Monday, December 28, 2009

बोया पेड़ बबूल का..

पच्चीस रुपये किलो का आलू और चालीस रुपये किलो की चीनी खरीदते हुए किसे कोस रहे हैं आप? बेहतर होगा कि खुद को कोसिए! पहले तो इस बात पर कि आप उपभोक्ता हैं और दुनिया में सरकारें बहुसंख्य उपभोक्ताओं के बजाय मुट्ठी भर उत्पादकों की ज्यादा सुनती हैं और दूसरी बात यह कि आपने ही सरकार को वह 'बहुमद' दिया है, जिसमें मस्त नेताओं के लिए महंगाई अब मुद्दा ही नहीं (नान इश्यू) है। दरअसल हम वक्त पर कभी सही सवाल करते ही नहीं। ..आपने अपने नेता से आखिरी बार कब यह पूछा था कि देश में पिछले चालीस वर्षो में फसलों का रकबा क्यों नहीं बढ़ा, जबकि खाने वाले पेट दोगुने हो गए? या चीन पिछले एक दशक में खेती में नौ फीसदी की विकास दर के साथ कृषि उत्पादों का बड़ानिर्यातक कैसे बन गया और भारत शुद्ध आयातक में कैसे बदल गया? याद कीजिए कि कब और किस चुनाव में उठा था यह सवाल कि भारत में पिछले एक दशक में हर आदमी को कम अनाज (प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता) क्यों मिलने लगा जबकि कमाई बढ़ गई है? या गरीब बांग्लादेश और रेगिस्तानी इजिप्ट (मिस्त्र) के खेत भारत से ज्यादा अनाज क्यों देते हैं? ..यकीन मानिए, आपको छेद रही महंगाई की बर्छियां इन्हीं सवालों से निकली हैं। मंदी आई और गई, शेयर बाजार गिरा और चढ़ा, सरकारें गई और आई मगर इन सबसे बेअसर, जिद्दी महंगाई पिछले दो ढाई साल में हमारे आर्थिक तंत्र में पैबस्त हो गई है। सरकार अब दयनीय विमूढ़ता में है, आयात नामुमकिन है और देश लगभग खाद्य आपातकाल की तरफ मुखातिबहै।
सरासर गलत दिलासे
हम आपको आटा दाल का भाव क्या बताएं? हम तो आपको उन दिलासों की असलियत बताना चाहते हैं जो महंगाई की जिम्मेदारी से बचने के लिए दिए जाते हैं। सरकार का चेहरा छिपाने वाली अंतरराष्ट्रीय पेट्रो कीमतें गिर चुकी हैं, मगर महंगाई चढ़ी हुई है। अब तो इस महंगाई से मुद्रा के प्रवाह का भी कोई रिश्ता नहंी रहा। यह अब तक की सबसे पेचीदा और कडि़यल महंगाई है, जिसे कई अहम क्षेत्रों की लंबी उपेक्षा ने गढ़ा है। भारत ने इससे पहले भी महंगाई के दौर देखे हैं। सत्तर, अस्सी, नब्बे के दशक औसतन सात से नौ फीसदी की महंगाई के थे। 1974-75 में महंगाई 25 फीसदी तक गई थी और 80-81 में 18.2 फीसदी व 91-92 में 13.2 फीसदी तक। लेकिन ताजी महंगाई उनसे फर्क है। 1974 की महंगाई सूखे में खरीफ की तबाही से उपजी थी, जबकि अस्सी की महंगाई को खेती की असफलता व तेल की कीमतों में तेजी ने गढ़ा था। मत भूलिए कि पिछले साल देश में दशक का सबसे अच्छा खाद्यान्न उत्पादन हुआ था, मगर तब भी खाने की कीमतें मार रही थीं और अब जब खरीफ कुछ नरम-गरम रही, तब भी महंगाई का कहर जारी है। भारत में महंगाई अब आम लोगों को मारने के लिए मौसम या दुनिया के बाजार की मोहताज नहीं है। सरकार के नीतिगत अपकर्मो ने उसे बला की ताकत दे दी है।
..आम कहां से खाय
भारतीय कृषि की करुण कथा बहुत लंबी है। हम इसे सुनाना भी नहीं चाहते। आप केवल खेती की चर्चा के जरिए ताजी महंगाई के कांटों की जड़ें देखिए। जिनकी तलाश के लिए कोई खुर्दबीन नहीं चाहिए। हिसाब बड़ा साफ है कि पिछले दो दशकों में देश की आबादी 20 से 24 फीसदी की (1991 में करीब 24 और 2000 में 22 फीसदी) प्रति दशक गति से बढ़ी, मगर अनाज उत्पादन बढ़ने की दर दो दशकों में 11 व 18 फीसदी रही है। भूल जाइए कि अधिकांश सांसद अपना पेशा किसान बताते हैं, भारत में (3124 किग्रा) एक हेक्टेअर जमीन में तो बांग्लादेश (3904 किग्रा) के बराबर भी धान नहीं पैदा होता। गेहूं की प्रति हेक्टेअर उपज में मरुस्थलीय इजिप्ट (6455 किग्रा) हमसे ढाई गुना आगे है। बीस साल में भूखे पेटों की आबादी दोगुना करने वाले देश में कुल बुवाई क्षेत्र तीन दशक से 140 से 141 मिलियन हेक्टेअर पर लटका है। हैरत में पड़ना जरूरी है कि भारत में अनाज की प्रति व्यक्ति वार्षिक उपलब्धता 1991 में 171 किग्रा से घटकर अब 150 किग्रा पर आ गई है। यह बात सिर्फ गेहूं चावल की है। दालें तो वर्षो से पतली हैं। 1.3 अरब पेटों को पाल रहे चीन में प्रति व्यक्ति 404 किग्रा अनाज उपलब्ध है। करीब डेढ़ दशक पहले तक विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत अनाज का दान लेने वाला चीन खेती की सूरत बदल कर दुनिया के अनाज बाजार बड़ा खिलाड़ी बन गया है और आज अनाज उत्पादन बढ़ाने की प्रयोगशाला है। इसके विपरीत भारत खाने की स्थायी किल्लत का केंद्र बनता जा रहा है। भारत ने पिछले दो दशकों में अपने खेतों में बदहाली उगाई और बाजार में मांग। आय, खपत व बाजार बढ़ा मगर पैदावार, खेत, अनुसंधान घट गया। रोटियों की जिद्दोजहद तो होनी ही है।
महंगाई का उदारीकरण
दो दशकों में देश के कुल आर्थिक उत्पादन में खेती का हिस्सा लगभग तीन गुना (52 फीसदी से 18 फीसदी) घट जाना आपको अचरज में नहीं डालता? उगाने वाले और खाने वाले हाथों के बीच संतुलन अब बिगड़ गया है। असंतुलन पहले भी था, मगर तब आय कम थी। उद्योग व सेवा क्षेत्रों के बूते बढ़ी आय ने लोगों को ताजी क्रय शक्ति दे दी है, जिसे वह किल्लत वाले खाद्य बाजार पर चलाकर मांग व आपूर्ति के संतुलन को कायदे से बिगाड़ रहे हैं। उत्पादन कम हो तो उदार बाजार मुश्किलों का सौदा करता है। खाद्य प्रसंस्करण, स्नैक्स और कृषि उपज आधारित मूल्य वर्धित उत्पादों का बाजार अनाज का विशाल व संगठित, नया ग्राहक है। सबको निवाला न दे पाने वाली खेती इन्हें भी आपूर्ति करती है। इन्हें खूब मुनाफा होता है। वक्त के साथ जमाखोरी के ढंग बदल रहे हैं। किल्लत की दुनिया में वायदा बाजार भी खूब चमकता है और मुश्किलें बढ़ाता है। यह महंगाई का उदारीकरण है। खेती में उत्पादक व उपभोक्ता के हितों के बीच संतुलन की बहस अंतरराष्ट्रीय है। भारत की खाद्य अर्थव्यवस्था में उत्पादक घटे हैं, जबकि उपभोक्ता बढ़ रहे हैं। आदर्श स्थिति में नीतियां उपभोक्ताओं के हित में होनी चाहिए क्योंकि उत्पादक भी किसी न किसी स्तर पर उपभोग करता है। लेकिन यहां तो साफ ही नहीं कि खेती की किस्मत लिखने वाली नीतियां किसानों के लिए हैं या उपभोक्ताओं के लिए। अगर पूरी राजनीति खेती के हक में है तो उत्पादकों को बाजार खाद्य सामग्री से भर देने चाहिए। फिर दाल, रोटी, सब्जी की आपूर्ति कम क्यों है? महंगाई क्यों निचोड़ रही है? और अगर खेती का उत्पादन नहीं बढ़ सकता तो फिर आयात खुलना चाहिए जैसा कि दुनिया के कई मुल्क करते हैं। भारत की खाद्य अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता पिसता है और उत्पादक का राजनीतिक इस्तेमाल होता है। .. कोई तीसरा है जो मालामाल होता है? हमने कभी पूछा नही कि यह तीसरा आदमी कौन है?. बस शांति के साथ महंगाई सहने की आदत डाल ली है। तो आइए, खुद को शाबासी तो दीजिए..आने वाली पीढि़यां आपके त्यागकी कथाएं गाएंगी!
anshumantiwari@del.jagran.com

Monday, December 21, 2009

छोटे होने की जिद

तो फिर भारत का हर छोटा राज्य समृद्धि में बड़ा क्यों नहीं हो जाता? क्यों छोटे राज्य विशेष श्रेणी के दर्जे यानी केंद्रीय सहायता के मोहताज हैं? वित्तीय देनदारियों में डिफाल्टर होने का खतरा इन पर ही क्यों मंडराता है? इनके पास शानदार विकास और जानदार कानून व्यवस्था दिखाने वाला कोई चमकदार अतीत क्यों नहीं है? विकास के बेहद सीमित अवसर, चुनिंदा संसाधन व सीमित आर्थिक गतिविधियां क्यों इन राज्यों की नियति बन जाती हैं? इन सवालों से ईमानदारी के साथ आंख मिलाकर तो देखिए!.. छोटे राज्यों को लेकर होने वाले बड़े-बड़े आंदोलनों का तुक-तर्क आपको असमंजस में डाल देगा। छोटे राज्यों की पूरी बहस को यदि आर्थिक संदर्भो और बदले वक्त की रोशनी में खोला जाए तो हैरत में डालने वाले निष्कर्ष निकलते हैं। दुनिया के छोटे देश, अब तो बड़े भी, इस निर्दयी बाजार में साझी आर्थिक (यूरोपीय समुदाय, आसियान) किस्मत लिख रहे हैं, तब भारत में ऐसी राज्य इकाइयां बनाने की मांग उठती है जो आर्थिक कमजोरी व जोखिम के डीएनए के साथ ही पैदा होने वाले हैं।
अतीत किसे सिखाता है?
बहस पिछड़े इलाकों के आर्थिक विकास की ही है ना! मगर गैर आर्थिक तर्को पर बांटे गए राज्यों ने तो भारत को विकास की विसंगतियों का अजायबघर बना दिया है। 28 राज्यों वाले इस मुल्क में 13 राज्य छोटे हैं। इनमें आठ तो विशेष दर्जे वाले हैं, जिन्हें मजाक में विशेष खर्चे वाले राज्य कहा जाता है। केंद्रीय मदद और अनुदान पर निर्भर, क्योंकि अपनी अर्थव्यवस्था बैसाखी भी नहीं देती। पांच राज्य जो इस दर्जे से बाहर हैं, उनमें झारखंड गरीबी और भ्रष्टाचार का स्वर्ग है। छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा का और गोवा राजनीतिक अस्थिरता का। .. पंजाब और हरियाणा? जिज्ञासा लाजिमी है क्योंकि छोटे राज्यों के समर्थन की पूरी तर्क श्रृंखला को इन्हीं से ऊर्जा मिलती है। पंजाब व हरियाणा भारतीय कृषि के स्वर्ण युग की देन हैं। वक्त बदला तो खेती आधारित विकास का माडल उदारीकरण की आंधी में उखड़ गया। जैसे-जैसे देश के आर्थिक उत्पादन में खेती का हिस्सा घटा, आबादी बढ़ी, जोतें छोटी हुई, वैसे-वैसे पंजाब और हरियाणा मुश्किलों की गांठ बनते गए हैं। भारी घाटे, असंतुलित विकास व आय में अंतर और पलायन इनकी पहचान है। हरियाणा को खेतिहर जमीन गंवाकर कुछ उद्योग मिल भी गए, लेकिन पंजाब तो बड़े उद्योगों के मामले में छोटा ही रह गया। भाषाई पहचान के लिए बना पंजाब अतीत में पहचान की संकट का एक हिंसक आंदोलन झेल चुका है और खेती का यह स्वर्ग किसानों की आत्महत्या का नर्क भी रहा है। जबकि हरियाणा में अधिकांश जमीन मुट्ठी भर लोगों के पास है। नए हो या पुराने, छोटे राज्य न आंकड़ों में कोई करिश्मा करते दिखते हैं और न जमीन पर। झारखंड अगर प्रति व्यक्ति आय में देश में पांचवें नंबर पर है तो राज्य में गरीबी की रेखा से नीचे आने वाले 42 फीसदी का आंकड़ा इसकी चुगली खाता है। उत्तर पूर्व को सात छोटे राज्यों में बांटकर भी यहां विकास की तस्वीर नहीं बदली जा सकी।
विभाजन के जोखिम
कल्पना करिए कि अगर मौसम का बदलाव किसी छोटे राज्य में खेती का ढर्रा ही बदल दे (दुनिया के कुछ देशों में यह हो रहा है) या पर्यावरण के कानूनों के कारण खानें बंद करनी पड़ें या फिर वित्तीय कानूनों में बदलावों की वजह से राज्यों के लिए बाजार से कर्ज लेना मुश्किल हो जाए?.. कुछ भी हो सकता है! लेहमन की बर्बादी या दुबई के डूबने के बारे में किसने सोचा था? वित्तीय तूफानों में थपेड़े खा रही दुनिया मान रही है कि छोटा होना अब जोखिम को बुलाना है। इसलिए देश अपनी आर्थिक सीमाओं का एकीकरण कर रहे हैं भौगोलिक तौर पर एक भले ही न हों। पिछले साल की मंदी ने यूरोप के कई छोटे मुल्कों को बर्बाद किया था। भारत में पिछले दो साल की आर्थिक कमजोरी के मद्देनजर एक अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि केंद्र पर निर्भर छोटे राज्यों के लिए आने वाले साल बहुत मुश्किल हैं। कर कानूनों में एक फेरबदल भी छोटे राज्य की औद्योगिक तस्वीर बदल देता है। याद कीजिए कि दो साल पहले उत्तर पूर्व के राज्यों से जब केंद्र ने कर रियायतें वापस लीं तो उद्योग भी वापस चल दिए। छोटे राज्यों का झंडा उठाने वालों को कौन यह बताए कि अब बाजार में छोटा होना ज्यादा जोखिम भरा है। निवेशक स्वतंत्र हैं, बैंक अब साख देखते हैं। बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपने व्यापक आर्थिक आधार के कारण फिर भी बच जाती हैं, मगर छोटी तो एक झटके में निबट जाती हैं। आर्थिक अतीत गवाह है कि वेतन आयोग की सिफारिशों से लेकर आपदाओं तक जब भी बोझ बढ़ा है, छोटे राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं भूलोट हो गई हैं।
यह पहाड़ा ही उलटा है
विशालता या राजधानी से भौगोलिक दूरी के कारण कोई प्रदेश या प्रदेश का हिस्सा उपेक्षित नहंी होता। इस तर्क पर उत्तर पूर्व और लद्दाख कुछ भी सोच सकते हैं। विकास में उपेक्षा की वजह सिर्फ राजनीतिक है। दूरी का तर्क तो अब हास्यास्पद है क्योंकि सूचना तकनीक के विकास के बाद एक राज्य का मुख्यमंत्री (अगर चाहे तो) राजधानी में बैठकर सुदूर जिले के डीएम से आंख में आंख डालकर विकास के सवाल कर सकता है। विकास के इस उलटे पहाड़े ने कई बार पेचीदा जनसंख्या प्रवास को भी जन्म दिया है। जातीय या क्षेत्रीय पहचान के सवाल अक्सर सक्षम मानव संसाधनों को एक राज्य की सीमा में बांध (उस राज्य विशेष के लोग बाहर से आकर वापस बसते हैं और गैर राज्य के लोग बाहर का रुख करते हैं) देते हैं या फिर बाहर रोक देते हैं। क्योंकि राज्य का बंटवारा ही मूल निवासियों को प्रमुखता देने के तर्क पर होता है, इसलिए प्रवासियों की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं। यही वजह है कि छोटे राज्यों में उत्पादक गतिविधियां बहुआयामी नहीं हो पातीं।राजनीति की उम्र हमेशा दिनों व हफ्तों में होती है, जबकि आर्थिक विकास को वर्षो तपना पड़ता है। तेजी से बदलते बाजार और बिल्कुल नए किस्म की उलझनों ने दुनिया के सारे आर्थिक सिद्धातों को पलट दिया है। छोटे राज्यों में बस इतना फायदा जरूर है कि जो नेता कभी सामूहिक और व्यापक जनाधार की राजनीति नहीं कर सकते, उनकी सत्ताकांक्षाएं ये राज्य पूरी कर देते हैं, मगर इससे विकास के सवाल कहां हल होते हैं? छोटे राज्यों की बहस को नए संदर्भो में एक बार फिर परखना चाहिए? तर्कों व तथ्यों पर आधारित बहस में न बसें जलती हैं और न शहर थमते हैं, बल्कि काम के निष्कर्ष जरूर निकल आते हैं।

