Monday, December 27, 2010

भूल-चूक, लेनी-देनी

अर्थार्थ
शुक्र है कि हम सुर्खियों से दूर रहे। आर्थिक दुनिया ने दस के बरस में जैसी डरावनी सुर्खियां गढ़ी उनमें न आने का सुकून बहुत गहरा है। करम हमारे भी कोई बहुत अच्छेह नहीं थे। हमने इस साल सर ऊंचा करने वाली सुर्खियां नहीं बटोरीं लेकिन ग्रीस, आयरलैंड, अमेरिका के मुकाबले हम, घाव की तुलना में चिकोटी जैसे हैं। अलबत्ता इसमें इतराने जैसा भी कुछ नहीं है। वक्त, बड़ा काइयां महाजन है। उसके खाते कलेंडर बदलने से बंद नही हो जाते हैं बल्कि कभी कभी तो उसके परवाने सुकून की पुडि़या में बंध कर आते हैं। मंदी व संकटों से बचाते हुए वक्त हमें आज ऐसी हालत में ले आया है जहां गफलत में कुछ बड़ी नसीहतें नजरअंदाज हो सकती हैं। दस के बरस बरस का खाता बंद करते हुए अपनी भूल चूक के अंधेरों पर कुछ रोशनी डाल ली जाए क्यो कि वक्त की लेनी देनी कभी भी आ सकती है।
लागत का सूद
सबसे पहले प्योर इकोनॉमी की बात करें। भारत अब एक बढती लागत वाला मुल्क हो गया है। पिछले कुछ वर्षों की तेज आर्थिक विकास दर ने हमें श्रम (लेबर कॉस्ट) लागत को ऊपर ले जाने वाली लिफ्ट में चढ़ा दिया है। सस्ता श्रम ही तो भारत की सबसे बड़ी बढ़त थी। वैसे इसमें कुछ अचरज नहीं है क्यों कि विकसित होने वाली अर्थव्यरवस्थाओं में श्रम का मूल्यं बढ़ना लाजिमी है। अचरज तो यह है कि हमारे यहां लागत हर तरफ से बढ़

Monday, December 20, 2010

हमको भी ले डूबे !

अर्थार्थ
“तुम नर्क में जलो !! सत्यानाश हो तुम्हारा !! .दुनिया याद रखे कि तुमने कुछ भी अच्छा नहीं किया !!”....डबलिन में एंग्लो आयरिश बैंक के सामने चीखती एक बूढ़ी महिला के पोस्टर पर यह बददुआ लिखी है। ...बैंकों से नाराज लोगों का गुस्सा एक बड़ा सच बोल रहा है। बैंकों ने दुनिया का कितना भला किया यह तो पता नहीं मगर मुश्किलों की महागाथायें लिखने में इन्हे महारथ हासिल है। आधुनिक वित्तीय तंत्र का यह जोखिमपसंद, मनमाना और बिगड़ैल सदस्य दुनिया की हर वित्तीय त्रासदी का सूत्रधार या अभिनेता रहा है। बैंक हमेशा डूबे हैं और हमको यानी हमारे जैसे लाखों को भी ले डूबे हैं। इनके पाप बाद में सरकारों ने अपने बजट से बटोरे हैं। अमेरिका सिर्फ अपने बैंकों के कारण औंधे मुंह बैठ गया है। इन्हीं की मेहरबानी से यूरोप के कई देश दीवालिया होने की कगार पर हैं। इसलिए तमाम नियामक बैंकों को रासते पर लाने में जुट गए हैं। डरा हुआ यूरोप छह माह में दूसरी बार बैंकों को स्ट्रेस टेस्ट (जोखिम परीक्षण) से गुजारने जा रहा है। बैंकिंग उद्योग के लिए नए बेहद सख्त कानूनों से लेकर अंतरराष्ट्री य नियमों (बेसिल-तीन) की नई पीढ़ी भी तैयार है। मगर बैंक हैं कि मानते ही नहीं। अब तो भारत के बैंक भी प्रॉपर्टी बाजार (ताजा बैंक-बिल्डर घोटाला) में हाथ जलाने लगे हैं।
डूबने की फितरत
गिनती किसी भी तरफ से शुरु हो सकती है। चाहें आप पिछले दो साल में डूबे 315 अमेरिकी बैंकों और यूरोप में सरकारी दया पर घिसट रहे बैंकों को गिनें या फिर 19 वीं शताब्दी का विक्टोरियन बैंकिंग संकट खंगालें। हर कहानी में बैंक नाम एक चरित्र जरुर मौजूद है, खुद डूबना व सबको डुबाना जिसकी फितरत है। 1970 से लेकर 2007 तक दुनिया में 124 बैंकिंग संकट आए हैं और कई देशों में तो यह तबाही एक से ज्या दा बार

Monday, December 13, 2010

साख नहीं तो माफ करो!

अर्थार्थ
साख नहीं तो माफ करो! .. दुनिया का बांड बाजार अर्से बाद जब इस दो टूक जबान में बोला तो लंदन, मैड्रिड, रोम, ब्रसेल्स और न्यूयॉर्क, फ्रैंकफर्ट, बर्लिन और डबलिन में नियामकों व केंद्रीय बैंकों की रीढ़ कांप गई। दरअसल जिसका डर था वही बात हो गई है। वित्तीय बाजारों के सबसे निर्मम बांड निवेशकों ने यूरोप व अमेरिका की सरकारों की साख पर अपने दांत गड़ा दिए हैं। घाटे से घिरी अर्थव्यवस्थाओं से निवेशक कोई सहानुभूति दिखाने को तैयार नहीं हैं। ग्रीस व आयरलैंड को घुटनों के बल बिठाकर यूरोपीय समुदाय से भीख मंगवाने के बाद ये निवेशक अब स्पेन की तरफ बढ़ रहे हैं। स्पेन, यूरोप की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, क्या आयरलैंड व ग्रीस की राह पर जाएगा? सोच कर ही यूरोप की सांस फूल रही है। लेकिन यह बाजार तो स्पेन के डेथ वारंट पर दस्तखत करने लगा है, क्योंकि इस क्रूर बाजार में बिकने वाली साख यूरोप की सरकारों के पास नहीं है और तो और, इस निष्ठुर बाजार ने अमेरिका की साख को भी खरोंचना शुरू कर दिया है।
खतरे की खलबली
पूरी दुनिया में डर की ताजा लहर बीते हफ्ते यूरोप, अमेरिका व एशिया के बांड बाजारों से उठी, जब सरकारों की साख पर गहरे सवाल उठाते हुए निवेशकों ने सरकारी बांड की बिकवाली शुरू कर दी और सरकारों के लिए कर्ज महंगा हो गया। बीते मंगलवार अमेरिकी सरकार के (दस साल का बांड) बाजार कर्ज की लागत सिर्फ कुछ घंटों में

Monday, December 6, 2010

पर्दा जो उठ गया !

अर्थार्थ
रा देखिये तो शर्म से लाल हुए चेहरों की कैसी अंतरराष्ट्रीय नुमाइश चल रही है। अमेरिका से अरब तक और भारत से यूरोप तक मुंह छिपा रहे राजनयिकों ने नहीं सोचा था कि विकीलीक्स ( एक व्हिसिल ब्लोइंग वेबसाइट) सच की सीटी इतनी तेज बजायेगी कि कूटनीतिक रिश्तों पर बन आएगी। दुनिया के बैंक समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर सब उनकी कारोबारी गोपनीयता को उघाड़ क्यों देना चाहते हैं। कहीं (भारत में) कारोबारी लामबंदी बनाम निजता बहस की गरम है क्यों कि कुछ फोन टेप कई बड़े लोगों को शर्मिंदा कर रहे हैं। अदालतें सरकारी फाइलों में घुस कर सच खंगाल रही हैं। पूरी दुनिया में पारदर्शिता के आग्रहों की एक नई पीढ़ी सक्रिय है, जो संवेदनशीलता, गोपनीयता,निजता की मान्यताओं को तकनीक के मूसल से कूट रही है और सच बताने के पारंपरिक जिम्मेंदारों को पीछे छोड़ रही है। कूटनीति, राजनीति, कारोबार सभी इसके निशाने पर हैं। कहे कोई कुछ भी मगर, घपलों, घोटालों, संस्थागत भ्रष्टाचार और दसियों तरह के झूठ से आजिज आम लोगों को यह दो टूक तेवर भा रहे हैं। दुनिया सोच रही है कि जब घोटाले इतने उम्दा किस्म के हो चले हैं तो फिर गोपनीयता के पैमाने पत्थर युग के क्यों हैं ?
खतरनाक गोपनीयता
ग्रीस की संप्रभु सरकार अपने कानूनों के तहत ही अपनी घाटे की गंदगी छिपा रही थी। पर्दा उठा तो ग्रीस ढह गया। ग्रीस के झूठ की कीमत चुकाई लाखों आम लोगों ने, जो पलक झपकते दीवालिया देश के नागरिक बन गए । यूरोप अमेरिका की वित्तीय संस्थामओं ने नीतियों के पर्दे में बैठकर तबाही रच दी। अमेरिका लेकर आयरलैंड तक आम लोग अपने बैंकों के दरवाजे पीट कर यही तो पूछ रहे हैं कि यह कैसी कारोबारी गोपनीयता थी जिसमें उनका सब कुछ लुट

