Monday, March 4, 2013

अलविदा गेम चेंजर



यह बजट आर्थिक विकास के उस मॉडल को आंकडा़शुदा श्रद्धांजलि है जिसने भारत का एक दशक बर्बाद कर दिया।

खेद प्रगट का करने इससे भव्‍य तरीका और क्‍या हो सकता है कि एक पूरे बजट को वी आर सॉरी का आयोजन में बदल दिया जाए। यूपीए का दसवां बजट पछतावे की परियोजना है। यह बजट आर्थिक विकास के उस मॉडल को आंकडा़शुदा श्रद्धांजलि है जिसने भारत का एक दशक बर्बाद कर दिया। प्रायश्चित तो मौन व सर झुकाकर होते हैं और इसलिए बजट से कोई उत्‍साह आवंटित नहीं हुआ। चिदंबरम खुल कर जो नहीं कह सके उसे आंकडों के जरिये बताया गया। यह बजट पिछले एक दशक के ज्‍यादातर लोकलुभावन प्रयोगों को अलविदा कह रहा है। वह स्‍कीमें जिन्‍हें यूपीए कभी गेम चेंजर मानती थी अंतत: जिनके कारण ग्रोथ व वित्‍तीय संतुलन का घोंसला उजड़ गया।

Monday, February 25, 2013

भूल सुधार बजट



भरोसा जुटाने के लिए चिदंबरम को निर्ममता के साथ पिछले वित्‍त मंत्री प्रणव मुखर्जी के बजटों को गलत साबित करना होगा।

ह महासंयोग कम ही बनता है जब सियासत के पास खोने के लिए कुछ न हो और अर्थव्‍यवस्‍था भी अपना सब कुछ गंवा चुकी हो। भारत उसी मुकाम पर खड़ा है जहां सत्‍तारुढ़ राजनीति अपनी साख व लोकप्रियता गंवा चुकी है और अर्थव्‍यवस्‍था अपनी बढ़त व ताकत। 2013 का बजट इस दुर्लभ संयोग की रोशनी में देश के सामने आएगा। यह अपने तरह का पहला चुनाव पूर्व बजट है जिससे निकलने वाले राजनीतिक फायदे इस तथ्‍य पर निर्भर होंगे बजट के बाद आर्थिक संकट बढ़ते हैं या उनमें कमी होगी। इस बजट के लिए आर्थिक सुधारों का मतलब दरअसल पिछले बजटों की गलतियों का सुधार है। चिदंबरम मजबूर हैं, वोटर और निवेशक, दोनों का भरोसा जुटाने के लिए उन्‍हें निर्ममता के साथ पिछले वित्‍त मंत्री प्रणव मुखर्जी के बजटों को गलत साबित करना होगा। मुखर्जी ने तीन साल में करीब एक लाख करोड़ के नए टैक्‍स थोपे थे जिनसे जिद्दी महंगाई, मरियल ग्रोथ, रोजगारों में कमी और वित्‍तीय अनुशासन की तबाही निकली है। प्रणव मुखर्जी के आर्थिक दर्शन को सर के बल खड़ा करने के बाद ही चिदंबरम

Monday, February 18, 2013

सुधार पुरुष का आखिरी मौका



स यह बजट और !! .... इसके बाद उस नामवर शख्सियत की इतिहास में जगह अपने आप तय हो जाएगी जिसने 24 जुलाई 1991 की शाम, फ्रेंच लेखक विक्‍टर ह्यूगो की इस पंक्ति के साथ, भारत को आर्थिक सुधारों की सुबह सौंपी थी कि दुनिया की कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसके साकार होने का समय आ गया है। लेकिन सुधारों का वह विचार अंतत:  रुक गया और 1991 जैसे संकटों का प्रेत फिर वापस लौट आया। सुधारों के सूत्रधार की अगुआई में ही भारत की ग्रोथ शिखर से तलहटी पर आ गई जो अवसरों का अरबपति रहा है। आने वाला बजट पी चिदंबरम के लिए एक और मौका नहीं है, यह तो भारत के सुधार पुरुष के लिए अंतिम अवसर है। यह डा. मनमोहन सिंह का आखिरी बजट है।  
पांच साल वित्‍त मंत्री और दस साल प्रधानमंत्री अर्थात आर्थिक सुधारों के बाइस साल में पंद्रह साल तक देश की नियति का निर्धारण। डा मनमोहन सिंह से ज्‍यादा मौके शायद ही किसी को मिले होंगे। संयोग ही है कि प्रख्‍यात अर्थशास्‍त्री और सुधारों के प्रवर्तक ने 1991 में इकतीस पेज के बजट भाषण में भारत के तत्‍कालीन संकट की जो भी वजहें गिनाई थीं, देश नए संदर्भो में उन्‍हीं को