Sunday, December 13, 2009

गरीबी बनाम गर्मी

यह इस सदी की शायद सबसे पेचीदा गुत्थी है जो दुनिया के वर्तमान और भविष्य से जुड़ी है। बेजोड़ उलझन से भरा यह विमर्श अब तक की सबसे जटिल व सनातन बहसों पर भारी है। ..यह असमंजस है 'हरे' बनाम 'भरे' का। तलाश एक ऐसी दुनिया की जो पर्यावरण से हरी हो मगर समृद्धि से भी भरी हो। .. हरे और भरे को एक दूसरे का पूरक समझने की गलती मत कर बैठियेगा। यह दुनिया के दो नए धु्रव हैं। एक तरफ पिघलते हिमशैलों, उफनते सागरों, सूखती नदियों और बौराते मौसम की गंभीर चिंतायें हैं, तो दूसरी तरफ बेहतर जीवन स्तर, समृद्धि और सुविधाओं की जायज अपेक्षायें हैं। दोनों फिलहाल आसानी से एक साथ नहीं हो सकते क्योंकि दुनिया में समृद्धि का अतीत कोयले, बिजली, तेल के कार्बनी धुएं से निकले जीडीपी ने बनाया है। यानी कि बीता हुआ कल भी इस पेंच को खोलने का कोई सूत्र नहीं देता। दुनिया के कुछ हिस्सों ने पिछली सदी में जिस तरह हरियाली चाट कर खुद को समृद्धि से भरा था, नई सदी में दुनिया के दूसरे हिस्से भी यही करना चाहते हैं। इन्हें अमीरी की अहमियत और गरीबी दूर करने का जो रास्ता दिखा है वह कार्बन फेंकने वाली औद्योगिक प्रगति से ही निकलता है। गैर पारंपरिक ऊर्जा में उम्मीदें जरूर हैं, मगर वक्त लगेगा और पिछड़ी हुई दुनिया जरा जल्दी में है। इसलिए क्या विकसित और क्या विकासशील? किसी को नहीं मालूम कि आर्थिक प्रगति और कार्बन उत्सर्जन की इस जोड़ी को कैसे तोड़ा जाए?
जोड़ी अनोखी, मेल अनोखा
कारें और उद्योग बिजली व तेल जैसे जीवाश्म ईधन पचाकर कार्बन परिवार की गैसें उगलते हैं जिनसे मौसम गरमा रहा है। सारी जिद्दोजहद कार्बन के इस वमन को रोकने की है। बुनियादी तौर पर तलाश उस सूत्र की है जिसके जरिये आर्थिक विकास को कार्बन उत्सर्जन से अलग (डिकपलिंग आफ इकोनामिक ग्रोथ फ्राम कार्बन एमीशन) किया जा सके। मगर यह जोड़ी तोड़ना बहुत कठिन है। दुनिया अपनी अमीरी आर्थिक उत्पादन यानी जीडीपी को बढ़ाकर ही नापती है। पिछले कई दशकों का इतिहास कार्बन की खपत और जीडीपी में बढ़ोत्तरी का स्पष्ट रिश्ता बताता है। लगभग हर देश ने ईधन व ऊर्जा पर आर्थिक प्रगति हासिल की है। हाल के वर्षो में दुनिया की औसत सालाना विकास दर 3.6 फीसदी रही है, मगर 2000 से 2006 के दौरान दुनिया में कार्बन उत्सर्जन भी 3.1 फीसदी की सालाना गति से बढ़ा है। 1990 से 1999 के दौरान भी कार्बन उत्सर्जन का, जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय से सीधा वृद्धिपरक रिश्ता रहा है। पिछली करीब एक चौथाई सदी में दुनिया की अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना हो गया मगर 1990 (क्योटो समझौते) के बाद से दुनिया को गरमाने वाली गैसों का उत्सर्जन भी 40 फीसदी बढ़ गया। कोई शक नहीं कि इस प्रगति से दुनिया ने 60 फीसदी पर्यावरण गंवाया है मगर यह बहस पूरी तरह थकाऊ है कि कौन कितना कार्बन छोड़ रहा है। पिछले आधे दशक में जब दुनिया में तेल की कीमतें रिकार्ड पर थीं तब भी तो खूब तेल फूंका गया। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान अगर ऊर्जा के इस्तेमाल को बेहतर करने का दावा कर रहे हैं तो क्या फर्क पड़ता है उनके इस्तेमाल का सामान बनाने के लिए अब चीन या भारत कार्बन उगल रहे हैं। क्यों उन्हें भी तो उत्पादन बढ़ाने व अमीर होने का हक है।
हरा भी और भरा भी
हरे विकास की बहस उभरने से पहले तक दुनिया को यही मालूम था कि तेज विकास ही गरीबी का इलाज है। भारत को अगले कई दशकों तक लगातार आठ फीसदी विकास दर चाहिए ताकि गरीबी मिटे। दुनिया के कई देशों को और भी तेज दौड़ना होगा मगर खेती हो या उद्योग, परिवहन हो या सेवा, सबको तेल, कोयला जैसे ईधन चाहिए। दिल्ली, ढाका और बैंकाक को लास एजिलिस में अपना भविष्य दिखता है। पिछड़े देशों को आधुनिक शहर, ढेर सारा उत्पादन और भरपूर रोजगार चाहिए। मगर अचानक बदलता मौसम बताने लगा कि पर्यावरण की बर्बादी से आने वाली गरीबी ज्यादा गहरी है। ...दुनिया में एक अरब से अधिक की गरीब आबादी दोनों तरफ से सांसत में फंस गई है। उसकी गरीबी आर्थिक विकास से मिटेगी मगर यही विकास सूखा बाढ़ जैसी आपदाओं के जरिये उसे मारने आ रहा है। हालांकि तेज और निरंतर विकास तो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी चाहिए खासतौर पर मंदी के बाद। दुनिया के देश कार्बन उत्सर्जन घटाने को तो तैयार हैं मगर विकास गंवाने को नहीं हैं। नतीजतन टोपियां घुमाई जा रही हैं और सब सर झटक रहे हैं। विकासशील देश, विकसित देशों को उनका अतीत दिखाते हैं जबकि विकसित देश कहते हैं कि पर्यावरण बिगड़ा तो गरीब मुल्क सबसे ज्यादा गंवायेंगें।
समाधानों पर संदेह
यह बहस तब और गुंथ जाती है जब समाधान नहीं दिखते। विकास को गंदे धुऐं से अलग करने की बहस में हरी तकनीकों या गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की तरफ उम्मीद की नजर जाती है। सौर ऊर्जा से लेकर पवन ऊर्जा तक सफलता की बड़ी कहानियां भी हैं, मगर भरोसा नहीं जमता क्योंकि दुनिया को ढेर सारी ऊर्जा चाहिए सस्ती और निरंतर। इस पैमाने पर यह विकल्प सिर्फ प्रायोगिक हैं। भारत सहित पूरी दुनिया तेल व कोयले जैसे जीवाश्म ईधनों पर भारी सब्सिडी देती है। अमेरिका के इंवायरमेंटल ला इंस्टीट्यूट ने बताया कि अमेरिका ने 2008 तक आठ साल में जीवाश्म ईधनों पर 72 अरब डालर की सब्सिडी दी जबकि गैर पारंपरिक ऊर्जा के लिए महज 29 अरब डालर की। आयल चेंज जैसी संस्थायें कहती हैं जब दुनिया तेल, कोयले, गैस जैसे ईधनों पर 250 अरब डालर सालाना की सब्सिडी दे रही हैं तो फिर किस बात की हरी तकनीक? डर सबको है मगर किसी को किसी की नीयत पर भरोसा भी नहीं है।
पर्यावरण के कुजनेत्स कर्व का सिद्धांत कहता है कि एक निश्चित समृद्धि के बाद विकास कार्बन की खपत खुद घटा देता है। सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन दुनिया में बहुतों का यह कहना है कि उन्होंने तो विकास ही नहीं देखा। जो विकसित हैं वह इस कर्व को पहले सही साबित करें। बहस भारी है। दुनिया को मौजूदा माडल के खतरे दिख गए हैं लेकिन उसे छोड़ा कैसे जाए? कोपनहेगन में मेज पर अरबों डालर और दसियों प्रस्ताव हैं मगर कोई सर्वस्वीकार्य रास्ता नहीं। सौ टके की बात यह कि दुनिया को विकास के लिए साफ ईधन चाहिए और उसके आने तक सब कुछ गोल-मोल है।
तीसरी दुनिया की दिक्कत यह है जब तक वह विकास की गणित समझ पाती तब तक उसे इसके नुकसान दिखने लगे। उसे नहीं समझ में आता कि वह पहले गरीबी घटाये या फिर गर्मी। वह सूडान और सुनामी के बीच खड़ी है। एक तरफ भुखमरी है और दूसरी तरफ पर्यावरण। दुनिया फिलहाल अंधी गलियों में भटक रही है। कोपेनहेगन से उम्मीदों की हरियाली नहीं उलझनों का धुआं ही निकलेगा।
anshumantiwari@del.jagran.com

Tuesday, December 8, 2009

महासंकट की उलटी गिनती!

अगर दिल कमजोर है तो इसे जरा संभल कर पढ़ें। यह एक खौफनाक असली कहानी है जो दुनिया के वित्तीय बाजारों में लिखी जा रही है। यह हारर स्टोरी समाचारी सुर्खियों की शक्ल में कभी भी और किसी भी वक्त दुनिया के सामने फट सकती है। यह यथार्थ मंदी दूर होने के मुगालतों को मसलने की कूव्वत रखता है और दुनिया को संकटों की एक अभूतपूर्व दुनिया में ले जा सकता है। हो सकता है आप यकायक अगली पंक्तियों पर भरोसा न करें मगर यह सच है कि .. 2010 में ब्रिटेन की सरकार कर्ज के संकट में फंस सकती है!! दो हजार दस का बरस दुनिया में सरकारों के दीवालिया होने का बरस हो सकता है!! अर्थात सावरिन डेट क्राइसिस!! मतलब सरकारों का डिफाल्टर होना यानी कि उस कर्ज को चुकाने में चूक जो सरकारों ने अपनी संप्रभु गारंटी के बदले लिया है। ..अतीत में अर्जेटीना को भुगत चुके वित्तीय बाजार के लिए ये जुमले महाप्रलय की भविष्यवाणियों से कम नहीं हैं। दुबई के डिफाल्टर होने के बाद पूरी दुनिया के कई देशों पर अचानक कर्ज संकट के प्रेत मंडराने लगे हैं। कम से कम आधा दर्जन छोटे बड़े देशों में कर्ज का पानी नाक तक आ गया है। इनमें कुछ तो जी 10 और जी 20 देश भी हैं यानी दुनिया के विकसित, बड़े और अमीर भी। वित्तीय बाजार के लिए यह एक महासंकट की उलटी गिनती है क्योंकि जैसे ही दुनिया के केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाना शुरू करेंगे तमाम देश कर्ज चुकाने में चूकने लगेंगे और यह चूक मुद्राओं के अवमूल्यन से होती हुई पता नहीं कहां जाकर रुकेगी।
दुबई तो नमूना है
वित्तीय बाजार कह रहा है कि दुनिया का एक बड़ा देश जल्द ही अपने कर्जो में डिफाल्टर होने वाला है? यह रूस है या फिर ब्रिटेन या कोई और? तकरीबन एक सप्ताह पहले मोर्गन स्टेनले दुनिया को यह विश्लेषण पेश कर दुनिया को चौंका दिया कि वर्ष 2010 में ब्रिटेन ऋण संकट में फंस सकता है। मोर्गन तो सिर्फ आशंका जाहिर कर रहा था, मगर स्टैंडर्ड एंड पुअर ने तो ब्रिटेन की साख को लेकन अपने आकलन को नकारात्मक कर दिया। वित्तीय बाजारों का सूत्रधार ब्रिटेन और रेटिंग एजेंसियों की नजर में साख नकारात्मक? ..हैरतअंगेज या सनसनीखेज? विशेषणों की कमी पड़ जाएगी। रूस भी कर्जो के जबर्दस्त दबाव में है खासतौर पर छोटी अवधि के कर्ज जो उसने तेल कीमतों में तेजी के दौर में अपनी चमकती साख के वक्त लिये थे, इनका भुगतान सर पर है। जर्मनी पर कर्ज का बोझ यूरोपीय बाजारों की सांस रोकने लगा है। जब बड़ों का यह हाल है तो फिर छोटों की कौन कहे? दरअसल दुबई का तूफान पश्चिम और पूरब के कई देशों की वित्तीय बदहाली को उघाड़ गया है। आयरलैंड की अर्थव्यवस्था कर्ज के तूफान में घिर रही है। बाल्टिक देश तो कर्ज के गर्त के सबसे करीब हैं। लाटविया शायद ही मुश्किलों से बचे। एस्टोनिया और लिथुआनिया पर विदेशी कर्ज उनके जीडीपी से ज्यादा हो गया है। बुल्गारिया और हंगरी भी इन्हीं देशों की जमात में हैं। इन छोटे देशों की हालत को हलके में मत लीजिए, एक दुबई की बर्बादी ने दुनिया की चूलें हिला दी हैं इनमें एक देश भी अगर अपनी संप्रभु देनदारियों में चूका तो वित्तीय बाजारों में हाहाकार मच जाएगा।
संकट की सुनामी
संकटों के वक्त हमेशा कुछ सर रेत में धंस जाते हैं। इस मौके पर भी ऐसा ही हो रहा है। दुनिया को मंदी से उबरने की मरीचिका दिखाई जा रही है, लेकिन वित्तीय बाजार में तो संकट की सुनामी बनती दिख रही है। यह संकट दरअसल पिछले कुछ वर्षो की उदार मौद्रिक नीतियों, वित्तीय अपारदर्शिता और बाजार में बहे अकूत पैसे से उपजा है। दुनिया जब सुखी थी या सुखी दिखने का नाटक कर सकती थी, तब सरकारों ने और सरकार की गारंटियों के सहारे कंपनियों ने वित्तीय बाजार से अंधाधुंध पैसा उठाया। मंदी आई तो रिटर्न के स्रोत सूख गए। इसलिए जब कर्ज की पहली देनदारी निकली तो बाजार ने दुबई जैसों को ज्यादा वक्त देने से मना कर दिया। कल बाजार औरों से किनारा करेगा। पूरी दुनिया में ब्याज दरें बढ़ने वाली हैं अर्थात देनदारियों को चुकाने के लिए नया कर्ज महंगा और मुश्किल होगा। इसलिए दुबई के बाद पूरी दुनिया में देशों की रेटिंग उलट-पलट गई है। दुनिया के कर्ज और कर्ज की दुनिया के बारे में दिलचस्पी रखते हैं, तो विश्व के के्रडिट डिफाल्ट स्वैप (के्रडिट डिफाल्ट स्वैप अर्थात सीडीएस वित्तीय बाजार के जाने पहचाने उपकरण हैं। यह एक तरह का बीमा है जो कि एक कर्ज देने वाली संस्था किसी दूसरी संस्था से लेती है। ताकि अगर लेनदार डिफाल्टर हो तो पैसा न डूबे। इसके लिए कर्ज देने वाला स्वैप देने वाले को प्रीमियम देता है।) बाजार की ताजी तस्वीर देखिए। छोटों की कौन कहे यहां तो बड़ों की साख पर बन आई है। चीन के सीडीएस छह फीसदी, रूस के 19 फीसदी, इंडोनिशया के 28 फीसदी महंगे हो गए हैं। दांतों तले उंगली दबाइए क्योंकि फ्रंास, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन, स्पेन और यहां तक अमेरिका भी कर्ज बाजार के ऋण जोखिम के सूचकांकों पर खतरे वाली श्रेणियों में चमकने लगे हैं। इन मुल्कों में कर्ज और जीडीपी का अनुपात खतरनाक हो गया है। जर्मनी का कुल कर्ज अगले साल उसके उत्पादन के 77 फीसदी के बराबर हो जाएगा। ब्रिटेन में यह 80 फीसदी है तो जापान में यह 200 फीसदी पर पहुंच रहा है। अमेरिका में ट्रेजरी यानी सरकार के कुल कर्ज का करीब 44 फीसदी हिस्सा अगले एक साल में चुकाया जाना है। तभी तो दुनिया विशेष ऋण बाजार में अमेरिका की साख को मिली ट्रिपल ए रेटिंग पर हैरत के साथ हंस रही है।
बचाएगा कौन?
कर्ज संकटों के इतिहास से वाकिफ कोई व्यक्ति कह सकता है कि आईएमएफ किस दिन काम आएगा। मगर देशों के कर्ज संकट के दो पहलू हैं, एक विदेशी कर्ज और दूसरादेशी। लाटविया, एस्टोनिया जैसे देशों पर विदेशी कर्ज है। आईएमएफ इन्हें विदेशी मुद्रा देकर कुछ समय के लिए बचा सकता है। अलबत्ता आईएमएफ का इलाज लेने वाले देशों की वित्तीय साख का कचरा बन जाता है। अर्जेटीना इसकी ताजी नजीर है। आईएमएफ की मदद लेने वाले देशों की कंपनियां दुनिया के बाजार में अछूत बन जाती हैं। हो सकता है ब्रिटेन, जापान, जर्मनी को आईएमएफ की जरूरत न पड़े, लेकिन इनके संकट आईएमएफ सुलझा भी नहीं सकता। ये देश घरेलू कर्ज की जकड़ में हैं। इन्हें ज्यादा घरेलू मुद्रा छापकर कर्ज पाटना होगा या फिर टैक्स बढ़ाना और खर्च घटाना होगा। इनमें से हर कदम खतरों भरा है। भारी राजकोषीय घाटे और नोटों की छपाई देशी मुद्रा का अवमूल्यन करती है और सरकार को अपने बांड खरीदने वाले भी नहीं मिलते। कर बढ़ाना और खर्च घटाना, मांग कम करता है और कर चोरी बढ़ाता है।
और भारत ?. आप कह सकते हैं कि कुछ सुरक्षित है या कुछ अर्थो में कतई सुरक्षित नहीं है। सरकार भले ही कर्जदार न हो, लेकिन वित्तीय बाजार तो दुनिया से जुड़ा है, इसलिए संकट की सुनामी हमें डुबाए भले न, लेकिन झकझोर जरूर देगी। हमारे लिए इतना ही काफी है। देशों के ऋण संकट वित्तीय बीमारियों की फेहरिस्त में सबसे भयानक हैं। इसके इलाज आर्थिक शरीर को बुरी तरह तोड़ देते हैं और अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो जाती है। अर्जेंटीना छह साल बाद आज भी घिसट रहा है और मेक्सिको को पुरानी रौ में आने में वक्त लगेगा। कभी-कभी यह लगता है कि दुनिया का वित्तीय एकीकरण फायदे से ज्यादा नुकसान का सौदा साबित हो रहा है। अर्जेटीना की सुनामी ने केवल लैटिन अमेरिका के बाजारों को हिलाया था मगर अब जो सुनामी बन रही है, वह पूरे भूमंडल के वित्तीय बाजारों को लपेट सकती है। वजह यह कि उदारीकरण के लाभ भले ही सामूहिक न हों, मगर गलतियां और नुकसान सामूहिक रहे हैं। इसलिए 2012 की फिक्र छोडि़ए.. 2010 वित्तीय बाजारों पर बहुत भारी पड़ सकता है।
---------------------