Monday, November 29, 2010

नीतीश होने की मजबूरी

अर्थार्थ
वोटर रीझता है मगर सड़क से नहीं (जातीय) समीकरण से, विकास से नहीं (वोटों का) विभाजन से और काम से नहीं (व्यक्तित्व के) करिश्मे से! एक पराजित मुख्यमंत्री ने कुछ साल पहले ऐसा ही कहा था। यह हारे को हरिनाम था ? नहीं ! यह भारत में विकास की राजनीति के असफल होने का ईमानदार ऐलान था। नेता जी बज़ा फरमा रहे थे,भारत की सियासत तो जाति प्रमाण पत्रों की दीवानी है। विकास के सहारे बदलते आय (कमाई)प्रमाण पत्रों की होड़ उसे नहीं सुहाती। चुनावी गणित विकास के आंकड़ो से नहीं सधती, इसलिए ठोस आर्थिक विकास से सिंझाई गई राजनीति को हमने कभी चखा ही नहीं। भारत में सियासत अपनी लीक चलती है और विकास अपनी गति से ढुलकता है। सत्ता में पहुंच कर आर्थिक प्रगति दिखाने वालों का माल भी वोट की मंडी में कायदे से नहीं बिकता तो फिर विकास की राजनीति का जोखिम कौन ले? इसलिए आर्थिक विकास दलों के बुनियादी राजनीतिक दर्शन की परिधि पर टंगा रहता है। मगर इस बार कुछ हैरतअंगेज हुआ। जनता नेताओं से आगे निकल गई। पुरानी सियासत के अंधेरे में सर फोड़ती पार्टियों को, बिहार का गरीब गुरबा वोटर धकेल कर नई रोशनी में ले आया है। बिहार के नतीजे राजनीति को उसका बुनियादी दर्शन बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। चौंकिये मत! राजनीति हमेशा मजबूरी में ही बदली है।
प्रयोग जारी है
भारत का प्रौढ़ लोकतंत्र,उदार अर्थव्यवस्था से रिश्ते को कई तरह से परख रहा है। पूरा देश राजनीतिक आर्थिक मॉडलों की विचित्र प्रयोगशाला है। राजनीतिक स्थिरता विकास की गारंटी है लेकिन बंगाल का वोटर अब विकास के लिए ही स्थिरता से निजात चाहता है। दूसरी तरफ लंबी राजनीतिक स्थिरता के सहारे राजस्थान चमक जाता है। गठजोड़ की सरकारें पंजाब में कोई उम्मीाद नहीं जगातीं लेकिन बिहार में वोटरों को भा जाती हैं। बड़े राज्यों में पहिया धीरे घूमता है मगर छोटे राज्य विकास का रॉकेट बनते भी नजर नहीं

Monday, November 22, 2010

भ्रष्टाचार का मुक्त बाजार

अर्थार्थ
राजाओं, कलमाडिय़ों, मधु कोड़ाओं और ललित मोदियों के शर्मनाक संसार को देखकर क्या सोच रहे हैं ... यही न कि आर्थिक खुलेपन की हवा भ्रष्टाचार के पुराने इन्फेक्शन को खूब रास आ रही है ? वेदांतो, सत्यमों व तमाम वित्तीय कंपनियों के कुकर्मों में आपको एक आर्थिक अराजकता दिखती होगी। कभी कभी यह कह देने का मन होता होगा कि आर्थिक उदारीकरण ने भारत में भ्रष्टाचार का उदारीकरण कर दिया है !!.... माना कि यह ऊब, खीझ और झुंझलाहट है मगर बेसिर पैर नहीं है। मान भी लीजिये कि हम मुक्त बाजार की विकृतियों को संभाल नहीं पा रहे हैं। रिश्वत, कार्टेल, फर्जी एकाउंटिंग, कारपोरेट फ्रॉड, लॉबीइंग, नीतियों में मनमाना फेरबदल, ठेके, निजीकरण का इस्तेमाल .... उदार बाजार का हर धतकरम भारत में खुलकर खेल रहा है। राजा व कोड़ा जैसे नेताओं की नई पीढ़ी अब राजनीतिक अवसरों में कमाई की संभावनाओं को चार्टर्ड अकाउंटेंट की तरह आंकती है, इसलिए भ्रष्टाजचार भी अब सीधे नीतियों के निर्माण में पैठ गया है। सातवें आठवें दशक के नेता अपराधी गठजोड़ की जगह अब नेता-कंपनी गठजोड़ ले ली है। यह जोड़ी ज्यादा चालाक, आधुनिक, रणनीतिक, बेफिक्र और सुरक्षित है। मुक्त बाजार में ताली दोनों हाथ से बज रही है।
खुलेपन का साथ
मुट्ठी में दुनिया (मोबाइल) लिये घूम रही भारत की एक बड़ी आबादी को मालूम होना चाहिए कि यह सुविधा बहुतों की मुट्ठयां गरम होने के बाद मिली है। सुखराम से राजा तक, दूरसंचार क्षेत्र का उदारीकरण अभूतपूर्व भ्रष्टा्चार से दागदार है। सिर्फ यही क्यों पूंजी बाजार, खनन, अचल संपत्ति व निर्माण, बैंकिंग, वायु परिवहन, सरकारी अनुबंध ... हर क्षेत्र में उदारीकरण के बाद बडे घोटाले दर्ज हुए हैं। उदारीकरण और भ्रष्टाचार रिश्ते की सबसे बड़ी पेचीदगी यही है कि

Monday, November 15, 2010

संकटों के नए संस्करण

अर्थार्थ
दुनिया की आर्थिक फैक्ट्रियों से संकटों के नए संस्करण फिर निकलने लगे हैं। ग्रीस के साथ ही यूरोप की कष्ट कथा का समापन नहीं हुआ था, अब आयरलैंड दीवालिया होने को बेताब है और इधर मदद करने वाले यूरोपीय तंत्र का धैर्य चुक रहा है। बैंकिंग संकट से दुनिया को निकालने के लिए हाथ मिलाने वाले विश्व के 20 दिग्गज संरक्षणवाद को लेकर एक दूसरे पर गुर्राने लगे हैं यानी कि बीस बड़ों की (जी-20) बैठक असफल होने के बाद करेंसी वार और पूंजी की आवाजाही पर पाबंदियों का नगाड़ा बज उठा है। सिर्फ यही नहीं, मंदी में दुनिया की भारी गाड़ी खींच रहे भारत, चीन, ब्राजील आदि का दम भी फूल रहा है। यहां वृद्धि की रफ्तार थमने लगी है और महंगाई के कांटे पैने हो रहे हैं। दुनिया के लिए यह समस्याओं की नई खेप है और चुनौतियों का यह नया दौर पिछले बुरे दिनों से ज्यादा जटिल, जिद्दी और बहुआयामी दिख रहा है। समाधानों का घोर टोटा तो पहले से ही है, तभी तो पिछले दो साल की मुश्किलों का कचरा आज भी दुनिया के आंगन में जमा है।

ट्रेजडी पार्ट टू
यूरोप के पिग्स (पुर्तगाल, आयरलैंड, ग्रीस, स्पेन) में दूसरा यानी आयरलैंड ढहने के करीब है। 1990 के दशक की तेज विकास दर वाला सेल्टिक टाइगर बूढ़ा होकर बैठ गया है और यूरोपीय समुदाय से लेकर आईएमएफ तक सब जगह उद्धार की गुहार लगा रहा है। डबलिन, दुबई जैसे रास्ते से गुजरते हुए यहां तक पहुंचा है। जमीन जायदाद के धंधे को कर्ज देकर सबसे बड़े आयरिश बैंक एंग्लो आयरिश और एलाइड आयरिश तबाह हो गए, जिसे बजट से 50 बिलियन यूरो की मदद देकर बचाया जा रहा है। आयरलैंड का घाटा जीडीपी का 32 फीसदी हो रहा है, सरकार के पास पैसा नहीं है और बाजार में साख रद्दी हो गई है। इसलिए बांडों को बेचने का इरादा छोड़ दिया गया है। आयरलैंड के लिए बैंकों को खड़ा करने की लागत 80 बिलियन यूरो तक जा सकती है। करदाताओं को निचोड़कर (भारी टैक्स और खर्च कटौती वाला बजट) यह लागत नहीं निकाली जा सकती। इसलिए ग्रीस की तर्ज पर यूरोपीय समुदाय की सहायता संस्था (यूरोपियन फाइनेंशियल स्टेबिलिटी फैसिलिटी) या आईएमएफ से मदद मिलने की उम्मीद है। लेकिन यह मदद उसे दीवालिया देशों की कतार में पहुंचा देगी। यूरोपीय समुदाय की दिक्कत यह है कि

