Monday, August 15, 2011

दहकते हुए दो सवाल


क्या मंदी घेर ही लेगी? दुनिया में वित्तीय तबाही कैसे रुकेगी? अमेरिकी साख से जिनकी साख जुड़ी है वह देश, बैंक या कंपनियां कहां सर फोड़ेंगे? इटली स्पेन कब डिफॉल्ट। होंगे? कितने और बैंकों की श्रद्धांजलि छपेगी ? डॉलर की जगह कौन सी मुद्रा लेगी ? बेकारी व खर्च में कमी से गुस्सा ये लोग अब किस शहर को लंदन बनायेंगे ? चीन क्या खुद संकट में नहीं हैं? संकट के इलाजों से महंगाई कितनी बढ़ेगी ? ... दहकते हुए सवालों का लावा ! अनिश्चितता ऐसा तूफान ! अभूतपूर्व है यह सब कुछ !!!. जवाब के लिए तर्क, आंकड़े, इतिहास, तथ्यत, संभावनायें परखने तक का वक्त् तक नहीं। अमेरिका की रेटिंग घटने के बाद से सवालों के उठने की रफ्तार बाजारों के गिरने की गति से सौ गुना ज्यादा है। हर घंटे नए सवालों की फौज ललकारती हुई खड़ी हो जाती है। सवालों की इस भीड़ में दो प्रशन सबसे ज्या दा दहक रहे हैं। जिनके जवाब की तलाश में दुनिया के हर निवेशक, उद्यमी, रोजगार चाहने वाले की आंखें , अखबारों व कंप्यूटर स्क्रीनों से चिपकी हैं, कि शायद कहीं कोई उम्मीद कौंध जाए। इन दो की पीठ पर ही हजारों सवाल लदे हैं।
पहला सवाल : क्या अमेरिका और पश्चिम यूरोप की सरकारों के पास इतने संसाधन व क्षमता है तक वह दुनिया के वित्तीय तंत्र को डूबने से बचा सकें ??
बच जाएंगे मगर कीमत बड़ी होगी। दुनिया में इतना पैसा नहीं है कि डूबते सिस्टम को एकमुशत उबार सके। वित्तीतय बाजार में सबकी किस्मंत गुंथी हुई है इसलिए प्रायशिचत भी साझा होगा। तभी तो अमेरिका की साख घटने के बाद बाजारों ने कुछ दिनों में चार ट्रिलियन डॉलर गंवा दिये। अमेरिका की 168 शीर्ष वित्तीदय कंपनियां (मोर्गन, सिटी ग्रुप आदि आदि) अपनी बुकवैल्यू से 60 फीसदी कम पर बाजार में बिक रही हैं। अमेरिकी या यूरोपीय बांडों में पैसा लगाने वाले बैंक, कंपनियां आगे भी डूबेंगे। क्यों कि यह संकट सरकारों से ज्यादा उनका है जो सरकारों कर्ज दिये बैठे हैं। मगर दर्द सरकारों ने दिया है तो दवा भी वही देंगी। पहली कोशिश है सस्तेउ से सस्ता कर्ज देने कि ताकि पैसे की कमी से कोई न डूबें। यह काम केवल सरकारें कर सकती हैं। कोई स्टैंहडर्ड एंड पुअर कितनी भी बड़ी क्यों न हो, करेंसी नोट नहीं छाप सकती। नोट छपेंगे और पैसा बहेगा। बैंकों व सरकारों ने बाजार में दखल देकर बचाव शुरु कर दिया है। केंद्रीय बैंक सस्ता पैसा लेकर मोर्चे पर हैं। बड़े बैंकों को डूबने से बचाया जाएगा और छोटों को डूबने दिया जाएगा। अमेरिकी फेड रिजर्व का यही फार्मूला है। दूसरी समस्या है सरकारों की कर्ज की, जिसका इलाज सरकारों की संप्रभुता से ही निकलेगा। कानून बनाकर कर्ज का भुगतान टालने (ग्रीस की तर्ज पर) या बैंकों से कर्ज माफ कराने कोशिशें शुरु होने वाली हैं। देशों की संपुभता सवोच्च है और कोई वित्तीकय तंत्र देश की सीमाओं के बाहर नहीं है। इसलिए देशों की संसदें जो कहेंगी, बैंकों को मानना ही होगा। मजबूरी जो ठहरी।
खतरों का अंधेरा – कम ब्याज दरों से मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम है तो कर्ज देनदारी टालने पर सरकारें साख गंवायेंगी। कई और बैंक व वित्तीदय संस्था्यें डूब सकते हैं। सरकारों को टैक्स बढ़ा कर और खर्च घटाकर अलोकप्रिय होना पड़ेगा। यूरोप अभी और डरायेगा। बाजार लगातार गोते खायेंगे। मगर इस निर्मम इलाज की पीड़ा झेलनी ही होगी।