Tuesday, December 1, 2009

समृद्धि का नकलिस्‍तान

दुनिया का सबसे महंगा होटल, सबसे बड़ी शॉपिंग मॉल, रेगिस्तान के बीच आइस स्कीइंग का इंडोर स्टेडियम, समुद्र के बीच शानदार इमारत... पिछले करीब दो दशकों में दुनिया का बहुत कुछ शानदार ठीक हमारे पड़ोस में उगा है और वह भी रेत बीच जहां तेल तक नहीं था। अब इस स्वर्ग के ढहने की बारी है। दुबई तो इस साल की शुरुआत से ही ढह रहा है मगर हमें पता तब तक इसने अर्जेटीना की राह पकड़ ली जो इसे दीवालियेपन की तरफ ले जाती है। दुबई नई उदार दुनिया का एक ऐसा अनोखा मॉडल है जिसमें अपनी पूंजीवाद न्यूनतम अच्छाइयों और अधिकतम बुराइयों के साथ मुखरित हुआ था। अचल संपत्ति लालच, कर्ज और खोखले विकास का यह मॉडल जितने कम वक्त में उभरंा था उससे भी कम समय में जमींदोज होने लगा है। खरबों डॉलर के वित्तीय संकट के धुंऐ के छंटने की उम्मीद में वित्तीय दुनिया जब आंखे खोलने की कोशिश कर रही थी तब दुबई के बवंडर की रेत इसकी आंखों में भर गई है।
रेत के महल. सच में !
नकली विकास का क्या मतलब होता है? दुबई से अच्छा कोई सबक नहीं है। नखील.. यही तो नाम है दुबई की उस कंपनी का जिस कर्ज न चुका पाने से यह पूरी कहानी शुरु हुई है। समृद्धि का नखलिस्तान बनाने की कोशिश में लगी दुबई सरकार की यह कंपनी नकली विकास का प्रतीक बन कर उभरी है। दुबई पास सिर्फ तीन चीजें थीं। एक समृद्ध अरबी का पड़ोसी, दूसरी शेखों की सल्तनत जिसमें कानून बनाना व बदलना आसान था और एक दूरदर्शी व आधुनिक उदारता, जो अरब के अन्य मुल्कों में दुर्लभ थी। यह दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के परिवार को अन्य अरब शेखों से अलग करती है और चौथा खुद ब्रांड दुबई यानी कामयाब मार्केटिंग। इन चार के सहारे कोई देश लंबे समय तक नहीं खड़ा हो सकता अलबत्ता इन्होंने मिलकर दुबई को चुटकियों में कमाई कराने वाली मरीचिका जरुर बना दिया। तेल की नेमत से महरुम दुबई सत्तर के दशक तक महज एक बंदरगाह था। नब्बे के दशक में यह अमीर अरब देशों की बदौलत व्यापार का केंद्र बन गया। मगर दुबई की अचंभित कर देने वाली नई तस्वीर महज दस साल पहले बननी शुरु हुई थी। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि अमेरिका जब डब्लूटीसी ढहा तो दुबई में इमारतों के शिखर कंगूरे बनने शुरु हुए। आकलन है कि कानूनों में बदलाव और सख्ती से डरे अरब के समृद्ध निवेशक करीब एक खरब डॉलर वापस मध्य पूर्व में लाए थे और जिन्होंने अचल संपत्ति के कारोबार को चमका दिया। रुस के अमीरों ने इसे बढ़ाया और ब्रिटेन डेवलपरों व फाइनेंसरों को इसमें मोटी कमाई मिली जिनके पीछे लंदन का उदार वित्तीय बाजार खड़ा था। 2003 के ईराक युद्ध के बाद तेल से कमाने वालों का अकूत धन भी इस कथित स्वर्ग में लगा और कुछ वर्षों के भीतर दुबई में इतना कुछ बन गया कि देखने वाले हैरत में पड़ गए। चाहे वह बुर्ज अल अरब होटल हो या समुद्र के बीच बन रहा नखील का स्वप्निल पाम जुमेरा या मरुस्थल के बीच स्कीइंग अथवा 1.5 अरब डॉलर की लागत से होटल अटलांटिस जिसकी उद्घाटन पार्टी पर ही 20 लाख डॉलर खर्च हुए थे। दुनिया की 25 फीसदी विशालयकाय क्रेनें अकेले दुबई में खपने लगीं और निर्माण के आधुनिक आश्चर्य डिस्कवरी व नेट जिओ जैसे चैनलों की नियमित कथाओं में बदल गए। छोटे से दुबई में इस साल फरवरी तक करीब 4000 इमारतें बन रही थीं।
छोटा नहीं है यह बवंडर
दुबई का संकट विशुद्ध रुप से अचल संपत्ति का है दुबई के पास इसके अलावा कुछ है भी नहीं। जमीन और भवनों की बेसिर पैर कीमतें। मकान बनने से पहले ही कई बार बिक जाना और अंधाधुंध मुनाफा। अकेले इस साल दुबई में 60,000 अपार्टमेंट बिकने को तैयार थे। मंदी से मांग घटी और सब कुछ ढह गया बचा सिर्फ कर्ज और बेकारी। इस साल फरवरी में जब बुर्ज दुबई ने 2.5 अरब डॉलर के कर्ज के लिए रिफाइनेंस की अर्जी डाली थी तभी से यह स्पष्ट हो गया था कि दुबई में अचल संपत्ति का गुब्बारा फूटने की तरफ बढ़ रहा है। बुर्ज को अमीरात के दो बैंकों ने मदद की लेकिन कुछ माह के भीतर ही नखील के लिए कर्ज मुश्किल बनने लगा और जोखिम भरी रेटिं" के कयास लगने लगे। इस वक्त दुबई की कई सरकारी व गैर सरकारी कंपनियां और दुबई वाटर एंड इलेक्टिसिटी अथॉरिटी कर्ज भुगतान टलवाने वालों की कतार में आ गए थे। अगर कोई इसे सिर्फ 80 अरब डॉलर का संकट मान रहा है तो वह गलती पर है। यह कर्ज सिर्फ नखील और दुबई व‌र्ल्ड या डीपी व‌र्ल्ड जैसे सरकारी डेवलपरों का है। इससे कहीं ज्यादा कर्ज लेकर निजी कंपनियां वहां आई थीं और इमारतें बना रहीं थीं। दुबई का संकट इसलिए गहराने वाला है क्यों कि इसमे केवल अरब के धनकुबेरों का नहीं पैसा नहीं लगा तमाम बैंकरों, वित्तीय संस्थाओं, ने शेयर व बांड बाजारों से पैसा जुटा कर भी नकली स्वर्ग लगाया है। दुबई में यह बीमारी 'यादा बड़ी है, मगर कतर और अबूधाबी में पिछले कुछ सालों में दुबई की नकल गई है। पूरे अमीरात में बन रही लगभग आधी अचल संपत्ति परियोजनायें बंद हो गई हैं। जिनकी संयुक्त लागत 582 अरब डॉलर है। इनमें बहुचर्चित पाम जुमेरा सहित स्नोडोम और दुबई के इर्द गिर्द अरब कैनाल जैसी परियोजनायें भी हैं। कतर में भी मुश्किल है और कुवैत का एक बड़ा निवेश बैंक इस साल की शुरुआत में दो करोड़ डॉलर के कर्ज में डिफाल्टर हो चुका है। यानी कि यह रोग अरब में और फैलेगा और मारेगा उन प्रवासियों जो यहां अपनी जीविका के लिए आए थे।
शानदार गलतियां करने की कला
दुबई ने उन गलतियों को ज्यादा भव्य और बेफिक्री के साथ किया जिन्हें अन्य देश पहले से करते आए हैं। यानी अचल संपत्ति पर आधारित विकास और कर्ज का सहारा। मगर दुबई का पूरा आर्थिक मॉडल एक मामले में दुनिया में अनोखा और सबसे ज्यादा जोखिम भरा हो गया। दुबई ने अपने इस पूरे विकास में जिन्हें बाजार बनाया वह दुनिया का बहुत समृद्ध तबका था। जबकि कर्ज और अचल संपत्ति के जोखिम को कम से एक बड़ा देशी बाजार तो चाहिए ही। मगर दुबई की अधिकांश आबादी प्रवासियों की है जो सिर्फ काम करने के लिए आए हैं। विकास के बेहद महंगे मॉडल को इस महंगे मॉडल को थामने के लिए न तो देश के भीतर कोई बड़ा बाजार था और कोई दूसरा उद्योग। देश की अधिकांश आबादी प्रवासियों की है। बन रहे भवनों, होटलों या मॉल में जिनके लिए कोई जगह नहीं है। दुबई के पास कोई प्राकृतिक संसाधन या निर्यात भी नहीं है। विदेशी मुद्रा का स्रोत पर्यटन व सेवायें हैं, जिनका बाजार बहुत संवेदनशील है। इसलिए जब मंदी आई तो बड़े ग्राहक किनारा कर "ए और कर्जदारों ने अंगूठा दिखा दिया। दुबई पड़ोसी भी अपनी साख का लेकर चिंतित हैं इसलिए मदद पता नहीं कितनी होगी।
मार्केटिंग की दुनिया का प्रिय जुमला है कि अगर कोई कहानी किसी खास ढंग से सुनाई जाए तो यह भी एक अच्छा कारोबार है.. दुबई ने दुनिया को अपनी कहानी बहुत कायदे से सुनाई। दुबई पिछले दशक की सबसे बड़ी ब्रांडिंग सफलता है। संसाधनों से महरुम दुबई ने बहुत नपे तुले ढंग से स्वयं दुनिया की सबसे भव्य, सुंदर, सर्वश्रेष्ठ, आरामदेह और प्रतिष्ठित जिंदगी देने वाले देश के रुप में और प्रस्तुत किया। ब्रांड दुबई ने दुनिया के हर बड़े चर्चित व्यक्ति को खींचा नतीजतन तमाम तरह की अनोखी परियोजनायें जो कभी नहीं बनीं मगर चर्चा में रहीं। दुबई सिंगापुर की तरह एक व्यापार केंद्र बनने निकला था और अंतत: बन गया अचल संपत्ति का कैसिनो यानी जुआघर। दुनिया को सीखना चाहिए कि कुछ लाख अरबपतियों के बसने या सबसे भव्य इमारतो से कोई अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती। माफ कीजिये! दुबई ने जल्दी ढह कर दुनिया पर उपकार किया है।
anshumantiwari@del,jagran.com

Monday, November 23, 2009

लूट के सरपरस्त

पैसा चाहे दान का हो या लूट का, सफेद हो या काला, श्रम से आया हो या धतकरम से, निवेश से मिला हो या उपनिवेश से.. पैसा अपना रास्ता तलाश ही लेता है। काले पैसे की दुनिया में अकेले सिर्फ देने, लेने या लूटने वाले हाथ ही नहीं होते बल्कि इसे सहेजने, संजोने, निवेश करने और लूट को धोने की लॉंड्री चलाने वाले हाथ भी होते हैं। तब ही तो राजनीतिक भ्रष्टाचार जरिये दुनिया में हर साल 1.6 खरब डालर की लूट (विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ का आकलन)होती है, जो कैरेबियन कैमन आइलैंड,अफ्रीका में लाइबेरिया से लेकर यूरोप में लंदन और पूर्व में मकाऊ तक कर बचाने के स्वर्गो छिप जाती है या फिर शेयर बाजार और अचल संपत्ति के धंधे में खप जाती है। बड़ी दिलचस्प बात है कि लूट के इस खेल में देने लेने वाले हाथ भले ही छिपे हों लेकिन लूट की हिफाजत करने वाले हाथ सबको दिखते हैं। काली कमाई को धोने वाले यह हाथ इतने उजले हैं कि इन्हीं के जरिये विकासशील देशों के भ्रष्ट राजनेता और अपराधी हर साल 500 से 800 अरब डॉलर यानी प्रतिदिन करीब दो अरब डॉलर पार कर देते हैं।
लूट का माल जमीन में डाल
भ्रष्ट राजनेताओं से लेकर चालबाज उद्यमियों तक जमीन सबके कुकर्म को शरण देती है तभी तो अचल संपत्ति कीमतों में कोई तुक तर्क नहीं होता और सत्यम के संकट की पृष्ठभूमि राजू परिवार के अचल संपत्ति निवेशों से जुड़ती है। भारत के उभरते हुए शहर अचल संपत्ति के निवेशकों का स्वर्ग हैं और वित्त मंत्रालय के ताजे आंकड़ो मुताबिक 2008-09 में करीब 2000 करोड़ रुपये के कर चोरी मामलों के साथ भारत का अचल संपित्त क्षेत्र काली कमाई की जन्नत है। अंतरराष्ट्रीय संगठन फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की रिपोर्र्टे अचल संपत्ति और मनी लॉड्रिंग के रिश्ते बखानने वाले उदारहणों से भरी पड़ी हैं। अमेरिका में यह मानने वालों की कमी नहीं है कि दुनिया को हिलाने वाला वित्तीय संकट वहां की अचल संपत्ति के भ्रष्टाचार से उपजा था। अमेरिकी जनता को अपने अचल संपत्ति डेवलपरों संगठन नेशनल एसोसिएशन ऑफ रिएलटर्स की ताकत का अंदाजा है। यह 2008 में अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनावों में यह संगठन चंदा देने वालों में सबसे ऊपर था। बताते चलें कि अमेरिका में 2006 तक दस सालों के दौरान संदेहास्पद वित्तीय गतिविधियों के करीब 260 मामलों में 132 केवल अचल संपत्ति से संबंधित थे। दरअसल अचल संपत्ति के कारोबार में काली कमाई को धोना सबसे आसान है क्यों कि यहां कर्ज, ट्रस्ट, फर्जी कंपनियों सहित दर्जनों ऐसे रास्ते हैं रास्ते जहां लूट का माल खप जाता है इसलिए कर चोरी के स्वर्गो की दुनिया में जमा धन भी बडे़े पैमाने पर अचल संपत्ति के अंतरराष्ट्रीय खेल में पनाह पाता है। इन जन्नतों में सब माफ
कर बचाइये,संपत्ति प्रबंधन सेवा का लाभ उठाइये। .. दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय पत्रिकाओं में आमतौर पर छपने वाले इस तरह के विज्ञापन कर चोरी के स्वर्गो से जुडे़े एजेंटों के होते हैं। जी 20 की बैठकों में होने वाले दिखावे पर मत जाइये। इस वित्तीय संकट से पहले भी दुनिया में कर चोरी के स्वर्ग थे और अब भी करीब 70 टैक्स हैवेन काम कर रहे हैं, जिनमें से 25 तो यूरोप में हैं। दुनिया के भ्रष्ट नेताओं की लूट यहां किस तरह पनाह पाती है इस पर अगर किसी को शक हो तो उसे स्विटरजरलैंड के विदेश मंत्री के अप्रैल में दिये गए बयान को याद करना चाहिए। जिसमें उन्होंने माना था कि नाइजीरिया में रिश्वतखोरी के 1800 लाख डॉलर स्विस बैंकों में जमा हैं और सरकार इसे वापस करने को तैयार है। इन कर स्वर्गो के सहारे दुनिया के देशों के लूट के अरबों डॉलर उड़ जाते हैं। तभी तो चैनल आईलैंड के बैंकों में 1975 से जमा राशि जो अरब डॉलर थी पिछले साल 200 अरब डॉलर पहुंच गई है। स्वतंत्र अध्ययनों में यह माना गया है कि इन लूट के पनाहगारों के पास करीब 2.7 खबर डॉलर जमा हैं जो कि दुनिया में कुल बैंक जमा का 20 फीसदी है। भ्रष्ट नेता, अधिकारी व कंपनियों के जरिये विकासशील मुल्कों से होने वाली कैपिटल फ्लाइट के सहारे यह जन्नतें इस कदर गुलजार हैं यिह आईएमएफ को यह कहना पड़ा कि दुनिया के वित्तीय बाजारों में लगभग एक तिहाई निवेश टैक्स हैवेन के जरिये होता है। अंकटाड को सुनिये जो यह कहता है कि दुनिया का एक तिहाई प्रत्यक्ष निवेश कर चोरी के स्वर्गो के जरिये होता है।
वित्तीय बाजार में सबका उद्धार
काली कमाई है तो उसे अचल संपत्ति में धोइये और कर स्वर्गो में संजोइये। बाद में तो सब वित्तीय बाजार में ही आना है क्यों कि लक्ष्मी चंचला है और दुनिया के वित्तीय बाजार उसका क्रीडांगन हैं। कर स्वर्गो में जमा राशि से दुनिया वित्तीय बाजार झूमते है ंऔर हेज फंड मौज करते हैं। दुनिया को 1998 में कनाडा के वाईबीएम मैगेक्स कार्पोरेशन को नहीं भूलना चाहिए जिसे अरबों डॉलर की मनी लॉड्रिंग का स्रोत माना गया था और शेयर बाजार से हटा दिया गया था। इस तरह की पता कितनी और कंपनियां शेयरों से लेकर जिंस बाजारों तक फैली हैं जिनका अतीत और वर्तमान नहीं परखा जाता। वह तो वित्तीय बाजारों की लहरों पर मौज करती हैं और सफाई के साथ लूट का माल बाजारों में खपा देती हैं। कर स्वर्गो से निकला धन चूंकि उजला होता है इसलिए इसे पोर्टफोलियो निवेश में गिना जाता है फिर चाहे वह पैसा अचल संपत्ति की कीमतों में आग लगाये या शेयर और जिंस बाजारों को बेसिर पैर वजहों से उछाल दे। वित्तीय उपकरणों की इतनी किस्में आ चुकी हैं कि उनके बीच घूमकर सब कुछ साफ हो जाता है। तभी तो अमेरिकी सीनेट समिति ने केपीएमजी की जांच में यह पाया था वह कई तरह के अवैध कर बचत वित्तीय उपकरण बेचती है। मार्टगेज कर्जो से लेकर बीमा उद्योग तक पसरे खरबों के डॉलर के पोर्टफोलिया निवेश कौन सा पैसा कहां से आया है किसीको नहीं मालूम। बस पैसा एक बार इस मशीन में आ जाए तो वह साफ होकर ही निकलता है। दुनिया को अनाज, रोजगार, मकान, पानी, दवा, सड़कें और बिजली चाहिए। इन्हीं के लिए तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य तय किये जिनके जरिये 2015 तक दुनिया से भूख व गरीबी मिटाई जानी है। हैरत में पड़ जाएंगे आप कि दुनिया को रहने लायक बनाने के इन लक्ष्यों अधिकतम लागत अधिकतम 528 अरब डॉलर है जो विकासशील देशों से हर साल होने वाली लूट से कम है। दुनिया इस खुली चोरी पर शर्मिदा है, मगर यह शर्मसार दुनिया गुस्से की नहीं हमारी की दया की पात्र है। क्यों कि देने लेने वाले हाथों को बांधने की बात तो दूर यह लूट के माल को ठिकाने लगाने के ठिकाने भी बंद नहीं कर पाती। काले धन की खपत रुक जाए तो इसकी पैदावार भी रुक सकती है, मगर लुटने वालों की बदकिस्मती तो देखिये कि दुनिया में आर्थिक उदारीकरण के बाद वित्तीय मशीन को चिकना करने लगी है। .. मूरत संवारने में बिगड़ती चली गई, पहले से हो गया है जहां और भी खराब।
anshumantiwari@del.jagran.com