Monday, November 8, 2010

असमंजस की मुद्रा

अर्थार्थ
साख बचे तो (आर्थिक) सेहत जाए? ताज मिले तो ताकत जाए? एक रहे तो भी कमजोर और बिखर गए तो संकट घोर?? बिल्कुल ठीक समझे आप, हम पहेलियां ही बुझा रहे हैं, जो दुनिया की तीन सबसे बड़ी मुद्राओं अर्थात अमेरिकी डॉलर, चीन का युआन और यूरो (क्रमश:) से जुड़ी हैं। दरअसल करेंसी यानी मुद्राओं की पूरी दुनिया ही पेचीदा उलटबांसियों से मुठभेड़ कर रही है। व्यापार के मैदान में अपनी मुद्रा को कमजोर करने की जंग यानी करेंसी वार का बिगुल बजते ही एक लंबी ऊहापोह बाजार को घेर को बैठ गई है। कोई नहीं जानता कि दुनिया की रिजर्व करेंसी का ताज अमेरिकी डॉलर के पास कब तक रहेगा? युआन को कमजोर रखने की चीनी नीति पर कमजोर डॉलर कितना भारी पड़ेगा? क्या माओ के उत्तराधिकारियों की नई पीढ़ी युआन को दुनिया की रिजर्व करेंसी बनाने का दांव चलेगी? यूरो का जोखिम कितना लंबा खिंचेगा। क्या दुनिया में अब कई रिजर्व करेंसी होंगी? दुनिया के कुछ हिस्से आठवें दशक के लैटिन अमेरिका की तरह दर्जनों विनिमय दरों का अजायबघर बन जाएंगे? ... सवालों की झड़ी लगी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार असमंजस में नाखून चबा रहा है।
दुविधा का नाम डॉलर
विश्व के करीब 60 फीसदी विदेशी मुद्रा भंडारों में भरा ताकतवर अमेरिकी डॉलर ऊहापोह की सबसे बड़ी गठरी है। अमेरिकी नीतियों ने डॉलर को हमेशा ताकत की दवा दी ताकि अमेरिकी उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति महंगाई से महफूज रहे। मजबूत डॉलर, सस्ते आयात व नियंत्रित मुद्रास्फीति अमेरिका के मौद्रिक प्रबंधन की बुनियाद है। सस्ते उत्पादन और अवमूल्यित मुद्रा के महारथी चीन ने इसी नीति का फायदा लेकर अमेरिकी बाजार को अपने उत्पादों से पाटकर अमेरिका को जबर्दस्त व्यापार घाटे का तोहफा दिया है। सस्ते आयात को रोकने के लिए विश्व व्यापार में डॉलर को प्रतिस्पर्धात्मक रखना अमेरिकी नीति का दूसरा पहलू है। अलबत्ता 1980-90 में जापान ने इसे सर के बल खड़ा किया था और अब चीन इसे दोहरा रहा है। इस अतीत को पीठ पर लादे विश्व की यह सबसे मजबूत रिजर्व करेंसी अब तक की सबसे जटिल चुनौतियों से मुकाबिल है। जीडीपी के अनुपात में 62 फीसदी विदेशी कर्ज (अमेरिकी बांडों में विदेशी निवेश) अमेरिका के भविष्य पर

Monday, November 1, 2010

मुद्रास्फीति की महादशा

अर्थार्थ
ड़क पर से बैंकनोट बटोरे जा रहे हैं। (हंगरी 1946) .. लाख व करोड़ मूल्य वाले के नोट लेकर लोग जगह जगह भटक रहे हैं। (जर्मनी 1923) .. बाजार में कीमतें घंटो की रफ्तार से बढ़ रही हैं। (जिम्बावे 2007)। ... अमेरिका के लोगों के सपनों में यह दृश्य आजकल बार-बार आ रहे हैं। अंकल सैम का वतन, दरअसल, भविष्य के क्षितिज पर हाइपरइन्फे्लेशन का तूफान घुमड़ता देख रहा है। एक ऐसी विपत्ति जो पिछले सौ सालों में करीब तीन दर्जन से देशों में मुद्रा, वित्तीय प्रणाली और उपभोक्ता बाजार को बर्बाद कर चुकी है। आशंकायें मजबूत है क्यों कि ढहती अमेरिकी अर्थव्यवस्था को राष्ट्रपति बराकर ओबामा और बेन बर्नांकी (फेडरल रिजर्व के मुखिया) मुद्रा प्रसार की अधिकतम खुराक (क्यूई-क्वांटीटिव ईजिंग) देने पर आमादा हैं। फेड रिजर्व की डॉलर छपाई मशीन ओवर टाइम में चल रही है और डरा हुआ डॉलर लुढ़कता जा रहा है। बर्नाकी इस घातक दवा (क्यूई) के दूसरे और तीसरे डोज बना रहे है। जिनका नतीजा अमेरिका को महा-मुद्रास्फीति में ढकेल सकता है और अगर दुनिया में अमेरिका के नकलची समूह ने भी यही दवा अपना ली तो यह आपदा अंतरदेशीय हो सकती।

क्यूई उर्फ डॉलरों का छापाखाना
मांग, उत्पादन, निर्यात और रोजगार में बदहाल अमेरिका डिफ्लेशन (अपस्फीति) के साथ मंदी के मुहाने पर खड़ा है। ब्याज दरें शून्य पर हैं यानी कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ब्याज दरें घटाने जैसी दवायें फेल हो चुके हैं। अब क्वांटीटिव ईजिंग की बारी है। अर्थात ज्यादा डॉलर छाप कर बाजार में मुद्रा की क्वांटिटी यानी मात्रा बढ़ाना। नोट वस्तुत: भले ही न छपें लेकिन व्यावहारिक मतलब यही है कि फेड रिजर्व के पास मौजूद बैंको के रिजर्व खातों में (मसलन भारत में सीआरआर) ज्यादा धन आ जाएगा। इसके बदले बैंक बांड व प्रतिभूतियां फेड रिजर्व को दे देंगे। क्यूई की दूसरी खुराक इस साल दिसंबर तक आएगी। तीसरी की बात भी

Monday, October 25, 2010

संकट की पूंजी

अर्थार्थ
यह भी खूब रही। भारत, चीन, रूस, ब्राजील वाली दुनिया समझ रही थी कि संकट के सभी गृह नक्षत्र यूरो और डॉलर जोन के खाते में हैं, उनका संसार तो पूरी तरह निरापद है। लेकिन संकट इनके दरवाजे पर भी आ पहुंचा। यह पिछड़ती दुनिया जिस विदेशी पूंजी केजरिए उभरती दुनिया (इमर्जिंग मार्केट) में बदल गई वही पूंजी इनके आंगन में संकट रोपने लगी है। मंदी से हलकान अमेरिका व यूरोप अपने बाजारों को सस्ती पूंजी की गिजा खिला रहे हैं। यह पूंजी लेकर विदेशी निवेशक उभरते वित्तीय बाजारों में शरणार्थियों की तरह उतर रहे हैं। तीसरी दुनिया के इन मुल्कों की अच्छी आर्थिक सेहत ही इनके जी का जंजाल हो गई है। शेयर बाजारों में आ रहे डॉलरों ने इनके विदेशी मुद्रा भंडारों को फुला कर इनकी मुद्राओं को पहलवान कर दिया है। जिससे निर्यातक डर कर दुबक रहे हैं। विदेशी पूंजी की इस बाढ़ से शेयर बाजारों और अचल संपत्ति का बाजार गुब्बारा फिर फूलने लगा है। कई देशों में मुद्रास्फीति (भारत में पहले से) मंडराने लगी है। हमेशा से चहते विदेशी निवेशक अचानक पराए हो चले हैं। कोई ब्याज दरें बढ़ाकर इन्हें रोक रहा है तो कोई सीधे-सीधे विदेशी पूंजी पर पाबंदिया आयद किए दे रहा है। 1997 के मुद्रा संकट जैसे हालात उभरते बाजारों की सांकल बजा रहे हैं।
कांटेदार पूंजी
पूंजी का आना हमेशा सुखद ही नहीं होता। दुनिया अगर असंतुलित हो, पूंजी अचानक कांटे चुभाने लगती है। ताजी मंदी और उसके बाद ऋण संकट के चलते अमेरिका व यूरोप के केंद्रीय बैंकों ने अपने बाजारों में पैसे का मोटा पाइप खोल दिया। ब्याज दरें तलहटी (अमेरिका में ब्याज दर शून्य) पर आ गईं ताकि निवेशक और उद्योगपति सस्ता कर्ज ले अर्थव्यवस्था को निवेश की खुराक देकर खड़ा करें। अव्वल तो इस सस्ते कर्ज से इन देशों में कोई बड़ा निवेश नहीं हुआ और जो हुआ वह भी निर्यात के लिए था, मगर वहां दाल गलनी मुश्किल थी क्योंकि कमजोर युआन की खुराक पचा कर चीन

Monday, October 18, 2010

कमजोरी की ताकत

अर्थार्थ
कमजोरी में भी बिंदास ताकत होती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार जल्द ही कमजोर मुद्राओं (करेंसी) की करामात देखेगा जब मुद्राओं के अवमूल्यन से निकले सस्ते निर्यात लेकर दुनिया के देश एक दूसरे के बाजारों पर चढ़ दौड़ेंगे। मंदी ने सारा संयम तोड़ दिया है, करेंसी को कमजोर करने की होड़ में शेयर बाजारों के चहेते विदेशी निवेशक पराए होने लगे हैं। उनके डॉलर अब उल्टा असर (विदेशी पूंजी की भारी आवक मतलब देशी मुद्रा को ज्यादा ताकत) कर रहे हैं। उदार विश्व व्यापार की कसमें टूटने लगी हैं। अपने बाजारों के दरवाजे बंद रखने में फायदे देख रहा विश्व मुक्त बाजार का जुलूस फिलहाल रोक देना चाहता है। दुनिया में ट्रेड या करेंसी वार का मैदान तैयार है। एक ऐसी जंग जिसमें पराए बाजार को कब्जाने और अपने को बचाने के लिए सब कुछ जायज है। इसे रोकने की एक बड़ी कोशिश (मुद्राकोष-विश्व बैंक की ताजा बैठक) हाल में ही औंधे मुंह गिरी है। इसलिए अब दुनिया के देशों ने अपने-अपने पैंतरों का रिहर्सल शुरू कर दिया है। इस जंग में पैंतरे ही अलग हो सकते हैं, लड़ाई की रणनीति तो एक ही है- जिसकी मुद्रा जितनी कमजोर वह उतना बड़ा सीनाजोर।

मांग रे मांग
भारत व चीन जैसी किस्मत सबकी कहां? इनके यहां तेज आर्थिक वृद्धि की रोशनी, लेकिन दुनिया के बड़ों के यहां गहरा अंधेरा है। कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह पेंदी में बैठ गई हैं। अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, इटली, यूके में इस साल की दूसरी तिमाही इतनी खराब रही है कि खतरे के ढोल बजने लगे हैं। इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं दरअसल पिछले दस साल के औसत रुख से ज्यादा कमजोर हैं। अमेरिका और यूरोजोन में उत्पादन ठप है और मांग घटने के कारण मुद्रास्फीति एक

Monday, August 30, 2010

जागते रहो!