Monday, February 11, 2013

नए समाज का पुराना बजट


स पर मायूस हुआ जा सकता है कि भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को पिछले एक दशक के सबसे बुरे वक्‍त में जो बजट मिलने जा रहा है वह संसद से निकलते ही चुनाव के मेले में खो जाएगा। वैसे तो भारत के सभी बजट सियासत के नक्‍कारखानों में बनते हैं इसलिए यह बजट भी लीक पीटने को आजाद है। अलबत्‍ता पिछले बीस साल में यह पहला मौका है जब वित्‍त मंत्री के पास  लीक तोड कर बजट को अनोखा बनाने की गुंजायश भी मौजूद है जो लोग सडकों पर उतर कर कानून बनवा या बदलवा रहे हैंवही लोग बजटों के पुराने आर्थिक दर्शन पर भी झुंझला रहे हैं। बीस साल पुराने आर्थिक सुधारों में सुधार की बेचैनी सफ दिखती है  क्‍यों कि बजट बदलते वक्‍त से पिछड़ गए हैं। बजट, लोकतंत्र का सबसे महतत्‍वपूर्ण आर्थिक राजनीतिक आयोजन है और संयोग से इसका रसायन बदलने के लिए मांगमूड और मौका तीनों ही मौजूद हैं।  
बजटों में बदलाव का पहला संदेशा नई आबादी से आया है। भारत एक दशक में शहरों का देश हो जाएगा। बजट, इस जनसांख्यिकीय सचाई से कट गए हैं। 2001 से 2011 के बीच नगरीय आबादी करीब 31 फीसदी की गति से बढी जो गांवों का तीन

Monday, February 4, 2013

नई नियति


भारत में जिद्दी महंगाई के सबसे लंबे दौर के बावजूद दिन बहुरने का आसरा शायद इसलिए कायम था क्‍यों कि इतिहास, सरकारों को दर्दनिवारक बताता है। किस्‍म किस्म की कमजोरियों के बाद भी अर्थव्‍यवस्‍था में तेज तरक्‍की के तीज त्‍योहार लौटने की उम्‍मीदें इसलिए जिंदा थीं क्‍यों कि सरकारों की सूझबूझ से हालात बदलने की नजीरें मिलती हैं। अफसोस ! उम्‍मीदों की इन सभी डोर रस्सियों को अब कुछ वर्षों के लिए समेट लेने का वक्‍त आ गया है। देश का मौद्रिक प्रबंधक रिजर्व बैंक और राजकोषीय प्रबंधक वित्‍त मंत्रालय,  लगभग सभी बड़ी लड़ाइयां हार चुके हैं। इस हार का ऐलान भी हो गया है। दहाई की महंगाई, छह फीसदी के इर्द गिर्द विकास दर, कमजोर रुपया, भारी घाटे और एक सुस्‍त-लस्‍त-पस्‍त आर्थिक तरक्‍की अगले कुछ वर्षों के लिए नई नियति है यानी  भारत का न्‍यू नॉर्मल। 2003 से 2008 वाले सुनहले दौर की जल्‍द वापस आने की संभावनायें अब खत्‍म हो गई हैं।
न्‍यू नॉर्मल मुहावरा दुनिया की सबसे बड़ी बांड निवेशक कंपनियों में एक पिमोको की देन है। जो 2008 के संकट के बाद पस्‍त हुए अमेरिका की आर्थिक हकीकत को बताता था। भारत का न्‍यू नॉर्मल भी निर्धारित हो गया है। भारत के आर्थिक प्रबंधन को लेकर रिजर्व बैंक और वित्‍त मंत्रालय दो साल से अलग अलग ध्रुवों पर खडे थे। बीते सप्‍ताह दोनों के बीच युद्ध विराम