Tuesday, November 17, 2009

समृद्धि का अभिशाप

मधु कोड़ा को तो कोस ही रहे हैं न, लगे हाथ कुदरत को भी कोसिये, कानून को भी और साथ में खुद को भी। कुदरत जहां जमीन के नीचे समृद्धि का हिरण्य (सोना) भर देती है वहां जमीन के ऊपर हमेशा हिंसा,अपराध और भ्रष्टाचार का महाअरण्य उग आता है। इसलिए ही तो महज एक दशक के राजनीतिक अतीत और तीस माह से भी कम के कार्यकाल में मधु कोड़ा भारत में राजनीतिक भ्रष्टाचार के महा खलनायक बन जाते हैं। चौंकिये मत, मधु कोड़ा दुनिया के उन असंख्य घृणित भ्रष्टाचार प्रसं"ों में एक नया संदर्भ हैं जो खनिजों से भरी धरती के ऊपर जन्मते रहे हैं। सीको मोबोतू, (जैरे के पूर्व शासक) सानी अबाचा (नाइजीरिया के पूर्व शासक) और युवारो मुसुवेनी (युगांडा के पूर्व शासक) आदि ने जिस तरह खनिज संपत्ति से भरपूर वसुधा पर भ्रष्टाचार के अप्रतिम भवन बनाये थे मधु कोड़ा ने भी ठीक उसी तरह झारखंड में भ्रष्टाचार के शिखर गढ़े हैं। प्राकृतिक समृद्धि अक्सर सत्ता तंत्र को बिगाड़ती है तभी तो दुनिया के सर्वकालिक दस महाभ्रष्ट नेताओं में से आधे से अधिक का रिश्ता किसी न किसी तरह से प्राकृतिक समृद्धि की जमीनों से है। इन्हें देखकर ही आर्थिक दुनिया को समृद्धि के अभिशाप या रिसोर्स कर्स का सिद्धांत गढ़ना पड़ा। खनिजों से भरपूर धरती के ऊपर अगर कानून ढीले और नेता लालची हों तो वहां डेमोक्रेसी या आटोक्रेसी नहीं बल्कि क्लेप्टोक्रेसी (लूट का शासन)राज करती है, जो सिर्फ लूटना और लुटाना जानती है। दीन हीन और दरिद्र अधिकांश अफ्रीका आज इसी समृद्धि से शापित और इस प्रणाली से शासित है। झारखंड भारत में इस अभिशाप और शासन की एक ताजी बानगी है।
गरीब बनाने वाली अमीरी
झारखंड को अगर कुछ देर के लिए हम एक स्वतंत्र देश में मान लें तो अफ्रीका में इसके कई समतुल्य मिल जाएंगे। यहां वह सब कुछ है जो एक रिसोर्स कर्स्ड यानी समृद्धि से शापित किसी मुल्क में होता है। जाम्बिया, कांगो, नाइजीरिया, सिएरा लियोन, अंगोला, लाइबेरिया हो सकता है कि झारखंड से बदतर हों लेकिन समृद्धि के अभिशाप के मामले में झारखंड उनके ही जैसा है। अफ्रीका के इन सभी अजीबोगरीब बदकिस्मत में मुल्कों में गृह युद्ध, हथियार बंद गिरोह, मौत, बीमारी, गरीबी का साम्राज्य वर्षो से है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन देशों को निचोड़ती हैं और भ्रष्ट राजनेता व नौकरशाह सभी सुख भोगते हैं। रक्तपात, भ्रष्टाचार, रिश्वत देने वाली कंपनियां, दरिद्र जनता और कमजोर विकास दर, समृद्धि से अभिशप्त किसी भी क्षेत्र की पहचान हैं और झारखंड में यह सब पूरी ठसक के साथ मौजूद है। यहां सिएरा लिओन जैसा गृह युद्ध भले न हो मगर नक्सलवाद है तो जो संगठित पुलिस व सुरक्षा बल पर हमला करता है। गरीबी की रेखा नीचे एक बड़ी आबादी है, तरह तरह से छले जाते आदिवासी है और इन सब के ऊपर मधु कोड़ाओं का भ्रष्ट तंत्र है। समृद्धि के अभिशाप को फलीभूत होने के लिए और क्या चाहिए? इसलिए ही तो एक सीमित क्षेत्र में तेल, हीरे, सोने अन्य खनिजों की भरमार को दुनिया अर्थशास्त्री अवसर कम आफत ज्यादा मानते हैं। क्यों कि प्राकृतिक समृद्धि कुछ ऐसी पेचीदा आर्थिक विसंगतियां पैदा कर देती जिससे बहुत किस्मत वाले राष्ट्र निकल पाते हैं।
खोदो-खाओ-खिलाओ
भारत की 40 फीसदी खनिज संपदा अपने गर्भ में संजोये झारखंड की विकास दर आखिर राष्ट्रीय आर्थिक विकास दर या कई अन्य रा'यों से कम क्यों है? क्यों सालाना करीब 6000 करोड़ रुपये के खनिज उत्पादन वाले इस राज्य में 75 फीसदी लो"ों के पेट में दाना खेती से ही पड़ता है? दुनिया भर अर्थशास्त्री यह गुत्थी नहीं सुलझा पाते आखिर प्रकृति से उपकृत देश या राज्य विकास में उन देशों या राज्यों से पीछे क्यों होते हैं जहां प्राकृतिक संसाधनो की इतनी भरमार नहीं है। दरअसल प्राकृतिक समृद्धि जल्दी पैसा कमाने का मौका देती है। खनिज निकालने के लिए उद्योग बिठाने की जरुरत नहीं होती। इसलिए जो देश अकूत खनिजों के धनी हैं वहां औद्योगिकीकरण कम होता है और कमाई कुछ लोगों के हाथ केंद्रित है। अफ्रीकी देश गैबन प्रतिदिन तीन लाख बैरल तेल निकालता है, लेकिन यहां सब कुछ आयात होता है। नाइजीरिया में दुनिया का सबसे दसवां सबसे बड़ा तेल भंडार है लेकिन नाइजर डेल्टा के लोग पत्थर युग में जी रहे है। कांगो की कहानी दुनिया जानती है और लाइबेरिया की लकड़ी बेचकर हथियारबंद गुरिल्ला गिरोह एक दूसरे को मारते हैं। खनन उद्योग वह सरकारों को अच्छे राजस्व और राजनेताओं को शीघ्र धन लाभ के नायाब सूत्र देता है और खनन के अधिकार हासिल कर संगठित मैन्युफैक्चरिंग उद्योग पनपने की संभावनायें समाप्त कर देता है। समृद्धि के अभिशाप का एक पहलू यह भी है कि एक जगह एक खनिज का बड़ा भंडार मिलने के बाद अन्य स्थानों पर इसे तलाशने की कोशिशें धीमी पड़ जाती हैं। खनिज अपनी खनन लागत से ज्यादा रिटर्न देते हैं इसलिए यह चोखा धंधा है और खनन उद्योग भ्रष्टाचार के लिए दुनिया में बदनाम है।
कानून की कठपुतलियां
ढाई साल में तो कोई मुख्यमंत्री सत्ता व प्रशासन की बारीकी समझ पाता है और वह भी जब उसे पहली बार यह कुर्सी मिली हो लेकिन कोड़ा ने ढाई साल में सब कुछ कर लिया। खनिजों से भरपूर क्षेत्रों में ऐसा होना आम बात है। दरअसल प्राकृतिक समृद्धि, रिश्वत देने वाली कंपनियां और लालची नेता मिलकर एक दुष्चक्र बना देते हैं जिनके बीच फंसकर कानून कठपुतलियों की तरह नाचते हैं। खनन उद्योग सबसे जल्दी कमाई कराता है इसलिए यहां राजनेता आनन फानन मे कानून बदलते हैं। खनन उद्यो" से जुड़े लोग अक्सर चुटकी लेते हैं कि इस कारोबार में फाइलें सबसे तेज चलती हैं। कमजोर संस्थायें और व्यवस्था तथा निवेश करने वाले भ्रष्ट मगर बड़े नामों का प्रचार तंत्र राजनेताओं पूरी मदद देता है। इसलिए खनिज से धनी देशों में भ्रष्टाचार पूरी तरह संगठित है। बल्कि अब दुनिया की कंपनियां तो इस बात पर बहस करती हैं कि राजनीतिक भ्रष्टाचार का सुहार्तो मॉडल उचित है या भारतीय मॉडल। कोरिया या इंडोनेशिया में लेनहार एक ही था मगर भारत में कई हैं। अगर कानून कमजोर हों तो लोकतंत्र में भ्रष्टाचार किसी अन्य शासन प्रणाली से ज्यादा होता है और सरकारें अस्थिर व कमजोर हों तो फिर क्या कहने? यही वजह है मैनकर ओल्सन(लॉबीइंग या इंटरेस्ट ग्रुप सिद्धांत के प्रणेता) ने शायद भ्रष्टाचार के संदर्भ में कहीं लिखा था कि घुमंतू लुटेरों से तो स्थायी लुटेरे ठीक हैं। अर्थात भ्रष्ट सरकारें स्थिर हों तो भी राहत है कम से कम कुछ तो तय होता है।
ऐसा नहीं है कि खनिजों से मालामाल दुनिया के सभी देश अभिशप्त हैं। अफ्रीका में बोत्सवाना, यूरोप में नार्वे, उत्तर अमेरिका में कनाडा, ओशेनिया में ऑस्ट्रेलिया ऐसे देश हैं जिन्होंने समृद्धि के अभिशाप को बेअसर किया है। हीरे जैसे अभिशप्त खनिज से भरपूर बोत्सवाना के ईमानदार राजनेताओं व मजबूत संस्थाओं उसे अंगोला या नाइजीरिया नहीं बनने दिया और अपने मुल्क को दुनिया की सबसे तेज विकास वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया। दुनिया का तीसरे सबसे बड़े तेल निर्यातक नार्वे ने भी अपनी प्राकृतिक समृद्धि को कायदे से संभाला है। भारत में झारखंड प्राकृतिक समृद्धि से आने वाली बीमारियों का बनता हुआ नमूना है। भारत के कुछ अन्य राज्य भी इससे नसीहत ले सकते है क्यों कि भ्रष्टाचार व हिंसा के रुप में समृद्धि का अभिशाप इस राज्य पर असर करता दिखने लगा है। अगर कोई सबक ले तो संभावनामय झारखंड बोत्सवाना बन सकता है नहीं तो इसकी हिरण्यगर्भा धरती इसे हथियार बंद गिरोहों और भ्रष्ट नेताओं का अभयारण्य बनाने लगी है। anshumantiwari@del.jagran.com

Monday, November 9, 2009

देनहार कोई और है...

सिमेंस, बीएई सिस्टम्स, ल्युसेंट, केलाग्स ब्राउन, सन माइक्रोसिस्टम्स और रायल डच शेल में क्या समानता है? यह सभी बहुराष्ट्रीय दिग्गज रिश्वत देने वाली कंपनियों की सूची (अमेरिकी जस्टिस विभाग) के सरताज हैं। फर्डिनांडो मार्कोसों और अल्बर्तो फुजीमोरियों से लेकर मधु कोड़ाओं तक की गिनती लगाते हुए हम यह भूल ही गए कि देने वाले हाथ भी होते हैं। यह नाम देने वाले दिग्गज हाथों में से कुछ के हैं जो यह आर्थिक उदारीकरण के नए और बहुरूप चेहरों से नियंत्रित होते हैं। यह पूरा परिदृश्य भ्रष्टाचार के बड़े राजनीतिक चेहरों के बीच गुम जाता है, क्योंकि उदारीकरण के गुन गाते और भ्रष्टाचार को गरियाते हम यह यह तलाशना भी भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार को कहीं उदारीकरण से पोषण तो नहीं मिलने लगा है? दरअसल अगर लाइसेंस परमिट राज भ्रष्टाचार का पूर्णत: सरकारी और केंद्रित स्वरूप था तो उदारीकरण, कई संदर्भो में, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार जैसे धतकरमों के विकेंद्रीकृत और अभिनव प्रयोग लेकर आया है। देने वाले और लेने वाले हाथ तो वही हैं, लेकिन लेन-देन के ढंग ढर्रे ज्यादा चुस्त, चतुर और पेचीदा हो गए हैं। पूरी दुनिया वित्तीय कुकर्मो की इस नई पीढ़ी से हलकान है अलबत्ता लेने-देने वालों की पौ-बारह है।
गरम मुट्ठी लाख
कीब्रिटेन की हथियार निर्माता बीएई सऊदी अरब में जेट का सौदा हथियाने के लिए अरबों डालर की रिश्वत दे डालती है। मामला ब्रिटेन के सीरियस फ्राड आफिस के पास है। जर्मन कंपनी औद्योगिक दिग्गज सिमेंस ठेके लेने के लिए दुनिया में एक अरब डालर की रिश्वत बांट पता नहीं कितनों को भ्रष्ट कर देती है। केलाग्स नाइजीरियन नौकरशाहों को रिश्वत की लत लगा देती है तो ल्युसेंट चीन के भ्रष्टाचार पोषक माहौल में खुलकर खेलती है। ..यह सूची बहुत लंबी है और इसमें दर्ज नामों में दिग्गजों की कमी नहीं है। अमेरिका का जस्टिस विभाग ऐसी 120 कंपनियों के खिलाफ जांच कर रहा है, जिन्होंने दुनिया में बहुतों का ईमान बिगाड़ा है। ओईसीडी हर साल एक रिपोर्ट जारी कर दुनिया को कारोबारी दुनिया में रिश्वतखोरी की डरावनी तस्वीर दिखाता है और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल हर साल सर पीटता है, मगर देने वाले हाथ हमेशा लंबे और मजबूत साबित होते हैं। संभावनामय बाजारों के दरवाजे पर नीतियों की मुहर लेकर बैठे राजनेता और नौकरशाह इनके आसान निशाने हैं। यह राजनेता इन कंपनियों को सिर्फ इसलिए हाथों-हाथ नहीं लेते क्योंकि यह उनकी समृद्धि की ललक को पूरा करती हैं, बल्कि यह दिग्गज इसलिए भी अपना काम करा ले जाते हैं, क्योंकि यह निवेश, रोजगार, विकास के अग्रदूत बन कर आते हैं। विकास व निवेश के भूखे विकासशील देशों के लिए यह देने वाले हाथ किसी महादानी के हाथों से कम नहीं होते इसलिए तीसरी दुनिया के नीति निर्माता इन दिग्गजों की दागदार दुनिया पर निगाह भी नहीं डालते।
और हिचक किस बात की?
पूरी दुनिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ब्राइबिंग के बिजनेस को इतना चुस्त व चतुर कर दिया है कि नेताओं के लिए इनसे डील करना ज्यादा सुरक्षित हो गया है। दर्जनों तरीके हैं, काम कराने से लेकर पैसा देने वाली एजे¨सयों की कई पर्ते हैं और हित साधने के साधन पूरी दुनिया में फैले हैं। ओईसीडी परेशान है कि आखिर इन बीच की एजेंसियों का क्या किया जाए जो कि देने वाले दिग्गजों और लेने वाले लालचियों के बीच इतनी सफाई से काम करती हैं कि पकड़ना मुश्किल हो जाता है। दरअसल यह लेन-देन को तरह-तरह के नायाब और वैध आवरण पहनाना अब एक कंसल्टेंसी है, जो बाजार में आसानी से मिलती है। इसीलिए तो विदेश में रिश्वत के खिलाफ दुनिया के जिन देशों में कानून भी हैं वहां भी कंपनियों पर शिकंजा कसना मुश्किल होता है। तभी तो एक बहुराष्ट्रीय दिग्गज ने चीन के अधिकारियों को लास वेगास की सैर कराकर अपना काम करा लिया और काफी वक्त तक कोई पकड़ नहीं सका। पूरी दुनिया उदारीकरण की दीवानी है। इस दीवानगी में हर देश अपने कानूनों को बदल रहा है ताकि उसकी जनता को विकास और समृद्धि मिले। यह मिलती भी है, लेकिन इसके साथ देने वाले हाथों की चालाकी भी आती है। यह हाथ ऐसे कानून बनवाने व बदलवाने में माहिर हैं, जिनसे विकास की जरुरतें भी पूरी होती हों और उनके कारोबारी हित भी सध जाएं। जाहिर जब दोनों काम एक साथ हो रहे हों और राजनेताओं को बोनस में मेहनताना मिल रहा हो तो फिर हिचक किस बात की?
भ्रष्टाचार का उदारीकरण
एक बड़ा पेचीदा सवाल है कि उदारीकरण से भ्रष्टाचार मिटता है या बढ़ता है। लाइसेंस परमिट राज के परम भ्रष्ट दौर को देख चुके लोग उदार नियमों को भ्रष्टाचार का इलाज मानते हैं मगर जरा भारत पर गौर फरमाइए। जिन बड़े वित्तीय व आर्थिक घोटाले उदारीकरण के पिछले करीब दो दशकों में हुए हैं, उतने पहले के चालीस वर्षो में नहीं हुए। शेयर बाजार, कंपनी प्रबंधन, सरकारी अनुबंध, निवेश कानून, वित्तीय सेवाएं, अचल संपत्ति, लाइसेंस परमिट लगभग हर जगह एक न एक बड़ा घोटाला दर्ज हो चुका है। रोचेस्टर इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी के आर्थिक विभाग ने कुछ वर्ष पहले एक अध्ययन में यह पाया था कि उदारीकरण भ्रष्टाचार दूर करने की दवा नहीं है, बल्कि तीसरी दुनिया के कई देशों में उदारीकरण ने भ्रष्टाचार को खाद पानी दे दिया है। नियम ढीले हुए हैं, प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, नए अवसर आए हैं और निवेशकों ने बाजार की तरफ रुख किया है तो राजनेताओं की मुट्ठियां ज्यादा गरम हुई हैं क्योंकि अब दांव बड़े हैं और खिलाड़ी कई। कई जगह यह पाया गया है कि जिन देशों में लोकतंत्र और उदारीकरण एक साथ आया, वहां भ्रष्टाचार कम पनपा मगर जिन देशों में लोकतंत्र पहले आया और अर्थव्यवस्थाओं के दरवाजे काफी समय बाद खुले वहां उदारीकरण ने लेने और देने वाले हाथों के लिए चांदी काटने का इंतजाम कर दिया है। भारत के संदर्भ में अभी इस रिश्ते की पड़ताल होनी है।
भ्रष्टाचार की गुत्थी पहले से कडि़यल है, राजनीति व नौकरशाही ने इसे हमेशा कसा है और अब दिग्गज कंपनियां इसमें एडहेसिव डाल कर इसे और सख्त कर रही हैं। दरअसल भारत में लेने वाले हाथ इतने बड़े हैं कि उन की ओट में देने वाले हाथ छिप जाते हैं या फिर बेदाग नजर आते हैं। इसलिए हम इस तंत्र के दूसरे पक्ष की तरफ नहीं देख पाते मगर दुनिया ने अब कंपनियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। जल्द ही हमें भी इन अपवित्र दानियों की तरफ देखना होगा। तब तक भ्रष्टाचार में फंसे नेता, अच्छे संदर्भो में लिखे गए, रहीम के इस दोहे के सहारे अपना बचाव कर सकते हैं.. देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हम पर करें तासे नीचे नैन।