अर्थार्थ
नजर उतारिए सरकार की, बड़ी हिम्मत दिखाई हुजूर ने, वरना तो लोकतंत्र में सरकारें बुनियादी रूप से दब्बू ही होती हैं। बात अगर बड़ी निजी कंपनियों की हो तो फैसले नहीं, समझौते होते हैं। वेदांत के मामले जैसी तुर्शी और तेजी तो बिरले ही दिखती है। नाना प्रकार के दबावों को नकारते हुए सरकार ने जिस तेजी से वेदांत को कानूनी वेदांत पढ़ाया, वह कम से कम भारत के लिए तो नया और अनोखा ही है और इस हिम्मत पर सरकार को विकास और विदेशी निवेश के वकीलों से जो तारीफ मिली, वह और भी महत्वपूर्ण है। इसे भारत में ऐसे सुधारों की शुरुआत मानिए, जिसका वक्त अब आ गया था। जरा खुद से पूछिए कि अब से एक दशक पहले क्या आप भारत में सरकारों से इस तरह की जांबाजी की उम्मीद कर सकते थे। तब तो सरकारें विदेशी निवेश की चिंता में सांस भी आहिस्ता से लेती थीं। वेदांत को सबक सरकारी तंत्र के भीतर सोच बदलने का सुबूत है और यह बदलाव सिर्फ वक्त के साथ नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे जन अधिकारों के नए पहरुए भी हैं और, माफ कीजिए, दंतेवाड़ा व पलामू भी।
वेदांत से शुरुआत
यूनियन कार्बाइड से लेकर वेदांत तक कंपनियों के कानून से बड़ा होने की ढेरों नजीरें हमारे इर्दगिर्द बिखरी हैं। इसलिए वेदांत पर सख्ती भारत के कानूनी मिजाज से कुछ फर्क नजर आती है। उड़ीसा सरकार तो आज भी मानने को तैयार नहीं है कि नियामगिरी में बॉक्साइट खोद रही वेदांत ने वन अधिकार, वन संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के कानूनों को अपनी खदान में दफन कर दिया। अलुमिना रिफाइनरी की क्षमता (एक मिलियन टन से छह मिलियन टन) हवा में नहीं बढ़ जाती, जैसा कि लांजीगढ़ में वेदांत ने बगैर किसी मंजूरी के कर लिया। यह कैसे हो सकता है कि सरकारों को 26 हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्जा, पर्यावरण की बर्बादी या आदिवासियों के हकों पर हमला न दिखे। खनन कंपनियां तो वैसे भी अपनी मनमानी के लिए पूरी दुनिया

Monday, August 23, 2010

दो नंबर का दम

अर्थार्थ
भी-कभी बड़े बदलाव के लिए ज्यादा वक्त की दरकार नहीं होती। कई बार दूरगामी परिवर्तन ढोल-ताशा बजाए बगैर चुपचाप संजीदगी के साथ दबे पांव आ जाते हैं और हम जान भी नहीं पाते। जैसे कि विश्व में आर्थिक ताकत के हिसाब-किताब को ही लीजिए। पूरी दुनिया पता नहीं कहां-कहां उलझी थी, इस बीच बीते सप्ताह जापान को पछाड़कर चीन दुनिया की (अमेरिका के बाद) दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गया। ..तकरीबन साढ़े चार करोड़ निर्धन लोगों वाली एक विकासशील अर्थव्यवस्था और दुनिया में दूसरे नंबर पर। हर पैमाने पर अभूतपूर्व है यह करिश्मा। चीन ने केवल एक तिहाई सदी में ही सब कुछ उलट-पलट दिया। आखिर ऐसी कामयाबी पर कौन है जो रश्क न करेगा। मगर हकीकत यह है कि चीन बल्लियों उछल नहीं रहा है, बल्कि वह नंबर दो के चक्कर को लेकर कुछ ऊहापोह में दिखता है। चीन के विकास में कुछ गहरे भीतरी अंतरविरोध हैं, जो शायद इस चमक के बाद खुलकर उभर आए हैं। इसलिए सरकार अपने इस ताज को कोई भाव ही नहीं दे रही है। सरकार के अखबारों को चीन का तीसरी दुनिया वाला चेहरा ही सुहाता है। अलबत्ता बाहरी विश्व को कोई असमंजस नहीं है। पूरी दुनिया को मालूम है कि चीन अद्भुत रूप से व्यावहारिक है, गरीब व पिछड़ा बना रहना उसके लिए कूटनीतिक व आर्थिक तौर पर ज्यादा माफिक है।
चमत्कारी रफ्तार
1968 में जब जापान ने तत्कालीन पश्चिम जर्मनी को पछाड़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की जगह ली थी तो दुनिया चौंक गई थी। अलबत्ता इसके बाद यह मान लिया गया था कि अमेरिका व जापान ने पहली व दूसरी सीटें रिजर्व करा ली हैं। गरीब और आबादी से भरा चीन तब किसी के राडार पर नहीं था। साढ़े तीन से चार दशकों में सारी गणनाएं सर के बल खड़ी हो गई। सुधारों के पहले एक दशक में तो दुनिया यह जान ही नहीं पाई कि चीन में क्या हो रहा है। अगले एक दशक में लोगों ने चीन को समझना शुरू किया और बाद के तीसरे दशक में दुनिया दांतो तले उंगली दबाकर इसकी रफ्तार में खो गई। चीन शून्य से शिखर पर आ गया। बीते सप्ताह जब जापान की सरकार ने यह बताया कि साल की दूसरी तिमाही में जापान का जीडीपी 1.29 ट्रिलियन डॉलर रहा है, जबकि चीन का 1.36 ट्रिलियन तो दुनिया के सामने हर तरह से यह साबित हो गया कि अब अमेरिका के बाद चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है। दुनिया के विशेषज्ञ किसी देश की अर्थव्यवस्था का आकार उसकी क्रय शक्ति (पर्चेजिंग पॉवर) पर आंकते हैं और चीन इस पैमाने पर जापान को एक दशक पहले ही पछाड़ चुका है। अलबत्ता दुनिया आर्थिक उत्पादन के डॉलर में मूल्यांकन को ज्यादा भरोसेमंद मानती है। इसलिए जापान के आर्थिक उत्पादन के आंकड़ों बाद लगी मुहर ज्यादा प्रामाणिक है। अब यह तय है कि साल खत्म होते-होते चीन का उत्पादन जापान से काफी आगे निकल जाएगा। अब अगर कोई महामंदी न आ धमके या बड़ी आफत न आए तो चीन अगले एक दशक से भी कम वक्त में अमेरिका को पछाड़ सबसे आगे खड़ा होगा।
असमंजस बेशुमार
आगे होने पर चीन बाग-बाग नहीं, बल्कि संजीदा है। ड्रैगन के सरकारी अखबार इस रिपोर्ट कार्ड को बहुत तवज्जो न देने की सलाह बांट रहे हैं। दरअसल चीन एक खास किस्म की उधेड़बुन में है। तेज विकास दर की चमक में चीन के अंतरविरोध भी उभर आए हैं। दुनिया अब चीन के भीतर विकास ही नहीं और भी कुछ देख रही है। हाल में जब चीन की एक बड़ी सूचना तकनीक कंपनी में वेतन न बढ़ने पर श्रमिक असंतोष बढ़ा तो पूरी दुनिया पीछे पड़ गई। 1.3 अरब लोगों वाले चीन की विसंगतियां महाकाय हैं। सरकार ने ज्यादातर संसाधन देश को औद्योगिक ताकत बनाने में झोंक दिए, जिसके कारण एक डॉलर प्रतिदिन से भी कम कमाने वाले 15 करोड़ लोगों की हालत पर नजर ही नहीं गई। 58 फीसदी आबादी गांवों में है और मानव विकास सूचकांक में चीन बहुत से छोटों से पीछे है। सिर्फ यही नहीं जापान की तर्ज पर चीन ने पर्यावरण गंवाया है और ये सभी क्षेत्र चीन में भारी निवेश मांग रहे हैं, जबकि राज्य सरकारों पर भारी कर्ज है। चतुर कामरेडों को मालूम है कि अगर दुनिया ने विकसित दर्जे में गिनना शुरू कर दिया तो यह सब कुछ ज्यादा समय तक ढंका नहीं जा सकता, इसलिए चीन विकासशील ही रहना मांगता है। अब दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा लगाए चीन को यह महसूस हो रहा है कि वह पूरी दुनिया के लिए सस्ता सप्लायर भर बनकर रह गया है। यह दर्जा भी उसने काफी कुछ गंवाकर पाया है।
दुनिया बेकरार
चाइना डेली ने सलाह दी है कि चीन को इन आंकड़ों पर इतराने के बजाय अपना प्रैक्टिकल काम करते रहना चाहिए। यकीनन चीन अपना प्रैक्टिकल काम कर रहा है और दुनिया इसे देख व जान रही है और बेचैन है। चीन का यह नया शिखर विश्व में आर्थिक संतुलन बदलने की पहली इबारत है। वित्तीय बाजार के लिए चीन बहुत बड़ी ताकत है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यानी अमेरिका के सरकारी बांडों में चीन सबसे बडा निवेशक है यानी अमेरिका ने अपने ताजा खातों में सबसे ज्यादा कर्ज चीन से ले रखा है। यूरो जोन में चीन की तूती बोलती है और अफ्रीका में उसका पैसा अभूतपूर्व कमाल दिखा रहा है। इसलिए कोई भी चीन के विकासशील होने के मुगालते में नहीं है। चीन यूं तो जिद्दी है, मगर चतुर भी। अगर बात फायदे की हो तो उसे अपनी मुद्रा अवमूल्यन करने का दबाव स्वीकारने में दिक्कत नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि चीन कूटनीतिक ताकत में अपने पूर्ववर्ती नंबर दो जापान से बहुत अलग है। दुनिया के मंचों पर चीन का जलवा दिखता है और इसके बूते वह यूरोप से लेकर अफ्रीका तक तरह-तरह से पैर फैला रहा है। चीन ने सैन्य ताकत भी मजबूत की है और दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों की होड़ में लंबे हाथ मारे हैं। दुनिया की नंबर दो अर्थव्यवस्था बनने के बाद ड्रैगन का आत्मविश्वास और बढ़ गया है।
ब्रिटेन के करीब 2500 से ज्यादा छात्र मंदरिन (चीन की भाषा) सीख रहे हैं। पिछले कुछ वर्षो में दुनिया में हुए कोयला, तेल, गैस व यूरेनियम के अधिकांश बड़े सौदे चीन की कंपनियों ने किए हैं और चीन की मुद्रा युआन भविष्य में नई ताकत बन सकती है यानी कि यह मानना गलत नहीं है कि दुनिया का पहिया अब चीन के इशारे पर घूम रहा है। मगर पहिए पर खुद चीन भी सवार है। पिछले तीन दशक में चीन ने उत्पादन का विशाल तंत्र खड़ा कर लिया है और दुनिया में हर पांच लोगों में एक चीन का आदमी शामिल है। अर्थात इतनी बड़ी आबादी व इस उत्पादन तंत्र के लिए दुनिया की चक्की का लगातार तेजी से चलते रहना जरूरी है, क्योंकि अगर विश्व की अर्थव्यवस्था को झटके लगे तो चीन का पहिया भी पटरी से उतर जाएगा और मेला उखड़ जाएगा। नंबर दो बनने के बाद चीन दुनिया पर शायद कुछ ज्यादा ही निर्भर हो गया है।
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Tuesday, August 17, 2010