उम्मीद की रोशनी – इस संकट में देश, बैंक व निवेशक सब थोड़ा थोड़ा गंवायेंगे, मगर शायद हम बच जाएंगे। सरकारो की राजनीतिक समझदारी का इम्तहान अब शुरु हुआ है।
दूसरा सवाल : मंदी का खतरा कितना सच है ?
खतरा भरपूर है। तथ्या देखिये। एक- दुनिया की सबसे बड़ी (अमेरिकी) अर्थव्यटवसथा साल की पहली तिमाही में केवल 0.4 फीसदी बढ़ी। दो- ग्रोथ के दो बड़े इंजन चीन व भारत सुस्त पड़ रहे हैं। तीन- पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ रही है उपभोक्ता खर्च सिकोड़ रहे हैं। चार- रोजगारों में तगडी गिरावट है। यूबीएस कहता है कि अमेरिका में 4.5 लाख सरकारी नौकरियां घटेंगी और यूरोप में इसकी दोगनी। पांच - यूरोप की विकास दर में बढ़ोत्तरी कोई उम्मीद नहीं है। छह- जापान टूट चुका है,विकास दर धराशायी है। सात- तेल की कीमतें महंगाई का ईंधन हैं। ..... यानी कि मंदी की पालकी तैयार है। अमेरिका में डबल डिप ( आर्थिक विकास दर में लगातार गिरावट) ही नहीं, दुनियावी मंदी का खतरा है। 2008 और 2011 की गिरावट में फर्क यह है कि तब अमेरिका-यूरोप-जापान फिसल रहे थे मगर भारत व चीन के ग्रोथ इंजन दहाड़ रहे थे। अब दुनिया में उस पार गिरावट है तो इस तरफ सुस्तीे। यूरोप अमेरिका में मांग घटने से उत्पाकदन गिरा है तो भारत-चीन-लैटिन अमेरिका में मांग घटाने के लिए उत्पा दन गिराया जा रहा है ताकि महंगाई रुक सके। इस सूरते हाल का भविष्य मंदी है। महंगाई व मंदी के इलाज एक दूसरे के उलटे हैं। पश्चिम यूरोप व अमेरिका मांग बढ़ाने के लिए बाजार में पैसा बढ़ायेंगे जबकि चीन व भारत महंगाई थामने के लिए मुद्रा का प्रवाह सिकोड़ रहे हैं। अर्थात ग्रोथ बढाने पर दुनिया बंटी हुई है। गौरतलब है कि जब भी पेट्रो उत्पादों पर खर्च की लागत विश्वर जीडीपी के मुकाबले तीन फीसदी से ऊपर गई हैं, मंदी आई है। 1973-74 के अरब इजरायल युद्ध, 1979 के ईरान युद्ध और 2008 के वित्तीय संकट ( तेल कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल तक) में ऐसा हुआ था। यानी कि मंदी का डर सौ फीसदी जायज है।
खतरों का अंधेरा– दुनिया के अधिकांश हिस्सों में महंगाई के बीच कर्ज का प्रवाह बढ़ाना बारुद हाथ में लेकर आग बुझाने की प्रेक्टिस करने जैसा है। मगर ग्रोथ पर दांव लगाने के अलावा कोई दूसरा रास्ताझ भी नहीं है। अगर ग्रोथ लौटी तो बहुत सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी नहीं तो महंगाई व मंदी मिलेगी।
उम्मीद की रोशनी- तेल की कीमतें घटें तो सस्ते पेट्रोल डीजल से पूरब व पश्चिम के इंजन फिर रफ्तार पकड़ सकते हैं और महंगाई के बिना ग्रोथ बढ़ाने की कोशिश मजबूत हो सकती है। मगर तेल की कीमतें तो शुरुआती गिरावट के बाद फिर बढ़ने लगी हैं। गेंद राजनीति के पाले में है।
यूं तो मौजूदा कोशिशों को नैतिक, सैद्धांतिक और व्यगवस्‍थागत कई सवालों से घेरा जा सकता है मगर हम एक भयानक संकट से मुखातिब हैं। जहां नैतिक बहसों का वक्त नहीं है। अब तो सर्वनाश को टालने की बात है यानी आधा गंवाकर आधा बचाने (सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्ध: त्यजति... ) वाली रणनीतियां ही कारगर होंगी। कौन बचा और कौन उबरा इसका हिसाब एक साल बाद होगा। फिलहाल तो यह देखिये कि कौन डूबा और कौन निबटा? आग का दरिया खौल रहा है जिसमें डूब कर ही जाना है। ....कमजोर दिल वालों को अपना खास ख्याल रखना चाहिए।
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Monday, August 8, 2011