Monday, November 2, 2009

अभी धोखे हैं इस राह में

इसी को कहते हैं जोर का झटका.. आप सोच रहे थे कि मंदी गई तो अब होगीी रोज"गारों की भरमार। उद्योगों को मिलेगी मांग की पुचकार। सस्ता होगा कर्ज जो मिलेगा बार-बार और बाजार में होगी सस्ते सामान की बहार। मगर यहां महंगाई और महंगे कर्ज का खतरा सामने है। यह एंटी क्लाइमेक्स है। मंदी तो उम्मीदों से उलटा संसार छोड़ कर जा रही है। सभी आश्ंाकाओं के विपरीत अगर मंदी जल्दी यानी महज दो ढाई साल में खत्म हो गई है तो यह भी सही हैकि मंदी सभी आशाओं से विपरीत मंदी के बान बन रहा माहौल बड़ा अजीबोगरीब है। सिर्फ ढाई साल की मंदी ने दुनिया को कम से कम अगले कई महीनों तक तक सताने वाली ऐसी कमजोरियां दे दी हैं। जिनके कारण अर्थव्यवस्थायें अपनी कमर सीधी नहीं कर सकेंगी। चौंकियेगा नहीं अगर कुछ दुनिया के कुछ देशों या हिस्सों में मंदी लंबी खिंच जाए क्यों कि अब मंदी के खिलाफ सामूहिक जंग का दौर खत्म हो रहा है। आने वाला दौर अब देश, बैंक और कंपनियों की अपनी ताकत की परीक्षा लेगा क्यों कि अब मंदी की बाद की दुनिया में होंगे खाली खजाने, कमजोर कंपनियां, अवमूल्यित मुद्रायें अप्रत्याशित संरंक्षणवाद आदि आदि.. अर्थात बड़े धोखे हैं इस राह में !!!
बदहाल बैलेंस शीटबैलेंस शीट
रिसेशन .. जापान इस शब्द से नब्बे के दशक से परिचित है। दुनिया को शायद अब इसका अहसास होगा। मंदी खत्म होने के वक्त दुनिया अक्सर मिल्टन फ्रीडमैन के सिद्धांत को याद करती है। फ्रीडमैन बता गए हैं कि मंदी के बाद अर्थव्यवस्था छलांग मारती है क्यों कि जो संसाधन अनुपयोगी पड़े रहते हैं वह उत्पादन में वापस लौट आते हैं। सामान्य रुप से ऐसा होता है लेकिन अगर मंदी गहरी हो और उत्पादन में गिरावट तेज हो तो फिर मंदी बाजार से निकल कर कंपनियों की बैलेंस शीट तक पहुंच जाती है। 1992 में तेज गिरावट के बाद जापान की अर्थव्यवस्था अब तक उस विकास दर को हासिल नहीं कर सकी जो कि वहां अस्सी के दशक में थी। दुनिया इसे बैलेंस शीट रिसेशन के नाम से जानती है क्यों कि कंपनियां उस पैमाने पर उतपादन नहीं बढ़ा पाईं जैसा कि अपेक्षित था। इस किस्म की मंदी लंबी चलने डर कुछ मजबूत कारणों पर आधारित है। यह मंदी अपने पूर्वजों की तरह आर्थिक उत्पादन प्रक्रिया में किसी गिरावट से नहीं आई है बल्कि यह समस्या उन वित्तीय प्रतिष्ठानों का उपहार है जो उत्पादक तंत्र को संसाधन देते हैं। यह मंदी बैंकिंग, पूंजी बाजार आदि की समस्याओं के कारण आई। इसके जो इलाज किये हैं उनसे बाजार में उत्पादक संसाधनों की कमी भी होनी है क्यों कि अब बैंक हाथ सिकोड़ रहे हैं। कर्ज कम मिलेगा और महंगा भी, अर्थात जब उद्योग जोखिम लेने का साहस जुटा रहे होंगे तब मांग के बढ़ाने को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा। इसलिए ही तो दुनिया फ्रीडमैन के फार्मूले के दोहराये जाने और विकास दर के उछाल मारने पर भरोसा नहीं कर पा रही है।
बाजारों में बैरियर
मंदी की जकड़ से आजाद होने की कोशिश कर रही दुनिया को ब्रिक देशों यानी भारत, चीन, ब्राजील, रुस से बहुत उम्मीदें हैं, मगर उम्मीद के नवजात केंद्रों को बड़ों यानी विकसित देशों की दुनिया से डरना चाहिए। मंदी के बाद अपनी अर्थव्यवस्थाओं बैसाखी देने में लगे विकसित देश वही कर सकते हैं जो 1971 में अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन ने किया था। निक्सन ने अमेरिका में आयातों पर दस फीसदी अधिभार लगा दिया था, जिसके बाद निर्यातक देशों ने अपने निर्यातों को प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन करना शुरु कर दिया। हाल में ही जब ओबामा ने चीनी टायरों पर आयात शुल्क बढ़ाया तो दुनिया को निक्सन नजर आ गए। विकसित देशों के अपनी जनता के लिए रोजगार चाहिए जिसके लिए उन्हें निर्यात करना होगा इधर भारत व चीन जैसी एशिया की अर्थव्यवस्थायें उन्हें बाजार में टिकने नहीं देंगी। बल्कि विकसित देशों के अपने बाजार इन निर्यात के इन मंगोलों का निशाना होंगे। इसलिए मंदी के बाद बाजारों के उदार होने के फालतू ख्याल मत पालिये। बाजार खुलेंगे नहीं बल्कि तरह तरह से बंद होंगे और मुद्राओं को सस्ता कर बढ़त लेने की होड़ शुरु होगी।
फिर वही महंगाई
मंदी से पहले महंगाई और मंदी के बाद महंगाई। .. इस मंदी की यह सबसे जटिल विरासत है कि महंगाई की गुत्थी और कडि़यल होने वाली है। महंगाई मांग व आपूर्ति में अंतर से ही उपजती है यह अंतर मंदी के बाद भी रहेगा लेकिन इस बार कुछ अलग ढंग से। मंदी से पहले की महंगाई प्राकृतिक और स्वाभाविक थी अब महंगाई कृत्रिम होगी। मंदी से पहले की महंगाई में सिर्फ कच्चे माल या कृषि उपजों की कमी एक प्रमुख वजह थी लेकिन अब इस महंगाई में ऊंची ब्याज दर, जोखिम की संभावनायें, पुराने घाटे निकालने की कोशिश और एक आशंकित सतर्कता शामिल होगी। उद्योग उत्पादन जरुर बढ़ायेंगे लेकिन मार्जिन बरकरार रखते हुए अर्थात कीमतें घटाकर प्रतिस्पर्धा करने के नुस्खे कम आजमाये जाएंगे। इसलिए मंदी के बाद महंगाई लंबी चल सकती है और मांग व आपूर्ति का संतुलन बनने में वक्त लग सकता है।पूरा परिदृश्य क्या आपको एक दुष्चक्र बनने के संकेत नहीं देता? मंदी-महंगाई-मांग में कमी-ऊंची ब्याज दरें-ज्यादा लागत-बाजारों में संरंक्षणवाद-कम उत्पादन-सुस्त विकास दर..? इसके बाद क्या? कह पाना मुश्किल है। लेकिन यह निष्कर्ष जरुर निकलता है कि मंदी से उत्पादन में कमी और रोजगारों की कमी का जो घाटा बना था उसकी भरपाई भरपाई मुश्किल दिखती है। इसलिए मुगालते मत पालिये। मंदी जाने का मतलब सब कुछ मनभावन हो जाना नहीं है। मंदी जाने का मतलब बीमारी का फैलाव रुकना भर है स्वस्थ हो जाना नहीं। दुनिया की अर्थव्यवस्थायें सामान्य सेहत पाने में डेढ़ दो साल निकाल देंगी और डेढ़ दो साल में वक्त क्या करवट लेगा कोई नहीं जानता। .. इसलिए अभी तो सिर्फ यही कहना चाहिए कि गेट वेल सून..

Tuesday, October 27, 2009

इतिहास से किसने सीखा ?

इतिहास से हम क्या सीखते हैं? यही न, कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा है। इतिहास दरअसल खुद को नहीं दोहराता बल्कि गलतियों का इतिहास स्वयं को दोहराता है। नहीं तो लेहमन ब्रदर्स सहित शताधिक बैंकों को गंवाने के बाद दुनिया बदल न जाती ? चौंकिये और झुंझलाइये! दुनिया ने 2008 की शुरुआत से लेकर अब तक शेयर बाजारों में 30 खरब डॉलर गंवाये हैं और घरों आदि अचल संपत्तियों में 11 खरब डॉलर का चूना लगा है। यह पूरा नुकसान दुनिया के जीडीपी यानी कुल आर्थिक उत्पादन का 75 फीसदी है। मगर रत्ती भर बदलाव दिखा है कहीं? दुनिया के मुल्कों ने तो उन कारणों का इलाज तक नहीं किया जिनके कारण यह विपदा फट पड़ी थी। बैंक व निवेश संस्थायें फिर उसी पुराने ढर्रे पर हैं। नियामक पहले की तरह लड़ रहे हैं। राजनेताओं के एजेंडे पर अब वित्तीय संकट के कारणों का इलाज है ही नहीं। यानी सब कुछ हस्ब-मामूल है। खैर मनाइये क्यों कि मंदी के बाद की दुनिया जोखिमों से भरपूर है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ?
टू बिग टु फॉल .. यही तो मुहावरा इस्तेमाल करती थी न्यूयार्क की वाल स्ट्रीट, लेहमैनों जैसे नामचीन महाकाय निवेश बैंकों के बारे में जिन्हे वित्तीय संकट के सैलाब ने इतिहास के गटर में डाल दिया। अचरज इस बात पर नहीं कि संकट से पहले दुनिया यह समझती थी कि वित्तीय दिग्गज अपराजेय हैं, आश्चर्य इस पर है कि आज भी ऐसा ही माना जा रहा है। इसलिए ही तो सुधार के नाम पर दुनिया ने अपने बैंकों को और बड़ा कर दिया। मेरिल लिंच, बैंक ऑफ अमेरिका में घुस गया। अब बैंक ऑफ अमेरिका 2.7 खरब डॉलर की संपत्ति वाला भीमकाय वित्तीय संस्थान है। अमेरिका के वेल्स फार्गो ने 12.7 अरब डॉलर खर्च कर वाचोविया बैंक को निगल लिया। अमेरिका के केमिकल बैंक को चेज मैनहट्टन पचा गया तो यूरोप ड्रेसनर बैंक को ड्यूश बैंक। मंदी के बाद अमेरिका लेकर ऑस्ट्रेलिया तक और जापान से लेकर ब्राजील तक वित्तीय संस्थायें छोटी नहीं बल्कि बड़ी हुई हैं और वह भी संकट के मौके पर मिली सरकारी व केंद्रीय बैकों की मदद के सहारे।ध्यान दीजिये मेरिंल लिंच का उद्धार बैंक ऑफ अमेरिका ने अमेरिकी खजाने व फेड रिजर्व की कृपा से किया। दरअसल लेहमैनों, वाचोविया, फेनी मे आदि की बर्बादी के बाद दुनिया ने माना यह थी बड़ी वित्तीय संस्थाओं वाले मॉडल में जोखिम ज्यादा है क्यों कि इनकी बर्बादी बड़ी तबाही लाती है लेकिन सुधारों के नाम वित्तीय बाजारों के गले में और बड़े पत्थर बांध दिये गए। अब अगर किसी संकट में बैंक ऑफ अमेरिका डूबा तो तबाही देखकर दुनिया डर जाएगी।
संहार का सामान
इस मंदी में अगर आपने शेयर बाजार में पैसा गंवाया है या बाजार में रोजगार, तो आपका पूरा हक बनता है दुनिया के कर्णधारों से यह पूछने का कि मंदी के बाद क्या सुधरा है? अब तक तो वित्तीय दुनिया यह कायदे से जान गई है कि जटिल और हवाई वित्तीय उपकरणों ने उसे तबाह कर दिया लेकिन इन उपकरणों का इस्तेमाल कहीं बंद नहीं हुआ। सब कुछ वैसा ही है, खतरनाक, अपारदर्शी और विस्फोटक। वित्तीय जनसंहार के हथियारों के नाम से पारिभाषित वित्तीय डेरीवेटिव्स फलफूल रहे हैं। अपनी जेब संभालिये क्यों कि 2009 की दूसरी पहली छमाही तक अमेरिका के पांच बैंकों ने करीब 190 खरब डॉलर के डेरीवेटिव्स संजो रखे थे। यह घोर सट्टेबाजी पर आधारित डेरीवेटिव्स हैं और इस तरह के कुल डेरीवेटिव्स की मालकियत में इन पांच बैंकों हिस्सा करीब 25 फीसदी है। आइये आपका डर और बढ़ाते हैं। दुनिया के बैंकों ने निवेश के लिए ओवर ड्राफ्ट देना जारी रखा हुआ है। 2009 में दुनिया भर के प्रमुख बैंक अकेले ओवर ड्राफ्ट फीस से करीब 38 अरब डॉलर कमायेंगे। ध्यान दीजिये 2008 के संकट के बाद दुनिया ने गंगाजली उठा कर यह माना था कि अगर कर्ज के धन से अति निवेश या सट्टेबाजी होती है तो वह सिर्फ तबाही लाती है। मगर किससे पूछें कि दुनिया के शेयर बाजारों में हाल के महीनों में जो तेजी दिखी यह फिर उसी गलती का दोहराया जाना नहीं है? आखिर बताने वाला है कौन?
कौन चाहे सुधरना?
जी 20 के मंचों पर चिंता जताते, ओबामाओं, गार्डन ब्राउनों और मनमोहन सिंहों देखकर आप किसी भुलावे में तो नहीं पड़ गए? क्या आपको मालूम है कि लेहमैन के ढहने के बाद अमेरिका की संसद ने वित्तीय नियमों को चुस्त करने के कितने कानून पारित किये हैं? .. एक भी नहीं। जी हां सच में एक भी नहीं। दरअसल अमेरिका में संपत्ति मॉर्टगेज की समस्या के हल के लिए एक छोटा सा कानूनी प्रयास भी बैंकों की लामबंदी के कारण अमेरिकी संसद में इस तरह हारा कि एक सदस्य को कहना पड़ा कि बैंकों ने अमेरिकी कांग्रेस पर कब्जा कर लिया है। अमेरिका में कंज्यूमर फाइनेंशियल प्रोटेक्शन एजेंसी बनाने का प्रस्ताव भी मर चुका है। 2008 के संकट के बद पूरी दुनिया में सिस्टमिक रेगुलेटर बनाने की बहस शुरु हुई थी मगर यह कहीं नहीं पहुंची। किसी देश में वित्तीय नियमन में न कोई बड़ा बदलाव आया है और न ही कहीं कोई ऐसा नियामक बना जो कि दुनिया को आगाह करे कि पूरी प्रणाली में कहां खतरा है। भारत को ही देखिये इस संकट के बाद यहां भी कुछ नहीं बदला। वित्तीय तंत्र को मिली नसीहतें लागू करने के लिए कोई ठोस उपाय पिछले एक साल में नजर नहीं आए हैं।
मंदी खुद में बहुत बड़ी नसीहत थी लेकिन अब एक साल बाद की हालत देखकर लगता है कि मंदी जाते हुए शायद ज्यादा बड़ी नसीहतें छोड़ रही है। दुनिया अपनी रवानी में है। हम वही सब कुछ फिर करने लगे हैं जिसे हम एक साल पहले कोस रहे थे। न्यूटन ने कहा था कि वह ग्रहों की चाल की गणना कर सकते हैं लेकिन आदमी के पागलपन की नहीं। न्यूटन ने भी ब्रिटेन में 1711 के साउथ सी बबल नाम के मशहूर शेयर घोटाले में हाथ जलाये थे। जिसमें लोगों ने फर्जी कंपनियों के शेयर एक दूसरे को बेच दिये थे। न्यूटन से लेकर आज तक की दुनिया शायद कई मामलों एक जैसी है। इसलिए सतर्क रहिये, तबाही फिर मारेगी। क्यों कि इतिहास से हमने यही सीखा है कि इतिहास हमने कुछ नहीं सीखा। ====