निवाले पर आफत

अर्थार्थ
रोटी या डबल रोटी, जो भी खाते हों, अब उसकी ले-दे मचने वाली है। मुश्किल वक्त में कुदरत भी अपना तकाजा लेकर आ पहुंची है। दुनिया सिर झुकाए वित्तीय संकटों की गुत्थियां खोलने में जुटी थी मगर इसी बीच अनाज बाजार ने पंजे मारने शुरू कर दिए। जमीन के एक बहुत बड़े हिस्से पर इस साल प्रकृति का गुस्सा बरस रहा है। मौसम अपने सबसे डरावने चेहरे के साथ दुनिया की कृषि के सामने खड़ा है। रूस में सूखे, पाकिस्तान में बाढ़, अफगानिस्तान व ऑस्ट्रेलिया में टिड्डी और भारत में असंतुलित वर्षा ने मिलकर जून से अब तक दुनिया में गेहूं की कीमत 50 फीसदी बढ़ा दी है। कई देश अनाज का निर्यात बंद करने लगे हैं जबकि आयात पर निर्भर देशों के व्यापारी वायदा बाजार में हवा भर रहे हैं। महंगाई से तप रहे भारत जैसे मुल्कों के लिए यह बीमारी के बीच अस्पतालों की हड़ताल जैसा है। यहां खेती अस्थिर है, मौसम इस बार भी नखरे दिखा रहा है। खाद्य अर्थव्यवस्था बदहाल है इसलिए अनाज बिकता या बंटता नहीं बल्कि सड़ता है और अंतत: अक्सर आयात की नौबत आती है।
डरावना मौसम
विश्व के कई हिस्सों ने मौसम का ऐसा गुस्सा अरसे बाद देखा है। भारत में लेह से लेकर रूस के एक बड़े हिस्से तक प्रकृति की निर्ममता बिखरी है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े गेहूं उत्पादक रूस के 27 राज्यों में इमर्जेसी लगी है। यह पूरा इलाका रूस की गेहूं उत्पादक पट्टी है। रूस में पिछले तीस साल का सबसे भयानक सूखा पड़ा है। तापमान 130 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है और देश के सात भौगोलिक हिस्सों में जंगल आग का समंदर बने हुए हैं। रूस अपने ताजा इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा झेल रहा है। जंगलों के धुएं से मॉस्को सात दिन तक बंद रहा है। इस सूरत में दुनिया को रूस से गेहूं मिलने की उम्मीद नहीं है। मौसम केवल रूस का ही दुश्मन नहीं है। पड़ोसी राज्य यूक्रेन में भी भयानक सूखा है। दुनिया के छठे सबसे बड़े गेहूं उत्पादक यूक्रेन की काफी फसल पहले ही पाले की भेंट चढ़ चुकी है। पाकिस्तान के भी एक बहुत बड़े हिस्से के लिए रमजान बहुत बुरा बीत रहा है। यहां करीब दस लाख एकड़ की कृषि भूमि ताजा इतिहास की सबसे भयानक बाढ़ में डूब चुकी है। पड़ोसी अफगानिस्तान में गेहूं की फसल का एक बड़ा हिस्सा टिड्डी चाट गई है। टिड्डी का असर ऑस्ट्रेलिया की फसल तक है, जहां करीब 30 लाख टन उपज का नुकसान संभव है। गेहूं बाजार के प्रमुख खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी हिस्सा पहले ही सूखे से जूझ रहा है और चीन व कनाडा में बाढ़ की तबाही है। यही वजह है कि अमेरिका के कृषि विभाग ने पूरी दुनिया में गेहूं का उत्पादन करीब ढाई फीसदी घटने का आकलन किया है। अगले साल मार्च तक विश्व के गेहूं भंडार में करीब सात फीसदी की कमी संभव है। दुनिया की आबादी को देखते हुए उत्पादन और भंडार में यह गिरावट संकट से कम नहीं है।
कीमती अनाज
लेनिन ने जिस अनाज को मुद्राओं की मुद्रा कहा था वह रूस के लिए अचानक बहुत कीमती हो चला है। ब्लैक सी से लेकर उत्तरी काकेशस और पश्चिमी कजाखिस्तान तक फैले रूस के विशाल उर्वर इलाके में भयानक सूखे के बाद इस रविवार से दुनिया के बाजार में रूस का गेहूं पहुंचना बंद हो गया है। वोल्गा नदी से सिंचित यह क्षेत्र रूस को दुनिया का प्रमुख अनाज निर्यातक बनाता है। पुतिन की सरकार ने इस साल निर्यात चार करोड़ टन पहुंचाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब निर्यात पर चार माह की पाबंदी लग गई है। रूस अपने गेहूं उत्पादन का बीस फीसदी हिस्सा निर्यात करता है। रूस के इस फैसले के बाद उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप के बाजारों में अफरा-तफरी फैली है। यूक्रेन भी गेहूं का प्रमुख निर्यातक है जो अगले सप्ताह तक निर्यात पर रोक लगाने वाला है। शिकागो के जिंस एक्सचेंज में गेहूं का वायदा 1973 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर खुला है। इसे देखते हुए विश्व बैंक को दुनिया के देशों से निर्यात रोकने की होड़ बंद करने का अनुरोध करना पड़ा है। दो साल पहले चावल को लेकर भी इसी तरह की होड़ मची थी और कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थीं। कई प्रमुख उत्पादक देशों में मक्के और जौ की उपज भी घटी है। दुनिया में मक्के का भंडार 13 साल के सबसे निचले स्तर पर बताया जा रहा है। अनाज को लेकर दुनिया में संवेदनशीलता काफी ज्यादा है। इसलिए उत्पादन घटने का आंकड़ा आने के बाद पिछड़े और अगड़े सभी देश अपने भंडार भरने में लग जाते हैं, जिससे बाजार में कीमतें और ऊपर जाती हैं। यानी बाजार में बदहवासी बढ़ रही है।
बहुआयामी मुश्किल
अनाजों के बाजार का संतुलन बड़ा नाजुक है। कुछ ही देशों के बूते दुनिया में मांग व आपूर्ति का पलड़ा संभलता रहता है क्योंकि ज्यादातर देशों की पैदावार उनकी जरूरत भर की होती है। 2007-08 में दुनिया ने अनाज बाजार में जबर्दस्त तेजी का दौर देखा था जो लौटता दिख रहा है। भारत जैसे देशों के लिए तो यह आफत है। एक अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत में खेती सिरे से गैर भरोसेमंद हो चली है। भोजन के अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भारत की निर्भरता तेजी से बढ़ी है। पिछले कई वर्षो से दुनिया का बाजार भारत को दाल व खाद्य तेल खिला रहा है। गेहूं व चावल के आयात की नौबत अक्सर आती रहती है। बीते ही साल चीनी का भी आयात हुआ है। इसलिए दुनिया के अनाज बाजार का बदलता रंग चिंतित करता है। भारत में पिछले एक दशक में मौसम के रंग बदले हैं। वर्षा का क्षेत्रीय वितरण उलट-पलट रहा है। ताजा मानसून ने उत्तर में पंजाब और हरियाणा के खेतों को बुवाई से पहले ही पानी से भर दिया जबकि पूर्व व मध्य भारत के धान उत्पादक इलाके सूख रहे हैं। भारत में अनाज उत्पादन के आकलन लगातार उलटे पड़ते हैं। खाद्य बाजारों में आ रही महंगाई को भारत पहुंचने तक कोई नहीं रोक सकता। अलबत्ता अगर फसल बिगड़ी तो अनाज को लेकर भारत का बजट भी बिगड़ सकता है।
दुनिया यह मान रही थी कि अगले दो दशक में उसे अपनी अनाज उपज दोगुनी करनी होगी ताकि बढ़ती आबादी का पेट भरा जा सके। हालांकि खेती का यह एजेंडा वित्तीय संकट से निपटने के बाद ही सामने आना था। तब तक दुनिया इस बात से मुतमइन थी कि मांग आपूर्ति में संतुलन बनाने भर की पैदावार होती रहेगी अलबत्ता कुदरत को कुछ और मंजूर था। मौसम के बदले मिजाज ने अब हाथों से तोते उड़ा दिए हैं। बैंकों और वित्तीय कानूनों में उलझी सरकारें अचानक खेतों को लेकर परेशान होने लगी हैं क्योंकि हर जगह बात निवाले की है। .. यकीनन रोटी से ज्यादा बड़ा सवाल और क्या हो सकता है ??
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Monday, August 9, 2010

