Thursday, December 30, 2010

वर्षार्थ - बेरहम वक्त : मरहम वक्त

क्त की शाख से दस का पत्ता टूट कर गिर रहा है। कलेवर बदलेगा या नहीं क्या पता मगर कैलेंडर तो बदलेगा ही। दो हजार दस का पहला सूरज को देखकर किसने सोचा कि वक्ते इतना बेरहम होगा कि अर्थव्यवस्थायें,संस्थायें,साख और लोग ...बस घाव गिनते रह जाएंगे। काल का गाल बड़ा विकराल है और समय की अपनी एक निपट अबूझ,अप्रत्याशित और शाश्‍वत गति है। इसलिए तारीख बदलने से अतीत कभी नहीं मरता। वह तो वर्तमान के तलवे में कांटे की तरह धंसा है। दस की चोटों से ग्यारह जरुर लंगड़ायेगा। मगर  भरोसा रखिये, यही वक्त उन चोटों पर मरहम भी लगायेगा।

वक्त सौ मुंसिफों का मुंसिफ है, वक्त आएगा इंतजार करो।।

वक्त की बेरहमी को याद करने के लिए और उम्मीद के मरहम तलाशने के लिए प्रस्तु्त है पिछले एक साल के अर्थार्थ का चुनिंदा वर्षार्थ। ( चुनना जरा मुश्किल था। ... निज कवित्त केहि लाग न नीका.... लेकिन ब्लॉगर से मिले पेजव्यूज और पोस्ट के आंकड़ों ने मदद की। मेल-ओ-मोबाइल से आई प्रतिक्रियाओं ने भी रास्ता दिखाया। यह संकलन सबसे ज्यादा पढ़े गए और संदर्भ से दृष्टि से अहम लेखों का संचयन है।)

आप सब अपने अपने स्नेह और आशीष से अर्थार्थ को पोसते रहे हैं। आशीर्वाद बनाये रखियेगा। बड़ा संबल मिलता है। निराला जी ने लिखा है ... पुन: सवेरा एक बार फेरा है जी का... वक्त का फेरा      ग्यारह का सवेरा लेकर दरवाजे पर पहुंचा है। दरवाजा खोलिये! स्वागत करिये!
 2011 सुखद, सुरक्षित और मांगलिक हो।

अर्थार्थ का वर्षार्थ

नीतीश होने की मजबूरी ... जाति प्रमाण पत्रो की राजनीति बनाम आय प्रमाण पत्रों की राजनीति। ब्लॉगर रेटिंग में यह सबसे ज्यादा पढ़ा गया लेख।


निवाले पर आफत ... नए साल पर बर्फ से ढंका न्यूयार्क बंद है। इस साल मौसम बड़ा बेरहम रहा। रुस की आग, यूरोप की ठंड, पाकिस्तान की बाढ़ से रोटी चौपट हो गई। ब्लॉगर की रेटिंग के अनुसार सबसे ज्यादा पढ़ा गया लेख।


दो नंबर का दम .. इस साल चीन, अमेरिका के बाद, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यसवस्था हो गया। हमारे पूर्वी पड़ोसी की ताकत अकूत है। ब्लॉगर रेटिंग के आधार पर।
साथ में पढ़ें चीन है तो चैन कहां रे और चाइनीज चेकर भी




दाग और दुर्गंध की दोस्ती.. हमारे यहां कार्बाइड उनके यहा बीपी। मगर दोहरे पैमाने। कार्बाइड माफ और मैक्सिको खाड़ी में पर्यावरण विनाश रचने वाली बीपी का टेंटुआ दबाकर हर्जाने की वसूली। यह भी ब्लॉगगर की रेटिंग के आधार पर।


मेहरबानी आपकी .. भारतीय उपभोक्ताओ की शौर्य गाथा। महंगाई के बावजूद खर्च का जोखिम। अपनी पीठ तो थपथपाइये। स्रोत ब्लॉ.गर रेटिंग।


जागते रहे.. वेदांत पर सख्ती। ताकतवर स्वयंसेवी संगठनों का उभार। एक नए किस्म की सामाजिक आर्थिक सक्रियता। स्रोत ब्लॉगर रेटिंग।


सियासत के सलीब ... सजा की सियासत। जनता गुस्सायी तो सरकारें दोषियों से याराना छोड़ सजा देने निकल पड़ीं। बैंक सूली पर टंगे। सियासत का दोहरा चेहरा। .. स्रोत ब्लॉगर रेटिंग।


फजीहत का गोल्ड मेडल.. बदनामी का कॉमनवेल्थ ... जलवा दिखाने के लिए खेल में जलालत। हमारे नेताओं को फजीहत कराने के कायदे सिखाने का स्कूल खोलना चाहिए। स्रोत ब्लॉगर रेटिंग।

संकटों के नए संसकरण ... ग्रीस के डूबने के बाद बात खत्म- नहीं हुई। नई संकट कथाओं का खुलासा। संयोग कि इस स्तंकभ के कुछ दिनों बाद आयरलैंड में ट्रेजडी का शो शुरु हो गया।



अमेरिका यूरोप संकट  समग्र

डूबे तो उबरेंगे ... यूरोप और यूरो के डूबने की बात अप्रैल में .. साल बीतते आशंकायें असलियत में तब्दील हो गईं

ऐसा भी हो सकता है .... अमेरिका और ब्रिटेन में ऋण संकट के पसरने का आकलन मई में। वक्त उसी तरफ ले जा रहा है1


महात्रासदी का ग्रीक कोरस... ग्रीस के डूबने की त्रासदी। अर्थार्थ में 2009 से ग्रीस का पीछा कर रहा था।


शाएलाकों से सौदेबाजी ... संप्रभु कर्ज संकट यानी देशों के दीवालिया होने की विभीषिका। दर्द भरा इतिहास और जटिल वर्तमान


पछतावे की परियोजनायें ... संकटों का प्रायश्चित। सरकारी संपत्तियों की बिक्री। नए टैक्सों से जनता की आफत


सिद्धांतों का शीर्षासन ... एक संकट और कई सिद्धांत सर के बल। यूरोप लोक कल्या.णकारी राज्ये धराशायी


घट घट में घाटा ... घाटों का अभूतपूर्व जमघट। पूरी दुनिया की सरकारों के बजटों में भयानक घाटे।



मुद्रास्फीति की महादशा ... अमेरिका में डॉलर छपाई मशीन के खतरे। हाइपरइन्फ्लेशन का डर



साख नहीं तो माफ करो .... महाबलशाली बांड बाजार की यूरोप व अमेरिका को घुड़की



बजट के रंग

आपके जमाने का बजट या बाप के जमाने का ... बजटों का अतीत और वर्तमान, प्रौढ़ लोकतंत्र जवान अर्थव्यवस्था


बजट में जादू है ... बजटों में बहुत कुछ खो जाता है। जो मिलता है वह मिलता नजर नहीं आता।


बजट की बर्छियां ... बजट बहुत चुभते हैं। कई अदृश्य कीलें होंती हैं बजट में।


वाह क्या गुस्सा है .. वित्त मंत्री गुस्साये तो खर्च के अभियान जमीन पर आए।



बुरा न मानो बजट है ... बजट की होली। वित्तत मंत्री की शानदार ठिठोली


बजट की षटपदी ... एक शोधपूर्ण आयोजन.. बजट में कर्ज और खर्च की वास्तhविकता। करों के पुराने चाबुक और खर्च के अंधे कुएं। इस श्रंखला को काफी पढ़ा और डाउनलोड किया गया।



लूट और झूठ का राज

झूठ के पांव ... सूचनायें छिपाने का कारोबार। क्रियेटिव अकाउंटिंग। अपारदर्शिता का कारोबारी साम्राज्य


भ्रष्टाचार का मुक्त बाजार .. उदारीकरण से बढ़ा लूट का बाजार। निजीकरण ने दी नेताओं को अकूत ताकत। कंपनियां यानी देने वाले हजारों हाथ।


पर्दा जो उठ गया .. सच बोलने की नई परंपरायें। संदर्भ विकीलीक्स। झूठ की भरमार के बीच सच का महंगा बाजार

डुबाने वाले किनारे (बैंक)

ऊंटों के सर पहाड़ .. दुनिया को नचाने वाली वित्तीय संस्था ओं के बुरे दिन। बैंकों पर भारी टैक्सों की तलवार

इंस्पेक्टर राज इंटरनेशनल .. कठोरतम वित्तीय कानूनों का दौर। बैंकिंग उद्योग बतायेंगे कि कैसे मरेंगे यानी प्रॉविजन ऑफ फ्यूनरल प्ला्न ( अमेरिका का नया वित्तीय कानून)



हमको भी ले डूबे ... डूबने की फितरत यानी बैंकों की आदत। आयरलैंड से लेकर अमेरिका तक बैंकों को श्रद्धांजलि



....कुछ अलग से

बस इतना सा ख्वाब है... यह 2010 का पहला लेख था।


बीस साल बाद ... उदारीकरण के दो दशक के बाद भी कहां कहा .. जहां के तहां


भूल चूक लेनी देनी ... 2010 का अंतिम आलेख ... बढ़ती लागत, घटती साख और असंतुलित विकास का तकाजा



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Monday, December 27, 2010

भूल-चूक, लेनी-देनी

अर्थार्थ
शुक्र है कि हम सुर्खियों से दूर रहे। आर्थिक दुनिया ने दस के बरस में जैसी डरावनी सुर्खियां गढ़ी उनमें न आने का सुकून बहुत गहरा है। करम हमारे भी कोई बहुत अच्छेह नहीं थे। हमने इस साल सर ऊंचा करने वाली सुर्खियां नहीं बटोरीं लेकिन ग्रीस, आयरलैंड, अमेरिका के मुकाबले हम, घाव की तुलना में चिकोटी जैसे हैं। अलबत्ता इसमें इतराने जैसा भी कुछ नहीं है। वक्त, बड़ा काइयां महाजन है। उसके खाते कलेंडर बदलने से बंद नही हो जाते हैं बल्कि कभी कभी तो उसके परवाने सुकून की पुडि़या में बंध कर आते हैं। मंदी व संकटों से बचाते हुए वक्त हमें आज ऐसी हालत में ले आया है जहां गफलत में कुछ बड़ी नसीहतें नजरअंदाज हो सकती हैं। दस के बरस बरस का खाता बंद करते हुए अपनी भूल चूक के अंधेरों पर कुछ रोशनी डाल ली जाए क्यो कि वक्त की लेनी देनी कभी भी आ सकती है।
लागत का सूद
सबसे पहले प्योर इकोनॉमी की बात करें। भारत अब एक बढती लागत वाला मुल्क हो गया है। पिछले कुछ वर्षों की तेज आर्थिक विकास दर ने हमें श्रम (लेबर कॉस्ट) लागत को ऊपर ले जाने वाली लिफ्ट में चढ़ा दिया है। सस्ता श्रम ही तो भारत की सबसे बड़ी बढ़त थी। वैसे इसमें कुछ अचरज नहीं है क्यों कि विकसित होने वाली अर्थव्यरवस्थाओं में श्रम का मूल्यं बढ़ना लाजिमी है। अचरज तो यह है कि हमारे यहां लागत हर तरफ से बढ़

Monday, December 20, 2010

हमको भी ले डूबे !

अर्थार्थ
“तुम नर्क में जलो !! सत्यानाश हो तुम्हारा !! .दुनिया याद रखे कि तुमने कुछ भी अच्छा नहीं किया !!”....डबलिन में एंग्लो आयरिश बैंक के सामने चीखती एक बूढ़ी महिला के पोस्टर पर यह बददुआ लिखी है। ...बैंकों से नाराज लोगों का गुस्सा एक बड़ा सच बोल रहा है। बैंकों ने दुनिया का कितना भला किया यह तो पता नहीं मगर मुश्किलों की महागाथायें लिखने में इन्हे महारथ हासिल है। आधुनिक वित्तीय तंत्र का यह जोखिमपसंद, मनमाना और बिगड़ैल सदस्य दुनिया की हर वित्तीय त्रासदी का सूत्रधार या अभिनेता रहा है। बैंक हमेशा डूबे हैं और हमको यानी हमारे जैसे लाखों को भी ले डूबे हैं। इनके पाप बाद में सरकारों ने अपने बजट से बटोरे हैं। अमेरिका सिर्फ अपने बैंकों के कारण औंधे मुंह बैठ गया है। इन्हीं की मेहरबानी से यूरोप के कई देश दीवालिया होने की कगार पर हैं। इसलिए तमाम नियामक बैंकों को रासते पर लाने में जुट गए हैं। डरा हुआ यूरोप छह माह में दूसरी बार बैंकों को स्ट्रेस टेस्ट (जोखिम परीक्षण) से गुजारने जा रहा है। बैंकिंग उद्योग के लिए नए बेहद सख्त कानूनों से लेकर अंतरराष्ट्री य नियमों (बेसिल-तीन) की नई पीढ़ी भी तैयार है। मगर बैंक हैं कि मानते ही नहीं। अब तो भारत के बैंक भी प्रॉपर्टी बाजार (ताजा बैंक-बिल्डर घोटाला) में हाथ जलाने लगे हैं।
डूबने की फितरत
गिनती किसी भी तरफ से शुरु हो सकती है। चाहें आप पिछले दो साल में डूबे 315 अमेरिकी बैंकों और यूरोप में सरकारी दया पर घिसट रहे बैंकों को गिनें या फिर 19 वीं शताब्दी का विक्टोरियन बैंकिंग संकट खंगालें। हर कहानी में बैंक नाम एक चरित्र जरुर मौजूद है, खुद डूबना व सबको डुबाना जिसकी फितरत है। 1970 से लेकर 2007 तक दुनिया में 124 बैंकिंग संकट आए हैं और कई देशों में तो यह तबाही एक से ज्या दा बार

Monday, December 13, 2010

साख नहीं तो माफ करो!

अर्थार्थ
साख नहीं तो माफ करो! .. दुनिया का बांड बाजार अर्से बाद जब इस दो टूक जबान में बोला तो लंदन, मैड्रिड, रोम, ब्रसेल्स और न्यूयॉर्क, फ्रैंकफर्ट, बर्लिन और डबलिन में नियामकों व केंद्रीय बैंकों की रीढ़ कांप गई। दरअसल जिसका डर था वही बात हो गई है। वित्तीय बाजारों के सबसे निर्मम बांड निवेशकों ने यूरोप व अमेरिका की सरकारों की साख पर अपने दांत गड़ा दिए हैं। घाटे से घिरी अर्थव्यवस्थाओं से निवेशक कोई सहानुभूति दिखाने को तैयार नहीं हैं। ग्रीस व आयरलैंड को घुटनों के बल बिठाकर यूरोपीय समुदाय से भीख मंगवाने के बाद ये निवेशक अब स्पेन की तरफ बढ़ रहे हैं। स्पेन, यूरोप की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, क्या आयरलैंड व ग्रीस की राह पर जाएगा? सोच कर ही यूरोप की सांस फूल रही है। लेकिन यह बाजार तो स्पेन के डेथ वारंट पर दस्तखत करने लगा है, क्योंकि इस क्रूर बाजार में बिकने वाली साख यूरोप की सरकारों के पास नहीं है और तो और, इस निष्ठुर बाजार ने अमेरिका की साख को भी खरोंचना शुरू कर दिया है।
खतरे की खलबली
पूरी दुनिया में डर की ताजा लहर बीते हफ्ते यूरोप, अमेरिका व एशिया के बांड बाजारों से उठी, जब सरकारों की साख पर गहरे सवाल उठाते हुए निवेशकों ने सरकारी बांड की बिकवाली शुरू कर दी और सरकारों के लिए कर्ज महंगा हो गया। बीते मंगलवार अमेरिकी सरकार के (दस साल का बांड) बाजार कर्ज की लागत सिर्फ कुछ घंटों में

Monday, December 6, 2010

पर्दा जो उठ गया !

