप सकती हैं, टैक्‍स थोप सकती हैं  और बैंकों से हमारी जमा निकाल कर मनमाना खर्च कर सकती है . यही वजह है कि भारत के बजट दशकों के सब्‍स‍िडी के  एनीमल फॉर्म (जॉर्ज ऑरवेल) में भटक रहे हैं जहां "All animals are equal, but some are more equal than others. इस सबके बीच  सुप्रीम कोर्ट की कृपा से अगर देश को इतना भी पता चल जाए कि कौन सा सरकारी दया रेवड़ी है और कौन सी रियायत वैक्‍सीन तो कम से कम हमारे ज़हन तो साफ हो जाएंगे.

 

 

 

Thursday, August 18, 2022

बड़ी जिद्दी लड़ाई



 

गुरु क्‍या रिजर्व बैंक महंगाई रोक लेगा?

लगभग कातर मुद्रा में चेले ने चाय सुड़कते हुए गुरु से पूछा.

बेट्टा, रिजर्व बैंक महंगाई नहीं रोक सकता. वह तो बढ़ ही गई है. बैंक केवल महंगाई बढ़ने की संभावना रोक सकता है.

क्‍या ? चेले के दिमाग में सवालों का सितार बजने लगा

सुना नहीं, आरबीआई गवर्नर शक्‍तिकांत दास ने पिछले सप्‍ताह बैंक ऑफ बड़ौदा के बैंकर्स कांक्‍लेव में यही तो कहा है.

रिजर्व बैंक बज़ा खौफज़दा है क्‍यों किे महंगाई से ज्‍यादा खतरनाक होती है उसके बढ़ते जाने की संभावना. अ‍ब तो यह भारत के उपभोक्‍ताओं की खपत का तरीका बदल रही है.

रिसर्च फर्म कांतार की ताजा स्‍टडी बताती है कि 2020 की तुलना में उपभोक्‍ता दुकानों पर ज्‍यादा जा रहे हैं लेक‍िन खरीद सात फीसदी कम हो गई है. उपभोक्‍ता सामानों की करीब 28 फीसदी खरीद  1,5,10,20 पैकिंग पर सिमट गई है. इन पैकेज की बिक्री 11फीसदी (2020 में 7 फीसदी) बढ़ी है. कंपनियों ने इनकी कीमतें बढ़ाई हैं इनमें इनका ग्रामेज यानी सामान की मात्रा घटाई है. करीब  68 फीसदी उपभोक्‍ता सामान (प्रसाधन आदि)  और शत प्रतिश खाद्य उत्‍पाद 10 रुपये से कम कीमत में उपलब्‍ध हैं. सनद रहे कि यही वह छोटा पैकेट वर्ग है जिसमें अनब्रांडेड सामानों पर सरकार ने जीएसटी लगाया है. महंगाई के कारण सिकुडती खपत पर टैक्‍स बढ़ रहा है.

बदलता उपभोक्‍ता व्‍यवहार महंगाई के बढ़ते जाने की संभावना का प्रमाण है. महंगाई से लड़ाई में यह रिजर्व की बैंक की हार के शुरुआती  संकेत हैं.

कई वर्षों में यह पहला मौका है जब महंगाई सभी घरों में फैल गई है. पहले महंगाई का दबाव खाद्य और ईंधन के वर्ग में रहता था. ईंधन और खाद्य रहित कोर यानी बुनियादी महंगाई नियंत्रण में थी इसलिए खुदरा कीमतों में आग भड़क कर ठंडी हो जाती थी

क्र‍िसिल का एक ताजा अध्‍ययन बताता है कि खुदरा मूल्‍य सूचकांक के खाद्य सामानों वाले हिस्‍से (भार 46 फीसदी) में महंगाई जमकर बैठ गई है. बीते एक साल में भारत में खाद्य उत्‍पादन लागत करीब 21 फीसदी बढ़ी है. यह बढ़त थोक मूल्‍य सूचकांक की कुल बढ़त से भी ज्‍यादा है. वित्‍त वर्ष 2022 में डीजल की थोक महंगाई 52.2 फीसदी, उर्वरक की 7.8 फीसदी, कीटनाशकों की 12.4 फीसदी और पशु चारे की महंगाई 17.7 फीसदी बढी है. अर्थात खाद्य महंगाई का तीर अब कमान से छूट चुका है

ईंधन की महंगाई पर टैक्‍स में ताजा कमी असर भी नहीं हुआ. कच्‍चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से सरकारी अनुमान से ऊपर जा चुकी है. 100-110 डॉलर प्रति बैरल नया सामान्‍य है.  कच्‍चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रत‍ि बैरल की बढ़ोत्‍तरी से खुदरा महंगाई करीब 40 प्रतिशतांक बढ़ती है. ऊपर से रुपये की कमजोरी, महंगाई बढते जाने की संभावना को यहां से ईंधन मिल रहा है.