Monday, January 28, 2013

सोने का फंदा


चेन्नई एयरपोर्ट पर कस्टम के हाथ लगा वह गुमनाम कूरियर, कीमती ही नहीं था करामाती भी था। पैकेट के खुलते ही दिल्ली को अलर्ट जारी करना पड़ा। कूरियर से सोने की तस्करी प्रमाण मिलने के बाद कस्टम अधिकारी, अब देश भर में पार्सल पैकेट खंगाल रहे हैं। घटना कुछ सप्ताह पहले की है। उस पैकेट में 3.8 करोड़ का सोना मिला जो अपने तरह की सबसे बड़ी ताजी बरामदगी थी। सोना सरकार की ताजा मुसीबत है जो उदार बाजार व ऊंची आय वाले नए भारत में पेचीदा और बहुआयामी होकर लौटी है। वित्तीय असुरक्षा व आर्थिक कुप्रबंध से घिरा देश अपनी बचत को बचाने के लिए सोने पर पिल पड़ा है। सोने का आयात विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर समस्‍या बनने लगा तो सरकार ने एक साल के भीतर सोने पर सीमा शुल्क छह गुना कर दिया। इसके बाद से सोने की दुनिया की उलटी घूम गई है। देश के आधुनिक हवाई अड्डे व बंदरगाह अचानक अस्सी का दशक जीने लगे हैं। अब आतंकियों से ज्यादा बडी फिक्र सोने के तस्करों की है। सोने की महंगाई, इसकी दीवानगी के आगे पानी भर रही है। सोने की ललक को संतुलित करने के लिए सरकार के पास फिलहाल कोई नई सूझ भी नहीं है।
सोने की मायावी मांग का मिजाज अस्सी के दशक जैसा ही है लेकिन असर व आयाम ज्यादा  व्यापक हैं। आठवें दशक में लोग निवेश के विकल्प न होने की वजह से सोने पर रीझते थे। तब सोने के आयात पर पाबंदी के कारण तस्करी की दंतकथायें

Monday, January 21, 2013

आपरेशन डीजल


भारत अपने सुधार इतिहास के सबसे दर्दनाक फैसले से मुकाबिल है। डीजल की कीमतों को बाजार के हवाले करना सुधारों का सबसे धारदार नश्‍तर है। तभी तो कड़वी गोली को खाने व खिलाने  की जुगत लगाते सुधारों 22 साल बीत गए। यह नश्‍तर पहले से मौजूद महंगाई, कमजोर रुपये के सानिध्‍य में दोगुने दर्द की शर्तिया गारंटी के साथ  अर्थव्‍यवस्‍था के शरीर में उतरा हैभारत डीजल पर चलने, चमकने, दौड़ने, उपजने व बढ़ने वाला मुल्‍क है। यहां गरीब गुरबा से लेकर अमीर उमरा तक हर व्‍यक्ति की जिंदगी में डीजल शामिल है। इसलिए भारत की डीजली अर्थव्‍यवस्‍था को एक साल तक महंगाई के अनोखे तेवरों के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इस सुधार सरकार को शुक्रिया जरुर कहियेगा क्‍यों कि इस कदम के फायदे मिलेंगे लेकिन इससे पहले लोगों का तेल निकल जाएगा।
सरकार के आपरेशन डीजल का मर्म यह नहीं है कि पेट्रोल पंप पर डीजल हर माह पचास पैसे महंगा होगा। महंगाई का दैत्‍य तो डीजल पर दोहरी मूल्‍य प्रणाली से अपने नाखून तेज करेगा जिसके तहत थोक उपभोक्‍ताओं यानी रेलवे, बिजली घरों, मोबाइल कंपनियों को प्रति लीटर करीब दस रुपये ज्‍यादा देने होंगे। इस फैसले के बाद  डीजल को सब्सिडी के नजरिये के बजाय महंगाई के नजरिये