फजीहत का गोल्ड मेडल

अर्थार्थ
हार पहनने से गला कटते सुना है आपने? ताज सजाने से कोई गंजा भी हो सकता है? चेहरा सजाने कोशिश हुलिया बिगाड़ दे तो ? यकीन नहीं होता तो जरा भारत के इतिहास के सबसे बड़े खेल आयोजन को देखिये , दुनिया के देश जिन आयोजनों की मेजबानी से साख और शान का जलवा दिखाते हैं भारत उन्हीं के कारण जलालत झेल रहा है। ओलंपिक, एशियाड और कॉमनवेल्थ के दर्जे वाले खेल आयोजन पूरे विश्व में हमेशा से फिजूलखर्ची, भ्रष्टाचार व घाटे से दागदार रहे हैं, फिर भी दुनिया के देश यह वजनदार घंटी गले में सिर्फ इसलिए बांधते हैं क्यों कि इससे उनकी शान का दिग-दिगंत में गूंज जाती है और भव्यता की चमक में दाग छिप जाते हैं। भारत ने भी इसी उम्मीद में कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी का ताज पहना था लेकिन अब पूरी दुनिया भारत के बुनियादी ढांचे, प्रबंधन, तकनीक और सुघड़ता की नहीं बल्कि भ्रष्टाचार, कुप्रबंध और विवादों की नुमाइश देख रही है। चमकने के चक्कर में भारत ने बमुश्किल बनी अंतरराष्ट्रीय साख का कबाड़ा कर लिया है, वह भी भारी निवेश के साथ।
सबसे दुर्लभ जीत
2008 के बीजिंग ओलंपिक के कुछ माह बाद खेल की दुनिया में जो सबसे बड़ी खबर आई थी वह पैसे की थी। बीजिंग ओलंपिक की आयोजन समिति ने बताया कि उसने 146 मिलियन डॉलर (करीब 674 करोड़ रुपये) का मुनाफा कमाया। ... खेल की दुनिया इस दुर्लभ तमगे पर हैरत में पड़ गई। चीन पर भरोसा मुश्किल था मगर अविश्वास का आधार भी नहीं था। चीन ने ओलंपिक व संबंधित 102 परियोजनाओं पर 2.6 बिलियन डॉलर (आधिकारिक आंकड़ा) खर्च किये थे और शोहरत व मुनाफा दोनों कमाया। ओलंपिक परिवार (एशियाड कॉमनवेल्थ आदि) के खेल आयोजनों की दुनिया में यह करिश्मा कम ही या यूं कहें कि शायद दूसरी बार हुआ था। ‘मैकोलंपिक’ (मैकडोनाल्ड प्रायोजित) के नाम से मशहूर 1984 के लास एंजेल्स खेल मुनाफा कमाने वाले पहले ओलंपिक थे। यह इस खेल में निजी कंपनियों का शायद पहला प्रवेश था और इसे आधुनिक ओलंपिक की शुरुआत का खिताब मिला। पिछले कॉमनवेल्थ (मेलबोर्न 2006) खेलों का भी बजट नहीं बिगड़ा था। अलबत्ता बीजिंग या लॉस एंजल्स अपवाद हैं और इनके रिकार्डों पर मजबूत संदेह भी हैं। नियम तो यह है कि बड़े खेल आयोजनों में मेजबान बुरी तरह हारते हैं। यह आयोजन उनकी जेब कायदे से तराश देते हैं।
तयशुदा हार
1976 का मांट्रियल ओलंपिक कनाडा के लिए वित्तीय आफत साबित हुआ थो, तो ग्रीस के ताजे संकट की जड़ें 2004 के एथेंस ओलंपिक की मेजबानी में तलाशी जा रही हैं। दरअसल बीजिंग जब ओलंपिक का ताज सजा रहा था तब मांट्रियल (1976), बार्सिलोना (1992), सिडनी (2000) और एथेंस (2004) ओलंपिक की मेजबानी के दौरान लिए गए कर्जों से (प्रो. जेफ्री जार्विन, तुलान यूनिवर्सिटी) जूझ रहे थे। कुछ हफ्तों के आयोजन पर भारी निवेश, ढेर सारी फिजूलखर्ची और बाद में घाटा इन खेल आयोजनों का शाश्वत सच है, तभी तो 2006 एशियाड के मेजबान कतर के अधिकारी खेलों से परोक्ष फायदों मसलन निवेश, विकास, रोजगार आदि की दुहाई देते हैं। क्यों कि किसी बड़े देश के सिर्फ एक शहर में भारी खर्च सरकारों को मुश्किल में डालता है। दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर भी यही तर्कहैं अलबत्ता आंकड़े इन तर्कों को सर के बल खड़ा करते हैं। बैंक ऑफ चाइना ने, बीजिंग खेलों से पहले एक शोध में जानकारी दी थी कि पिछले 60 साल में आयोजित 12 ओलंपिक में नौ के मेजबानों की अर्थव्यवस्थायें खेल मेले के बाद गोता खा गईं। कॉमनवेल्थ खेल, ओलंपिक व एशियाड से छोटे हैं लेकिन भारत के खजाने में यह बड़ा छेद करेंगे। ताजी मंदी के कारण 2012 के ओलंपिक की मेजबानी लंदन के गले में फंस गई है। दरअसल इन खेलों में मेजबान कभी नहीं जीतते। इसलिए ज्यादातर देश यह हार नहीं पहनते हैं और यह खेल कुछ बड़े मुल्कों के बीच घूमते रहते हैं।
और ढेर सारा गुबार
कलमाड़ी और उनकी टीम दागी खेल आयोजकों की विश्व परंपरा के भारतीय वारिस हैं। अकूत पैसा और अनंत भ्रष्टाचार ओलंपिक परिवार के खेलों की पहचान है। मेजबानी हासिल करने से लेकर आयोजन तक धतकरमों का रिकार्ड इन मेलों के साथ साथ चलता है। 2002 के शीतकालीन ओलंपिक की मेजबानी के लिए अमेरिका की साल्ट लेक खेलों को इस तरह दागदार किया कि ओलंपिक महासंघ को अपने कुछ सदस्यों को चलता करना पड़ा, मगर इसके बाद मेजबानी के लिए रिश्वतखोरी रवायत बन गई। सिडनी ओलंपिक के मेजबानों पर भी यही आरोप लगा। रुस से लेकर जापान तक और अमेरिका से चीन (ताजे बीजिंग ओलंपिक से पहले खुले मामले) तक बड़े खेल आयोजनों में भ्रष्टïाचार की दर्जनों कहानियां हैं। इसलिए ओलंपिक व कामनवेल्थ संघ इन दागों से डरने लगे हैं। अब उन्हें मेजबान तलाशने में मुश्किल होती है। खेलों का अपनी गणित है। जबर्दस्त लामबंदी के बावजूद, ब्राजील, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नाक के नीचे से 2014 का ओलंपिक उठा ले जाता है और ओबामा का गृह नगर शिकागो खिसियाकर रह जाता है।
फिर भी इकरार