कोर इन्‍फेलशन (खाद्य और ईंधन रहित महंगाई) दो साल से रिजर्व बैंक लक्ष्‍य यानी 5 फीसदी से ऊपर है. यही खुदरा महंगाई की सबसे बड़ी ताकत है. कोर इन्‍फलेशन खुदरा मूल्‍य सूचकांक में 47 फीसदी का  हिस्‍सा रखती है जो हिस्‍सा खाद्य उत्‍पादों से भी ज्‍यादा है.

थोक महंगाई प्रचंड 15 फीसदी की प्रचंड तेजी पर है और बीते एक साल खौल रही है. गैर खाद्य थोक महंगाई तो 16 फीसदी से ऊपर है. थोक कीमतें में बढ़त का पूरा असर हमारी जेब तक नहीं आया है  क्‍यों कि खुदरा महंगाई इसकी आधी यानी औसत 6-7 फीसदी पर है.

करीब 43 उद्योगों में 800 बड़ी और मझोली कंपनियों के अध्‍ययन के आधार पर क्रिसिल को पता चला कि कच्‍चे माल की महंगाई से कंपन‍ियों के मार्जिन में एक से दो फीसदी की कमी आएगी. इसलिए मांग न होने के बाद भी कीमतों में बढ़ोत्‍तरी जारी है.

सेवाओं (सर्विसेज) की महंगाई देर से आती है लेकिन फिर वापस नहीं लौटती. परिवहन बिजली तो महंगे हुए ही हैं, रिटेल महंगाई में स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा का सूचकांक लगातार 16 माह से 6 फीसदी से ऊपर है. सेवाओं और सामानों की महंगाई में एक फीसदी का अंतर है यानी सेवायें और महंगी होंगी  

बंदरगाहों पर महंगाई का स्‍वागत

महंगा आयात, उत्‍पादन की लागत बढ़ाता है. इस लागत को नापने के लिए इंपोर्ट यूनिट वैल्‍यू इंडेक्‍स को आधार बनाया जाता है. यह सूचकांक थोक महंगाई को सीधे प्रभाव‍ित करता है.  वित्‍त वर्ष 2022 के दौरान भारत की आयात‍ि‍त महंगाई दहाई के अंकों में रही. अप्रैल जनवरी के बीच यह बढ़कर 27 फीसदी हो गई. इसका असर हमें थोक महंगाई के 15 फीसदी पहुंचने के तौर पर नजर आया.

क्रिस‍िल का हिसाब बताता है कि भारत की कीमत 61 फीसदी थोक महंगाई अब आयातित हो गई. कोविड से पहले थोक मूल्‍य सूचकांक में आयात‍ित महंगाई का हिस्‍सा केवल 28.3 फीसदी था. भारत की अधिकांश इंपोर्टेड इन्‍फेलशन कच्‍चे तेल ,खाद्य तेल और धातुओं से आ रही है.

भारतीय आयात में 60 फीसदी हिस्‍सा खाड़ी देशों, चीन, आस‍ियान, यूरोपीय समुदाय और अमेरिका से आने वाले सामानों व सेवाओं का है. जहां कैलेंडर वर्ष 2021 में निर्यात महंगाई 10 से 33.6 फीसदी तक बढ़ी है.

कपास और कच्‍चे तेल को छोड कर अन्‍य सभी कमॉड‍िटी ग्‍लोबल महंगाई अभी पूरी तरह भारत में लागू नहीं हुई है. कोयला और यूरि‍या की महंगाई तो अभी आई ही नहीं है. यूर‍िया को सरकार सब्‍स‍िडी से बचा रही है लेक‍िन महंगा कोयला बिजली की दरें जरुर बढ़ायेगा

ये तो कम न होगी!

धूमिल कहते थे लोहे का स्‍वाद लोहार से नहीं घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है. महंगाई कम होगी इसका जवाब सरकार नहीं आप खुद स्‍वयं को देंगे, जो इसे सह और भुगत रहे हैं. रिजर्व बैंक हर दूसरे महीने भारतीय परिवारों से महंगाई का स्‍वाद पूछता है. जून के सर्वे में महंगाई बढ़ने की संभावना का सूचकांक मार्च की तुलना में 40 फीसदी बढ़ा है सरकार भले ही कहे कि महंगाई घटकर 6-7 फीसदी रहेगी लेकिन उपभोक्‍ता मान रहे हैं कि यह 11 फीसदी से ऊपर रहेगी.

महंगाई कम होने का दारोमदार नॉर्थ ब्‍लॉक और बैंक स्‍ट्रीट पर नहीं बल्‍क‍ि उपभोक्‍ताओं के यह महसूस करने पर है कि सचमुच कीमतें कम होंगी. महंगाई की बढ़ते जाने की संभावना ही महंगाई की असली ताकत है, यही ताकत रिजर्व बैंक पर भारी पड़ रही है.