घोटालों की रोशनी


घोटालों के कीचड़ के बीच भी क्या हम उम्मीद के कुछ अंखुए तलाश सकते हैं? भ्रष्टाचार के कलंक की आंधी के बीच भी क्या कुछ बनता हुआ मिल सकता है? यह मुमकिन है। जरा गौर से देखिये घोटालों के धुंध के बीच हमारी संवैधानिक संस्थाओं की ताकत लौट रही है। कानूनों की जंग छूट रही है और आजादी के नए पहरुए नए ढंग से अलख जगा रहे हैं। घोटालों के अंधेरे के किनारों से झांकती यह रोशनी बहुत भली लगती है। यह रोशनी सिर्फ लोकतंत्र का सौभाग्य है।
संविधान की सत्ता
डा. अंबेडकर ने संविधान बनाते समय कैग (नियंत्रक व महालेखा परीक्षक) को देश के वित्तीय अनुशासन की रीढ़ कहा था मगर व्यावहारिक सच यही है कि पिछले छह दशक के इतिहास में, कैग एक उबाऊ, आंकड़ाबाज और हिसाबी किताबी संस्थान के तौर पर दर्ज था। ऑडिट रिपोर्ट बोरिंग औपचारिकता थीं और कैग की लंबी ऑडिट टिप्पणियों पर सरकारी विभाग उबासी लेते थे। कारगिल युद्ध के दौरान ताबूत खरीद, विनिवेश पर समीक्षा के कुछ फुटकर उदाहरण छोड़ दिये जाएं तो देश को यह पता भी नहीं था कि कैग के पास इतने पैने दांत हैं। एक ऑडिट एजेंसी को, मंत्रियों को हटवाते (राजा व देवड़ा), प्रधानमंत्री की कुर्सी हिलाते और मुख्यमंत्रियों (सीडब्लूजी) के लिए सांसत बनते हमने कभी नहीं देखा था। कैग अब भ्रष्टाचारियों को सीबीआई