पैसे की बर्बादी और भ्रष्टïाचार की मान्य परंपराओं के बावजूद दुनिया के देश के इन खेलों को सिर्फ इसलिए लाते हैं ताकि उनका कॉलर ऊंचा हो सके और दुनिया मेजबान मुल्क का बुनियादी ढांचा, भव्य प्रबंधन, चमकदार वर्तमान और भविष्य की उम्मीदें देख सके। चीन दो साल में दूसरे बड़े (गुआंगजू एशियाड इसी नवंबर में) खेल की मेजबानी करेगा। इन खेलों से हमें दुनिया को यह बताना था भारत शानदार बुनियादी ढांचा बनाता है। तकनीक के हम सूरमा हैं और एक महाशक्ति भव्य आयोजन कर सकती है। यानी केवल साख की सजावट बस? मगर आयोजकों की कृपा से इन खेलों में अपना चेहरा देखकर हम अब लज्जित हैं।
विश्व की खेल प्रबंध कंपनियों के बीच सबसे ताजा मजाक यह है कि अब भारत को ओलंपिक की मेजबानी दिलवायी जा सकती है क्यों कि यहां आप किसी भी कीमत पर कुछ भी बेच सकते हैं, आखिर ऐसे दिलफेंक मेजबान कहां मिलेंगे?? दरअसल शान को शर्मिंदगी में बदलना अगर कोई कला है तो दिल्ली खेलों के आयोजक इसका स्कूल खोल सकते हैं। भारत ट्रैक एंड फील्ड खेलों में कभी कोई ताकत नहीं रहा। हमारे लिए तो यह महंगा खेल छवि प्रबंधन यानी शान और शोहरत का तमगा हासिल करने कोशिश भर था। मगर भारत ने तो कॉमनवेल्थ खेलों से पहले ही एक गोल्ड मेडल जीत लिया है ... फजीहत का गोल्ड मेडल !!!!
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Monday, August 2, 2010

मेहरबानी आपकी !

अर्थार्थ
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दस फीसदी की धार से छीलती महंगाई, महंगा होता कर्ज, अस्थिर खेती, सुस्त निवेश, चरमराता बुनियादी ढांचा और सौ जोखिम भरी वित्तीय दुनिया!!!! फिर भी अर्थव्यवस्था में आठ फीसदी से ऊपर की कुलांचें? ..कुछ भी तो माफिक नहीं है, मगर गाड़ी बेधड़क दौड़े चली जा रही है। किसे श्रेय देंगे आप इस करिश्मे का? ..कहीं दूर मत जाइए, अपना हाथ पीछे ले जाकर अपनी पीठ थपथपाइए!! यह सब आपकी मेहरबानी है। आप यानी भारतीय उपभोक्ता देश की अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया में सबसे पहले मंदी के गर्त से बाहर खींच लाए हैं। दाद देनी होगी हिम्मत की कि इतनी महंगाई के बावजूद हम खर्च कर रहे हैं और उद्योग चहक रहे हैं। यह बात दीगर है कि इस वीरता की कीमत कहीं और वसूल हो रही है। कमाई, उत्पादन और खर्च तीनों बढ़े हैं, लेकिन आम लोगों की बचत में वृद्धि पिछले तीन-चार साल से थम सी गई है। दरअसल खर्च नही, बल्कि शायद आपकी बचत महंगाई का शिकार बनी है।
खर्च का जादू
मंदी से दूभर दुनिया में भारत की अर्थव्यवस्था इतनी जल्दी पटरी पर लौटना हैरतअंगेज है। मांग का यह मौसम कौन लाया है? भारत तो चीन की तरह कोई बड़ा निर्यातक भी नहीं है। यहां तो निर्यात हमेशा से नकारात्मक अर्थात आयात से कम रहा है। दरअसल बाजार में ताजी मांग खालिस स्वदेशी है। माहौल बदलते ही भारत के उपभोक्ताओं ने अपने बटुए व क्रेडिट कार्ड निकाल लिये और आर्थिक विकास दर थिरकने लगी। इस साल जनवरी से मार्च के दौरान भारत में उपभोग फिर 4 से 4.5 फीसदी की गति दिखाने लगा है। खासतौर पर निजी उपभोग खर्च तो मार्च में 10.4 फीसदी पर आ गया है। इसी के बूते रिजर्व बैंक नौ फीसदी की आर्थिक विकास दर की उम्मीद बांध रहा है। करीब 36 फीसदी निर्धन आबादी के बावजूद भारत का 55-60 करोड़ आबादी वाला मध्य वर्ग इतना खर्च कर रहा है कि अर्थव्यवस्था आराम से दौड़ जाए। भारत के बाजार में 60 फीसदी मांग अब विशुद्ध रूप से खपत से निकलती है। पिछले कुछ वर्षो में आय व खर्च में वृद्धि तकरीबन बराबर हो गई है। बल्कि आर्थिक सर्वेक्षण तो बताता है कि हाल की मंदी से पहले के वर्ष (2008-09) में तो प्रति व्यक्ति खर्च, प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि से ज्यादा तेज दौड़ रहा था। अर्थातलोगों ने कर्ज के सहारे खर्च किया। वह दौर भी भारत में उपभोक्ता कर्जो में रिकार्ड वृद्घि का था। मैकेंजी ने एक ताजा अध्ययन में माना है कि अगले एक दशक में भारत का निजी उपभोग खर्च 1500 बिलियन डॉलर तक हो जाएगा। अर्थात खर्च का जादू जारी रहेगा।
खर्च से खुशहाल
पिछले कुछ महीनों के दौरान आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े दिलचस्प सूचनाएं बांट रहे हैं। भारत में उपभोक्ता उत्पादों के उत्पादन की वृद्धि दर जनवरी के तीन फीसदी से बढ़कर अप्रैल में 14.3 फीसदी हो गई। इसमें भी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स यानी तमाम तरह के इलेक्ट्रानिक सामान आदि का उत्पादन 37 फीसदी की अचंभित करने वाली गति दिखा रहा है और सबूत दे रहा है कि बाजार में नई ग्राहकी आ पहुंची है। भारत में उपभोक्ता खर्च के कुछ हालिया (आर्थिक समीक्षा 2009-10) आंकड़े प्रमाण हैं कि उद्योग क्यों झूम रहे हैं। उपभोक्ताओं के कुल खर्च में परिवहन व संचार पर खर्च का हिस्सा पिछले कुछ वर्षो में 20 फीसदी पर पहुंच गया है। इसे आप सीधे आटोमोबाइल व संचार कंपनियों के यहां चल रहे त्यौहार से जोड़ सकते हैं। यात्रा करने पर खर्च बढ़ने की रफ्तार बीते चार वर्षो में पांच फीसदी से बढ़कर 12.3 फीसदी हो गई है। आटोमोबाइल बढ़ा तो ईधन पर खर्च भी उछल गया। मनोरंजन, चिकित्सा, शिक्षा और यहां तक कि फर्निशिंग जैसे उद्योग उपभोक्ताओं की कृपा से बाग-बाग हुए जा रहे हैं। खाने पर खर्च की वृद्धि दर घट गई है। मार्च में कुल निजी उपभोग खर्च 35.71 लाख करोड़ रुपये रहा है, लेकिन यह भारत मंं उपभोक्ता खर्च की आधी तस्वीर है। भारत के उपभोक्ताओं का बहुत बड़ा खर्च असंगठित खुदरा बाजार में होता है। देश के पूर्व सांख्यिकी प्रमुख प्रनब सेन ने हाल में कहा था कि देश के कुल कारोबार में संगठित खुदरा कारोबार का हिस्सा पांच-छह फीसदी ही है, इसलिए भारत में खपत को सही तरह से आंकना मुश्किल है।
खर्च का शिकार
भयानक महंगाई और फिर भी बढ़ता खर्च? ..उलटबांसी ही तो है, क्योंकि महंगाई तो खर्च को सिकोड़ देती है। भारत में इस संदर्भ में पूरा परिदृश्य बड़ा रोचक है। यहां महंगाई ने खर्च को नहीं बचत को सिकोड़ा है। भारत में उपभोक्तावाद का ताजा दौर 2004-05 के बाद शुरू हुआ था, जब अर्थव्यवस्था ने आठ-नौ फीसदी की रफ्तार दिखाई। उस समय महंगाई की दर चार फीसदी के आसपास थी। आय बढ़ी, बाजार बढ़ा, सस्ते कर्ज मिले तो उपभोक्ताओं ने बिंदास खर्च किया। आय व खर्च का स्वर्ण युग 2008-09 के अंत तक चला। इसी वक्त महंगाई और मंदी ने अपने नख दंत दिखाए, जिससे खपत कुछ धीमी पड़ गई, लेकिन शॉपिंग की नई संस्कृति तो तब तक जम चुकी थी। इसलिए जैसे ही छठवें वेतन आयोग का तोहफा मिला, सरकारी कर्मचारी झोला उठाकर बाजार में पहुंच गए। हालात सुधरते ही बढ़े वेतन के साथ निजी नौकरियों वाले भी शॉपिंग लिस्ट लेकर निकल पड़े। महंगाई ने खर्च के उत्साह को यकीनन तोड़ा है, लेकिन खर्च को नहीं। खर्च के इस मौसम में कुर्बान तो हुई है बचत। उपभोक्तावाद की ऋतु के आने के बाद से आम लोगों की बचत पिछले पांच साल से औसत 22-23 फीसदी (जीडीपी के अनुपात में) पर स्थिर है। वित्तीय बचत भी अर्से से 10-11 फीसदी पर घूम रही है।
इस गफलत में रहने की जरूरत नहीं कि महंगाई असर नहीं करती। महंगाई कम और कमजोर आय वालों का खर्च चाट गई तो मध्यम आय वर्ग की बचत उसके पेट में गई है। अलबत्ता खर्च का त्यौहार जारी है और इसलिए तमाम बाधाओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मंदी की बाजी सबसे पहले पलट दी है। चीन की कामयाबी भारी निर्यात और निवेश से निकली है, मगर भारत खपत व उपभोग की गौरव गाथा लिख रहा है, नया निवेश भी इसी उपभोग का दामन पकड़ कर आ रहा है। ..सरकार तो उपभोक्ताओं को सलाम करने से रही, लेकिन कम से कम आप तो खुद को शाबासी दे ही लीजिए.. महंगाई से जूझते हुए आपने सचमुच करिश्मा किया है।
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Monday, July 26, 2010

इंस्‍पेक्‍टर राज इंटरनेशनल !