अर्थार्थ
रा देखिये तो शर्म से लाल हुए चेहरों की कैसी अंतरराष्ट्रीय नुमाइश चल रही है। अमेरिका से अरब तक और भारत से यूरोप तक मुंह छिपा रहे राजनयिकों ने नहीं सोचा था कि विकीलीक्स ( एक व्हिसिल ब्लोइंग वेबसाइट) सच की सीटी इतनी तेज बजायेगी कि कूटनीतिक रिश्तों पर बन आएगी। दुनिया के बैंक समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर सब उनकी कारोबारी गोपनीयता को उघाड़ क्यों देना चाहते हैं। कहीं (भारत में) कारोबारी लामबंदी बनाम निजता बहस की गरम है क्यों कि कुछ फोन टेप कई बड़े लोगों को शर्मिंदा कर रहे हैं। अदालतें सरकारी फाइलों में घुस कर सच खंगाल रही हैं। पूरी दुनिया में पारदर्शिता के आग्रहों की एक नई पीढ़ी सक्रिय है, जो संवेदनशीलता, गोपनीयता,निजता की मान्यताओं को तकनीक के मूसल से कूट रही है और सच बताने के पारंपरिक जिम्मेंदारों को पीछे छोड़ रही है। कूटनीति, राजनीति, कारोबार सभी इसके निशाने पर हैं। कहे कोई कुछ भी मगर, घपलों, घोटालों, संस्थागत भ्रष्टाचार और दसियों तरह के झूठ से आजिज आम लोगों को यह दो टूक तेवर भा रहे हैं। दुनिया सोच रही है कि जब घोटाले इतने उम्दा किस्म के हो चले हैं तो फिर गोपनीयता के पैमाने पत्थर युग के क्यों हैं ?
खतरनाक गोपनीयता
ग्रीस की संप्रभु सरकार अपने कानूनों के तहत ही अपनी घाटे की गंदगी छिपा रही थी। पर्दा उठा तो ग्रीस ढह गया। ग्रीस के झूठ की कीमत चुकाई लाखों आम लोगों ने, जो पलक झपकते दीवालिया देश के नागरिक बन गए । यूरोप अमेरिका की वित्तीय संस्थामओं ने नीतियों के पर्दे में बैठकर तबाही रच दी। अमेरिका लेकर आयरलैंड तक आम लोग अपने बैंकों के दरवाजे पीट कर यही तो पूछ रहे हैं कि यह कैसी कारोबारी गोपनीयता थी जिसमें उनका सब कुछ लुट

Monday, November 29, 2010

नीतीश होने की मजबूरी

अर्थार्थ
वोटर रीझता है मगर सड़क से नहीं (जातीय) समीकरण से, विकास से नहीं (वोटों का) विभाजन से और काम से नहीं (व्यक्तित्व के) करिश्मे से! एक पराजित मुख्यमंत्री ने कुछ साल पहले ऐसा ही कहा था। यह हारे को हरिनाम था ? नहीं ! यह भारत में विकास की राजनीति के असफल होने का ईमानदार ऐलान था। नेता जी बज़ा फरमा रहे थे,भारत की सियासत तो जाति प्रमाण पत्रों की दीवानी है। विकास के सहारे बदलते आय (कमाई)प्रमाण पत्रों की होड़ उसे नहीं सुहाती। चुनावी गणित विकास के आंकड़ो से नहीं सधती, इसलिए ठोस आर्थिक विकास से सिंझाई गई राजनीति को हमने कभी चखा ही नहीं। भारत में सियासत अपनी लीक चलती है और विकास अपनी गति से ढुलकता है। सत्ता में पहुंच कर आर्थिक प्रगति दिखाने वालों का माल भी वोट की मंडी में कायदे से नहीं बिकता तो फिर विकास की राजनीति का जोखिम कौन ले? इसलिए आर्थिक विकास दलों के बुनियादी राजनीतिक दर्शन की परिधि पर टंगा रहता है। मगर इस बार कुछ हैरतअंगेज हुआ। जनता नेताओं से आगे निकल गई। पुरानी सियासत के अंधेरे में सर फोड़ती पार्टियों को, बिहार का गरीब गुरबा वोटर धकेल कर नई रोशनी में ले आया है। बिहार के नतीजे राजनीति को उसका बुनियादी दर्शन बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। चौंकिये मत! राजनीति हमेशा मजबूरी में ही बदली है।
प्रयोग जारी है
भारत का प्रौढ़ लोकतंत्र,उदार अर्थव्यवस्था से रिश्ते को कई तरह से परख रहा है। पूरा देश राजनीतिक आर्थिक मॉडलों की विचित्र प्रयोगशाला है। राजनीतिक स्थिरता विकास की गारंटी है लेकिन बंगाल का वोटर अब विकास के लिए ही स्थिरता से निजात चाहता है। दूसरी तरफ लंबी राजनीतिक स्थिरता के सहारे राजस्थान चमक जाता है। गठजोड़ की सरकारें पंजाब में कोई उम्मीाद नहीं जगातीं लेकिन बिहार में वोटरों को भा जाती हैं। बड़े राज्यों में पहिया धीरे घूमता है मगर छोटे राज्य विकास का रॉकेट बनते भी नजर नहीं

Monday, November 22, 2010

भ्रष्टाचार का मुक्त बाजार

अर्थार्थ
राजाओं, कलमाडिय़ों, मधु कोड़ाओं और ललित मोदियों के शर्मनाक संसार को देखकर क्या सोच रहे हैं ... यही न कि आर्थिक खुलेपन की हवा भ्रष्टाचार के पुराने इन्फेक्शन को खूब रास आ रही है ? वेदांतो, सत्यमों व तमाम वित्तीय कंपनियों के कुकर्मों में आपको एक आर्थिक अराजकता दिखती होगी। कभी कभी यह कह देने का मन होता होगा कि आर्थिक उदारीकरण ने भारत में भ्रष्टाचार का उदारीकरण कर दिया है !!.... माना कि यह ऊब, खीझ और झुंझलाहट है मगर बेसिर पैर नहीं है। मान भी लीजिये कि हम मुक्त बाजार की विकृतियों को संभाल नहीं पा रहे हैं। रिश्वत, कार्टेल, फर्जी एकाउंटिंग, कारपोरेट फ्रॉड, लॉबीइंग, नीतियों में मनमाना फेरबदल, ठेके, निजीकरण का इस्तेमाल .... उदार बाजार का हर धतकरम भारत में खुलकर खेल रहा है। राजा व कोड़ा जैसे नेताओं की नई पीढ़ी अब राजनीतिक अवसरों में कमाई की संभावनाओं को चार्टर्ड अकाउंटेंट की तरह आंकती है, इसलिए भ्रष्टाजचार भी अब सीधे नीतियों के निर्माण में पैठ गया है। सातवें आठवें दशक के नेता अपराधी गठजोड़ की जगह अब नेता-कंपनी गठजोड़ ले ली है। यह जोड़ी ज्यादा चालाक, आधुनिक, रणनीतिक, बेफिक्र और सुरक्षित है। मुक्त बाजार में ताली दोनों हाथ से बज रही है।
खुलेपन का साथ
मुट्ठी में दुनिया (मोबाइल) लिये घूम रही भारत की एक बड़ी आबादी को मालूम होना चाहिए कि यह सुविधा बहुतों की मुट्ठयां गरम होने के बाद मिली है। सुखराम से राजा तक, दूरसंचार क्षेत्र का उदारीकरण अभूतपूर्व भ्रष्टा्चार से दागदार है। सिर्फ यही क्यों पूंजी बाजार, खनन, अचल संपत्ति व निर्माण, बैंकिंग, वायु परिवहन, सरकारी अनुबंध ... हर क्षेत्र में उदारीकरण के बाद बडे घोटाले दर्ज हुए हैं। उदारीकरण और भ्रष्टाचार रिश्ते की सबसे बड़ी पेचीदगी यही है कि

Monday, November 15, 2010

संकटों के नए संस्करण

अर्थार्थ
दुनिया की आर्थिक फैक्ट्रियों से संकटों के नए संस्करण फिर निकलने लगे हैं। ग्रीस के साथ ही यूरोप की कष्ट कथा का समापन नहीं हुआ था, अब आयरलैंड दीवालिया होने को बेताब है और इधर मदद करने वाले यूरोपीय तंत्र का धैर्य चुक रहा है। बैंकिंग संकट से दुनिया को निकालने के लिए हाथ मिलाने वाले विश्व के 20 दिग्गज संरक्षणवाद को लेकर एक दूसरे पर गुर्राने लगे हैं यानी कि बीस बड़ों की (जी-20) बैठक असफल होने के बाद करेंसी वार और पूंजी की आवाजाही पर पाबंदियों का नगाड़ा बज उठा है। सिर्फ यही नहीं, मंदी में दुनिया की भारी गाड़ी खींच रहे भारत, चीन, ब्राजील आदि का दम भी फूल रहा है। यहां वृद्धि की रफ्तार थमने लगी है और महंगाई के कांटे पैने हो रहे हैं। दुनिया के लिए यह समस्याओं की नई खेप है और चुनौतियों का यह नया दौर पिछले बुरे दिनों से ज्यादा जटिल, जिद्दी और बहुआयामी दिख रहा है। समाधानों का घोर टोटा तो पहले से ही है, तभी तो पिछले दो साल की मुश्किलों का कचरा आज भी दुनिया के आंगन में जमा है।

ट्रेजडी पार्ट टू
यूरोप के पिग्स (पुर्तगाल, आयरलैंड, ग्रीस, स्पेन) में दूसरा यानी आयरलैंड ढहने के करीब है। 1990 के दशक की तेज विकास दर वाला सेल्टिक टाइगर बूढ़ा होकर बैठ गया है और यूरोपीय समुदाय से लेकर आईएमएफ तक सब जगह उद्धार की गुहार लगा रहा है। डबलिन, दुबई जैसे रास्ते से गुजरते हुए यहां तक पहुंचा है। जमीन जायदाद के धंधे को कर्ज देकर सबसे बड़े आयरिश बैंक एंग्लो आयरिश और एलाइड आयरिश तबाह हो गए, जिसे बजट से 50 बिलियन यूरो की मदद देकर बचाया जा रहा है। आयरलैंड का घाटा जीडीपी का 32 फीसदी हो रहा है, सरकार के पास पैसा नहीं है और बाजार में साख रद्दी हो गई है। इसलिए बांडों को बेचने का इरादा छोड़ दिया गया है। आयरलैंड के लिए बैंकों को खड़ा करने की लागत 80 बिलियन यूरो तक जा सकती है। करदाताओं को निचोड़कर (भारी टैक्स और खर्च कटौती वाला बजट) यह लागत नहीं निकाली जा सकती। इसलिए ग्रीस की तर्ज पर यूरोपीय समुदाय की सहायता संस्था (यूरोपियन फाइनेंशियल स्टेबिलिटी फैसिलिटी) या आईएमएफ से मदद मिलने की उम्मीद है। लेकिन यह मदद उसे दीवालिया देशों की कतार में पहुंचा देगी। यूरोपीय समुदाय की दिक्कत यह है कि

Monday, November 8, 2010

असमंजस की मुद्रा

अर्थार्थ
साख बचे तो (आर्थिक) सेहत जाए? ताज मिले तो ताकत जाए? एक रहे तो भी कमजोर और बिखर गए तो संकट घोर?? बिल्कुल ठीक समझे आप, हम पहेलियां ही बुझा रहे हैं, जो दुनिया की तीन सबसे बड़ी मुद्राओं अर्थात अमेरिकी डॉलर, चीन का युआन और यूरो (क्रमश:) से जुड़ी हैं। दरअसल करेंसी यानी मुद्राओं की पूरी दुनिया ही पेचीदा उलटबांसियों से मुठभेड़ कर रही है। व्यापार के मैदान में अपनी मुद्रा को कमजोर करने की जंग यानी करेंसी वार का बिगुल बजते ही एक लंबी ऊहापोह बाजार को घेर को बैठ गई है। कोई नहीं जानता कि दुनिया की रिजर्व करेंसी का ताज अमेरिकी डॉलर के पास कब तक रहेगा? युआन को कमजोर रखने की चीनी नीति पर कमजोर डॉलर कितना भारी पड़ेगा? क्या माओ के उत्तराधिकारियों की नई पीढ़ी युआन को दुनिया की रिजर्व करेंसी बनाने का दांव चलेगी? यूरो का जोखिम कितना लंबा खिंचेगा। क्या दुनिया में अब कई रिजर्व करेंसी होंगी? दुनिया के कुछ हिस्से आठवें दशक के लैटिन अमेरिका की तरह दर्जनों विनिमय दरों का अजायबघर बन जाएंगे? ... सवालों की झड़ी लगी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार असमंजस में नाखून चबा रहा है।
दुविधा का नाम डॉलर
विश्व के करीब 60 फीसदी विदेशी मुद्रा भंडारों में भरा ताकतवर अमेरिकी डॉलर ऊहापोह की सबसे बड़ी गठरी है। अमेरिकी नीतियों ने डॉलर को हमेशा ताकत की दवा दी ताकि अमेरिकी उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति महंगाई से महफूज रहे। मजबूत डॉलर, सस्ते आयात व नियंत्रित मुद्रास्फीति अमेरिका के मौद्रिक प्रबंधन की बुनियाद है। सस्ते उत्पादन और अवमूल्यित मुद्रा के महारथी चीन ने इसी नीति का फायदा लेकर अमेरिकी बाजार को अपने उत्पादों से पाटकर अमेरिका को जबर्दस्त व्यापार घाटे का तोहफा दिया है। सस्ते आयात को रोकने के लिए विश्व व्यापार में डॉलर को प्रतिस्पर्धात्मक रखना अमेरिकी नीति का दूसरा पहलू है। अलबत्ता 1980-90 में जापान ने इसे सर के बल खड़ा किया था और अब चीन इसे दोहरा रहा है। इस अतीत को पीठ पर लादे विश्व की यह सबसे मजबूत रिजर्व करेंसी अब तक की सबसे जटिल चुनौतियों से मुकाबिल है। जीडीपी के अनुपात में 62 फीसदी विदेशी कर्ज (अमेरिकी बांडों में विदेशी निवेश) अमेरिका के भविष्य पर

Monday, November 1, 2010

मुद्रास्फीति की महादशा

अर्थार्थ
ड़क पर से बैंकनोट बटोरे जा रहे हैं। (हंगरी 1946) .. लाख व करोड़ मूल्य वाले के नोट लेकर लोग जगह जगह भटक रहे हैं। (जर्मनी 1923) .. बाजार में कीमतें घंटो की रफ्तार से बढ़ रही हैं। (जिम्बावे 2007)। ... अमेरिका के लोगों के सपनों में यह दृश्य आजकल बार-बार आ रहे हैं। अंकल सैम का वतन, दरअसल, भविष्य के क्षितिज पर हाइपरइन्फे्लेशन का तूफान घुमड़ता देख रहा है। एक ऐसी विपत्ति जो पिछले सौ सालों में करीब तीन दर्जन से देशों में मुद्रा, वित्तीय प्रणाली और उपभोक्ता बाजार को बर्बाद कर चुकी है। आशंकायें मजबूत है क्यों कि ढहती अमेरिकी अर्थव्यवस्था को राष्ट्रपति बराकर ओबामा और बेन बर्नांकी (फेडरल रिजर्व के मुखिया) मुद्रा प्रसार की अधिकतम खुराक (क्यूई-क्वांटीटिव ईजिंग) देने पर आमादा हैं। फेड रिजर्व की डॉलर छपाई मशीन ओवर टाइम में चल रही है और डरा हुआ डॉलर लुढ़कता जा रहा है। बर्नाकी इस घातक दवा (क्यूई) के दूसरे और तीसरे डोज बना रहे है। जिनका नतीजा अमेरिका को महा-मुद्रास्फीति में ढकेल सकता है और अगर दुनिया में अमेरिका के नकलची समूह ने भी यही दवा अपना ली तो यह आपदा अंतरदेशीय हो सकती।

क्यूई उर्फ डॉलरों का छापाखाना
मांग, उत्पादन, निर्यात और रोजगार में बदहाल अमेरिका डिफ्लेशन (अपस्फीति) के साथ मंदी के मुहाने पर खड़ा है। ब्याज दरें शून्य पर हैं यानी कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ब्याज दरें घटाने जैसी दवायें फेल हो चुके हैं। अब क्वांटीटिव ईजिंग की बारी है। अर्थात ज्यादा डॉलर छाप कर बाजार में मुद्रा की क्वांटिटी यानी मात्रा बढ़ाना। नोट वस्तुत: भले ही न छपें लेकिन व्यावहारिक मतलब यही है कि फेड रिजर्व के पास मौजूद बैंको के रिजर्व खातों में (मसलन भारत में सीआरआर) ज्यादा धन आ जाएगा। इसके बदले बैंक बांड व प्रतिभूतियां फेड रिजर्व को दे देंगे। क्यूई की दूसरी खुराक इस साल दिसंबर तक आएगी। तीसरी की बात भी

Monday, October 25, 2010

संकट की पूंजी

अर्थार्थ
यह भी खूब रही। भारत, चीन, रूस, ब्राजील वाली दुनिया समझ रही थी कि संकट के सभी गृह नक्षत्र यूरो और डॉलर जोन के खाते में हैं, उनका संसार तो पूरी तरह निरापद है। लेकिन संकट इनके दरवाजे पर भी आ पहुंचा। यह पिछड़ती दुनिया जिस विदेशी पूंजी केजरिए उभरती दुनिया (इमर्जिंग मार्केट) में बदल गई वही पूंजी इनके आंगन में संकट रोपने लगी है। मंदी से हलकान अमेरिका व यूरोप अपने बाजारों को सस्ती पूंजी की गिजा खिला रहे हैं। यह पूंजी लेकर विदेशी निवेशक उभरते वित्तीय बाजारों में शरणार्थियों की तरह उतर रहे हैं। तीसरी दुनिया के इन मुल्कों की अच्छी आर्थिक सेहत ही इनके जी का जंजाल हो गई है। शेयर बाजारों में आ रहे डॉलरों ने इनके विदेशी मुद्रा भंडारों को फुला कर इनकी मुद्राओं को पहलवान कर दिया है। जिससे निर्यातक डर कर दुबक रहे हैं। विदेशी पूंजी की इस बाढ़ से शेयर बाजारों और अचल संपत्ति का बाजार गुब्बारा फिर फूलने लगा है। कई देशों में मुद्रास्फीति (भारत में पहले से) मंडराने लगी है। हमेशा से चहते विदेशी निवेशक अचानक पराए हो चले हैं। कोई ब्याज दरें बढ़ाकर इन्हें रोक रहा है तो कोई सीधे-सीधे विदेशी पूंजी पर पाबंदिया आयद किए दे रहा है। 1997 के मुद्रा संकट जैसे हालात उभरते बाजारों की सांकल बजा रहे हैं।
कांटेदार पूंजी
पूंजी का आना हमेशा सुखद ही नहीं होता। दुनिया अगर असंतुलित हो, पूंजी अचानक कांटे चुभाने लगती है। ताजी मंदी और उसके बाद ऋण संकट के चलते अमेरिका व यूरोप के केंद्रीय बैंकों ने अपने बाजारों में पैसे का मोटा पाइप खोल दिया। ब्याज दरें तलहटी (अमेरिका में ब्याज दर शून्य) पर आ गईं ताकि निवेशक और उद्योगपति सस्ता कर्ज ले अर्थव्यवस्था को निवेश की खुराक देकर खड़ा करें। अव्वल तो इस सस्ते कर्ज से इन देशों में कोई बड़ा निवेश नहीं हुआ और जो हुआ वह भी निर्यात के लिए था, मगर वहां दाल गलनी मुश्किल थी क्योंकि कमजोर युआन की खुराक पचा कर चीन

