Monday, November 5, 2012

सियासत बनाम सिद्धांत


भारत का आर्थिक प्रबंधन सिद्धांत और सियासत के बीच फंस गया है। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार वित्‍त मंत्रालय और रिजर्व बैंक दो अलग अलग ध्रुवों पर खड़े हैं। इस सच से मुंह छिपाने से कोई फायदा नही कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था चलाने पर राजकोषीय नियामक और मौद्रिक नियामक के बीच सैद्धांतिक मतभेद हैं। केंद्र सरकार सस्‍ते कर्ज की पार्टी चाहती है, ता‍कि शेयर सूचकांक में उछाल सरकारी आर्थिक प्रबंधन की साख कुछ तो सुधर जाए। अलबतता रिजर्व बेंक मौद्रिक सिद्धांत पर पर कायम हैं, वह ब्‍याज दरों को लेकर लोकलुभावन खेल नहीं करना चाहता। रिजर्व बैंक नजरिये पर वित्‍त मंत्री की झुंझलाहट लाजिमी है। सुब्‍बाराव ने अपने  मौ‍द्रिक आकलन पर टिके रह कर दरअसल ताजा आर्थिक सुधारों के गुब्‍बारे में पिन चुभा दी है और भारत की बुनियादी आर्थिक मुसीबतों को फिर बहस के केंद्र में रख दिया है। टीम मनमोहन सुधारों का संगीत बजाकर इस बहस से बचने कोशिश की कर रही थी।  
सुधारों की हकीकत   
रिजर्व बैंक ने ग्रोथ आकलन को ही सर के बल खडा कर दिया है। इस वित्‍त वर्ष में देश की आर्थिक विकास दर 6.5 फीसद नहीं बलिक 5.8 फीसद रहेगी। यह आंकडा़  सरकार के चियरलीडर योजना आयोग के उत्साही अनुमानों को हकीकत की जमीन सुंघा देता है । ठीक इसी केंद्रीय बैंक मान रहा है कि थोक मूल्‍यों की महंगाई इस साल 7 फीसदी से बढ़कर 7.5 फीसदी हो जाएगी। मतलब यह है कि खुदरा कीमतों में महंगाई की आग और भडकेगी। मौ‍द्रिक समीक्षा कहती है कि महंगाई के ताजे तेवर  खाद्य, पेट्रो उत्‍पादों दायरे से बाहर के हैं यानी कि अब मैन्‍युफैक्‍चरिंग क्षेत्र से महंगाई आ रही है जो एक जटिल चुनौती है। रिजर्व बैंक ने वित्‍त मंत्री चिंदबरम की फील गुड पार्टी की योजना ही खत्‍म

Monday, October 29, 2012

अमेरिका की संकट मशीन


मेरिका भीतर से बेचैन और डरा हुआ है। इसलिए नहीं कि उसकी सियासत  उसे कौन सा रहनुमा देगी बल्कि इसलिए कि अमेरिका की वित्‍तीय संकट मशीन पूरी रफ्तार से काम रही है और राजनीति के पास इसे रोकने की कोई जुगत नहीं है।  दुनिया की महाशक्ति एक अभूतपूर्व वित्‍तीय संकट से कुछ कदम दूर है। अमेरिका में कर्ज और घाटे से जुड़ी मुसीबतों का टाइम बम दिसंबर मे फटने वाला है और अमेरिका के पांव में सबका पांव है सो टाइम बम की टिक टिक वित्‍तीय दुनिया के लिए मुसीबत के ढोल से कम नही है। घाटे को कम करने के राजनीतिक कोशिशों की अं‍तिम समय सीमा दिसंबर में ख्‍त्‍म हो रही है। एक जनवरी 2013 को अमेरिका का आटोमेटिक संवैधानिक सिस्‍टम सरकारी खर्च में कमी भारी कमी व टैक्‍स में जोरदार बढ़ोत्‍तरी का बटन दबा देगा। इस संकट से बचना अमेरिकी सियासत की असली अग्नि परीक्षा है। यह सिथति अमेरिका को सुनिश्‍चत मंदी और विश्‍व को नए तरह की मुसीबत में झोंक देगी।
फिस्‍कल क्लिफ
अमेरिका एक बडे संकट की कगार पर टंगा है। वित्‍तीय दुनिया इस स्थि‍ति को फिस्‍कल क्लिफ के नाम से बुला रही है। अमेरिका की सरकारों ने पिछले वर्षों में जो तरह तरह की कर रियायतें दी थीं उनके कारण घाटा बुरी तरह बढ़ा है। इन रियायतों को वापस लेने का वक्‍त आ गया है। अमेरिकी बजटीय कानून घाटा कम करने लिए सरकार के राजस्‍व में बढोत्‍तरी और खर्च में कमी की सीमायें तय करता है, जैसा कि भारत के राजकोषीय उत्‍तरदायित्‍व कानून में प्रावधान किया गया है। इस कानून के मुताबिक अमेरिकी सरकार को 2013 के लिए प्रस्‍तावित  घाटे को आधा कम करना है। जो सरकार के कुल राजसव में चार से पांच फीसदी की बढ़त और खर्च में एक फीसदी कमी के जरिये हो सकेगा। मतलब यह कि अमेरिका को 665 अरब डॉलर की