Monday, October 19, 2009

मंदी के बाद की दुनिया

दीवाली मनाई, दुख दलिद्दर को झाड़ू दिखाई, साथ में मंदी खत्म होने की उम्मीद भी नजर आई..तो अब क्या सोच रहे हैं? यही न कि अब तो दुख भरे दिन बीते रे भैया.. मंदी गई तो सब कुछ पहले जैसा होने वाला है? वैसे ही नौ दस फीसदी की मंजिलों को लांघती आर्थिक विकास की गति, बाजार में ढेर सारा पैसा और खूब सारे उत्पाद? यही तो उम्मीद है न???? माफ करिएगा बस यहीं आप कुछ ज्यादा आशावादी हो गए है। मंदी तो जा रही है लेकिन इसके बाद सब कुछ वैसा ही नहीं होने वाला है, जैसा इस नामुराद के आने के पहले था। मंदी के बाद दुनिया हैरतअंगेज ढंग से बदली है और अगर आप बाजार की परख रखते हैं तो आप बदलाव देख सकते हैं। मंदी जैसे जैसे अपने पंजे हटाएगी बाजार की बदली हुई सूरत और मुखर होकर सामने आएगी।
ईजी मनी का सूखता सागर
अब आर्थिक उत्पादन के उस अमेरिकी माडल के दिन लद गए हैं जिसमें सस्ता कर्ज झोंक उद्योगों को खड़ा किया जाता है।1980 से लेकर 2008 तक अमेरिका ईजी मनी में तैरता रहा और उसे देखकर यूरोप, जापान व एशिया के कुछ देशों ने भी यही माडल पकड़ा। दरअसल, पिछले एक दशक में अमेरिकी बैंकों ने कर्ज को अपनी बैलेंस शीट में रखा ही नहीं बल्कि उसे रहस्यमय व जटिल प्रतिभूतियों में बदलकर ऊधो से लेकर माधो तक सबको बेच दिया। खासतौर पर अमेरिका और सामान्यतौर पर पूरी दुनिया में पिछले एक दशक की तेज विकास दर सस्ते कर्ज के ईधन की बदौलत आई है। कभी यह कर्ज बैंकों के जरिए सीधे उद्योगों को गया है तो कभी निवेशकों ने इसके जरिए प्रतिभूतियां खरीदी हैं। हेज फंड, निवेशक बैंक, सब प्राइम मार्टगेज आदि सभी इसी सस्ते कर्ज सागर के जीव जंतु रहे हैं जिन्होंने खूब ऐश की। लेकिन अब यह सब खत्म हो गया। अत्यधिक सस्ते कर्ज को दुनिया अलविदा कहने वाली है क्योंकि वह कर्ज खोखले वित्तीय तंत्र की देन है। इस समय बाजार में धन की भरमार को यानी उदार मौद्रिक नीतियों को देखकर चौंकिए मत.. यह पाइप तो संकट के गड्ढे भरने के लिए खोले गए थे ताकि लेहमनों, बियर स्टन्र्सो सहित दुनिया भर के बैंकों को बचाया जा सके। यह धन प्रवाह उपभोक्ता व उद्योगों के लिए स्नान पान के लिए था ही नहीं जो कि शुभ और सकारात्मक माहौल में इस नदी के किनारे आते हैं संकट के वक्त वह कर्जपान क्यों करेंगे। इसलिए सस्ते कर्ज के बाद भी पूरी दुनिया में कर्ज की मांग लगतार घटी है। उदार मौद्रिक नीति की यह बैसाखियां हटने वाली हैं। इसके बाद अब कर्ज होगा महंगा और कर्ज के व्यापारी होंगे सतर्क क्योंकि कर्ज बाजार के गरम दूध ने उनकी जीभ क्या हलक तक जला दिया है।
उधार प्रेम की कैंची है
कर्ज चाहिए? माफ करिए.. कुछ शर्ते हैं। उपभोक्ता जी .. बैंक अब कुछ इस अंदाज में बात करेंगे।
माफ करिए अब बैंक सस्ता कर्ज लेकर आपके पीछे नहीं दौड़ेंगे। देखा नहीं मंदी के पिछले एक साल में आपको चिढ़ाने झुंझलाने वाली फोन कालें कितनी कम हो गई हैं। दरअसल अमेरिकी उपभोक्ताओं ने सस्ते कर्ज के सहारे दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को खूब चलाया। यह इस सस्ते कर्ज का खेल था कि अमेरिका में लोगों की व्यक्तिगत बचत दर जो 1970 में दस फीसदी थी 2008 में घटकर दो फीसदी से भी कम हो गई। आखिर बैंक कर्ज देने को तैयार थे तो बचत का झंझट कौन लेता? लेकिन अब न वहां बैंक सस्ता कर्ज दे रहे है और न भारत में। अकेले अमेरिका के 416 बड़े बैंकों को कर्ज न दे पाने वाली सूची में डाल दिया गया है जबकि 80 बैंक बंद हो चुके हैं। पूरी दुनिया के आलिम फाजिल मान रहे हैं कि जब कर्ज नहीं होगा तो अमेरिका व यूरोप के उपभोक्ताओं का खर्च कम होगा जो दुनिया में मांग को उतना नहीं बढ़ने देगा जितनी की उम्मीद है। यह मांग सिर्फ उपभोक्ता उत्पादों की नहीं बल्कि वित्तीय उत्पादों या अचल संपत्ति की भी है। यानी अगर समझदार उद्योग मंदी खत्म होने की झोंक में आंख बंद कर उत्पादन नहंीं बढ़ाएंगे, तो निवेश भी वित्तीय बाजार में अब कुछ सतर्क होकर आएंगे यानी कंजूसी से काम।
धीरे.धीरे.धीरे
ऊपर के विश्लेषण से अंदाज पा रहे हैं आपकी आखिर क्या होने वाला है? ..ठीक समझे आप? भूल जाइए कि मंदी के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं उसी रफ्तार पर पहुंच जाएंगी जैसे कि वह 2007 में थीं। मांग बढ़ेगी और विकास की गति भी लेकिन धीरे धीरे। इसके कई स्पष्ट कारण हैं। उत्पादक सतर्क हैं, वह अब मांग को बहुत करीब से देखेंगे और मार्जिन पर नजर रखेंगे। घाटे निकालने की कोशिश होगी। ध्यान दीजिए कि पूरी दुनिया में पिछले कुछ वर्षो में जरूरी चीजों के उत्पादन में उतनी वृद्धि नहीं हुई है जितनी कि मांग में। मंदी से उबरने की उम्मीद देखकर जिंस बाजार चढ़ने लगा है। मौसम का परिवर्तन पूरी दुनिया की खेती को परेशान कर रहा है यानी कि उत्पादन कम है। मंदी से उबरती दुनिया अब सतर्क होकर कारोबार करेगी। यानी महंगाई है और बनी रहेगी। तो एक तरफ आसान और सस्ते पैसे की कमी तो दूसरी तरफ आपूर्ति सीमित। आप खुद समझ सकते हैं कि मांग के बल्लियों उछलने की उम्मीद छलावा हैं। इसलिए विशेषज्ञ मंदी से उबरी विश्व अर्थव्यवस्था में विकास की रफ्तार को दुनिया में विकास की रफ्तार को तीन फीसदी से ज्यादा नहीं आंक रहे हैं और भारत में भी फिलहाल अगले एक दो साल छह-सात फीसदी की विकास दर की ही उम्मीद है।
मंदी जा रही है, देश के औद्योगिक उत्पादन ने 7.8 फीसदी की विकास दर दिखाई है। दीवाली से ठीक पहले आया यह आंकड़ा राहत देता है। लेकिन अगर किसी ने दीवाली के बाजार को गौर से देखा हो तो उसे यह जरूर महसूस हुआ होगा कि उम्मीद तो जगी है उत्साह नहीं। लाजिमी भी है मंदी ने इतना मारा है कि उत्साह जुटते वक्त लगेगा। संकटों के बाद सतर्कता बढ़ जाती है। इस संकट के बाद तो बहुत कुछ बदलना चाहिए क्योंकि इस मंदी ने कई पहलुओं पर आईना दिखाया है।. ..माफ कीजिए, हम आपकी खुशियां नहीं घटाना चाहते। हमारी कामना है कि लक्ष्मी आपके घर सदैव विराजें और आपको सभी खुशियों से नवाजें मगर हकीकत की जमीन पर पैर टिकाइए और जरा संभल कर उम्मीदें जगाइए। बाजार बहुत निर्मम है और उसकी तबाही का किस्सा अभी सिर्फ एक साल पुराना हुआ है।
-----------

Monday, October 12, 2009

बैसाखियों पर बहस

क्या बैसाखियां हटा ली जानी चाहिए? कौन सी बैसाखियां? अरे वही, जो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों और सरकारों ने मंदी से लड़खड़ाती अपनी अर्थव्यवस्थाओं के कंधे तले लगाईं थीं।.. तो क्या मंदी गुजर गई?...शायद..पता नहीं.कह नहीं सकते..लगता तो है। .. दुनिया जब मंदी जाने के सवाल पर नाखून चबा रही हो तो बैसाखियों को हटाने और बनाऐ रखने पर विकट असमंजस लाजिमी है। बैसाखियां मतलब दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की बाजार में पैसा छोड़ो नीतियां और सरकारों के भारी खर्च कार्यक्रम। किसी को लगता है कि अब बैसाखियां आदत बिगाड़ेंगी तो कुछ डरते हैं कि बैसाखियां अचानक हटने से अर्थव्यवस्थाएं फिर औंध जाएंगी। इसलिए कुछ देश मंदी को अब गुजर गया मान बैठे हैं जबकि कुछ देश और मुतमइन होना चाहते हैं।
किस मुर्गे की बांग सुनें?
मंदी की रात बीतने की बांग कौन लगाता है? कोई तो होगा जो मंदी समाप्त होने का सार्टिफिकेट देता होगा? वैसे दुनिया के पास इसका इंतजाम है, भरोसा करना आपकी मर्जी। बांग लगाने वाले कई हैं, अलबत्ता आवाजें एक जैसी नहीं हैं। चचा सैम के मुल्क में नेशनल ब्यूरो आफ इकोनामिकरिसर्च नामक एजेंसी है जो मंदी आने या जाने का आधिकारिक ऐलान करती है, लेकिन यह गजब की कंजूस और धीमी है। इसने पिछले साल दिसंबर में माना कि मंदी आ गई। जो इसी एजेंसी के मुताबिक एक साल पहले यानी दिसंबर 2007 में शुरू हुई थी। इसलिए पता नहीं कब यह मंदी खत्म होने की बांग देगी? लेकिन विकसित देशों का मशहूर संगठन ओईसीडी बोल पड़ा है कि मंदी गई। अमेरिका के फेड रिजर्व के मुखिया बेन बर्नाके को लगता है ''मंदी के खत्म होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा हैं।'' आईएमएफ भी इसी तरह संभल कर बोला है। इसके बाद तो आगे जितनी मुंह उतनी बातें।
मंदी थमी या तेजी लौटी
यह वाक् चातुर्य नहीं है। मंदी का थमना एक अलग बात है और ग्रोथ यानी अर्थव्यवस्था का रफ्तार पकड़ना एक दूसरी बात। इस पैमाने पर बड़ा दिलचस्प नजारा है। अमेरिकी विशेषज्ञ मान रहे हैं कि मंदी थम गई है, मगर तेजी नहीं लौटी क्योंकि आवास, श्रम व उपभोक्ता बाजार उठा नहीं है। दो साल में करीब 65 लाख रोजगार गंवाने वाली और 1930 के बाद सबसे तेज बेरोजगारी वृद्धि दर वाले अमेरिका को मंदी जाने का ऐलान करने के लिए काफी हिम्मत चाहिए। इसीलिए फेड रिजर्व भी सतर्क है। मगर ओईसीडी का दावा है कि दुनिया की ग्यारह बड़ी (अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी जापान आदि) और चार सबसे तेज (ब्राजील, रूस, भारत, चीन) अर्थव्यवस्थाओं में सुधार शुरू हो गया है। शेयर बाजार तो हद के मजेदार हैं। अमेरिकी शेयर बाजार मार्च के बाद से अब तक 44 फीसदी बढ़े हैं, जबकि भारतीय बाजार 20 फीसदी। मंदी जाने के गुण गाने वालों के लिए तर्क मौजूद हैं मगर अमेरिकियों से पूछिए! वह तो इसमें उलझे हैं कि मंदी जाने की उम्मीद में बाजार बढ़ रहा है या फिर मंदी वास्तव में चली गई है इसलिए कि बाजार तेज है??? दोनों बातों में फर्क है मगर आप मत उलझिए। इनकी भी सुनिए जो कहते हैं बस अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट थमी है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। दरअसल इस बात के कद्रदान तो कई हैं मंदी थमी है मगर रफ्तार की वापसी को स्वीकार करने में हिचक है क्योंकि उसके बाद तो बैसाखियां हटानी पड़ जाएंगी।
और सहारा कब तक?
उदार मौद्रिक नीति और घाटे के जोखिम पर अर्थव्यवस्था में पैसा झोंकने की बैसाखियां हटाने की बहस इस समय की सबसे बड़ी बहस है। बाजार में मुद्रा का प्रवाह मुद्रास्फीति को ईधन दे रहा है और प्रोत्साहन पैकेजों का खर्च सरकारी खजानों को खोखला कर रहा है, इसलिए हर देश 'एक्जिट स्ट्रेटजी' की बात करने लगा है। यानी उदार मौद्रिक नीति खत्म करने की तैयारी। मगर दुनिया में बहुत से देश डरे हैं इसलिए इंतजार करना चाहते हैं। अमेरिका इनमें शामिल है। नतीजतन बर्नाके हिचक रहे हैं, जापान भी सुस्त है, लेकिन आस्ट्रेलिया ने मंदी खत्म करने का ऐलान करते हुए ब्याज दर 25 प्रतिशतांक तक बढ़ा दी है। दक्षिण कोरिया ने ब्याज दरों में कमी रोक दी है। यूरोजोन की अर्थव्यवस्थाओं में भी अब यह मान लिया गया है कि ब्याज दरों में कमी का दौर खत्म हो गया। बहुसंख्यक देशों के केंद्रीय बैंक आस्ट्रेलिया का रास्ता भले ही न पकड़ें मगर ब्याज दरों में कमी को अब अलविदा कहा जा रहा है। बस जरा सा कर्ज कार्यक्रम पूरा हो जाए, भारतीय रिजर्व बैंक भी यही करेगा क्योंकि मुद्रास्फीति से दुनिया का हर केंद्रीय बैंक डरता है।
बैसाखियां हटने की बहस शुरू है और दुनिया का मुद्रा बाजार मचलने लगा है। आस्ट्रेलियाई डालर फूल गया है। रुपया भी ताकत दिखा रहा है। फिर भी यह एक सामान्य मनोविज्ञान है कि आर्थिक संकट के आने का अहसास जितनी जल्दी होता है, उसके जाने पर भरोसा करने में उतना ही वक्त लगता है। दरअसल पूरी दुनिया अपने-अपने मुर्गो की बांग पर जगना चाहती है। क्योंकि कोई यह नहीं जानता कि बैसाखियां हटने के बाद क्या होगा? इसलिए कुछ बेहतर होते माहौल का आनंद लीजिए मगर सतर्कता के साथ क्योंकि बाजार और अर्थव्यवस्थाओं के मामले में पिछला प्रदर्शन भविष्य की गारंटी नहीं होता।

और अन्‍यर्थ ( the other meaning ) के लिए स्‍वागत है
http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच) पर