Monday, October 18, 2010

कमजोरी की ताकत

अर्थार्थ
कमजोरी में भी बिंदास ताकत होती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार जल्द ही कमजोर मुद्राओं (करेंसी) की करामात देखेगा जब मुद्राओं के अवमूल्यन से निकले सस्ते निर्यात लेकर दुनिया के देश एक दूसरे के बाजारों पर चढ़ दौड़ेंगे। मंदी ने सारा संयम तोड़ दिया है, करेंसी को कमजोर करने की होड़ में शेयर बाजारों के चहेते विदेशी निवेशक पराए होने लगे हैं। उनके डॉलर अब उल्टा असर (विदेशी पूंजी की भारी आवक मतलब देशी मुद्रा को ज्यादा ताकत) कर रहे हैं। उदार विश्व व्यापार की कसमें टूटने लगी हैं। अपने बाजारों के दरवाजे बंद रखने में फायदे देख रहा विश्व मुक्त बाजार का जुलूस फिलहाल रोक देना चाहता है। दुनिया में ट्रेड या करेंसी वार का मैदान तैयार है। एक ऐसी जंग जिसमें पराए बाजार को कब्जाने और अपने को बचाने के लिए सब कुछ जायज है। इसे रोकने की एक बड़ी कोशिश (मुद्राकोष-विश्व बैंक की ताजा बैठक) हाल में ही औंधे मुंह गिरी है। इसलिए अब दुनिया के देशों ने अपने-अपने पैंतरों का रिहर्सल शुरू कर दिया है। इस जंग में पैंतरे ही अलग हो सकते हैं, लड़ाई की रणनीति तो एक ही है- जिसकी मुद्रा जितनी कमजोर वह उतना बड़ा सीनाजोर।

मांग रे मांग
भारत व चीन जैसी किस्मत सबकी कहां? इनके यहां तेज आर्थिक वृद्धि की रोशनी, लेकिन दुनिया के बड़ों के यहां गहरा अंधेरा है। कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह पेंदी में बैठ गई हैं। अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, इटली, यूके में इस साल की दूसरी तिमाही इतनी खराब रही है कि खतरे के ढोल बजने लगे हैं। इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं दरअसल पिछले दस साल के औसत रुख से ज्यादा कमजोर हैं। अमेरिका और यूरोजोन में उत्पादन ठप है और मांग घटने के कारण मुद्रास्फीति एक

Monday, August 30, 2010

जागते रहो!

अर्थार्थ
नजर उतारिए सरकार की, बड़ी हिम्मत दिखाई हुजूर ने, वरना तो लोकतंत्र में सरकारें बुनियादी रूप से दब्बू ही होती हैं। बात अगर बड़ी निजी कंपनियों की हो तो फैसले नहीं, समझौते होते हैं। वेदांत के मामले जैसी तुर्शी और तेजी तो बिरले ही दिखती है। नाना प्रकार के दबावों को नकारते हुए सरकार ने जिस तेजी से वेदांत को कानूनी वेदांत पढ़ाया, वह कम से कम भारत के लिए तो नया और अनोखा ही है और इस हिम्मत पर सरकार को विकास और विदेशी निवेश के वकीलों से जो तारीफ मिली, वह और भी महत्वपूर्ण है। इसे भारत में ऐसे सुधारों की शुरुआत मानिए, जिसका वक्त अब आ गया था। जरा खुद से पूछिए कि अब से एक दशक पहले क्या आप भारत में सरकारों से इस तरह की जांबाजी की उम्मीद कर सकते थे। तब तो सरकारें विदेशी निवेश की चिंता में सांस भी आहिस्ता से लेती थीं। वेदांत को सबक सरकारी तंत्र के भीतर सोच बदलने का सुबूत है और यह बदलाव सिर्फ वक्त के साथ नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे जन अधिकारों के नए पहरुए भी हैं और, माफ कीजिए, दंतेवाड़ा व पलामू भी।
वेदांत से शुरुआत
यूनियन कार्बाइड से लेकर वेदांत तक कंपनियों के कानून से बड़ा होने की ढेरों नजीरें हमारे इर्दगिर्द बिखरी हैं। इसलिए वेदांत पर सख्ती भारत के कानूनी मिजाज से कुछ फर्क नजर आती है। उड़ीसा सरकार तो आज भी मानने को तैयार नहीं है कि नियामगिरी में बॉक्साइट खोद रही वेदांत ने वन अधिकार, वन संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के कानूनों को अपनी खदान में दफन कर दिया। अलुमिना रिफाइनरी की क्षमता (एक मिलियन टन से छह मिलियन टन) हवा में नहीं बढ़ जाती, जैसा कि लांजीगढ़ में वेदांत ने बगैर किसी मंजूरी के कर लिया। यह कैसे हो सकता है कि सरकारों को 26 हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्जा, पर्यावरण की बर्बादी या आदिवासियों के हकों पर हमला न दिखे। खनन कंपनियां तो वैसे भी अपनी मनमानी के लिए पूरी दुनिया

Monday, August 23, 2010

दो नंबर का दम

अर्थार्थ
भी-कभी बड़े बदलाव के लिए ज्यादा वक्त की दरकार नहीं होती। कई बार दूरगामी परिवर्तन ढोल-ताशा बजाए बगैर चुपचाप संजीदगी के साथ दबे पांव आ जाते हैं और हम जान भी नहीं पाते। जैसे कि विश्व में आर्थिक ताकत के हिसाब-किताब को ही लीजिए। पूरी दुनिया पता नहीं कहां-कहां उलझी थी, इस बीच बीते सप्ताह जापान को पछाड़कर चीन दुनिया की (अमेरिका के बाद) दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गया। ..तकरीबन साढ़े चार करोड़ निर्धन लोगों वाली एक विकासशील अर्थव्यवस्था और दुनिया में दूसरे नंबर पर। हर पैमाने पर अभूतपूर्व है यह करिश्मा। चीन ने केवल एक तिहाई सदी में ही सब कुछ उलट-पलट दिया। आखिर ऐसी कामयाबी पर कौन है जो रश्क न करेगा। मगर हकीकत यह है कि चीन बल्लियों उछल नहीं रहा है, बल्कि वह नंबर दो के चक्कर को लेकर कुछ ऊहापोह में दिखता है। चीन के विकास में कुछ गहरे भीतरी अंतरविरोध हैं, जो शायद इस चमक के बाद खुलकर उभर आए हैं। इसलिए सरकार अपने इस ताज को कोई भाव ही नहीं दे रही है। सरकार के अखबारों को चीन का तीसरी दुनिया वाला चेहरा ही सुहाता है। अलबत्ता बाहरी विश्व को कोई असमंजस नहीं है। पूरी दुनिया को मालूम है कि चीन अद्भुत रूप से व्यावहारिक है, गरीब व पिछड़ा बना रहना उसके लिए कूटनीतिक व आर्थिक तौर पर ज्यादा माफिक है।
चमत्कारी रफ्तार
1968 में जब जापान ने तत्कालीन पश्चिम जर्मनी को पछाड़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की जगह ली थी तो दुनिया चौंक गई थी। अलबत्ता इसके बाद यह मान लिया गया था कि अमेरिका व जापान ने पहली व दूसरी सीटें रिजर्व करा ली हैं। गरीब और आबादी से भरा चीन तब किसी के राडार पर नहीं था। साढ़े तीन से चार दशकों में सारी गणनाएं सर के बल खड़ी हो गई। सुधारों के पहले एक दशक में तो दुनिया यह जान ही नहीं पाई कि चीन में क्या हो रहा है। अगले एक दशक में लोगों ने चीन को समझना शुरू किया और बाद के तीसरे दशक में दुनिया दांतो तले उंगली दबाकर इसकी रफ्तार में खो गई। चीन शून्य से शिखर पर आ गया। बीते सप्ताह जब जापान की सरकार ने यह बताया कि साल की दूसरी तिमाही में जापान का जीडीपी 1.29 ट्रिलियन डॉलर रहा है, जबकि चीन का 1.36 ट्रिलियन तो दुनिया के सामने हर तरह से यह साबित हो गया कि अब अमेरिका के बाद चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है। दुनिया के विशेषज्ञ किसी देश की अर्थव्यवस्था का आकार उसकी क्रय शक्ति (पर्चेजिंग पॉवर) पर आंकते हैं और चीन इस पैमाने पर जापान को एक दशक पहले ही पछाड़ चुका है। अलबत्ता दुनिया आर्थिक उत्पादन के डॉलर में मूल्यांकन को ज्यादा भरोसेमंद मानती है। इसलिए जापान के आर्थिक उत्पादन के आंकड़ों बाद लगी मुहर ज्यादा प्रामाणिक है। अब यह तय है कि साल खत्म होते-होते चीन का उत्पादन जापान से काफी आगे निकल जाएगा। अब अगर कोई महामंदी न आ धमके या बड़ी आफत न आए तो चीन अगले एक दशक से भी कम वक्त में अमेरिका को पछाड़ सबसे आगे खड़ा होगा।
असमंजस बेशुमार
आगे होने पर चीन बाग-बाग नहीं, बल्कि संजीदा है। ड्रैगन के सरकारी अखबार इस रिपोर्ट कार्ड को बहुत तवज्जो न देने की सलाह बांट रहे हैं। दरअसल चीन एक खास किस्म की उधेड़बुन में है। तेज विकास दर की चमक में चीन के अंतरविरोध भी उभर आए हैं। दुनिया अब चीन के भीतर विकास ही नहीं और भी कुछ देख रही है। हाल में जब चीन की एक बड़ी सूचना तकनीक कंपनी में वेतन न बढ़ने पर श्रमिक असंतोष बढ़ा तो पूरी दुनिया पीछे पड़ गई। 1.3 अरब लोगों वाले चीन की विसंगतियां महाकाय हैं। सरकार ने ज्यादातर संसाधन देश को औद्योगिक ताकत बनाने में झोंक दिए, जिसके कारण एक डॉलर प्रतिदिन से भी कम कमाने वाले 15 करोड़ लोगों की हालत पर नजर ही नहीं गई। 58 फीसदी आबादी गांवों में है और मानव विकास सूचकांक में चीन बहुत से छोटों से पीछे है। सिर्फ यही नहीं जापान की तर्ज पर चीन ने पर्यावरण गंवाया है और ये सभी क्षेत्र चीन में भारी निवेश मांग रहे हैं, जबकि राज्य सरकारों पर भारी कर्ज है। चतुर कामरेडों को मालूम है कि अगर दुनिया ने विकसित दर्जे में गिनना शुरू कर दिया तो यह सब कुछ ज्यादा समय तक ढंका नहीं जा सकता, इसलिए चीन विकासशील ही रहना मांगता है। अब दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा लगाए चीन को यह महसूस हो रहा है कि वह पूरी दुनिया के लिए सस्ता सप्लायर भर बनकर रह गया है। यह दर्जा भी उसने काफी कुछ गंवाकर पाया है।
दुनिया बेकरार
चाइना डेली ने सलाह दी है कि चीन को इन आंकड़ों पर इतराने के बजाय अपना प्रैक्टिकल काम करते रहना चाहिए। यकीनन चीन अपना प्रैक्टिकल काम कर रहा है और दुनिया इसे देख व जान रही है और बेचैन है। चीन का यह नया शिखर विश्व में आर्थिक संतुलन बदलने की पहली इबारत है। वित्तीय बाजार के लिए चीन बहुत बड़ी ताकत है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यानी अमेरिका के सरकारी बांडों में चीन सबसे बडा निवेशक है यानी अमेरिका ने अपने ताजा खातों में सबसे ज्यादा कर्ज चीन से ले रखा है। यूरो जोन में चीन की तूती बोलती है और अफ्रीका में उसका पैसा अभूतपूर्व कमाल दिखा रहा है। इसलिए कोई भी चीन के विकासशील होने के मुगालते में नहीं है। चीन यूं तो जिद्दी है, मगर चतुर भी। अगर बात फायदे की हो तो उसे अपनी मुद्रा अवमूल्यन करने का दबाव स्वीकारने में दिक्कत नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि चीन कूटनीतिक ताकत में अपने पूर्ववर्ती नंबर दो जापान से बहुत अलग है। दुनिया के मंचों पर चीन का जलवा दिखता है और इसके बूते वह यूरोप से लेकर अफ्रीका तक तरह-तरह से पैर फैला रहा है। चीन ने सैन्य ताकत भी मजबूत की है और दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों की होड़ में लंबे हाथ मारे हैं। दुनिया की नंबर दो अर्थव्यवस्था बनने के बाद ड्रैगन का आत्मविश्वास और बढ़ गया है।
ब्रिटेन के करीब 2500 से ज्यादा छात्र मंदरिन (चीन की भाषा) सीख रहे हैं। पिछले कुछ वर्षो में दुनिया में हुए कोयला, तेल, गैस व यूरेनियम के अधिकांश बड़े सौदे चीन की कंपनियों ने किए हैं और चीन की मुद्रा युआन भविष्य में नई ताकत बन सकती है यानी कि यह मानना गलत नहीं है कि दुनिया का पहिया अब चीन के इशारे पर घूम रहा है। मगर पहिए पर खुद चीन भी सवार है। पिछले तीन दशक में चीन ने उत्पादन का विशाल तंत्र खड़ा कर लिया है और दुनिया में हर पांच लोगों में एक चीन का आदमी शामिल है। अर्थात इतनी बड़ी आबादी व इस उत्पादन तंत्र के लिए दुनिया की चक्की का लगातार तेजी से चलते रहना जरूरी है, क्योंकि अगर विश्व की अर्थव्यवस्था को झटके लगे तो चीन का पहिया भी पटरी से उतर जाएगा और मेला उखड़ जाएगा। नंबर दो बनने के बाद चीन दुनिया पर शायद कुछ ज्यादा ही निर्भर हो गया है।
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Tuesday, August 17, 2010