Monday, August 1, 2011

महाबली का महामर्ज

दो अगस्त को आप किस तरह याद करते हैं, जर्मनी में हिटलर की ताजपोशी की तारीख के तौर या फिर भारत में कंपनी राज की जगह ब्रिटिश राज की शुरुआत के तौर पर। .... इस सप्ताह से दो अगस्त को वित्तीय दुनिया में एक नई ऐतिहासिक करवट के लिए भी याद कीजियेगा। दो अगस्त को अमेरिका डिफाल्ट ( कर्ज चुकाने में चूक) ????  शायद नहीं होगा क्यों कि सरकार के पास दसियों जुगाड़ हैं। मगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। महाबली का यह मर्ज इतिहास बनाने की तरफ बढ़ चुका है। अमेरिका सरकार के लिए कर्ज की सीमा बढ़ने की आखिरी तारीख दो अगस्त है। रिपब्लिकन व डेमोक्रेट चाहे जो इलाज निकालें यानी कि अमेरिका डिफॉल्ट हो या फिर बचने के लिए टैक्स लगाये मगर विश्व के सबसे बड़े निवेशक और सबसे बड़े बाजार की सबसे ऊंची साख का कीमा बन चुका है। रेटिंग एजेंसियों, बैंकों, हेज फंड, शेयर निवेशकों के विश्वव्यापी समुद्राय ने भविष्य को भांप लिया है और अपनी मान्यताओं, सिद्धांतों, रणनीतियों और लक्ष्यों को नए तरह से लिखना शुरु कर दिया है। सुरक्षा के लिए सोने ( रिकार्ड तेजी) से लेकर स्विस फ्रैंक (इकलौती मजबूत मुद्रा) तक बदहवास भागते निवेशक बता रहे हैं कि वित्तीय दुनिया अब अपने भगवान की गलतियों की कीमत चुकाने को तैयार हो रही है।
डूबने की आजादी
अमेरिका की परंपराओं ने उसे अनोखी आजादी और अजीब संकट दिये हैं। अमेरिका में सरकार का बजट और कर्ज अलग-अलग व्यवस्थायें हैं। हर साल बजट के साथ कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिए संसद की मंजूरी, जरुरी नहीं है। इस साल अमेरिका की सीनेट ने बजट खारिज कर दिया तो ओबामा ने उसे वापस मंजूर कराने को भाव ही नहीं दिया। क्यों कि कर्ज में डूबकर खर्च करने की छूट उनके पास थी। 1990 के दशक के बाद से अमेरिका ने अपने बजट व कर्ज में संतुलन बनाने की कोशिश की थी जो इस साल टूट गई और मई में 14 खरब डॉलर के सरकारी कर्ज की संवैधानिक सीमा भी पार हो गई। अब दो अगस्ते को खजाने खाली हो जाएंगे और वेतन पेंशन देने के लिए पैसा नहीं बचेगा। तकनीकी तौर पर यह डिफॉल्ट की स्थिति है। अमेरिका कर्ज पर संसद के नियंत्रण की तारीफ की जाती है मगर यही प्रावधान अमेरिकी संसद में ताकतवर विपक्ष