Monday, September 28, 2009

गलातियों को सुधारने का बाजार

दमी की पेचीगदी भी कम नहीं, वह झीलों को सुखा देता है और मरुस्थल में फूल खिला देता है... मगर इससे पहले कि आप पर्यावरणवादियों की तरह संजीदा हो जाएं पूरी बात पढ़ लीजिये... क्योंकि बात चाहे रेगिस्तान में बहार लाने की हो या झीलों को सुखाने की, मामला दरअसल पैसे का है। समृद्धि के लिए पहले हमने हवा-पानी को बिगाड़ा अब हम इसे सुधारने में पैसा गंवायेंगे और कमायेंगे। आखिर दुनिया को कोई बड़ा काम तो चाहिए न, वरना कमाई व खर्च के नए रास्ते कहां से आएंगे। इसलिए अमेरिकी डॉलर अब अपने एक उपनाम ग्रीनबैक को सार्थक करने वाला है। हो सकता है कि इस सप्ताह पर्यावरण को लेकर आप कुछ ज्यादा चिंतित हो गए हों जब आपने दुनिया के दिग्गजों को बड़े गंभीर और भावनात्मक लहजे में हवा-पानी पर बात करते सुना हो। इसी मुद्दे पर दिसंबर में कोपेनहेगन में दुनिया की पंचायत लगेगी और तब तक यह चख-चख और बढ़ जाएगी। मगर मुगालते में मत रहिये। दरअसल अब मामला हवा पानी को बचाने के अर्थशास्त्र का है। यह पूरी मगजमारी हकीकत में एक नए बाजार से ताल्लुक रखती है जो पर्यावरण को बचाने के लिए तैयार हो रहा है। यह गलतियों के सुधार का बाजार है। जाहिर है कि दुनिया ने प्रकृति को बिगाड़ कर काफी महंगी गलतियां की हैं, इसलिए सुधार भी अब हजार और लाख नहीं बल्कि खरबों डॉलर की कीमत का होगा।
हर चीज की कीमत है...
कुदरत इस बात की फिक्र नहीं करती कि आपकी आर्थिक हैसियत क्या है-अभिनेत्री वूपी गोल्डबर्ग।.... डॉलर पौंड यूरो में सोचने वाली दुनिया को समझ में आ गया है कि उसने अगर करीब 61 ट्रिलियन डॉलर की विश्व अर्थव्यवस्था हासिल की है तो वह हर साल करीब 20 ट्रिलियन डॉलर की कीमत का पर्यावरण भी गंवा रही है। यह नुकसान का मोटा आंकड़ा है जो मौसम के बदलाव से खेती, संपत्ति और जीवन को होने वाला सीधा नुकसान गणित पर आधारित है। पारिस्थितिकी को होने वाले परोक्ष नुकसान, लोगों आव्रजन या पानी या खाने की कमी की गणना इसमें शामिल नहीं है। धरती का तापमान पहले ही करीब 0.6 डिग्री बढ़ चुका है। बाढ़, सूखा व तूफानों की सूरत में मौसम में अप्रत्याशित बदलाव शुरु हो गए हैं और दुनिया के मुनीम नुकसान का आकलन कर हैरत में पड़ रहे हंैं। स्विटजरलैंड की रिइंश्योरेंस कंपनी स्विस री कहती है कि मौसमी आपदाओं से दुनिया हर साल करीब 200 अरब डॉलर की संपत्ति गंवा रही है। एसोसिएशन ऑफ ब्रिटिश इंश्योरर्स ने आंका है कि बढ़ती गर्मी के असर से अगर इस सदी के अंत तक समुद्रों का जल स्तर अगर एक मीटर बढ़ गया तो करीब 1.5 खबर डॉलर की संपत्ति समुद्री तूफानों के सीधे खतरे में पहुंच जाएगी। भारत के संदर्भ में तो यह गुणा भाग काफी भयानक है। अकेला महाराष्ट्र एक साल के सूखे में राज्य का करीब 30 फीसदी कृषि उत्पादन गंवा देता है। कोई लंबा सूखा भारत की खेतिहर अर्थव्यवस्था को कुछ माह में सात अरब डॉलर की चपेट दे सकता है। दरअसल पर्यावरण के नुकसान का हिसाब किताब इतना डरावना है कि अब इसे बचाने का कोई भी हिसाब के किताब छोटा लगता है।
...महंगा है बचाव
जब इस कदर गंवा रहे हैं तो बचाना महंगा पड़ेगा ही। दुनिया पिछले कई वर्षो से खुद को बदलने की लागत हिसाब किताब लगातार बदल रही है। संयुक्त राष्ट्र की समिति अर्थात यूएनएफसीसी ने आंका था कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए 2030 तक दुनिया को 40 से 170 अरब डॉलर खर्च करने होंगे मगर ब्रिटिश शोधकर्ताओं के ताजे आकलन के मुताबिक यह आंकड़ा सही नहीं है, लागत इससे कई गुना ज्यादा होगी। और अगर ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल, खनन आदि उद्योगों में बड़े बदलावों की लागत जोड़ ली जाए तो कोई भी आंकड़ा छोटा है। यूएनएफसीसी ने आंका था कि बाढ़ रोकने पर करीब 11 अरब डॉलर खर्च होंगे मगर ताजा आकलन कहता है गर्मी के कारण होने वाली पानी की कमी दूर करने की लागत इसमें जोडऩे पर खर्च बहुत बढ़ जाएगा। इसी तरह मौसम से असर से पैदा होने वाली बीमारियों से बचने का खर्च पांच अरब डॉलर से बहुत ज्यादा होगा क्यों कि शुरुआती आकलन में यूएनएफसीसी ने केवल चुनिंदा बीमारियों को आधार बनाया था। इसी तरह जलवायु परिवर्तन के हिसाब से बुनियादी ढांचा ठीक करने पर खर्च 1000 अरब डॉलर, समुद्र तटीय क्षेत्र को बचाने पर खर्च 33 अरब डॉलर और पारिस्थितिकी को बचाने पर 350 अरब डॉलर तक खर्च हो सकता है। गलतियों को सुधारने का बिल कितना बड़ा होगा यह तो वक्त बतायेगा लेकिन गलतियों के सुधार का यह बाजार काफी बड़ा होने वाला है।
दर्द देने वाले अब दवा बेचेंगे...
ग्रीन इन्वेस्टमेंट आने वाले दौर का सबसे दिलचस्प धंधा है और क्लीन टेक्नोलॉजी सबसे हॉट उत्पाद। अमेरिकी ऊर्जा एजेंसी मानती है कि धरती के तापमान में बढ़ोत्तरी रोकने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में अगले दो दशक में दो खरब डॉलर का निवेश होगा। विकसित देशों को सिर्फ बाढ़ रोकने, सूखे में उगने वाली फसलों और बीमारियों से बचाव आदि को लेकर तीसरी दुनिया में 16 खरब डॉलर का बाजार दिख रहा है। निवेश शुरु हो चुका है, दक्षिण कोरिया ने इस गलती सुधार बाजार में अपने जीडीपी के दो फीसदी के बराबर निवेश का निर्णय किया है जो कि 107 खरब वॉन है। पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाली तकनीकें, उत्पाद, सेवाएं अगले एक दशक में जगह बिकेंगी। अमेरिकी रिसर्च फर्म क्लीनटेक बताती है कि इन तकनीकों को विकसित करने के लिए 2008 में निवेशक दुनिया के बाजार से करीब 8.4 अरब डॉलर जुटा चुके हैं। दरअसल इस गलती सुधार बाजार में करीब 86 फीसदी निवेश निजी क्षेत्र ही करेगा। वही तकनीक बनाएगा और वही खरीदेगा। इस तरह की तकनीकों के लिए चीन अगर एक खरब डॉलर का बाजार है तो भारत भी छोटा बाजार नहीं है। दूसरी तरफ विकासशील देश इस खर्च के बदले कार्बन विनिमय के अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने लिये मुनाफा देख रहे हैं। अर्थात वह कम प्रदूषण फैलायेंगे और प्रदूषक पश्चिम से मुनाफा कमायेंगे।
कुला मिलाकर यह पूरा खेल काफी दिलचस्प हो चला है। पर्यावरण भविष्य का सबसे बड़ा बाजार है, जिसमें एक टन ऑक्सीजन और कार्बन डाइ आक्साइड से लेकर एक वर्ग किलोमीटर की मिट्टी तक का अपना मूल्य है। दुनिया इस नए हरे भरे हिसाब-किताब में गर्मी सर्दी, हवा- पानी, धुआं-धूल, हरियाली-मरुस्थल, बाढ़-सूखा, जीव-जीवन केवल प्रकृति के रंग ही नहीं हैं, बल्कि अब इनका अपना अर्थशास्त्र है और इन्हें रोकने, बढ़ाने या बचाने की एक मोटी लागत है। इसलिए हवा पानी की चर्चा अब वस्तुत: निवेश, कर्ज, लाभ, हानि, विनिमय, लेन-देन और वित्तीय उपकरणों की चर्चा है। तो देखिये जरा ...हम कितने नासमझ हैं कि हमने खुद को ही बर्बाद कर लिया और हम कितने समझदार हैं कि बर्बादी से उबरने के लिए हमने एक बाजार गढ़ लिया। ....सच में इंसान बेहद पेचीदा जीव है!!!
---------------

Monday, September 21, 2009

पड़ गई न आदत !!!

भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति में सबसे नया परिवर्तन क्या है? ..मंदी को लेकर दिमागी ऊर्जा मत गंवाइये। इस फ्लू में तो हम पूरी दुनिया के साथ ही छींक-खांस रहे हैं। बदलाव दरअसल यह है कि भारत अब एक महंगे उपभोक्ता बाजार वाला मुल्क बन गया है। .. चौंकिये मत! लंबी व स्थाई महंगाई अर्थव्यवस्था का सबसे नया व बड़ा परिवर्तन है। महंगाई अब मौसम के मिजाज पर अपना मूड नहीं बदलती। महंगाई अब मांग व आपूर्ति के समीकरणों पर कान नहीं देती। महंगाई रिजर्व बैंक की मौद्रिक कोशिशों को ठेंगे पर रखती है। उपभोग के बदलते ढंग व बाजार ने महंगाई की गुत्थी को पिछले डेढ़ साल में काफी सख्त कर दिया है। सरकार थक कर निढाल हो गई हैं और हमें महंगाई की आदत पड़ गई है।
..रहे हमेशा संग
एक दो नहीं पूरे अठारह माह... ( महंगाई के ताजे चरण 2008 मार्च में पड़े थे) महंगाई का यह संग कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है। उपभोक्ता मूल्यों की महंगाई पिछले अठारह माह के दौरान औसतन दस फीसदी से ऊपर रही है। यह महंगाई अतीत के मुकाबले अनोखी व वर्तमान से पूरी तरह अप्रभावित है। पिछले साल देश में रिकार्ड अनाज उत्पादन हुआ। औद्योगिक उत्पादन भी बढ़ा (वृद्धि दर कम थी), मगर महंगाई रिकार्ड बनाती रही। यानी कि आपूर्ति कम हो या ज्यादा, महंगाई के ठेंगे से। पिछला साल मंदी, यानी कि मांग कम होने का था। मांग कम हो तो कीमतें घटती हैं मगर महंगाई नहीं घटी। अर्थात न इस पर मांग कम होने की कला चली और न आपूर्ति बढऩे की। महंगाई ने अपना मौसमी चरित्र भी छोड़ दिया। अब वह एक रहस्यमय ताकत के साथ जमी है और बढ़ रही है।
हार गए सूत्रधार
विद्वान कहते हैं कि मुद्रास्फीति यानी महंगाई एक मौद्रिक परिदृश्य है। इस जमात का मानना है कि रिजर्व बैंक मुद्रा आपूर्ति के नल को खोल-बंद कर महंगाई को अपनी उंगलियों पर नचा सकता है। मांग आपूर्ति और मौसमी समीकरण तो बेअसर हुए ही मुद्रा आपूर्ति के सूत्रधार भी इस महंगाई से हार गए। नवंबर 2007 से लेकर अभी हाल तक रिजर्व बैंक कितनी बार पैंतरा बदल चुका है। महंगाई आती देख बैंक ने नवंबर 2007 में मुद्रा आपूर्ति पर सीआरआर का ढक्कन कसा और यह दर बढ़ते-बढ़ते अगस्त 2008 में नौ फीसदी हो गई। मगर इसके बाद उसने सीआरआर घटाई और अप्रैल 2009 में यह पांच फीसदी पर आ गई। रिजर्व बैंक ने करीब अठारह में माह अपना पूरा नीतिगत कत्थक कर लिया मगर महंगाई टस से मस नहीं हुई। अंतत: रिजर्व बैंक ने मान लिया खाने पीने की चीजों की महंगाई पर उसके मौद्रिक मंत्रों का कोई असर नहीं होता।
निवाले के लाले
महंगाई की ताजी प्रकृति हैरतअंगेज है। सारी तेजी मानों निवाले पर पर फट पड़ी है। क्या आपको पता है कि थोक मूल्यों वाली महंगाई, जो अभी शून्य पर थी उसमें खाद्य उत्पादों का सूचकांक करीब 15 फीसदी की वृद्धि दिखा रहा था जो कि इस दशक का सबसे ऊंचा स्तर है। अप्रैल तक बारह माह के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर खाने पीने की चीजों में महंगाई दर 13 फीसदी थी जो महंगाई की आग मिले सूखे के ईंधन के बाद 26 फीसदी के आसपास पहुंच रही है। अंतररराष्ट्रीय कारक औद्योगिक उत्पादों की महंगाई बढ़ा सकते हैं क्यों कि कच्चे माल, ईंधन, पूंजी आदि दुनिया के बाजार के इशारे पर नाचते हैं। मगर मगर खाने पीने की बुनियादी चीजों का स्रोत तो देशी है। सरकार कच्चे तेल की कीमतें बढऩे जैसे बोदे तर्कों के पीछे खुद को छिपा लेती है, लेकिन उसके ज्ञानी गुणवंत यह नहीं बता पाते कि पिछले अठारह माह में हर कोशिशें के बावजूद खाने पीने की चीजें सस्ती क्यों नहीं हुईं। जबकि पिछले एक साल के दौरान वह अच्छे कृषि उत्पादन, कर दरों में रियायत, उदार आयात का आदि का ढोल बजाती रही है।
रहस्य क्या है?
पिछले अठारह माह में मांग आपूर्ति, मौद्रिक प्रयास, कर रियायतें, उत्पादन आदि लगभग सभी मोर्चों पर एक साथ बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिससे महंगाई घटनी चाहिए थी मगर यह नामुराद कुछ ज्यादा जिद्दी हो गई। आखिर वजह क्या है? दरअसल महंगाई में अब प्रत्यक्ष के बजाय परोक्ष कारक ज्यादा बड़ी भूमिका निभा रहे हैं जो मांग व आपूर्ति या मौद्रिक चश्मे से महंगाई को देखने पर नजर नहीं आते। पहला कारण- देश में लगभग हर तरह के कारोबार की लागत सेवाओं का बड़ा हिस्सा है और माल ढोने से लेकर पैकिंग, वितरण, फोन तक सेवायें भी सैकड़ों किस्म की है। उपभोक्ताओं के उपभोग खर्च में अब आधे से ज्यादा पैसा सेवाओं पर जाता है। कीमतें इनकी भी बढ़ी हैं,जो उत्पादों की महंगाई में जुड़ती हैं मगर हमें नहीं दिखतीं। दूसरा कारण- बुनियादी ढांचे की अपनी एक परोक्ष लागत है। जो महंगी बिजली, खराब सडक़ों, ट्रैफिक में ईंधन की खपत आदि से बनती है और जिंसों व उत्पाद की कीमत में जुड़ जाती है। तीसरा कारण- सरकार बाजार से हार गई है। बाजार अब उसकी नहीं सुनता। सूचनाओं के तेज प्रवाह के कारण व्यापारी बाजार को पहले भांप लेते हैं। जमाखोरी के नए रास्ते व तकनीकें मौजूद हैं। थोक और खुदरा बाजार के बीच की विभाजक रेखा धुंधली हो रही है। रिटेल में प्रतिस्पर्धा और प्रोसेस्ड व पैकेज्ड खाद्य सामग्री के चलन ने मोटी जेब वाले थोक ग्राहकों का एक नया वर्ग खड़ा कर दिया है। जिनके पास सूचना, साधन और सुविधा सब कुछ है।
मूल्यवृद्धि एक पेचीदा आर्थिक तत्व है। कमाई व निवेश के लिए इसका होना जरुरी है, मगर बेहाथ होना जोखिम भरा। जिस देश में 30 फीसदी आबादी के लिए दो जून का जुगाड़ ही जिंदगी हो वहां निवाले का लगातार कीमती होते जाना खतरनाक है। बढ़ती कीमतें हमेशा बढ़ी हुई आय के फायदे चाट जाती हैं। इसलिए महंगाई गरीबी की पक्की दोस्त होती है। गरीबी से निजात मिलने में हमें देर लगेगी क्यों कि हम स्थाई महंगाई आदी हो चले हैं। अमीर खुसरो होते तो कुछ ऐसी पहेली पूछते...... दूर रहे तो भी न भावै, प्यार बढ़ावै बहुत सतावै, रहे हमेशा संग लगाई, कहु सखि पत्नी? नहिं महंगाई।
---------------