निवाले पर आफत

अर्थार्थ
रोटी या डबल रोटी, जो भी खाते हों, अब उसकी ले-दे मचने वाली है। मुश्किल वक्त में कुदरत भी अपना तकाजा लेकर आ पहुंची है। दुनिया सिर झुकाए वित्तीय संकटों की गुत्थियां खोलने में जुटी थी मगर इसी बीच अनाज बाजार ने पंजे मारने शुरू कर दिए। जमीन के एक बहुत बड़े हिस्से पर इस साल प्रकृति का गुस्सा बरस रहा है। मौसम अपने सबसे डरावने चेहरे के साथ दुनिया की कृषि के सामने खड़ा है। रूस में सूखे, पाकिस्तान में बाढ़, अफगानिस्तान व ऑस्ट्रेलिया में टिड्डी और भारत में असंतुलित वर्षा ने मिलकर जून से अब तक दुनिया में गेहूं की कीमत 50 फीसदी बढ़ा दी है। कई देश अनाज का निर्यात बंद करने लगे हैं जबकि आयात पर निर्भर देशों के व्यापारी वायदा बाजार में हवा भर रहे हैं। महंगाई से तप रहे भारत जैसे मुल्कों के लिए यह बीमारी के बीच अस्पतालों की हड़ताल जैसा है। यहां खेती अस्थिर है, मौसम इस बार भी नखरे दिखा रहा है। खाद्य अर्थव्यवस्था बदहाल है इसलिए अनाज बिकता या बंटता नहीं बल्कि सड़ता है और अंतत: अक्सर आयात की नौबत आती है।
डरावना मौसम
विश्व के कई हिस्सों ने मौसम का ऐसा गुस्सा अरसे बाद देखा है। भारत में लेह से लेकर रूस के एक बड़े हिस्से तक प्रकृति की निर्ममता बिखरी है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े गेहूं उत्पादक रूस के 27 राज्यों में इमर्जेसी लगी है। यह पूरा इलाका रूस की गेहूं उत्पादक पट्टी है। रूस में पिछले तीस साल का सबसे भयानक सूखा पड़ा है। तापमान 130 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है और देश के सात भौगोलिक हिस्सों में जंगल आग का समंदर बने हुए हैं। रूस अपने ताजा इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा झेल रहा है। जंगलों के धुएं से मॉस्को सात दिन तक बंद रहा है। इस सूरत में दुनिया को रूस से गेहूं मिलने की उम्मीद नहीं है। मौसम केवल रूस का ही दुश्मन नहीं है। पड़ोसी राज्य यूक्रेन में भी भयानक सूखा है। दुनिया के छठे सबसे बड़े गेहूं उत्पादक यूक्रेन की काफी फसल पहले ही पाले की भेंट चढ़ चुकी है। पाकिस्तान के भी एक बहुत बड़े हिस्से के लिए रमजान बहुत बुरा बीत रहा है। यहां करीब दस लाख एकड़ की कृषि भूमि ताजा इतिहास की सबसे भयानक बाढ़ में डूब चुकी है। पड़ोसी अफगानिस्तान में गेहूं की फसल का एक बड़ा हिस्सा टिड्डी चाट गई है। टिड्डी का असर ऑस्ट्रेलिया की फसल तक है, जहां करीब 30 लाख टन उपज का नुकसान संभव है। गेहूं बाजार के प्रमुख खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी हिस्सा पहले ही सूखे से जूझ रहा है और चीन व कनाडा में बाढ़ की तबाही है। यही वजह है कि अमेरिका के कृषि विभाग ने पूरी दुनिया में गेहूं का उत्पादन करीब ढाई फीसदी घटने का आकलन किया है। अगले साल मार्च तक विश्व के गेहूं भंडार में करीब सात फीसदी की कमी संभव है। दुनिया की आबादी को देखते हुए उत्पादन और भंडार में यह गिरावट संकट से कम नहीं है।
कीमती अनाज
लेनिन ने जिस अनाज को मुद्राओं की मुद्रा कहा था वह रूस के लिए अचानक बहुत कीमती हो चला है। ब्लैक सी से लेकर उत्तरी काकेशस और पश्चिमी कजाखिस्तान तक फैले रूस के विशाल उर्वर इलाके में भयानक सूखे के बाद इस रविवार से दुनिया के बाजार में रूस का गेहूं पहुंचना बंद हो गया है। वोल्गा नदी से सिंचित यह क्षेत्र रूस को दुनिया का प्रमुख अनाज निर्यातक बनाता है। पुतिन की सरकार ने इस साल निर्यात चार करोड़ टन पहुंचाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब निर्यात पर चार माह की पाबंदी लग गई है। रूस अपने गेहूं उत्पादन का बीस फीसदी हिस्सा निर्यात करता है। रूस के इस फैसले के बाद उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप के बाजारों में अफरा-तफरी फैली है। यूक्रेन भी गेहूं का प्रमुख निर्यातक है जो अगले सप्ताह तक निर्यात पर रोक लगाने वाला है। शिकागो के जिंस एक्सचेंज में गेहूं का वायदा 1973 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर खुला है। इसे देखते हुए विश्व बैंक को दुनिया के देशों से निर्यात रोकने की होड़ बंद करने का अनुरोध करना पड़ा है। दो साल पहले चावल को लेकर भी इसी तरह की होड़ मची थी और कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थीं। कई प्रमुख उत्पादक देशों में मक्के और जौ की उपज भी घटी है। दुनिया में मक्के का भंडार 13 साल के सबसे निचले स्तर पर बताया जा रहा है। अनाज को लेकर दुनिया में संवेदनशीलता काफी ज्यादा है। इसलिए उत्पादन घटने का आंकड़ा आने के बाद पिछड़े और अगड़े सभी देश अपने भंडार भरने में लग जाते हैं, जिससे बाजार में कीमतें और ऊपर जाती हैं। यानी बाजार में बदहवासी बढ़ रही है।
बहुआयामी मुश्किल
अनाजों के बाजार का संतुलन बड़ा नाजुक है। कुछ ही देशों के बूते दुनिया में मांग व आपूर्ति का पलड़ा संभलता रहता है क्योंकि ज्यादातर देशों की पैदावार उनकी जरूरत भर की होती है। 2007-08 में दुनिया ने अनाज बाजार में जबर्दस्त तेजी का दौर देखा था जो लौटता दिख रहा है। भारत जैसे देशों के लिए तो यह आफत है। एक अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत में खेती सिरे से गैर भरोसेमंद हो चली है। भोजन के अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भारत की निर्भरता तेजी से बढ़ी है। पिछले कई वर्षो से दुनिया का बाजार भारत को दाल व खाद्य तेल खिला रहा है। गेहूं व चावल के आयात की नौबत अक्सर आती रहती है। बीते ही साल चीनी का भी आयात हुआ है। इसलिए दुनिया के अनाज बाजार का बदलता रंग चिंतित करता है। भारत में पिछले एक दशक में मौसम के रंग बदले हैं। वर्षा का क्षेत्रीय वितरण उलट-पलट रहा है। ताजा मानसून ने उत्तर में पंजाब और हरियाणा के खेतों को बुवाई से पहले ही पानी से भर दिया जबकि पूर्व व मध्य भारत के धान उत्पादक इलाके सूख रहे हैं। भारत में अनाज उत्पादन के आकलन लगातार उलटे पड़ते हैं। खाद्य बाजारों में आ रही महंगाई को भारत पहुंचने तक कोई नहीं रोक सकता। अलबत्ता अगर फसल बिगड़ी तो अनाज को लेकर भारत का बजट भी बिगड़ सकता है।
दुनिया यह मान रही थी कि अगले दो दशक में उसे अपनी अनाज उपज दोगुनी करनी होगी ताकि बढ़ती आबादी का पेट भरा जा सके। हालांकि खेती का यह एजेंडा वित्तीय संकट से निपटने के बाद ही सामने आना था। तब तक दुनिया इस बात से मुतमइन थी कि मांग आपूर्ति में संतुलन बनाने भर की पैदावार होती रहेगी अलबत्ता कुदरत को कुछ और मंजूर था। मौसम के बदले मिजाज ने अब हाथों से तोते उड़ा दिए हैं। बैंकों और वित्तीय कानूनों में उलझी सरकारें अचानक खेतों को लेकर परेशान होने लगी हैं क्योंकि हर जगह बात निवाले की है। .. यकीनन रोटी से ज्यादा बड़ा सवाल और क्या हो सकता है ??
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Monday, August 9, 2010

फजीहत का गोल्ड मेडल

अर्थार्थ
हार पहनने से गला कटते सुना है आपने? ताज सजाने से कोई गंजा भी हो सकता है? चेहरा सजाने कोशिश हुलिया बिगाड़ दे तो ? यकीन नहीं होता तो जरा भारत के इतिहास के सबसे बड़े खेल आयोजन को देखिये , दुनिया के देश जिन आयोजनों की मेजबानी से साख और शान का जलवा दिखाते हैं भारत उन्हीं के कारण जलालत झेल रहा है। ओलंपिक, एशियाड और कॉमनवेल्थ के दर्जे वाले खेल आयोजन पूरे विश्व में हमेशा से फिजूलखर्ची, भ्रष्टाचार व घाटे से दागदार रहे हैं, फिर भी दुनिया के देश यह वजनदार घंटी गले में सिर्फ इसलिए बांधते हैं क्यों कि इससे उनकी शान का दिग-दिगंत में गूंज जाती है और भव्यता की चमक में दाग छिप जाते हैं। भारत ने भी इसी उम्मीद में कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी का ताज पहना था लेकिन अब पूरी दुनिया भारत के बुनियादी ढांचे, प्रबंधन, तकनीक और सुघड़ता की नहीं बल्कि भ्रष्टाचार, कुप्रबंध और विवादों की नुमाइश देख रही है। चमकने के चक्कर में भारत ने बमुश्किल बनी अंतरराष्ट्रीय साख का कबाड़ा कर लिया है, वह भी भारी निवेश के साथ।
सबसे दुर्लभ जीत
2008 के बीजिंग ओलंपिक के कुछ माह बाद खेल की दुनिया में जो सबसे बड़ी खबर आई थी वह पैसे की थी। बीजिंग ओलंपिक की आयोजन समिति ने बताया कि उसने 146 मिलियन डॉलर (करीब 674 करोड़ रुपये) का मुनाफा कमाया। ... खेल की दुनिया इस दुर्लभ तमगे पर हैरत में पड़ गई। चीन पर भरोसा मुश्किल था मगर अविश्वास का आधार भी नहीं था। चीन ने ओलंपिक व संबंधित 102 परियोजनाओं पर 2.6 बिलियन डॉलर (आधिकारिक आंकड़ा) खर्च किये थे और शोहरत व मुनाफा दोनों कमाया। ओलंपिक परिवार (एशियाड कॉमनवेल्थ आदि) के खेल आयोजनों की दुनिया में यह करिश्मा कम ही या यूं कहें कि शायद दूसरी बार हुआ था। ‘मैकोलंपिक’ (मैकडोनाल्ड प्रायोजित) के नाम से मशहूर 1984 के लास एंजेल्स खेल मुनाफा कमाने वाले पहले ओलंपिक थे। यह इस खेल में निजी कंपनियों का शायद पहला प्रवेश था और इसे आधुनिक ओलंपिक की शुरुआत का खिताब मिला। पिछले कॉमनवेल्थ (मेलबोर्न 2006) खेलों का भी बजट नहीं बिगड़ा था। अलबत्ता बीजिंग या लॉस एंजल्स अपवाद हैं और इनके रिकार्डों पर मजबूत संदेह भी हैं। नियम तो यह है कि बड़े खेल आयोजनों में मेजबान बुरी तरह हारते हैं। यह आयोजन उनकी जेब कायदे से तराश देते हैं।
तयशुदा हार
1976 का मांट्रियल ओलंपिक कनाडा के लिए वित्तीय आफत साबित हुआ थो, तो ग्रीस के ताजे संकट की जड़ें 2004 के एथेंस ओलंपिक की मेजबानी में तलाशी जा रही हैं। दरअसल बीजिंग जब ओलंपिक का ताज सजा रहा था तब मांट्रियल (1976), बार्सिलोना (1992), सिडनी (2000) और एथेंस (2004) ओलंपिक की मेजबानी के दौरान लिए गए कर्जों से (प्रो. जेफ्री जार्विन, तुलान यूनिवर्सिटी) जूझ रहे थे। कुछ हफ्तों के आयोजन पर भारी निवेश, ढेर सारी फिजूलखर्ची और बाद में घाटा इन खेल आयोजनों का शाश्वत सच है, तभी तो 2006 एशियाड के मेजबान कतर के अधिकारी खेलों से परोक्ष फायदों मसलन निवेश, विकास, रोजगार आदि की दुहाई देते हैं। क्यों कि किसी बड़े देश के सिर्फ एक शहर में भारी खर्च सरकारों को मुश्किल में डालता है। दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर भी यही तर्कहैं अलबत्ता आंकड़े इन तर्कों को सर के बल खड़ा करते हैं। बैंक ऑफ चाइना ने, बीजिंग खेलों से पहले एक शोध में जानकारी दी थी कि पिछले 60 साल में आयोजित 12 ओलंपिक में नौ के मेजबानों की अर्थव्यवस्थायें खेल मेले के बाद गोता खा गईं। कॉमनवेल्थ खेल, ओलंपिक व एशियाड से छोटे हैं लेकिन भारत के खजाने में यह बड़ा छेद करेंगे। ताजी मंदी के कारण 2012 के ओलंपिक की मेजबानी लंदन के गले में फंस गई है। दरअसल इन खेलों में मेजबान कभी नहीं जीतते। इसलिए ज्यादातर देश यह हार नहीं पहनते हैं और यह खेल कुछ बड़े मुल्कों के बीच घूमते रहते हैं।
और ढेर सारा गुबार
कलमाड़ी और उनकी टीम दागी खेल आयोजकों की विश्व परंपरा के भारतीय वारिस हैं। अकूत पैसा और अनंत भ्रष्टाचार ओलंपिक परिवार के खेलों की पहचान है। मेजबानी हासिल करने से लेकर आयोजन तक धतकरमों का रिकार्ड इन मेलों के साथ साथ चलता है। 2002 के शीतकालीन ओलंपिक की मेजबानी के लिए अमेरिका की साल्ट लेक खेलों को इस तरह दागदार किया कि ओलंपिक महासंघ को अपने कुछ सदस्यों को चलता करना पड़ा, मगर इसके बाद मेजबानी के लिए रिश्वतखोरी रवायत बन गई। सिडनी ओलंपिक के मेजबानों पर भी यही आरोप लगा। रुस से लेकर जापान तक और अमेरिका से चीन (ताजे बीजिंग ओलंपिक से पहले खुले मामले) तक बड़े खेल आयोजनों में भ्रष्टïाचार की दर्जनों कहानियां हैं। इसलिए ओलंपिक व कामनवेल्थ संघ इन दागों से डरने लगे हैं। अब उन्हें मेजबान तलाशने में मुश्किल होती है। खेलों का अपनी गणित है। जबर्दस्त लामबंदी के बावजूद, ब्राजील, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नाक के नीचे से 2014 का ओलंपिक उठा ले जाता है और ओबामा का गृह नगर शिकागो खिसियाकर रह जाता है।
फिर भी इकरार

पैसे की बर्बादी और भ्रष्टïाचार की मान्य परंपराओं के बावजूद दुनिया के देश के इन खेलों को सिर्फ इसलिए लाते हैं ताकि उनका कॉलर ऊंचा हो सके और दुनिया मेजबान मुल्क का बुनियादी ढांचा, भव्य प्रबंधन, चमकदार वर्तमान और भविष्य की उम्मीदें देख सके। चीन दो साल में दूसरे बड़े (गुआंगजू एशियाड इसी नवंबर में) खेल की मेजबानी करेगा। इन खेलों से हमें दुनिया को यह बताना था भारत शानदार बुनियादी ढांचा बनाता है। तकनीक के हम सूरमा हैं और एक महाशक्ति भव्य आयोजन कर सकती है। यानी केवल साख की सजावट बस? मगर आयोजकों की कृपा से इन खेलों में अपना चेहरा देखकर हम अब लज्जित हैं।
विश्व की खेल प्रबंध कंपनियों के बीच सबसे ताजा मजाक यह है कि अब भारत को ओलंपिक की मेजबानी दिलवायी जा सकती है क्यों कि यहां आप किसी भी कीमत पर कुछ भी बेच सकते हैं, आखिर ऐसे दिलफेंक मेजबान कहां मिलेंगे?? दरअसल शान को शर्मिंदगी में बदलना अगर कोई कला है तो दिल्ली खेलों के आयोजक इसका स्कूल खोल सकते हैं। भारत ट्रैक एंड फील्ड खेलों में कभी कोई ताकत नहीं रहा। हमारे लिए तो यह महंगा खेल छवि प्रबंधन यानी शान और शोहरत का तमगा हासिल करने कोशिश भर था। मगर भारत ने तो कॉमनवेल्थ खेलों से पहले ही एक गोल्ड मेडल जीत लिया है ... फजीहत का गोल्ड मेडल !!!!
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Monday, August 2, 2010

मेहरबानी आपकी !