Monday, July 25, 2011

साख की राख

याद नहीं पड़ता कि इतिहास को इस कदर तेजी से पहले कब देखा था। आर्थिक दुनिया में पत्थर की लकीरों का इस रफ्तार से मिटना अभूतपूर्व है। तारीख दर्ज कर रही है कि अब वित्‍तीय दुनिया अमेरिका की साख की कसम अब कभी नहीं खायेगी। इतिहास यह भी लिख रहा है कि ग्रीस वसतुत: दीवालिया हो गया है और समृद्ध और ताकतवर यूरोप में कर्ज संकटों का सीरियल शुरु हो रहा है। अटलांटिक के दोनों किनारे कर्ज के महामर्ज से तप रहे हैं। अमेरिकी सरकार कर्ज के गंभीर संकट में है। ओबामा कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिए दुनिया को डराते हुए अपने विपक्ष को पटा रहे हैं, दो अगस्त के बाद अमेरिका सरकार के खजाने खाली हो जाएंगे। यूरोपीय समुदाय ने ग्रीस के इलाज ( सहायता पैकेज) से मुश्किलों का नया पाठ खोल दिया है। कर्ज के संकट से बचने के‍ लिए अमेरिका और यूरोप ने शुतुरमुर्ग की तरह अपने सर संकट की रेत में और गहरे धंसा दिये हैं। जबकि संप्रभु कर्ज संकटों का अतीत बताता हैं कि आग के इस दरिया में डूब कर ही उबरा जा सकता है। दिग्गज देशों की साख, राख बनकर उड़ रही है और वित्तीय बाजारों आंखों के सामने अंधेरा छा रहा है।
दीवालियेपन का अरमेगडॉन
...यानी वित्तीय महाप्रलय। राष्ट्रपति ओबामा ने अमेरिका के संभावित डिफॉल्ट ( यानी और कर्ज लेने पर पाबंदी) को यही नाम दिया है। अमेरिकी संविधान के मौजूदा सीमा के मुताबिक देश का सार्वजनिक (सरकारी) कर्ज 14.29 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर नहीं जा सकता। कर्ज का यह घड़ा इस साल मई में भर गया था। अमेरिका में सार्वजनिक कर्ज जीडीपी का 70 फीसदी है। संसद से कर्ज की सीमा बढ़वाये बिना, अमेरिकी सरकार एक पाई का कर्ज भी नहीं ले पाएगी। ओबामा विपक्ष को डरा व पटा रहे हैं और पहले दौर कोशिश खाली गई है। विपक्षी कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिए कर बढ़ाने व खर्च काटने ( करीब 2.4 ट्रिलियन डॉलर का पैकेज) की शर्त लगा रहे है। घटती लोकप्रियता के बीच चुनाव की तैयारी में लगे ओबामा यह राजनीतिक जोखिम नहीं ले सकते। अमेरिका का डिफॉल्‍ट होना आशंकाओं भयानक चरम

Monday, July 18, 2011

ग्रोथ पर हमला

हूलुहान मुंबई के जीवट को सराहिये, अपनी लाचारी व खिसियाहट छिपाने के लिए यही एक रास्ता है। मुंबई के लोग मजबूरी के मरजीवड़े हैं कयों कि रोजी छिनने का खौफ मौत के खौफ से ज्यादा बड़ा है मुंबई के साहस में यह सच कतई नहीं छिपता हम एक असुरक्षित और लचर मुल्क हैं, इसलिए आतंक हमारी ग्रोथ को चबाने लगा है। जान माल की हिफाजत है ही नहीं इसलिए आर्थिक विकास पर बारुद पर बैठा है। किस्मत से हम एक बड़े मुल्क हैं नहीं तो इतना खून किसी भी अर्थव्यवस्था। को ( पाकिस्ता न नजीर है) जड़ से उखाड़ सकता है। जिस देश की आर्थिक नब्ज अठारह साल में सोलह धमाके और छह साल में चार सौ मौतें झेल चुकी हो, वहां जान देकर कारोबार करने का जीवट कौन दिखाना चाहेगा।
आतंक का आर्थिक असर
यदि हम देश व राज्यों की तरह शहरों का आर्थिक उत्पादन नाप ( 9/11 के बाद न्यूयार्क के ग्रॉस सिटी प्रोडक्ट की गणना) रहे होते, तो मुंबई की आर्थिक तबाही आंकड़ों में बोलती। काबुल व कराची के बाद आतंक से सबसे ज्यादा मौतें देखने वाली मुंबई की कारोबारी साख बिखर रही है। हम मौतों पर सियासत करते हैं जबकि दुनिया ग्रोथ पर आतंक के असर से कांप रही है। 2001 से 2003 के बीच आतंकी हमलों के कारण इजरायल ने आर्थिक विकास  में 10 फीसदी की गिरावट की झेली थी। सैंटा मोनिका (अमेरिका) के मिल्केन इंस्टीट्यूट का आंकड़ाशुदा निष्कर्ष है कि एक आतंकी हमला किसी देश की जीडीपी वृद्धि दर को 0.57 फीसदी तक