Monday, January 14, 2013

जिद बनाम जागरुकता


ह हरगिज जरुरी नहीं है कि समझदारी के सारे झरने सरकार और सियासत में ही फूटते हों। भारत में राजनीति और जनता के रिश्‍तों का रसायन अद्भुत ढंग से बदल गया है। भारत का समाज गवर्नेंस की उलझनों के प्रति व्‍यावहारिक व जागरुक हो कर उभरा है जबकि इसके विपरीत  सरकारें पहले से कहीं जयादा  मौकापरस्‍त, जिद्दी व जल्‍दबाज हो गईं हैं। रेलवे का किराया बढ़ाने और रसोई गैस के सिलेंडर घटाने के निर्णय, जनता और सरकार की परस्‍पर संवेदनशीलता का नया शास्‍त्र सामने लाए हैं। दोनों ही फैसले सेवाओं को महंगा करने से जुड़े हैं मगर जो लोग एलपीजी सब्सिडी घटाने की बेतुकी नीति पर भड़के हैं वही लोग महंगी रेल यात्रा को उचित मान रहे हैं। लोग रेलवे की आर्थिक हकीकत के प्रति संवेदनशील हैं मगर सरकार  लोगों की दैनिक जिंदगी प्रति निर्मम हो जाती है। सियासत की उंगलियों के नीचे जनता की नब्‍ज तो है ही नहीं,  सरकारें अपने क्रियान्‍वयन तंत्र से भी कट गई हैं। इसलिए उसका सिस्‍टम ही एलपीजी सब्सिडी और कैश ट्रांसफर जैसी महत्‍वाकांक्षी स्‍कीमों को औंधे मुंह गिरा देता है।
रेल के किराये में यह दस साल की पहली एक तरफा और सबसे बड़ी बढ़ोत्‍तरी थी। महंगाई के बावजूद आम लोग इसके समर्थन में अर्थशास्‍त्री की तरह बोले। लोग तो पिछले साल मार्च में भी सरकार के साथ थे जब दिनेश त्रिवेदी देश के सबसे बड़े सार्वजनिक परिवहन को उबारने की कोशिश कर रहे थे और ममता बनर्जी इस आर्थिक बुनियादी ढांचे का दम घोंट रही थीं। आम जनता कई महीनों से यह हकीकत समझ रही है कि भारतीय रेल दुनिया की सबसे दुर्दशाग्रस्‍त

Monday, January 7, 2013

उनकी सियासत सबकी मुसीबत


हॅालीवुड के सबसे काबिल रोमांच निर्माता मिल कर भी दुनिया को थर्राने की उतनी कुव्‍वत नही रखते जितनी काबिलियत अमेरिका के मुट्ठी भर राजनेताओं में है। 2012 के अंतिम दिन फिस्‍कल क्लिफ से बचने की कोशिश, अमेरिकी सियासत का सन्‍न कर देने वाला तमाशा थी। राजकोषीय संकट की गोली कान के पास निकल गई। अमेरिका वित्‍तीय संकटों के भयानक टाइम बम पर बैठा है जो किस्‍म किस्‍म के घाटों, अकूत कर्ज, कमजोर ग्रोथ के बारुद से बने हैं। बुरी तरह विभाजित अमेरिकी सियासत पलीता लेकर इस बारुद के पास नाच रही है। फिस्‍कल क्लिफ की मुसीबत टलने से किसी को राहत नहीं मिली है कयों कि ग्‍लोबल अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अमेरिकी फैक्‍ट्री में कुछ और बड़े संकट बन रहे हैं, जिनसे बचने के लिए राजनीतिक सहमति जरुरी होगी  जबकि अमेरिकी सियासत तो आत्‍मघाती संकटों की दीवानी हो चली है। दुनिया की सरकारों, बाजारों व बैंको को 2013 में अमेरिका के नेताओं से डरना चाहिए यूरोप के कर्ज से नहीं।
2013 के पहले दिन अमेरिका तकनीकी तौर राजकोषीय संकट में फंस गया था। पिछले वर्षों में लागू की गई कर रियायतों और खर्च में बढ़ोत्‍तरी को रोकने का आटोमेटिक सिस्‍टम ही फिस्‍कल क्लिफ था जो एक जनवरी 2013 को लागू हो गया। असर इसलिए नहीं हुआ कि क्‍यों कि नए साल की छुट्टिया थीं। घाटा कम करने के लिए टैक्‍स बढ़ाने पर एक ढीली ढाली सहमति बन गई, जिसे अमेरिकी कांग्रेस ने मंजूरी दे दी। अमेरिका के लिए बजट घाटे की फांस खत्‍म नहीं