अर्थार्थ
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दस फीसदी की धार से छीलती महंगाई, महंगा होता कर्ज, अस्थिर खेती, सुस्त निवेश, चरमराता बुनियादी ढांचा और सौ जोखिम भरी वित्तीय दुनिया!!!! फिर भी अर्थव्यवस्था में आठ फीसदी से ऊपर की कुलांचें? ..कुछ भी तो माफिक नहीं है, मगर गाड़ी बेधड़क दौड़े चली जा रही है। किसे श्रेय देंगे आप इस करिश्मे का? ..कहीं दूर मत जाइए, अपना हाथ पीछे ले जाकर अपनी पीठ थपथपाइए!! यह सब आपकी मेहरबानी है। आप यानी भारतीय उपभोक्ता देश की अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया में सबसे पहले मंदी के गर्त से बाहर खींच लाए हैं। दाद देनी होगी हिम्मत की कि इतनी महंगाई के बावजूद हम खर्च कर रहे हैं और उद्योग चहक रहे हैं। यह बात दीगर है कि इस वीरता की कीमत कहीं और वसूल हो रही है। कमाई, उत्पादन और खर्च तीनों बढ़े हैं, लेकिन आम लोगों की बचत में वृद्धि पिछले तीन-चार साल से थम सी गई है। दरअसल खर्च नही, बल्कि शायद आपकी बचत महंगाई का शिकार बनी है।
खर्च का जादू
मंदी से दूभर दुनिया में भारत की अर्थव्यवस्था इतनी जल्दी पटरी पर लौटना हैरतअंगेज है। मांग का यह मौसम कौन लाया है? भारत तो चीन की तरह कोई बड़ा निर्यातक भी नहीं है। यहां तो निर्यात हमेशा से नकारात्मक अर्थात आयात से कम रहा है। दरअसल बाजार में ताजी मांग खालिस स्वदेशी है। माहौल बदलते ही भारत के उपभोक्ताओं ने अपने बटुए व क्रेडिट कार्ड निकाल लिये और आर्थिक विकास दर थिरकने लगी। इस साल जनवरी से मार्च के दौरान भारत में उपभोग फिर 4 से 4.5 फीसदी की गति दिखाने लगा है। खासतौर पर निजी उपभोग खर्च तो मार्च में 10.4 फीसदी पर आ गया है। इसी के बूते रिजर्व बैंक नौ फीसदी की आर्थिक विकास दर की उम्मीद बांध रहा है। करीब 36 फीसदी निर्धन आबादी के बावजूद भारत का 55-60 करोड़ आबादी वाला मध्य वर्ग इतना खर्च कर रहा है कि अर्थव्यवस्था आराम से दौड़ जाए। भारत के बाजार में 60 फीसदी मांग अब विशुद्ध रूप से खपत से निकलती है। पिछले कुछ वर्षो में आय व खर्च में वृद्धि तकरीबन बराबर हो गई है। बल्कि आर्थिक सर्वेक्षण तो बताता है कि हाल की मंदी से पहले के वर्ष (2008-09) में तो प्रति व्यक्ति खर्च, प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि से ज्यादा तेज दौड़ रहा था। अर्थातलोगों ने कर्ज के सहारे खर्च किया। वह दौर भी भारत में उपभोक्ता कर्जो में रिकार्ड वृद्घि का था। मैकेंजी ने एक ताजा अध्ययन में माना है कि अगले एक दशक में भारत का निजी उपभोग खर्च 1500 बिलियन डॉलर तक हो जाएगा। अर्थात खर्च का जादू जारी रहेगा।
खर्च से खुशहाल
पिछले कुछ महीनों के दौरान आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े दिलचस्प सूचनाएं बांट रहे हैं। भारत में उपभोक्ता उत्पादों के उत्पादन की वृद्धि दर जनवरी के तीन फीसदी से बढ़कर अप्रैल में 14.3 फीसदी हो गई। इसमें भी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स यानी तमाम तरह के इलेक्ट्रानिक सामान आदि का उत्पादन 37 फीसदी की अचंभित करने वाली गति दिखा रहा है और सबूत दे रहा है कि बाजार में नई ग्राहकी आ पहुंची है। भारत में उपभोक्ता खर्च के कुछ हालिया (आर्थिक समीक्षा 2009-10) आंकड़े प्रमाण हैं कि उद्योग क्यों झूम रहे हैं। उपभोक्ताओं के कुल खर्च में परिवहन व संचार पर खर्च का हिस्सा पिछले कुछ वर्षो में 20 फीसदी पर पहुंच गया है। इसे आप सीधे आटोमोबाइल व संचार कंपनियों के यहां चल रहे त्यौहार से जोड़ सकते हैं। यात्रा करने पर खर्च बढ़ने की रफ्तार बीते चार वर्षो में पांच फीसदी से बढ़कर 12.3 फीसदी हो गई है। आटोमोबाइल बढ़ा तो ईधन पर खर्च भी उछल गया। मनोरंजन, चिकित्सा, शिक्षा और यहां तक कि फर्निशिंग जैसे उद्योग उपभोक्ताओं की कृपा से बाग-बाग हुए जा रहे हैं। खाने पर खर्च की वृद्धि दर घट गई है। मार्च में कुल निजी उपभोग खर्च 35.71 लाख करोड़ रुपये रहा है, लेकिन यह भारत मंं उपभोक्ता खर्च की आधी तस्वीर है। भारत के उपभोक्ताओं का बहुत बड़ा खर्च असंगठित खुदरा बाजार में होता है। देश के पूर्व सांख्यिकी प्रमुख प्रनब सेन ने हाल में कहा था कि देश के कुल कारोबार में संगठित खुदरा कारोबार का हिस्सा पांच-छह फीसदी ही है, इसलिए भारत में खपत को सही तरह से आंकना मुश्किल है।
खर्च का शिकार
भयानक महंगाई और फिर भी बढ़ता खर्च? ..उलटबांसी ही तो है, क्योंकि महंगाई तो खर्च को सिकोड़ देती है। भारत में इस संदर्भ में पूरा परिदृश्य बड़ा रोचक है। यहां महंगाई ने खर्च को नहीं बचत को सिकोड़ा है। भारत में उपभोक्तावाद का ताजा दौर 2004-05 के बाद शुरू हुआ था, जब अर्थव्यवस्था ने आठ-नौ फीसदी की रफ्तार दिखाई। उस समय महंगाई की दर चार फीसदी के आसपास थी। आय बढ़ी, बाजार बढ़ा, सस्ते कर्ज मिले तो उपभोक्ताओं ने बिंदास खर्च किया। आय व खर्च का स्वर्ण युग 2008-09 के अंत तक चला। इसी वक्त महंगाई और मंदी ने अपने नख दंत दिखाए, जिससे खपत कुछ धीमी पड़ गई, लेकिन शॉपिंग की नई संस्कृति तो तब तक जम चुकी थी। इसलिए जैसे ही छठवें वेतन आयोग का तोहफा मिला, सरकारी कर्मचारी झोला उठाकर बाजार में पहुंच गए। हालात सुधरते ही बढ़े वेतन के साथ निजी नौकरियों वाले भी शॉपिंग लिस्ट लेकर निकल पड़े। महंगाई ने खर्च के उत्साह को यकीनन तोड़ा है, लेकिन खर्च को नहीं। खर्च के इस मौसम में कुर्बान तो हुई है बचत। उपभोक्तावाद की ऋतु के आने के बाद से आम लोगों की बचत पिछले पांच साल से औसत 22-23 फीसदी (जीडीपी के अनुपात में) पर स्थिर है। वित्तीय बचत भी अर्से से 10-11 फीसदी पर घूम रही है।
इस गफलत में रहने की जरूरत नहीं कि महंगाई असर नहीं करती। महंगाई कम और कमजोर आय वालों का खर्च चाट गई तो मध्यम आय वर्ग की बचत उसके पेट में गई है। अलबत्ता खर्च का त्यौहार जारी है और इसलिए तमाम बाधाओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मंदी की बाजी सबसे पहले पलट दी है। चीन की कामयाबी भारी निर्यात और निवेश से निकली है, मगर भारत खपत व उपभोग की गौरव गाथा लिख रहा है, नया निवेश भी इसी उपभोग का दामन पकड़ कर आ रहा है। ..सरकार तो उपभोक्ताओं को सलाम करने से रही, लेकिन कम से कम आप तो खुद को शाबासी दे ही लीजिए.. महंगाई से जूझते हुए आपने सचमुच करिश्मा किया है।
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Monday, July 26, 2010

इंस्‍पेक्‍टर राज इंटरनेशनल !

अर्थार्थ
मौसम अचानक बिल्कुल बदल गया है। वित्तीय कारोबार पर कड़े नियमों की धुआंधार बारिश होने वाली है। पूंजी बाजारों में बेलौस और बेपरवाह वानर लीला कर रहे वित्तीय कारोबारियों पर कठोर पहरे की तैयारी हो गई है। बैंक, इन्वेस्टमेंट बैंक, हेज फंड, बांड फंड, म्यूचुअल फंड व इस जाति के सभी प्रतिनिधियों को सख्त पहरे में सांस लेनी होगी। अमेरिका में ताजा पीढ़ी के सबसे कठोर वित्तीय नियमन कानून को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने दस्तखत से नवाज दिया है। वित्तीय कारोबार पर एक समग्र यूरोपीय सख्ती के लिए यूरोप की सरकारें भी बीते सप्ताह ब्रुसेल्स में सहमत हो चुकी हैं। यूरोप के नामी 91 बैंकों को एक अभूतपूर्व परीक्षा, स्ट्रेस टेस्ट से गुजार कर उनकी कुव्वत परख ली गई है। भारत में नियामकों का नियामक यानी सुपर रेगुलेटर (बजट में घोषित आर्थिक स्थायित्व व विकास परिषद) आने को तैयार है। आपस में झगड़ते भारत के वित्तीय नियामक इसकी राह आसान कर रहे हैं। हर तरफ एक नया इंस्पेक्टर राज तैयार हो रहा है। नौकरशाह नियामकों की फौज हर जगह वित्तीय बाजार व इसके खिलाडि़यों की आठों पहर निगरानी करेगी।
..और फ्यूनरल प्लान भी
आपके अंतिम संस्कार का प्लान क्या है? सवाल बेहूदा हो सकता है, लेकिन ताजा कानून के तहत अमेरिका के वित्तीय कारोबारियों को इसका जवाब देना होगा। बैंकों व वित्तीय कंपनियों से पूछा जाएगा कि यदि संकट में फंस कर बर्बाद हुए तो वे अपनी दुकान किस तरह बंद करना चाहेंगे? 1930 के बाद अमेरिका में वित्तीय कानूनों में सबसे बड़ा बदलाव हो गया है। वॉलस्ट्रीट पर शिकंजा कसने वाला डॉड-फ्रैंक बिल तमाम दहलीजें पार करते हुए बीते सप्ताह लागू हो गया। 2300 पेज का यह भीमकाय कानून अपनी सख्ती और पाबंदियों के लिए दुनिया में नजीर बनेगा। अमेरिका के लोग एफएसओसी, फिनरेग और वोल्कर रूल जैसे नए शब्द सीख रहे हैं। एफएसओसी बोले तो.. फाइनेंशियल स्टेबिलिटी ओवरसाइट काउंसिल। एक सुपर रेगुलेटर यानी सबसे बड़ा नियामक। यह काउंसिल वित्तीय तंत्र के लिए जोखिम बनने वाली कंपनियों की लगातार पहचान करेगी। मतलब यह कि एफसीओसी ने जिसे घूरा उसका काम पूरा। बेफिक्र और मस्तमौला हेज फंड हों या निवेश बैंक सबके लिए कानून में कड़ी शर्ते हैं। बैंकों को जमा के बीमा पर ज्यादा रकम लगानी होगी ताकि अगर बैंक डूबें तो जमाकर्ता भी न डूब जाएं। वोल्कर रूल तय करेगा कि बैंक कौन से कारोबार और कहां निवेश न करें। 615 ट्रिलियन डॉलर के डेरिवेटिव्स कारोबार को पहली बार लगाम का स्वाद मिलेगा। क्रेडिट रेटिंग, बीमा, ब्रोकर, मॉरगेज, निवेशक आदि सब इस कानून के दायरे में हैं। सबसे अहम यह है कि अमेरिका की सरकार डूबने वाले एआईजी (बीमा कंपनी जिसे अमेरिकी सरकार ने उबारा था) जैसों का पाप अपने सर नहीं लेगी। हर कंपनी अपने अंतिम संस्कार की योजना पहले घोषित करेगी ताकि अगर वह बर्बाद हो तो उसे शांति से विदा किया जा सके। इस कानून पर हस्ताक्षर करते हुए तालियों की गूंज के बीच ओबामा ने कहा अब अमेरिका की जनता वॉलस्ट्रीट की गलतियों का बिल नहीं चुकाएगी। उदारता से पूरी दुनिया को ईर्ष्‍या से भर देने वाला अमेरिकी बाजार अब सख्ती का आदर्श बनेगा।
बैंकों की अग्निपरीक्षा

27 देश, 91 बैंक और एक परीक्षा!! बेचैनी, रोमांच, असमंजस! इस 23 जुलाई को पूरी दुनिया के वित्तीय बाजारों में समय मानो ठहर सा गया था। यूरोप के बैंक स्ट्रेस टेस्ट से गुजर रहे थे, यह साबित करने के लिए अगर संकट आया तो कौन सा बैंक बचेगा और कौन निबट जाएगा? पैमाना गोपनीय था अलबत्ता परीक्षा मोटे तौर पर कर्ज का बोझ, जोखिम भरे निवेश का हिसाब-किताब और पूंजी की स्थिति आदि के आधार पर ही हुई। शुक्रवार की रात भारत में जब लोग सोने की तैयारी कर रहे, तब इस परीक्षा का रिजल्ट आया। यूरोप के सात बैंक फेल हो गए। पांच स्पेन के और एक-एक जर्मनी व ग्रीस का। इन्हें अब अपनी सेहत सुधारने के लिए 3.5 बिलियन यूरो जुटाने होंगे, जो आसान नहीं है। फेल का रिपोर्ट कार्ड लेकर निकलने वाले इन बैंकों के साथ वित्तीय बाजार नरमी नहीं बरतेगा। मगर जो बैंक इस आग के दरिया से निकल आए हैं, उनके स्वागत के लिए एक नया सख्त समग्र यूरोपीय नियामक तैयार है। यूरोपीय समुदाय नया वित्तीय दो स्तरीय नियामक ढांचा बना रहा है। वित्तीय बाजार पर दैनिक नियंत्रण देशों के पास होगा, लेकिन व्यापक नियंत्रण एक बड़े यूरोपीय नियामक के हाथ में रहेगा। बैंकों के लिए अभी कई और स्ट्रेस टेस्ट तैयार हो रहे हैं।
नियामकों का नियामक

अमेरिका की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी ओवरसाइट काउंसिल, यूरोप की पैन यूरोपियन अथॉरिटी या फिर भारत की प्रस्तावित आर्थिक स्थायित्व व विकास परिषद आदि सब उसी सुपर रेगुलेटर के अलग-अलग नाम रूप हैं, जो अब आ ही पहुंचा है। दरअसल वित्तीय दुनिया में कई नियामक हैं, सो खूब गफलत भी है। अमेरिका में डेरिवेटिव और हेज फंड को लेकर नियामक ठीक उसी तरह उलझते रहे हैं, जैसे कि यूलिप को लेकर भारत में इरडा और सेबी लड़ रहे हैं। घोटालेबाज इस भ्रम पर खेलते हैं। भारत संकट से बाल-बाल बच गया, लेकिन नसीहत के तौर पर सुपर रेगुलेटर न होने की गलती जल्द ही दूर की जा रही है। दरअसल तीसरी दुनिया के लिए सिर्फ नियम कानून चाक चौबंद करने की ही झंझट नहीं है, उन्हें एक और झटके से निबटना होगा। फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि वित्तीय निवेशक इस नए कानूनी माहौल के बाद कैसा व्यवहार करेंगे, लेकिन जब निवेश की आजादी पर दर्जनों पहरे होंगे तो निवेश की आदत में कुछ फर्क तो आएगा ही। ..उभरते बाजारों को इस असर से निबटने की तैयारी भी करनी होगी।
भारत जैसी अधखुली अर्थव्यवस्थाएं तो बचे-खुचे इंस्पेक्टर राज के विदा होने की मन्नत मांग रहीं थीं, मगर यहां तो इंस्पेक्टर राज ताजा अंतरराष्ट्रीय अवतार में वापस लौट आया है। अमेरिका, यूरोप व एशिया के वित्तीय बाजारों की लगाम नए किस्म की ब्यूरोक्रेसी के हाथ आने जा रही है। बाजार के खिलाडि़यों को वित्तीय नौकरशाह या नियामक नौकरशाहों की एक नई पीढ़ी के नाज-नखरे उठाने होंगे। वित्तीय बाजार आजादी पाकर बौरा गया था अब उसे पाबंदियों की पांत में चलना होगा। ..बस एक चूक और पुर्नमूषकोभव !!