Monday, September 14, 2009

खर्चवीरों की किफायत

चरज होता है कि सरकारी खर्च में किफायत की बहस इतनी सतही, बोदी, नपुंसक और अर्थहीन भी हो सकती है। पानी में नहलाने से कभी हाथी का वजन घटता है भला। कुछ सवारियों के उतर जाने से रेल की रफ्तार बढ़ते देखी है आपने? किफायत प्रतीकों में नहीं आंकड़ों में दिखती है। यह नेताओं की समाजवादी चतुरता है और हमारा भोलापन कि राजनीति हमें अक्सर कुछ बड़े लोगों के विलासितापूर्ण खर्चों को कम करने की प्रतीकात्मक बहस में उलझा देती है और सरकार के डायनासोरी खर्च को एक गंभीर और जरुरी बहस से साफ बचा ले जाती है। इस बार फिर ऐसा ही हुआ है।
..कब हुई है किफायत?
भारत की सरकार की किफायत को प्रतीकात्मक इसलिए है क्यों कि शाहखर्ची रोकने या बचत की घोषणा, वित्त वर्ष खत्म होते होते फाइलों के आरामदेह कवर में सो चुकी होती है। बजट के आंकड़ों में सरकार हर साल पहले से ज्यादा खर्चीली नजर आती है। और किफायत की मुहिम भी क्या? गैर योजना खर्च में वही दस फीसदी की कमी, बड़ेे होटलों में सरकारी आयोजनों पर रोक, इकोनॉमी क्लास में हवाई यात्रा आदि। ऐसी कई मुहिम अतीत बन गईं मगर कभी सरकार ने यह नहीं बताया कि इनसे बचत क्या हुई? सब कुछ प्रतीकात्मक है इसलिए जुलाई में सरकार बजट में खर्च को बढ़ाने पर तालियां बटोरती है और सिर्फ दो माह बाद सात सितंबर को किफायत का आदेश जारी कर देती है।
..सोचो मत बस खर्च करो!
भारत की आर्थिक प्रकृति का नियम है कि जो वित्त मंत्री खर्च का जितना बड़ा आंकड़ा बताता है वह बजट पर अपनी पार्टी से उतनी बड़ी तारीफ पाता है। प्रणव मुखर्जी गरजे कि हम पहली बार दस लाख करोड़ रुपये के खर्च का बजट लाए हैं। यह मत पूछिये कि इसमें पूंजी खर्च तो केवल 1,23,606 करोड़ रुपये है। अर्थात सरकार का 90 फीसदी खर्च तो उस खाते में हो रहा है जिसे सरकार खुद विकास से नहीं जोड़ती। वैसे भी जिस सरकार के बजट का 70 फीसदी खर्च ब्याज, सब्सिडी, वेतन, पेंशन आदि गैर योजना मदों में जाता हो उसे किफायत की बहस में नहीं उलझना चाहिए।
... बहस तो दरअसल यह है
सरकार के खर्च को नहीं बल्कि उस खर्च की गुणवत्ता को तीखी बहस की दरकार है। जरा खर्च को परखने के पैमाने बदल दीजिये आप खुद कहेंगे कि यह हो क्या रहा है? कभी खाद पर दी जा रही सब्सिडी को खेती में सरकारी खर्च के समानांतर रखकर देखा है आपने। 2009-10 साल के बजट में सरकार खेती व सिंचाई के विकास पर कुल 11000 करोड़ रुपये खर्च करेगी और उर्वरक सब्सिडी पर करीब 50,000 करोड़!! ..डीजल पर दी जा रही सब्सिडी को बिजली क्षेत्र में सरकार के निवेश से नापिये। बिजली उत्पादन लिए इस साल प्रणव बाबू ने बजट में करीब 57000 करोड़ रुपये का योजना खर्च रखा हैं मगर डीजल पर दी जा रही सब्सिडी 52288 करोड़ रुपये है। इसी तरह एलपीजी व केरोसिन पर सब्सिडी को ग्रामीण विकास पर सरकार के कुल खर्च से तौलिये। यह सब्सिडी 45000 करोड़ रुपये है जब कि इस साल ग्रामीण विकास पर सरकार 43850 करोड़ रुपये खर्च करेगी। इसमें सरकार की चहेती नरेगा भी है। चाहें तो आप निर्यातकों को मिल रही कर रियायतों (44000 करोड़ रुपये) को उद्योग व खनन में सरकार के निवेश (35740 करोड़ रुपये) से नाप लीजिये। इसमें हर आंकड़ा खर्च की प्रासंगिकता, गुणवत्ता और उपयोगिता के सवाल उठा रहा है, जो जानबूझकर बहस से बाहर कर दिये जाते हैं।
किफायत की जरुरत क्या है?
सरकार में किफायत की मौजूदा बहस ही बेमतलब है। सरकार आखिर को किफायत क्यों करे? वह तो खर्च करने के लिए ही तो टैक्स लेती है। इसलिए उसे जमकर खर्च करना चाहिए ताकि बाजार में मांग बढ़े, रोजगार बढ़ें, सुविधायें बढ़ें। मंदी के दौरान दुनिया की सभी सरकारों ने ऐसा किया क्यों कि सरकारें जितना खर्चती हैं, निजी क्षेत्र उससे ज्यादा खर्च करता है। मगर हम दुनिया से फर्क हैं हमारी सरकार भी खर्च बहादुर है लेकिन वह खर्च सब्सिडी जैसे मदों में करती है, जिसका वह श्रेय भी नहीं ले सकती। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 2007-08 में जीडीपी के अनुपात में कुल घरेलू निवेश 39.3 फीसदी रहा है इसमें सरकार का योगदान केवल 9.1 फीसदी का था। यानी कि आर्थिक पहिया सरकार के खर्च पर नहीं घूमता।
जीडीपी के अनुपात में सरकार की बचत केवल 4.5 फीसदी है जबकि निजी क्षेत्र व आम लोगों की बचत 33 फीसदी। यानी कि किफायत व सरकार का मामला नहीं जमता। अलबत्ता सरकार अगर अपने खर्च के ढर्रे, प्रकृति, उपयोगिता और प्रासंगिकता पर बहस करे तो बात कुछ बनती है। सरकारी खर्च और किफायत की बहस इस बार थरुरों और कृष्णाओं के पांच सितारा सुइट व हवाई जहाजों के बिजनेस क्लास में फंस गई। हमारे देखते-देखते नेताओं ने एक बार फिर इंच भर नैतिकता के टुकड़े से करोड़ों के फालतू सरकारी खर्च को ढक लिया और हम खुश हो गए कि सरकार खर्च में कमी का चाबुक अपनों पर ही चला रही है। क्या खूब है यह किफायत का यह नया प्रतीकवाद !!!
-----------------

Monday, September 7, 2009

मझोले और छोटों की नई दुनिया

अंबानियों की लड़ाई का शोर राजनीति के गलियारों को गुंजा रहा हो। जब टाटा सिंगुर में सताये जाने का मुआवजा मांग रहे हों, जब सत्यम के जमीन जायदाद वाले असत्यम (मेटास) पर नियंत्रण की चख – चख चल रही हो। तो इन नक्‍कारखानों में तूती की आवाज कौन सुने? बड़ों के इस शोर के बीच मझोले और छोटों की अर्थव्यवस्था की तरफ दे ाने की फुर्सत किसे है? कोई देखे या न देखे पर बदलाव तो होता है क्यों कि परिवर्तन किसी टाटा, सत्यम या अंबानी का ट्रेडमार्क नहीं है। उद्योग जगत के बड़ों के नाज नखरे उठाने में मसरुफ सरकार को पता ही नहीं चला और सिर्फ पांच वर्षों में लघु उद्योगों का पूरा स्वरुप ही बदल गया। कभी मैन्युफैक्चरिंग यानी उत्पादन गतिविधियों का केंद्र रहा देश का लघु उद्योग अब सेवा क्षेत्र का स्वर्ग है। छोटे व मझोले उद्योगों की नई गणना बताती है कि देश की ढाई करोड़ से ज्याद लघु इकाइयों में 72 फीसदी इकाइयां अब सेवा क्षेत्र में हैं !!!! लघु उद्योगों की नीतियों पर नजर र ाने वालों को इस आंकड़े पर हैरत होना लाजिमी है क्यों कि सरकार की नीतियों और इस बदलाव में तो पीढिय़ों का अंतर है। सिर्फ यही नहीं यह बदलाव बहुत गहरे अर्थ भी छिपाये हुए है।
.. दिलचस्प नई सूरत?
लघु उद्योगों की दुनिया बड़े पैमाने पर बदल गई है भले ही लघु व मझोले उद्योगों की चौथी गणना के बीते सप्ताह आए आंकड़े बड़ी खबरों के बीच खो गए हों। ज्यादा लोग, कम तकनीक, छोटा उत्पादन.... लघु उद्योगों की अब यह पहचान नहीं रही। सरकार ने इस क्षेत्र के लिए परिभाषा बदली थी जिसके आधार पर लघु मझोले उद्योगों की चौथी गणना में मझोली इकाइयों व सेवा क्षेत्र को भी शामिल किया गया। नतीजे चौंकाने वाले हैं। देश में छोटी व मझोली इकाइयों की तादाद 1.3 करोड़ (2001-02 के आंकड़ों के मुताबिक) नहीं बल्कि दोगुनी यानी 2.6 करोड़ है। यह इकाइयां करीब छह करोड़ लोगों को रोजगार दे रही हैं। लेकिन विसंगति देखिये कि इनमें पांच करोड़ लोगों को रोजगार देने वाली इकाइयां पंजीकृत नहीं हैं यानी कि रोजगार है मगर असंगठित। फिर भी प्रति इकाई रोजगार 01-02 में 4.48 व्यक्ति था वह 06-07 में बढक़र 6.24 व्यक्ति हो गया है।
और हैरतअंगेज सीरत
लघु उद्योगों की नई तस्वीर में दिलचस्प पेचीदगियां हैं मगर सीरत में बदलाव तो आश्चर्यजनक हैं। अब देश की केवल 28 फीसदी लघु इकाइयां विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग के काम लगी हैं यानी कि लघु उद्योगों में इकाई लगाकर उत्पादन करने का दौर खत्म। अब सेवा देना लघु इकाइयों का नया काम है, इसलिए 72 फीसदी इकाइयां तरह तरह की सेवाओं में लगी हैं। लघु उद्योगों में 2001-02 से 06-07 के बीच प्रति इकाई स्थायी निवेश करीब सात लाख रुपये से बढ़ कर 33 लाख रुपये हो गया है, यानी कि यह नई सीरत उद्यमियों को भा रही है।
इस बदलाव के अर्थ
....मगर लघु उद्योगों के पूरे स्वरुप में यह बदलाव बड़ा अर्थपूर्ण है। पहला अर्थ तो यह कि हम रफ्ता-रफ्ता विनिर्माण आधारित अर्थव्यवस्था से सेवा आधारित अर्थव्यवस्था में बदलते जा रहे हैं। लघु उद्योगों को रोजगार का पावर हाउस माना जाता है लेकिन यह पावर हाउस अब इकाई लगाकर नहीं बल्कि सेवायें देकर चल रहा है। उद्यमी अब ठोस उत्पादन करना नहीं चाहते बल्कि अदृश्य सेवायें छोटों की इस बड़ी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। लेकिन इसके साथ ही निर्यात, उत्पादन और बाजार में कई अहम चीजों की आपूर्ति का ढांचा भी बदल गया। आप मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों के महंगे होने और सेवाओं के सस्ते होने के रहस्य को भी इस बदलाव के जरिये खोल सकते हैं। लघु इकाइयां सस्ते सामान बनाकर कीमतों को कम रखने में मदद रखती थीं, अब या तो वह सामान नहीं मिल पाते या बड़ी इकाइयां उन्हें ऊंची लागत पर बना रही हैं। महंगाई का यह एक छिपा हुआ चेहरा है।
नीतियों की गुत्थी
लघु उद्योगों की सूरत और सीरत में यह बदलाव उदारीकरण के बाद बनी लघु उद्योग नीतियों की प्रासंगिकता को कठघरे में ाड़ा कर देता है। लघु इकाइयों के लिए प्रोत्साहन, कर्ज, संरंक्षण, कर रियायत, निवेश, निर्यात आदि की नीतियां इस क्षेत्र मेंं मैन्युफैक्चरिंग की प्रमुखता को निगाह में रखकर बनती रही हैं। इस नई सूरत में अब इन नीतियों को सिरे से बदलना होगा क्यों कि अर्थव्यवस्था में रोजगार के सबसे बड़ा सप्लायर लघु उद्योग सेवा क्षेत्र का दीवाना है। मगर जरा ठहरिये....सरकार के पास तो सेवा क्षेत्र को लेकर कोई समेकित कानून ही नहीं है। ...सेवाओं में गुणवत्ता के सवाल पहले से हैं, ऊपर से छोटी पूंजी वाले लघु उद्योग की सेवाओं में बड़ी हिस्सेदारी इन सवालों को और बड़ा कर देती है। तो सेवायें लेने वाले उपभोकताओं के हित कैसे सुरक्षित होंगे? सरकार लघु उद्योगों को निर्यात में बढ़ावा देती है लेकिन पर लघु उद्योग तो उत्पादन के बजाय सेवाओं की तरफ मुखातिब हैं तो फिर निर्यात सेवाओं का होना चाहिए मगर यहां तो संगठित क्षेत्र से सेवा निर्यात को लेकर कोई रणनीति नहीं है, तो फिर लघु और असंगठित क्षेत्र की कौन सुने?
उदारीकरण ने सिर्फ बड़ों को नहीं बदला है बल्कि छोटे भी बड़े पैमाने पर बदल गए हैं। सरकार को यह दिखता ही नहीं कि लघु उद्योग वक्त के हिसाब से बदले हैं उसकी नीतियां देखकर नहीं। अब तो नीतियों को लघु उद्योगों की नई दुनिया के हिसाब से बदलना होगा। साथ ही उन चुनौतियों से निबटने की नीतियां भी चाहिए जो मैन्युफैक्चरिंग से लघु उद्योगों के दूर जाने से उपजेंगी। यह चुनौतियां रोजगार, आपूर्ति, कीमत और निर्यात सबको प्रभावित करेंगी, क्यों कि इस मुल्क की बहुरंगी अर्थव्यवस्था को सिर्फ बड़े उद्योगों की तलवार नहीं छोटे उद्योगों की सुई (...जहां काम आवै सुई, कहा करै तलवार) भी चाहिए।
-----

Thursday, September 3, 2009

हवाई नीतियों में फंसा असली खजाना

जमीन का मालिक मगर पैसे में कमजोर, दूसरा पैसे में मजबूत और खजाना तलाशने वालाऔर तीसरा वह जिसने खजाना मिलने से पहले ही खरीदने का सौदा कर लिया। ... यह कहानी है एक खजाने की है जिसमेंं दिलचस्प मोड़ खजाना मिलने के बाद आता है क्यों कि तब नीयत बदलती है। जिसने खजाना निकाला वह ऊंची कीमत वसूलने के हक में, तो जो खरीदने का सौदा पहले ही किये बैठा था उसे लगा धोखा हुआ। और इस बीच जिसकी जमीन थी वह भी आ धमका और उसने कहा कि खजाने की कीमत और बंटवारे का हिसाब वह करेगा। तो अब झगड़ा चालू है। यह कहानी है दरअसल कृष्णा गोदावरी बेसिन की, गैस के झगड़े की और अंबानी भाइयों के बीच विवाद की। इसमें पहला पात्र सरकार है, दूसरी है मुकेश अंबानी की रिलायंस और तीसरे पात्र हैं अनिल अंबानी।
द ग्रेट गैस शो!
इसे झगड़ा नहीं बल्कि प्रहसन या हास्य नाटक कहिये। जिसमें गफलतें ही गफलतें होती हैं और फिर सब अपनी-अपनी तरह से उन्हें ढंकने की कोशिश करते हैं। अरबों रुपये का खेल, अंबानी परिवार का फैमिली ड्रामा, शेयरधारकों की बैठक के बीच फूटा इमोशन , कंपनियों और सियासत से रिश्तों की चर्चायें, दांव पेंच, लंबे अदालती सीन । सब कुछ है इस स्क्रिप्ट में लेकिन ठहरिये यह ड्रामा नहंी है। यह देश की ऊर्जा सुरक्षा का मसला है, जिसे ठोस नीतियों व पारदर्शिता की दरकार है। जो कहीं नजर नहीं आतीं। इसलिए यह पूरा प्रकरण देश की किरकिरी कराने वाले एक ड्रामे में बदल गया है। इस झगड़े के कुछ सूत्र अंबानी परिवार की कलह से जरुर जुड़ते हैं पर वह कलह उतनी अहम नहीं है जितनी अहम है सरकार की गफलत और नीतिगत चूक जिसके कारण गैस क्षेत्र अंबानियों के झगड़े के सुलझने का मोहताज हो गया है।
परिवार का झगड़ा या सरकार का?
अंबानी परिवार का झगड़ा भी कानून के तहत किसी अदालत में हल हो सकता है बशर्ते सरकार के पास नीति साफ हो लेकिन यह सरकार ने अदूरदर्शी नीतियों और औचक कदमों से, गैस के मामले में, इस पारिवारिक झगड़े को एक राष्ट्रीय समस्या बना दिया। 2005 में अंबानी आत्मजों ने यह समझौता किया था कि मुकेश की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज अनिल की कंपनी रिलायंस नेचुरल रिसोर्स लिमिटेड को 17 वर्ष के लिए 2.34 डॉलर प्रति एमबीटीयू (मिलियन ब्रिटिश क्यूबिक थर्मल यूनिट) पर 280 लाख घन मीटर गैस बेचेगी। जब गैस मिल गई तो उसके साथ मुकेश अंबानी को 2007 में जारी का एक ऑर्डर भी मिल गया जिसमें गैस को 4.20 डॉलर प्रति एमबीटीयू पर बेचने की शर्त रखी गई थी। खजाने निकालने वाले ने इसे पकड़ लिया। मामला मुंबई हाई कोर्ट गया और अदालत ने पुराने समझौते पर ही मुहर लगा दी। विवाद जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तब सरकार सोते से जागी और उसने अंबानी परिवार का करार रद्द करने की अर्जी डाल दी। परिवार का झगड़ा परिवार और अदालत जाने, बात तो सरकार की है, जो नीतियों की कलाबाजी खाती रही है और विभिन्न पक्षों को नियम प्रावधानों को अपनी तरह से बखानने का मौका देती रही।
गलतियों की कॉमेडी
केजी बेसिन प्रतिदिन 120 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस प्रतिदिन दे सकता है जिससे देश का गैस का प्राकृतिक गैस उत्पादन दोगुना हो जाएगा और इससे दाभोल आकार के 15 बिजली घर चल सकते हैं। मगर जब यह खुलासा हुआ तो साथ ही यह पता लगा कि केजी बेसिन के भीतर से जब गैस निकली तो इसे बांटने बेचने के लिए नीतियों की पाइप लाइन ही नहीं है। फिर क्या था सरकार ने रंग पर रंग बदलने शुरु किये। दस पुरानी गैस तेल खोज नीति के तहत कंपनियों को गैस की कीमत तय करने व मार्केटिंग का अधिकार देने के फैसले से पीछे वह हट गई। तो गैस यूटिलाइजेशन नीति को लेकर बगलें झांकती रही। इस नीति के तहत यह तय होना है कि किस उद्योग कितनी गैस मिलेगी। इस नी िका प्रारुप दिसंबर 2007 में बना, जून 2008 में बदला गया और इस साल फरवरी व अप्रैल में फिर बदलाव हुए। मगर पेंच खत्म नहीं हुए क्यों कि यह नीति सिर्फ रिलायंस के केजी बेसिन उत्पाद बंटवारा समझौते के पर लागू होगी। यानी कि केयर्न, ओएनजीसी, पेट्रोनेट एलएनजी आदि कंपनियां जो गैस निकाल रहीं हैं उसके इस्तेमाल की नीति अभी भी हवा में है।
एक कीमती फार्मूला
गफलत सिर्फ इतनी ही नहीं गैस की कीमत तय करने को लेकर झगड़ा इतना पेचीदा है कि सिर्फ एक प्रावधान पर अदालत की व्याख्या करोड़ों का खेल कर सकती है और इससे न केवल अंबानी परिवारों के लिए सब कुछ बदल सकता है बल्कि आने वाले दौर में गैस क्षेत्र में निवेश से पहले कंपनियों को सोचना भी पड़ सकता है। गैस की कीमत तय करने के फार्मूले से सिर्फ इन विवाद का ही हल नहीं निकलना है बल्कि यह भी तय होना है कि गैस का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों ने जो निवेश उसका क्या होगा और आगे कौन कितना निवेश करेगा।
देश को इस बात पर संतोष होना चाहिए था कि अर्से बाद देश में गैस का एक बड़ा खजाना मिला है जो ऊर्जा की चिंताओं कम करते हुए विकास की रफ्तार तेज करेगा लेकिन यहां तो हालत उलटी है ऊर्जा सुरक्षा बढऩे की उम्मीदें एक परिवार के झगड़े की बंधक बन गई हैं। क्यों कि इस दुर्लभ प्राकृतिक संसाधन के न्यायसंगत बंटवारे और तर्कसंगत मूल्यांकन की नीतियों को लेकर सरकार खुद गैस में तैर रही थी। इसलिए ऊर्जा की चिंता छोड़ इस गैस शो का आनंद लीजिये। खजाने की इस कहानी में अभी कुछ और दिलचस्प मोड़ आएंगे।
---------