अर्थार्थ
मौसम अचानक बिल्कुल बदल गया है। वित्तीय कारोबार पर कड़े नियमों की धुआंधार बारिश होने वाली है। पूंजी बाजारों में बेलौस और बेपरवाह वानर लीला कर रहे वित्तीय कारोबारियों पर कठोर पहरे की तैयारी हो गई है। बैंक, इन्वेस्टमेंट बैंक, हेज फंड, बांड फंड, म्यूचुअल फंड व इस जाति के सभी प्रतिनिधियों को सख्त पहरे में सांस लेनी होगी। अमेरिका में ताजा पीढ़ी के सबसे कठोर वित्तीय नियमन कानून को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने दस्तखत से नवाज दिया है। वित्तीय कारोबार पर एक समग्र यूरोपीय सख्ती के लिए यूरोप की सरकारें भी बीते सप्ताह ब्रुसेल्स में सहमत हो चुकी हैं। यूरोप के नामी 91 बैंकों को एक अभूतपूर्व परीक्षा, स्ट्रेस टेस्ट से गुजार कर उनकी कुव्वत परख ली गई है। भारत में नियामकों का नियामक यानी सुपर रेगुलेटर (बजट में घोषित आर्थिक स्थायित्व व विकास परिषद) आने को तैयार है। आपस में झगड़ते भारत के वित्तीय नियामक इसकी राह आसान कर रहे हैं। हर तरफ एक नया इंस्पेक्टर राज तैयार हो रहा है। नौकरशाह नियामकों की फौज हर जगह वित्तीय बाजार व इसके खिलाडि़यों की आठों पहर निगरानी करेगी।
..और फ्यूनरल प्लान भी
आपके अंतिम संस्कार का प्लान क्या है? सवाल बेहूदा हो सकता है, लेकिन ताजा कानून के तहत अमेरिका के वित्तीय कारोबारियों को इसका जवाब देना होगा। बैंकों व वित्तीय कंपनियों से पूछा जाएगा कि यदि संकट में फंस कर बर्बाद हुए तो वे अपनी दुकान किस तरह बंद करना चाहेंगे? 1930 के बाद अमेरिका में वित्तीय कानूनों में सबसे बड़ा बदलाव हो गया है। वॉलस्ट्रीट पर शिकंजा कसने वाला डॉड-फ्रैंक बिल तमाम दहलीजें पार करते हुए बीते सप्ताह लागू हो गया। 2300 पेज का यह भीमकाय कानून अपनी सख्ती और पाबंदियों के लिए दुनिया में नजीर बनेगा। अमेरिका के लोग एफएसओसी, फिनरेग और वोल्कर रूल जैसे नए शब्द सीख रहे हैं। एफएसओसी बोले तो.. फाइनेंशियल स्टेबिलिटी ओवरसाइट काउंसिल। एक सुपर रेगुलेटर यानी सबसे बड़ा नियामक। यह काउंसिल वित्तीय तंत्र के लिए जोखिम बनने वाली कंपनियों की लगातार पहचान करेगी। मतलब यह कि एफसीओसी ने जिसे घूरा उसका काम पूरा। बेफिक्र और मस्तमौला हेज फंड हों या निवेश बैंक सबके लिए कानून में कड़ी शर्ते हैं। बैंकों को जमा के बीमा पर ज्यादा रकम लगानी होगी ताकि अगर बैंक डूबें तो जमाकर्ता भी न डूब जाएं। वोल्कर रूल तय करेगा कि बैंक कौन से कारोबार और कहां निवेश न करें। 615 ट्रिलियन डॉलर के डेरिवेटिव्स कारोबार को पहली बार लगाम का स्वाद मिलेगा। क्रेडिट रेटिंग, बीमा, ब्रोकर, मॉरगेज, निवेशक आदि सब इस कानून के दायरे में हैं। सबसे अहम यह है कि अमेरिका की सरकार डूबने वाले एआईजी (बीमा कंपनी जिसे अमेरिकी सरकार ने उबारा था) जैसों का पाप अपने सर नहीं लेगी। हर कंपनी अपने अंतिम संस्कार की योजना पहले घोषित करेगी ताकि अगर वह बर्बाद हो तो उसे शांति से विदा किया जा सके। इस कानून पर हस्ताक्षर करते हुए तालियों की गूंज के बीच ओबामा ने कहा अब अमेरिका की जनता वॉलस्ट्रीट की गलतियों का बिल नहीं चुकाएगी। उदारता से पूरी दुनिया को ईर्ष्‍या से भर देने वाला अमेरिकी बाजार अब सख्ती का आदर्श बनेगा।
बैंकों की अग्निपरीक्षा

27 देश, 91 बैंक और एक परीक्षा!! बेचैनी, रोमांच, असमंजस! इस 23 जुलाई को पूरी दुनिया के वित्तीय बाजारों में समय मानो ठहर सा गया था। यूरोप के बैंक स्ट्रेस टेस्ट से गुजर रहे थे, यह साबित करने के लिए अगर संकट आया तो कौन सा बैंक बचेगा और कौन निबट जाएगा? पैमाना गोपनीय था अलबत्ता परीक्षा मोटे तौर पर कर्ज का बोझ, जोखिम भरे निवेश का हिसाब-किताब और पूंजी की स्थिति आदि के आधार पर ही हुई। शुक्रवार की रात भारत में जब लोग सोने की तैयारी कर रहे, तब इस परीक्षा का रिजल्ट आया। यूरोप के सात बैंक फेल हो गए। पांच स्पेन के और एक-एक जर्मनी व ग्रीस का। इन्हें अब अपनी सेहत सुधारने के लिए 3.5 बिलियन यूरो जुटाने होंगे, जो आसान नहीं है। फेल का रिपोर्ट कार्ड लेकर निकलने वाले इन बैंकों के साथ वित्तीय बाजार नरमी नहीं बरतेगा। मगर जो बैंक इस आग के दरिया से निकल आए हैं, उनके स्वागत के लिए एक नया सख्त समग्र यूरोपीय नियामक तैयार है। यूरोपीय समुदाय नया वित्तीय दो स्तरीय नियामक ढांचा बना रहा है। वित्तीय बाजार पर दैनिक नियंत्रण देशों के पास होगा, लेकिन व्यापक नियंत्रण एक बड़े यूरोपीय नियामक के हाथ में रहेगा। बैंकों के लिए अभी कई और स्ट्रेस टेस्ट तैयार हो रहे हैं।
नियामकों का नियामक

अमेरिका की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी ओवरसाइट काउंसिल, यूरोप की पैन यूरोपियन अथॉरिटी या फिर भारत की प्रस्तावित आर्थिक स्थायित्व व विकास परिषद आदि सब उसी सुपर रेगुलेटर के अलग-अलग नाम रूप हैं, जो अब आ ही पहुंचा है। दरअसल वित्तीय दुनिया में कई नियामक हैं, सो खूब गफलत भी है। अमेरिका में डेरिवेटिव और हेज फंड को लेकर नियामक ठीक उसी तरह उलझते रहे हैं, जैसे कि यूलिप को लेकर भारत में इरडा और सेबी लड़ रहे हैं। घोटालेबाज इस भ्रम पर खेलते हैं। भारत संकट से बाल-बाल बच गया, लेकिन नसीहत के तौर पर सुपर रेगुलेटर न होने की गलती जल्द ही दूर की जा रही है। दरअसल तीसरी दुनिया के लिए सिर्फ नियम कानून चाक चौबंद करने की ही झंझट नहीं है, उन्हें एक और झटके से निबटना होगा। फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि वित्तीय निवेशक इस नए कानूनी माहौल के बाद कैसा व्यवहार करेंगे, लेकिन जब निवेश की आजादी पर दर्जनों पहरे होंगे तो निवेश की आदत में कुछ फर्क तो आएगा ही। ..उभरते बाजारों को इस असर से निबटने की तैयारी भी करनी होगी।
भारत जैसी अधखुली अर्थव्यवस्थाएं तो बचे-खुचे इंस्पेक्टर राज के विदा होने की मन्नत मांग रहीं थीं, मगर यहां तो इंस्पेक्टर राज ताजा अंतरराष्ट्रीय अवतार में वापस लौट आया है। अमेरिका, यूरोप व एशिया के वित्तीय बाजारों की लगाम नए किस्म की ब्यूरोक्रेसी के हाथ आने जा रही है। बाजार के खिलाडि़यों को वित्तीय नौकरशाह या नियामक नौकरशाहों की एक नई पीढ़ी के नाज-नखरे उठाने होंगे। वित्तीय बाजार आजादी पाकर बौरा गया था अब उसे पाबंदियों की पांत में चलना होगा। ..बस एक चूक और पुर्नमूषकोभव !!