Monday, July 19, 2010

पूंजी बदले पैंतरा

अर्थार्थ
क्या खरीदना चाहेंगे आप.?? ब्रिटेन की हाई स्पीड यूरोपियन रेल सेवा या ग्रीस के कैसिनो, जापान की डाक सेवा (दुनिया की सबसे बड़े बचत बैंक की मालिक) या फ्रांस व जर्मनी में सरकारी जमीन-मकान अथवा पोलैंड की सरकारी टकसाल और फोन कंपनी में हिस्सेदारी।... दमघोंट घाटे से घिरे यूरोप और जापान ने दुनिया में एक से नायाब सरकारी संपत्तियों का बाजार सजा दिया है। सरकारों के रत्‍‌न ( कंपनियां व प्रतिष्ठान) ग्राहकों के इंतजार में वित्तीय बाजारों के शो केस में बिठा दिये गए हैं। ..घाटा जो न कराये सो थोड़ा !!!. कर्ज पाटने और घाटा काटने के लिए सरकारी संपत्तियों की बिक्त्री तो तीसरी दुनिया का सहारा थी मगर अब तो बड़े बड़े इस बाजार में आवाज लगा रहे हैं। यह भारत के लिए फिक्त्रमंद होने मौका है। दुनिया भर के सरकारी रत्‍‌नों के इस व्यापार मेले में उसके जवाहर लालों ( सार्वजनिक उपक्त्रम विनिवेश) को कितने ग्राहक मिलेंगे? दरअसल विदेशी पूंजी अब पैंतरे बदल रही है। विदेशी निवेशकों को उनके अपने वतन बुला रहे हैं। संकट में घिरे यूरोप और अमेरिका अपने निजी क्षेत्र को उनका क‌र्त्तव्य याद दिला रहे हैं। इन कंपनियों का राष्ट्रप्रेम तीसरी दुनिया को परेशान कर सकता है। यानी कि भारत को अब विदेशी पूंजी की चिंता करनी चाहिए। उस कायर पूंजी की नहीं जो शेयर बाजार में संकट आते ही उड़ जाती है बल्कि उस विदेशी निवेश की जो अर्थव्यवस्था की जड़ों में उतर कर देश का हिस्सा हो जाता है।
सरकारों का बाजार
दुनिया के इस सबसे खास बाजार में आपका स्वागत है। इसे सरकारों के घाटे ने तैयार किया है। 232 बिलियन डॉलर के रिकार्ड घाटे से परेशान, ब्रिटेन, यहां मशहूर यूरोपियन हाई स्पीड ट्रेन सेवा बेचने (1.5 बिलियन डॉलर का जुगाड़ संभव) के लिए खड़ा है। यह ट्रेन इंग्लिश चैनल के समुद्र के नीचे से गुजरती है। ब्रितानी आकाश में विमानों की निगहबान, नेशनल एयर ट्रैफिक सर्विसेज (नैट्स) का निजीकरण हो रहा है। डाक कंपनी रॉयल मेल में भी सरकारी हिस्सेदारी बिक रही है। ब्रिटेन ने इस बिक्त्री अभियान से एक दशक में करीब 53 बिलियन डॉलर जुटाने का मीजान लगाया है। ग्रीस 3.7 बिलियन डॉलर जुटाने के लिए कई सरकारी रत्‍‌न बेचने निकल पड़ा है। शिपिंग के स्वर्ग इस मुल्क में कई बंदरगाह, रेलवे, हवाई अड्डे, डाक सेवा और एथेंस में पेयजल की आपूर्ति करने वाले प्रतिष्ठान तक, आंशिक या पूर्ण निजीकरण के लिए ग्राहक तलाश रहे हैं। कतर जैसे अमीर अरब मुल्क ग्रीस के नेशनल बैंक में हिस्सेदारी लेने की कोशिश में हैं। ग्रीस के मशहूर कैसिनो भी इस बाजार में सजे हैं। पूर्वी यूरोप में पौलेंड की सरकार दस बिलियन डॉलर के जुगाड़ के लिए अपनी टकसाल (मेनिका पोलस्का), बीमा, रसायन व फोन कंपनियों हिस्सेदारी बेच रही है। घाटा घटाने के लिए जर्मनी की सरकारी संपत्ति बिक्त्री कंपनी 'बीमा' करीब 3.4 बिलियन यूरो की संपत्तियां बेचने को तैयार है तो फ्रांस अपने छह फीसदी सरकारी भवन बेच डालेगा। घाटे में घिरी जापानी सरकार ,जापान पोस्ट का हिस्सा बेचने को तैयार है। डाक सेवा चलाने वाली यह कंपनी निवेशकों के 117 ट्रिलियन येन संभालती है। दुनिया का यह सबसे बड़ा बचत बैंक, जापान सरकार के बांडों में सबसे बड़ा निवेशक भी है। .. अर्थात सभी को मोटी जेब वाले कुछ निजी ग्राहकों का इंतजार है।
बांटने वालों की मुश्किल
यूरोप व अमेरिका में निजी क्षेत्र से ऐसी उम्मीदें कम दिखती हैं। इन क्षेत्रों में नए निवेश के स्त्रोत बाकी दुनिया से फर्क रहे हैं। बुनियादी ढांचा बनाने का जिम्मा आमतौर पर सरकारों का है। इनके संसाधनों की नदी अरबों खरबों के बांड बाजार से निकलती है। स्थांनीय निकाय और रेलवे, पेयजल, बिजली, कचरा प्रबंधन आदि से जुड़ी सरकारी कंपनियां बांड बाजार से पैसा उठा कर शहरों व देशों को रहने लायक बनाती हैं। इनके बांडों पर मिलने वाली कर छूट निवेशकों को आकर्षित करती है। मगर ताजे संकट ने सब बदल दिया। 2.7 ट्रिलियन डॉलर का अमेरिकी स्टेट व म्युशनिसिपल बांड बाजार ढह गया है। इस बाजार में कैलीफोर्निया को 'अमेरिका का ग्रीस' कह रहे हैं। जाहिर है जब देशों की साख कचरा हो रही हो तो स्थानीय निकायों के बांड कौन खरीदे। अमेरिका में पिछले छह माह में 1.5 बिलियन डॉलर के म्युनिसिपिल बांड डिफाल्ट हो चुके हैं। नतीजतन सरकारी संपत्तियां खरीदने व निवेश के लिए निजी क्षेत्र की टेर लग रही है। ब्रिटेन के नए वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबोर्न ने कहते हैं कि सरकारी खर्च घट रहा है, निजी क्षेत्र को अब आर्थिक विकास का इंजन संभालना होगा।
उलटी धार निवेश की
मंदी और संकट का विस्फोट दुनिया में निवेश की धारा उलट सकता है। जो मुल्क आज परेशान हैं उन्हीं की कंपनियां तीसरी दुनिया के देशों में निवेश उड़ेल रही थीं। अब इनके संसाधन इनके अपने ही देश में ही रुकने का खतरा है। स्वतंत्र आकलनों के मुताबिक अगले कुछ वषरें में दुनिया में 132 बिलियन डॉलर तक की सरकारी संपत्तियां बिकेंगी। इस नक्कारखाने में भारत के सार्वजनिक उपक्त्रम विनिवेश की तूती मुश्किल से ही सुनाई देगी। विदेशी निवेश के लिए बाजार को खोलना अमेरिका की सबसे ताजी बहस है। अमेरिका की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में विदेशी कंपनियां बिरले ही निवेश करती हैं। लेकिन संसाधनों की किल्लत पुराने नियम बदल रही है। अब अगर कैलीफोर्निया या लुइजियाना अथवा एथेंस या मानचेस्टर में निवेश के मौके निकले तो उत्तर प्रदेश अथवा पटना, जयपुर को कौन पूछेगा? आउटसोर्सिंग या कंपनियों के अधिग्रहण को लेकर हाल के प्रसंग गवाह है कि पश्चिम की सरकारें गजब की संरंक्षणवादी हैं, वह कर रियायतों से लेकर तमाम नियमों के जरिये निजी निवेश को अपने देश में रोकने की कुव्वत रखती हैं। कई झंझावातों के बाद जब भारत ने जब निवेशकों का भरोसा हासिल किया तो निवेश की हवायें ही बदलने लगीं हैं।
भारत की उलझन बड़ी दिलचस्प है। उभरती अर्थव्यवस्था से आकर्षित होकर निवेशकों के झुंड शेयर बाजारों में उतर रहे हैं। मगर यह डरपोक निवेश है, जो जरा से संकट पर बोरिया बिस्तर समेट लेता है। देश को वह विदेशी पूंजी चाहिए जो तकनीक, रोजगार व उत्पादन लेकर आए। सरकारी लक्ष्यों के मुताबिक 2012 तक देश को हर साल ऐसे 50 बिलियन डॉलर चाहिए, जो यहां की आर्थिक जमीन में उतर जाएं। अलबत्ता अच्छे वषरें में भी इस किस्म की विदेशी पूंजी 25-26 बिलियन डॉलर से ऊपर नहीं गई है। अब जबकि निवेश के उद्गम क्षेत्रों के इर्दगिर्द ही सूखा पड़ा है तो पूंजी की धारायें की भारत जैसे दूरदराज के इलाकों तक मुश्किल से ही पहुंचेंगी। हैरत नहीं कि दुनिया के अन्यं इलाकों से भी निवेशक यूरोप अमेरिका का रुख कर लें क्यों कि वहां के बाजारों में भारत जैसे रोड़े नहीं हैं। ..भारत को अब विदेशी निवेश के संभावित सूखे से निबटने के लिए तैयारी शुरु कर देनी चाहिए।
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Monday, July 12, 2010

घट-घट में घाटा

अर्थार्थ
छि:
! इतना घाटा! ..संभालो नहीं तो बीमार हो जाओगे। बजट घाटा बड़ा महंगा पड़ता है। ..टोरंटो की जी 20 बैठक में दुनिया के बड़ों को कुछ इस अंदाज में नसीहत दे रहे थे भारतीय प्रधानमंत्री। यह दरअसल उन उलाहनों या झिड़कियों की सूद समेत वापसी थी, जो घाटे को लेकर अगड़े देशों ने पिछले दशक में कई बार भारत को दी हैं, लेकिन तब भारत इस मर्ज के चुनिंदा मरीजों में एक था। ताजा दौर तो बिलकुल अलग है। सरकारों के घाटे अब सर्वव्यापी हैं। क्या बड़ा क्या छोटा, क्या अगड़ा और क्या पिछड़ा.. हर नामचीन देश की सरकार खाली खजानों और बदसूरत बजट को लेकर हलकान है। अमेरिका के स्थानीय निकाय घाटे को घटाने के लिए पुलिस जैसी जरूरी सेवाएं भी रोकने लगे हैं। यूरोप में सरकारें पेंशन काटकर अपनी बुढ़ाती आबादी से कुर्बानी मांग रही हैं। पहाड़ जैसे घाटे से डरा जापान सरकारी कर्ज की सीमा बांध रहा है। अगर सिर्फ सरकारों के बजट घाटे के आधार पर दुनिया का कोई नक्शा बनाया जाए तो हर महाद्वीप के हर दिग्गज देश के खजाने पर घाटे का लाल झंडा टंगा दिखेगा। ..राजकोषीय घाटे का यह साम्यवाद अभूतपूर्व है। अब इस हमाम में कौन किससे लजाए और कौन किसको चादर ओढ़ाए?
तीन साल में यह हाल
भारत जैसों को जाने दीजिए, यहां तो बजट घाटे वित्तीय संस्कृति का हिस्सा हैं मगर यूरोप व अमेरिका तो चुस्त राजकोषीय प्रबंधन की नजीर थे। किसी को भी यह जानकार हैरत होगी कि 2007 में विकसित मुल्कों का औसत घाटा जीडीपी के अनुपात में केवल 1.1 फीसदी था, मगर 2010 में यह 8.4 फीसदी हो गया। 2007 में विकसित मुल्कों की सरकारें जीडीपी के अनुपात में 73 फीसदी का औसत कर्ज दिखा रही थीं। अब यह इनके कुल जीडीपी से ज्यादा (सौ फीसदी से ऊपर) हो गया है। सिर्फ तीन साल की आर्थिक समस्याओं के फेर में इनके पूरे वित्तीय प्रबंधन का कचूमर निकल गया। इससे यह सिद्ध हुआ है कि इन मुल्कों का ढांचा कितने नाजुक तारों से बंधा था। इनके बजट अर्थव्यवस्थाओं को नए खर्च की थोड़ी सी खुराक देने में कंगाल हो गए। बची खुची कसर मंदी के कारण कमाई में कमी ने पूरी कर दी। दुनिया में मुस्कराती इठलाती अर्थव्यवस्थाएं सिर्फ 36 माह के भीतर घाटे में गले तक धंस गई हैं।
डॉलर वालों की ढाल
अमेरिका में दक्षिण कैलिफोर्निया का शहर मेवुड अपनी पुलिस फोर्स बंद कर रहा है। अधिकांश सरकारी कर्मचारी नौकरी गंवा चुके हैं। मेवुड अमेरिका के भीतर घाटे की भयानक हालत का उदाहरण है। हालांकि बाहर की दुनिया के लिए अमेरिका के पास अनोखी ढाल है। दरअसल घाटे व कर्ज के जिस स्तर पर ग्रीस डूबा है या यूरोप में हाय तौबा मची है, उससे कहीं ज्यादा फटी जेब के साथ अमेरिका मुस्करा सकता है क्योंकि उसके पास डॉलर है। यानी दुनिया के वित्तीय तंत्र की केंद्रीय मुद्रा। यूरो ढहने लगा तो अमेरिका के घाटे को बिसरा कर दुनिया डॉलर समेटने लगी। हर मुल्क का विदेशी मुद्रा खजाना डॉलर में है। इसलिए कमजोर वित्तीय हालत के बावजूद अमेरिका के बांड बिक जाते हैं। यानी कि डॉलर के सहारे अमेरिका घाटे को घटाने की गति धीमी रख सकता है और जीडीपी की तुलना में 100 फीसदी से ज्यादा कर्ज लेकर भी खड़ा रह सकता है। .. लेकिन नतीजा निकालने से पहले जरा ठहरिए। डॉलर का यह सहारा अमेरिका के भीतर किसी काम का नहीं है। अमेरिकी राज्यों का संयुक्त घाटा अगले साल 112 बिलियन डॉलर हो जाएगा। कर्ज में डूबे स्थानीय निकाय पुलिस, शिक्षा, अस्पताल जैसी जरूरी सेवाओं पर खर्च रोकने लगे हैं। अमेरिकी व्यवस्था में स्थानीय निकायों पर बहुत कुछ निर्भर है। उनका संकट आम लोगों पर भारी पड़ने लगा है। म्युनिसिपल बांड मार्केट ध्वस्त है यानी स्थानीय निकायों के लिए पूंजी का स्रोत बंद है। नतीजतन अमेरिका में सड़क, पुल, पार्किग आदि में विदेशी निवेश खोलने की बहस शुरू हो गई है। अमेरिका के लिए यह अनोखी स्थिति है। डॉलर की अम्मा भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खैर मना ले, लेकिन देश के भीतर तो घाटा नाक तक आ गया है।
यूरो वालों का कौन पुरसाहाल
यूरोपीय देशों के खजाने पूरी दुनिया की मुश्किल हैं। उनके पास तो डॉलर जैसा, खोखला ही सही, सहारा भी नहीं है। यूरोप का घाटा यहां के देशों व इनकी मुद्रा अर्थात यूरो दोनों को डुबा रहा है। मगर यूरो से दूरी बनाने वाले ब्रिटेन जैसे भी कम संकट में नहीं हैं। ब्रिटेन की नई सरकार का बजट वहां के लोगों पर आफत बन कर टूटा। घाटा जीडीपी का 10.1 फीसदी है। वित्त मंत्री ऑसबोर्न जब सालाना 44 बिलियन डॉलर का खर्च घटाएंगे, तब भी घाटे की बाढ़ उतरने में पांच साल लग जाएंगे। जीडीपी के अनुपात में करीब 80 फीसदी कर्ज के साथ ब्रिटेन सबसे ज्यादा खतरे में है। ग्रीस, स्पेन, हंगरी, इटली, पुर्तगाल, जर्मनी, आयरलैंड सबके सब भारत वाली बीमारी के बड़े मरीज हैं। यहां घाटों को ठीक करने के दो मॉडल काम कर रहे हैं। जिनकी रीढ़ कुछ मजबूत है वह देश खर्च घटा रहे हैं और जो बुरी तरह बदहाल हैं वह भारी टैक्स लगा रहे हैं।
मंदी की शुरुआत से पहले तक दुनिया के नीति निर्माताओं ने लगभग एक दशक का बसंत देखा था, यानी भरे हुए खजाने, नियंत्रण में घाटे, दिल खोलकर कर्ज देता बाजार आदि। मगर एक वित्तीय संकट व छोटी सी मंदी ने बाजी पलट दी और बजटीय घाटों ने सबको धर दबोचा। सरकारों को घाटे से बचाने या उबारने की इस भूमंडलीय बीमारी का कोई टीका नहीं है यानी कि हर देश को अपना फटा खुद अपनी तरह से सीना है। इस सूरत में कोई नहीं जानता कि किसका रफू कितना लंबा चलेगा। मसलन जापान ने कर्ज की सीमा तय की है। अलबत्ता सरकार मानती है कि घाटा कम होते-होते पांच साल लग जाएंगे। दुनिया के ज्यादातर देशों के घाटा नियंत्रण कार्यक्रम पांच-छह साल बाद ही नतीजे देंगे, क्योंकि घाटे ही इतने बड़े हैं, और वह भी तब जब कि कोई नया संकट न आ धमके।
दुनिया भर के हाकिम अब अपनी तलवारें बांधकर घाटे से जंग के लिए मैदान में कूद पड़े हैं। इस अभूतपूर्व समस्या के इलाज के लिए हर पैंतरा इस्तेमाल में है। मगर नतीजों को लेकर असमंजस है। बस पूरी दुनिया इस बात पर आश्वस्त है कि बजट के गड्ढों को भरने में मंदी से उबरने की उम्मीद काम आ जाएगी। यानी किघाटे का कचरा साफ होने तक दुनिया की आर्थिक मशीन खिच-खिच करते हुए ही चलेगी। मोटी बात यह कि टैक्स बढ़ेगा कमाई नहीं और खर्च घटेगा महंगाई नहीं। ..यह बात ठीक है कि घाटा काटने वाली तलवारें अंतत: आम लोगों की जेब पर ही चलती हैं, लेकिन सरकारें यह तलवारें हमारे भले के लिए ही तो उठाती हैं? है न?
हाकिम की तलवार मुकद्दस होती है।
हाकिम की तलवार के बारे मत लिक्खो।
(अहमद फराज)
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Thursday, July 8, 2010

चीन को 'यलोकेक' मांगता !!

चाईनीज चेकर (An Artharth E-xclusive)
फ्रांस हार गया !!.... बात फीफा वर्ल्‍ड कप की नहीं है। .. वह तो मैदान का खेल है। हम उस खेल की बात कर रहे हैं‍ जिसमें आज जीतने वाला एक दशक बाद सिकंदर होगा। जंग है दुनिया की सबसे अहम पीली धातु हथियाने की ! .... बिल्‍कुल सही समझे आप, हम सोने की नहीं यूरेनियम ( यूरेनियम को यलोकेक भी कहते हैं। अयस्‍क से पीले रंग का यूरोनियम कंसट्रेट पाउडर बनता है, जिसे बाद में यूरेनियम ईंधन में बदला जाता है) की बात कर रहे हैं। यूरेनियम की होड़ में चीन ने फ्रांस के दांत खट्टे कर दिये हैं और वह भी उसके अपने इलाके में। दुनिया जब अफ्रीका में बुवुजेला बजाने की तैयारी कर रही थी या मैक्सिको की खाड़ी में बीपी का कीचड़ साफ कर रही थी तब चीन ने फ्रांस को उसके अफ्रीकी आंगन में पटक दिया। चीन ने पश्चिम अफ्रीका में फ्रांस के पुराने उपनिवेश नाइजर में यूरेनियम की एक बड़ी खान हथिया ली। यह सौदा फ्रांस को हिला गया है।
नाइजर और पेरिस से दूर बैठे या यूरेनियम को लेकर दुनिया में चल रही होड़ से बेखबर लोग इस सौदे को हल्‍के में ले सकते हैं मगर फ्रांस के लिए यह सीधी हार है। साम दाम दंड भेद की सभी कलाओं में माहिर चीन ने नाइजर में फ्रांस का पूरा खेल ही पलट दिया है। चीन की सिर्फ कुछ वर्ष की मेहनत से चीनी कंपनियां गृह युद्ध के कारण चिथड़ा हो रहे नाइजर के सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों की नाक का बाल बन गई हैं। नाइजर की एजिलेक नामक खान को हथियाकर चीन ने दुनिया के दूसरे सबसे बड़े यूरेनियम उत्‍पादक देश नाइजर में फ्रांस और उसकी मशहूर यूरेनियम ऊर्जा कंपनी अरेवा का चालीस साल पुराना एकाधिकार तोड़ दिया है।
नाइजर पर चर्चा बाद में.... पहले एक जायजा, चीन की यूरेनियम भूख का। जिसके कारण वह फ्रांस जैसे पुराने खिलाडि़यों को उनके उपनिवेश में धूल चटा रहा है। चीन अपने भविष्‍य को बहुत नपे तुले ढंग से ऊर्जावान कर रहा है। आणविक हथियारों की बहस से परे पूरी दुनिया जानती है कि आबो हवा को साफ सुथरा रखने वाली ऊर्जा भविष्‍य में यूरेनियम से ही निकलेगी। आणविक ऊर्जा में दुनिया में सबसे बड़ा देश बनना चीन का नया सपना है। चीन अपने डॉलरों की गठरी लेकर पूरी दुनिया में यूरेनियम खोदने, खरीदने व हथियाने निकल पड़ा है। चीन में आणविक ऊर्जा की ताजा क्षमता दस गीगावाट के करीब है। लेकिन 2020 तक यह 40 गीगावाट पहुंच जाएगी। चीन में 11 न्‍यूक्लियर ( भारत में रिएक्‍टर तो 19 हैं मगर चीन भारत से पांच गुना ज्‍यादा नाभिकीय बिजली बनाता है।) रिएक्‍टर काम कर रहे हैं। 24 बन रहे हैं और 150 बनने वाले हैं। इसके बाद दुनिया में सबसे ज्‍यादा रिएक्‍टर चीन के पास होंगे और 2050 तक 1000 गीगावाट की नाभिकीय बिजली बना रहा होगा। चीन को मालूम है कि अगले दो दशक में उसे वर्तमान से दस गुना ज्‍यादा यूरेनियम चाहिए। वर्ल्‍ड न्‍यूक्लियर एसोसिशन इस पर मुहर लगाती है जिसके मुताबिक अगले दो दशक में चीन दुनिया में इस पीली धातु का सबसे अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्‍ता होगा।
चीन के पास डॉलरों से भरा भंडार है, जिसके बूते वह अफ्रीका से लेकर आस्‍ट्रेलिया तक हाथ मार रहा है। चीन की दोनों नाभिकीय ऊर्जा कं‍पनियां चाइना नेशनल न्‍यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन और चाइना गुआनडांग न्‍यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन पूरी दुनिया में यूरेनियम की खाने बटोरने के अभियान पर निकली हैं। चाइना गुआनडांग, कजाकस्‍तान ( दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्‍पादक), उज्‍बेकिस्‍तान, आस्‍ट्रेलिया और नामीबिया में यूरेनियम खोद कर चीन का भंडार भर रही हैं तो चाइना नेशनल न्‍यूक्लियर, मंगोलिया व नाइजर में सक्रिय है। चाइना गुआनडांग ने पिछले साल एक यूरेनियम खान हथियाकर आसट्रेलिया के पूरे खनन उद्योग को हैरत में डाल दिया था। चीन की निगाह दक्षिण आस्‍ट्रेलिया में सिथ‍त ओलंपिक के विशाल भंडार ओलंपिक डैम माइन पर भी हैं।
...... मगर चीन की चालों से आस्‍टे्लिया से ज्‍यादा फ्रांस परेशान है। नामीबिया व नाइजर जैसे अपने पुराने गुलाम देशों की जमीन के नीचे भरे यूरेनियम के सहारे फ्रांस की अरेवा दुनिया की सबसे बड़ी यूरेनियम उत्‍पादक बन गई। 1.2 बिलियन डॉलर के कारोबार वाली अरेवा को चीन का मिशन यूरेनियम मुश्किल में डाल रहा है। अरेवा नाइजर की पुरानी बाशिंदा है। उसकी इमोयूरारेन खान तैयार हो रही है जिससे 2013 तक 5000 टन यलोकेक निकलेगा। लेकिन अपने दशकों की मौजूदगी अरेवा चीन की कंपनी को एजिलेक खान लेने से नहीं रोक सकी। दरअसल अफ्रीका की भ्रष्‍ट राजनीति को चीन की दोस्‍ती रास आ रही है। भारी बोनस , नेताओं को हर तरह की सुविधा, देश में सड़कें पुल और गृह युद्ध में जरुरत के मुताबिक मदद.... चीन ने एक तरह से नाइजर को फ्रांस से काट सा दिया है। हिंसा और संघर्ष से भरे पूरी तरह स्‍थलीय (लैंडलॉक्‍ड) नाइजर में चीनी कंपनियां के पास तेल रिफाइनरी है, एक तेल ब्‍लॉक है और ....... यूरेनियम भी है। यानी बात पश्चिम अफ्रीका में फ्रांस के दबदबे पर बन आई है।
गृह युद्धों और हथियारबंद गिरोहों से भरे अधिकांश अफ्रीका में चीन खुलकर खेल रहा है। यूरेनियम हथियाने के लिए वह बोत्‍सवाना में जापान को पीछे धकेल रहा है तो नाइजर में फ्रांस को। ...... इस बेहद संवेदनशील धातु की बिसात पर चीन के पैंतरे बड़े नपे तुले हैं। एक दशक बाद चीन की नाभिकीय उत्‍पादन क्षमता दुनिया के लिए ईर्ष्‍या का सबब बन जाएगी।

यही तो है चाइनीज चेकर !!!!!!
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Monday, July 5, 2010

सियासत के सलीब

अर्थार्थ
दोषियों से दोस्ती भी और पीडि़तों की अगुआई भी। दोनों काम एक साथ। चिढ़ते रहिए आप, मगर यह विशेषाधिकार सिर्फ सियासत और सत्ता को मिला है। माहौल बदलते ही सियासत गलती करने वालों से गलबहियां छोड़कर, मुंसिफ बन जाती है। दुनिया भर की सरकारें आजकल इसी भूमिका में हैं। अमेरिका में व्हाइट हाउस से लेकर लंदन में टेन डाउनिंग स्ट्रीट और ऑस्ट्रेलिया तक सलीबों की सप्लाई अचानक बढ़ गई है। ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने बैंकों को अरबों पौंड के नए टैक्स की सूली पर टांग दिया है। अमेरिका, जर्मनी व फ्रांस भी बैंकों के लिए यही सजा मुकर्रर करने वाले हैं। व्हाइट हाउस ने पेट्रोल कंपनी बीपी को आर्थिक जुर्माने की सलीब पर चढ़ा दिया है। टोयोटा पहले से कठघरे में खड़ी है। दरअसल यह सूलियां सजाने का मौसम है, जिसमें बाजार के बादशाहों के खजाने निशाने पर हैं। मगर अपना मुल्क इस मामले में कुछ अलग है। घोटालों में झुलसे लोगों का दर्द गवाह है कि हम कायदे से सजा भी नहीं दे पाते। 26 साल पुराने भोपाल हादसे का दाग भी अपने ही बजट से धोने जा रहे हैं यानी कि करदाता सूली पर चढ़ेंगे। शर्मिदगी से बचने के लिए हम बस, खुद को सजा दे लेते हैं।
बुरे फंसे बैंक
सरकारें इस समय ताजा वित्तीय संकट के मुजरिम तय करने में जुटी हैं। कोशिश जल्द से जल्द सजा देने की है ताकि अपना दामन बचा रहे। बैंक व वित्तीय संस्थाएं पुराने पापी हैं। सरकारों की निगाह में इनका एडवेंचर दुनिया को महंगा पड़ा है। बैंकों को डूबने से बचाने पर सरकारें नौ ट्रिलियन (सोलह शून्य वाली संख्या) डॉलर तक खर्च चुकी हैं। इसलिए सजा भी माकूल होनी चाहिए। ब्रिटेन की नई सरकार के चांसलर जॉर्ज ऑसबोर्न ने ताजा बजट में बैंकों से दो बिलियन पौंड वसूलने का इंतजाम कर दिया है। जर्मनी व फ्रांस के शिकंजे भी बन चुके हैं। अमेरिका में कानून तैयार है, हालांकि लामबंदी जारी है, मगर टैक्स लगना तय है क्योंकि बैंक व वित्तीय संस्थाएं लामबंदी व रसूख में चाहे जितने मजबूत हों, सियासत में राजनेताओं को नहीं पछाड़ सकते। नेताओं ने बहुत सफाई के साथ टैक्स लगा भी दिया और टैक्स लगाने की सामूहिक (जी 20 की बैठक) तोहमत भी नहीं ली। अंतरराष्ट्रीय मंच से कर लगने का ऐलान शेयर बाजारों को तोड़ कर बैंकों की चीख पुकार को ऊंचा कर देता। इसलिए जी 20 ने बैंक टैक्स पर खुलकर बात ही नहीं की और देशों को टैक्स लगाने के लिए आजाद कर दिया। वैसे भी अमेरिका व यूरोप के प्रमुख देशों में इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी थी। इसके बदले बैंकों पर दूसरा सामूहिक शिकंजा कसा जा रहा है। बैंकिंग के कामकाज को सख्त पाबंदियों में बांधने वाले बेसिल नियमों की तीसरी पीढ़ी तैयार है। टैक्स के बाद बचा हुआ काम ये नियम कर देंगे। इसके बाद बैंक व वित्तीय संस्थाओं के लिए जोखिम लेकर मुनाफा कमाने के रास्ते बहुत संकरे हो जाएंगे।
माफी का मौका नहीं
अमेरिका नामक सबसे उदार बाजार ने पिछले कुछ महीनों में प्रमुख कार कंपनी टोयोटा के अध्यक्ष अकीयो टोयोदा को वस्तुत: आठ आठ आंसू रुला दिए। शेयरधारकों ने बाकायदा बैठक में झिड़का कि टोयोदा महोदय आप सुबकते हुए अच्छे नहीं लगते। टोयोटा की कारों के एक्सीलरेटर पैडल खराब थे। कारें अचानक तेज दौड़ पड़ती थीं। अमेरिका में हादसे हुए तो मामला गरमाया और टोयोदा को अपराधियों की तरह अमेरिकी संसद की समिति के सामने पेश होना पड़ा। पूरी दुनिया में एक करोड़ कारें वापस ली गई। कंपनी मुकदमे लड़ रही है और हर्जाना दे रही है। कमाई को दो बिलियन डॉलर की चपत लग चुकी है। टोयोटा के कर्मचारियों का वेतन दस फीसदी घटाया गया है। मैक्सिको की खाड़ी में बहते तेल में डूब रही बीपी का किस्सा सबको मालूम है। ओबामा ने कंपनी की गर्दन पकड़कर 20 बिलियन डॉलर का चेक ले लिया। बीपी अब लंबी मुकदमेबाजी के लिए तैयार हो रही है। सजा देने का यह मानसून ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच चुका है। प्रधानमंत्री केविन रड ने मंदी को देखते हुए देश के सबसे ताकतवर खनन उद्योग पर 40 फीसदी टैक्स लगाया तो कुर्सी खिसक गई। नई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने कुछ रियायत दी है, मगर टैक्स कायम है। बाजार को याद है कि जब मौका आया तो अमेरिका ने 246 बिलियन डॉलर का हर्जाना वसूल लिया और सिगरेट कंपनियां मिमियाती रह गई।
सजा की सियासत
सिगरेट कंपनियों से वसूली गई मोटी रकम में कितनी लोगों की सेहत सुधारने पर खर्च हुई या बीपी से मिले 20 बिलियन डॉलर कहां जाएंगे, इस पर अमेरिका में भी दर्जनों सवाल हैं। आप बेशक कह सकते हैं कि अमेरिकी सरकार ने पिछले साल एआईजी, फेनी मे और फ्रेडी मैकजैसी कंपनयिों को बचा लिया था। जबकि आज गोल्डमैन सैक्श, बीपी आदि को सजाएं सुनाई जा रही है। जी हां, यही तो सियासत है। वक्त बदला तो दुनिया का सबसे उदार बाजार कंपनियों के लिए सबसे क्रूर हो गया। मगर भारत को तो सजा देते हुए दिखना भी नहीं आता। सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार को लपेट में आता देख हमारी सरकार ने अचकचाकर भोपाल का हर्जाना 26 साल बाद अपने ही गले बांध लिया। कार्बाइड तो गई, अब गलती का बिल (1500 करोड़ रुपये का पैकेज) बजट यानी करदाता चुकाएंगे। उदारीकरण के बाद भारत में एक दर्जन से ज्यादा बड़े घोटालों में हजारों लोगों ने अपने हाथ जलाए हैं, लेकिन हर्जाना दिलाने का यहां कोई रिवाज नहीं है। दूसरी तरफ जमीन मकान के बाजार में फर्जीवाड़ा खुलने और जनता के गुस्साने के बाद ओबामा का प्रशासन सब प्राइम प्रॉपर्टी बाजार में धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ ऑपरेशन स्टोलेन ड्रीम चला रहा है। 191 मामले दर्ज हो चुके हैं और 147 मिलियन डॉलर की रिकवरी हो चुकी है। मतलब यह कि बात जब राजनीति के दामन तक पहुंचे किसी को भी टांगा जा सकता है।
दुनिया में कोई यह कभी नहीं जान पाएगा कि लीमन ब्रदर्स सहित दर्जनों बैंक अपनी गलती से डूबे या सरकारों अर्थात नियामकों की लापरवाही से। बीपी के कुएं से तेल का बहना कंपनी की चूक थी या सरकारी देखभाल की। जनता चाहे कहीं की भी हो, अपनी कमजोर याददाश्त की वजह से सिर्फ हादसे या घोटाले और उनके नतीजे या उपचार याद रख पाती है। यही वजह है कि पश्चिम की सियासत का इंसाफ बीपी, टोयोटा पर जुर्माने या बैंक टैक्स के तौर पर दुनिया को दिख जाता है। जबकि हमारे यहां दोषी नहीं, बल्कि पीडि़त ही सजा पाता है। दरअसल हम जरा कच्चे हैं। भारत की व्यवस्था न तो हादसे या घोटाले रोक पाती है और न ही इंसाफ देती नजर आती है। हमारी सियासत बस पूरे मामले में अपने हाथ काले कर लेती है और बाद में उन्हीं हाथों के पीछे मुंह भी छिपा लेती है। ..हमें कुछ सीखना चाहिए।
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Monday, June 28, 2010

तौबा, तेरा सुधार !!

अर्थार्थ
चास पार का पेट्रोल और चालीस पार का डीजल खरीदते हुए कैसा लग रहा है? सुधारों की पैकिंग में कांटो भरा तोहफा। पेट्रो उत्पादों के मामले में सरकारें हमेशा से ऐसा करती आई हैं। कीमतें बढ़ाते हुए हमें (सब्सिडी आंकड़ा दिखा कर) सब्सिडीखोर होने की शर्मिदगी से भर दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों की रोशनी में तेल कंपनियों की बेचारगी देखकर हम मायूस हो जाते हैं। अंतत: सुधारों का तिलक लगा कर उपभोक्ता यूं बलिदान हो जाते हैं कि मानो कोई दूसरा जिम्मेदार ही न हो। यह सरकारों का आजमाया हुआ इमोशनल अत्याचार है। वैसे चाहें तो ताजा फैसले की रोशनी में इसे पेट्रो मूल्य प्रणाली में नया सुधार भी कह सकते हैं। मगर पेट्रो उत्पादों को दुगने तिगुने टैक्स से निचोड़ती राज्य सरकारों को कुछ मत कहिए। सब्सिडी का डीजल पी रहे जेनसेटों से घरों बाजारों को चमकने दीजिए, बिजली की कमी की शिकायत मत कीजिए। सार्वजनिक परिवहन की मांग मत करिए, क्या ऑटो कंपनियों की प्रगति से जलते हैं? यह सब सुधार के एजेंडे में नहीं आते हैं। ताजा सुधार तेल कंपनियों को सिर्फ पेट्रोल की कीमत तय करने की आजादी देता है। डीजल को लेकर रहस्य और केरोसिन व एलपीजी पर सब्सिडी कायम है। साथ ही सियासत के दखल का शाश्वत रास्ता भी खुला है, जिसके कारण पेट्रो मूल्य प्रणाली में सुधारों का इतिहास बुरी तरह दागदार रहा है।
मांग के बदले महंगाई
मांग तलाश रही अर्थव्यवस्था को सरकार ने महंगाई व ऊंची लागत थमा दी है। नीति निर्माता इस वित्त वर्ष की शुरुआत से ही महंगाई बनाम तेज विकास बनाम घाटे की तितरफा ऊहापोह में घिरे हैं। अब बारी बाजार व निवेशकों के भ्रमित होने की है। महंगे पेट्रो उत्पादों के बाद आने वाले महीनों में मांग बढ़ते रहने की कोई गारंटी नहीं है। अर्थव्यवस्था की हालिया चमक की मजबूती पर दांव लगाना अब जोखिम भरा है। आखिर मंदी से घायल व महंगाई से लदी अर्थव्यवस्था पेट्रो कीमतों की टंगड़ी फंसने के बाद कितना तेज चल पाएगी? बाजार को दिखने लगा है कि खेत से लेकर फैक्ट्री तक पहले से फैली महंगाई मांग को समूचा निगल जाएगी। कच्चे तेल की वायदा कीमतें आने वाले वक्त में पेट्रो उत्पाद और महंगे होने का वादा कर रही हैं। तभी तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों में वृद्धि के कागज पत्तर संभालने लगा है। मुद्रास्फीति की आग पर उसे पानी डालना है। चीन के नए मौद्रिक दांव से अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिंसों की कीमत बढ़ने वाली है। महंगा ईधन, महंगी पूंजी या कर्ज और महंगा कच्चा माल। महंगाई की मारी और मंदी से उबरती अर्थव्यवस्था को फिलहाल ऐसे सुधार की दरकार नहीं थी।
साफ सियासत, रहस्यमय फार्मूले

कल्पना कीजिए, बिहार (अक्टूबर 2010) या बंगाल (मई 2011) में चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है। तभी ईरान को अमेरिका अचानक परमाणु कार्यक्रम का नया पिन चुभो देता है या फिर इजरायल हाल के फ्लोटिला हमले जैसी कोई कारगुजारी कर बैठता है। दुनिया में तेल की कीमतें सातवें आसमान पर हैं, तब क्या होगा? सरकार तेल कंपनियों से कीमतें तय करने की आजादी तत्काल छीन लेगी। पेट्रो मूल्य प्रणाली के ताजा क्रांतिकारी सुधार में यह प्रावधान शामिल है। यही पेंच पेट्रो मूल्य ढांचे में सुधारों की साख को हमेशा से दागी करते हैं। 2002 में भी सरकार ने पेट्रो मूल्यों के नियंत्रण से तौबा की थी। बजट में ऐलान हुआ भी था लेकिन कीमतें सरकार की जकड़ से कभी आजाद नहीं हुई। बस केरोसिन व एलपीजी का घाटा तेल पूल खाते की जगह बजट में पहुंच गया। सुधारों के नए कार्यक्रम में भी सरकार के हस्तक्षेप की जगह और राजनीतिक ईधनों यानी डीजल, केरोसिन और एलपीजी की कीमतों में पुराना असमंजस बरकरार है। कीमतें कब कैसे कितनी बढ़ेंगी या सरकार कब किस मौके पर कैसे दखल देगी, इसके फार्मूले रहस्य के रवायती आवरण में हैं। ऐसी सूरत में सुधारों पर भरोसा जरा मुश्किल है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि सुधार की रोशनी राज्यों के टैक्स ढांचे तक नहीं पहुंचती जो पेट्रो उत्पादों की कीमत दोगुनी कर देते हैं। महंगी कारों में सस्ते ईधन के खेल, तेल कंपनियों की दक्षता, केरोसिन व डीजल की मिलावट के अर्थशास्त्र, संरक्षण की कोशिशों और वैकल्पिक ईधनों की जरूरत जैसे मुद्दों की तरफ भी सुधारों की नजर नहीं जाती। पेट्रो मूल्यों में सुधार का मतलब सियासत के हिसाब से कीमतों में कतर ब्योंत है बस। और इस पैमाने पर यह वक्त सबसे मुफीद था।
बाजार बदला, पैमाने नहीं
सरकार का सस्ता डीजल कहां खप रहा है? सबको पता है कि सस्ता केरोसिन देश में किस काम आता है? पिछले बीस साल में इस देश में ईधन की खपत का पूरा ढांचा बदल गया मगर सरकार के पैमाने नहीं बदले। बुनियादी ढांचे और बुनियादी सेवाओं में कई बुनियादी खामियों की कीमत पेट्रो उत्पाद चुकाते हैं। डीजल दुनिया के लिए ट्रांसपोर्ट फ्यूल है मगर भारत में यह एनर्जी फ्यूल भी है। आवासीय भवनों व शॉपिंग मॉल को रोशन करने वाले दैत्याकार किलोवाटी जनरेटर बिजली कमी से उपजे हैं। शहरों से लेकर गांवों तक अब जरूरत की तिहाई रोशनी डीजल से निकलती है। नए उद्योग सरकारी बिजली भरोसे नहीं बल्कि सस्ते डीजल की बिजली भरोसे आते हैं। पिछले चार साल में डीजल 30 से 40 रुपये प्रति लीटर हो गया लेकिन डीजल की मांग करीब नौ फीसदी सालाना की रिकार्ड दर से बढ़ रही है। देश के ज्यादातर शहर सार्वजनिक परिवहन के मामले में आदिम युग में हैं मगर ऑटो कंपनियां वक्त को पछाड़ रही हैं। कामकाजी आबादी से भरे शहर निजी वाहनों से अटे पड़े हैं और पेट्रोल की मांग 14 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। बावजूद इसके पेट्रोल चार साल में 43 से 50 रुपये लीटर पर पहुंच गया। सस्ते डीजल और सस्ती बिजली दोनों की तोहमत खेती के नाम है लेकिन खेती में सिंचाई के फिर भी लाले हैं। दरअसल, बढ़ती अर्थव्यवस्था और कमाई ने बिजली, परिवहन सुविधाओं की कमी का इलाज सस्ते पेट्रो उत्पादों में खोज लिया है। इसलिए कीमत बढ़ने से मांग घटने का सिद्धांत यहां सिर के बल खड़ा है।
सरकार ठीक कहती है कि पेट्रो उत्पादों की महंगाई के मामले हम अभी सिंगापुर व थाईलैंड के करीब ही पहुंचे हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस तो बहुत आगे हैं। यह भी सच है कि अरब के कुओं, मैक्सिको की खाड़ी और नार्वे के समुद्र से निकला तेल कीमत के मामले में उपभोक्ताओं के बीच फर्क नहीं करता। लेकिन जरा ठहरिये.. सरकारें चाहें तो फर्क पैदा कर सकती हैं क्योंकि ईधन के मूल्य महंगाई, जनता की आय और अर्थव्यवस्था की स्थिति देखकर ही तय होते हैं। मगर यहां तो सियासत का फार्मूला सब पर भारी है। अब छोड़ भी दीजिये, महंगाई से राहत की उम्मीद का दामन। बेनियाज और बेफिक्र सरकार ने एक नया धारदार सुधार आप पर लाद दिया है। इसलिए .. जोर लगा के हईशा!

बेनियाजी हद से गुजरी, बंदा परवर कब तलक
हम कहेंगे हाले दिल और आप फरमायेंगे क्या
(गालिब )
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Monday, June 21, 2010

मांग के कंधे पर बैठी महंगाई

अर्थार्थ
कदम रुके थे, पैर में बंधा पत्थर तो जस का तस था। महंगाई गई कहां थी? अर्थव्यवस्था मंदी से निढाल होकर बैठ गई थी इसलिए महंगाई का बोझ बिसर गया था। कदम फिर बढ़े हैं तो महंगाई टांग खींचने लगी है। मुद्रास्फीति का प्रेत नई ताकत जुटा कर लौट आया है। मंदी के छोटे से ब्रेक के बीच महंगाई और जिद्दी, जटिल व व्यापक हो गई है। यह खेत व मंडियों से निकल कर फैक्ट्री व मॉल्स तक फैल गई है। मानसून का टोटका इस पर असर नहीं करता। gमौद्रिक जोड़ जुगत इसके सामने बेमानी है। महंगाई ने मांग में बढ़ोतरी से ताकत लेना सीख लिया है। तेज आर्थिक विकास अब इसे कंधे पर उठाए घूमता है। भारत में आर्थिक मंदी का अंधेरा छंट रहा है। उत्पादन के आंकड़े अच्छी खबरें ला रहे हैं लेकिन नामुराद महंगाई इस उजाले को दागदार बनाने के लिए फिर तैयार है।
लंबे हाथ और पैने दांत
महंगाई अब खेत खलिहान से निकलने वाले खाद्य उत्पादों की बपौती नहीं रही। बीते छह माह में यह उद्योगों तक फैल गई है यानी आर्थिक जबान में जनरलाइज्ड इन्फलेशन। महंगाई मौसमी मेहमान वाली भूमिका छोड़कर घर जमाई वाली भूमिका में आ गई है। उत्पादन का हर क्षेत्र इसके असर में है। कुछ ताजे आंकड़ों की रोशनी में महंगाई के इस नए चेहरे को पहचाना जा सकता है। पिछले साल दिसंबर तक भारत में महंगाई खाद्य उत्पादों की टोकरी तक सीमित थी। गैर खाद्य उत्पाद महज दो ढाई फीसदी की मुद्रास्फीति दिखा रहे थे लेकिन अब सूरत बदल गई है। गैर खाद्य और गैर ईधन (पेट्रोल डीजल) उत्पादों में भी मुद्रास्फीति 8 फीसदी से ऊपर निकल गई है। खाद्य उत्पादों में तो पहले से 11-12 फीसदी की मुद्रास्फीति है। खासतौर पर लोहा व स्टील, कपड़ा, रसायन व लकड़ी उत्पाद के वर्गो में कीमतों में अभूतपूर्व उछाल आया है। यह सभी क्षेत्र कई उद्योगों को कच्चा माल देते हैं इसलिए महंगाई का इन्फेक्शन फैलना तय है। यह महंगाई का नया व जिद्दी चरित्र है। बजट में कर रियायतें वापस हुई तो कीमतें बढ़ाने को तैयार बैठे उद्योगों को बहाना मिल गया। महंगाई का फैक्ट्रियों (मैन्यूफैक्चर्ड उत्पादों) में घर बनाना बेहद खतरनाक है। तभी तो रिजर्व बैंक भी मुद्रास्फीति के बढ़ने को लेकर मुतमइन है। बाजार मान रहा है कि थोक कीमतों वाली महंगाई दहाई के अंकों का चोला फिर पहन सकती है, फुटकर कीमतों की मुद्रास्फीति तो पहले से ही दहाई में हैं। मैन्यूफैक्चर्ड और खाद्य उत्पादों की कीमतें साथ-साथ बढ़ने का मतलब है कि महंगाई के हाथ लंबे और दांत पैने हो गए हैं।
इलाज नहीं खुराक
महंगाई अब मांग के पंखों पर सवारी कर रही है। याद करें कि दो साल पहले 2007-08 की तीसरी तिमाही में जब मुद्रास्फीति ने अपना आमद दर्ज की थी तब भी भारत में आर्थिक विकास दर तेज थी और महंगाई बढ़ने की वजह मांग का बढ़ना बताया गया था। बात घूम कर फिर वहीं आ पहुंची है। आर्थिक वृद्घि का तेज घूमता पहिया महंगाई को उछालने लगा है जबकि आपूर्ति के सहारे महंगाई घटाने की गणित फेल हो गई है। अंतरराष्ट्रीय कारकों के मत्थे तोहमत मढ़ना भी अब नाइंसाफी है। ताजी मंदी के बाद से पिछले कुछ माह में पूरे विश्व के बाजारों में जिंसों यानी कमोडिटीज की कीमतें गिरी हैं लेकिन भारत में कीमतें बढ़ रही हैं। माना कि पिछली खरीफ को सूखा निगल गया था लेकिन रबी तो अच्छी गई। रबी में गेहूं की पैदावार 2009 के रिकॉर्ड उत्पादन 80.68 मिलियन टन से ज्यादा करीब 81 मिलियन टन रही। सरकार ने कहा कि इससे खरीफ का घाटा पूरा हो गया है मगर महंगाई वैसे ही नोचती रही। अंतत: सरकार ने पैंतरा बदला और अब खरीफ पर उम्मीदें टिका दीं। मानसून का आसरा देखा जाने लगा है। दरअसल आर्थिक विकास के पलटी खाते ही मांग बढ़ी है जिसने पूरा गणित उलट दिया। आपूर्ति बढ़ने से महंगाई कुछ हिचकती इससे पहले उसे मांग ने नए सिरे से उकसा दिया है।
सारे तीर अंधेरे में

महंगाई को लेकर सरकार और रिजर्व बैंक के सारे तीर दरअसल अंधेरे में चलते रहे हैं इसलिए महंगाई का इलाज करने के जिम्मेदार भी अब अटकल और अंदाज के सहारे हैं। आंकड़ों में अगर कमी दिखी तो सरकार ने भी ताली बजाई और अगर आंकड़े ने कीमतें बढ़ती बताईं तो सरकार ने भी चिंता की मुद्रा बनाई। सरकार के ं महंगाई नियंत्रण कार्यक्रम में अगला टारगेट दिसंबर है और मानसून ताजा बहाना है। हालांकि अच्छी खरीफ महंगाई का इलाज शायद ही करे। दरअसल पिछले चार फसली मौसमों से जारी महंगाई ने कृषि उपज के बाजार में मूल्य वृद्घि की नींव खोद कर जमा दिया है। खरीफ का समर्थन मूल्य बढ़ाना सियासी मजबूरी थी इसलिए खरीफ में पैदावार के महंगे होने का माहौल पहले से तैयार है। इधर अर्थव्यवस्था में आमतौर पर मांग बढ़ने के साथ ही रबी की बेहतर फसल ने ग्रामीण क्षेत्र में भी उपभोग खर्च बढ़ा दिया है। तभी तो रबी की फसल आते ही उपभोक्ता उत्पादों व दोपहिया वाहनों का बाजार अचानक झूम उठा है। यानी कि अगर बादल कायदे से बरसे तो भी खरीफ की अच्छी फसल महंगाई को डरा नहीं सकेगी। इसके बाद बचती है रिजर्व बैंक की मौद्रिक कीमियागिरी। तो इस मोर्चे पर दिलचस्प उलझने हैं। मंदी से उबरती अर्थव्यवस्था को सस्ते कर्ज का प्रोत्साहन चाहिए और सरकारी उपक्रमों व निजी कंपनियों की ताजी इक्विटी खरीदने के लिए बाजार को भरपूर पैसा चाहिए। इधर यूरोप के बाजारों से जले निवेशक डॉलर यूरो लेकर भारत की तरफ दौड़ रहे हैं। उनके डॉलर आएंगे तो बदले में रुपया बाजार में जाएगा। इसलिए रिजर्व बैंक गवर्नर सुब्बाराव का इशारा समझिये। वह बाजार और उद्योग की नहीं सुनने वाले। उन्हें मालूम है कि बाजार में इस समय पैसा बढ़ाना महंगाई को लाल कपड़ा दिखाना है। अर्थात कर्ज महंगा होकर रहेगा और महंगा कर्ज उद्योगों की लागत बढ़ाकर महंगाई के नाखून और धारदार करेगा।
भारत की अर्थव्यवस्था ने मंदी की मारी दुनिया में सबसे पहले विकास की अंगड़ाई ली है। अर्थव्यवस्था में कई मोर्चो पर सुखद रोशनी फूट पड़ी है। आर्थिक उत्पादन के ताजे आंकड़े उत्साह भर रहे हैं तो सरकारी घाटे को कम करने के सभी दांव (थ्रीजी व ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम की बिक्री और विनिवेश) भी बिल्कुल सही पड़े हैं। रबी के मौसम में खेतों से भी अच्छे समाचार आए हैं और मानसून आशा बंधा रहा है। लेकिन महंगाई इस पूरे उत्सव में विघ्न डालने को तैयार है। और जिस अर्थव्यवस्था में महंगाई मेहमान की जगह मेजबान यानी कि मौसमी की जगह स्थायी हो जाए वहां कोई भी उजाला टिकाऊ नहीं हो सकता। क्योंकि महंगाई का अंधेरा अंतत: हर रोशनी को निगल जाता है।

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