Monday, October 22, 2012

मौत बांटने वाली लूट


हाराष्‍ट्र में पवारों, गडकरियों, कांग्रेस और शिव सेना मौसरे भाई वाले रिश्‍तों पर क्‍या चिढ़ना,  भ्रष्‍टाचार का दलीय कोआपरेटिव तो मराठी राजनीति का स्‍थायी भाव है, गुस्‍सा तो सियासत की निर्ममता पर आना चाहिए। जिसने भारत के इतिहास के सबसे नृशंस भ्रष्‍टाचार को अंजाम दिया है। मत भूलिये कि अब हम राजनीतिक भ्रष्‍टाचार के एक जानलेवा नमूने से मुखातिब हैं। महाराष्‍ट्र को दुनिया भारत में सबसे अधिक किसान आत्‍महत्‍या वाले राज्‍य के तौर पर जानती है। सिंचाई के पैसे, बांध की जमीनों और कीमती पानी की लूट का इन आत्‍महत्‍याओं से सीधा रिश्‍ता है। महाराष्‍ट्र का सिंचाई घोटाला दरअसल देश की सबसे बड़ी खेतिहर त्रासदी की पटकथा है।
पानी की लूट
महाराष्‍ट्र देश का इकलौता राज्‍य है जहां पिछले कई दशकों में सिंचाई पर किसी भी राज्‍य से ज्‍यादा खर्च हुआ है। राज्‍य की पिछली डेवलपमेंट रिपोर्ट बताती है कि नवीं योजना तक महाराष्‍ट्र में सिंचाई पर खर्चपूरे देश में कुल सिंचाई खर्च का 18 फीसदी था। आगे की योजनाओं में यह और तेजी से बढ़ा। खेतों को पानी देने पर खर्च के मामले में उत्‍तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े खेतिहर राज्‍य यकीनन महाराष्‍ट्र के सामने पानी भरते हैं। महाराष्‍ट्र में राजनेताओं के लिए सिंचाई सबसे मलाईदार विभाग

Monday, October 15, 2012

चीन बिना बेचैन




दि दुनिया में चिंताओं को नापने का कोई ताजा सूचकांक बनाया जाए तो डगमगाता अमे‍रिका और डूबता यूरोप उसमें सबसे ऊपर नहीं होगा।  दुनिया तो अब थमते चीन को लेकर बेचैन है। ग्‍लो्बल ग्रोथ का यह टर्बोचार्ज्‍ड इंजन धीमा पड़ने लगा है। चीन अब केवल एक देश का ही नाम नही बलिक एक नए किस्‍म की ग्‍लोबल निर्भरता का नाम भी है। दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्‍यवस्‍था की  फैक्ट्रियों में बंद मशीनों को देख कर ब्राजील, अफ्रीका और अमेरिका की खदानों से लेकर ताईवान व कोरिया के इलेक्‍ट्रानिक केंद्रो तक डर की लहर दौडने लगी है। चीन की ग्रोथ में गिरावट दुनिया की सबसे बड़ी बहुआयामी चुनौती है। सुस्‍त पडता चीन  विश्‍व की कई कंपनियों को दीवालिया कर देगा।
चीन की मशीन 
चीन की आर्थिक विकास दर अप्रत्याशित तेजी से गिर रही है। जुलाई से सितंबर  के दौरान चीन की विकास दर तीन साल के सबसे निचले स्‍तर 7.4 फीसदी पर आ गई है। चीन के विशाल मैन्‍युफैक्‍चरिंग उद्योग की वृ‍द्धि दर लगातार 11वें माह गिरी है। निर्यात आर्डरों में सितंबर दौरान, पिछले 42 माह की, सबसे तेज कमी दर्ज की गई। चीन की प्रमुख मैन्‍युफैक्‍चरिंग कंपनियों का मुनाफा लगातार छठे माह नीचे आया है। इसलिए विश्‍व बैंक के ताजे आर्थिक अनुमानों सबसे जयादा चिंता चीन को लेकर जाहिर की गई है। विश्‍व बैंक मान रहा है कि चीन में आर्थिक विकास दर अपेक्षा से तेज गिरावट के कारण पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में यह 2001 के बाद का यह सबसे खराब

Monday, October 8, 2012

सुधार, दरार और इश्तिहार



श्तिहार एक काम तो बाखूबी करते हैं। दीवार पर उनकी मौजूदगी कुछ वक्‍त के लिए दरारें छिपा लेती है। सियासत इश्तिहारों पर भले झूम जाए मगर बात जब अर्थव्‍यवस्‍था की हो तो इशितहारों में छिपी दरारें ज्‍यादा जोखिम भरी हो जाती हैं। भारत के इश्तिहारी आर्थिक सुधारों ने ग्‍लोबल निवेशकों को रिझाने के बजाय कनफ्यूज कर दिया है। सुर्खियों में चमकने वाले सुधारों के ऐलान, देश की आर्थिक सेहत के आंकड़े सामने आते ही सहम कर चुप हो जाते हैं। केलकर और दीपक पारिख जैसी समितियों की रिपोर्टें तो सरकार की सुधार  वरीयताओं की ही चुगली खाती हैं। सरकार सुधारों के पोस्‍टर से संकट की दरारों को छिपाने में लगी है। सुधार एजेंडे का भारत की ताजा आर्थिक चुनौतियों से कोई तालमेल ही हीं दिखता, इसलिए ताजा कोशिशें भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की व्यापक तस्‍वीर को बेहतर करती नजर नहीं आती। उत्‍पादन, ग्रोथ, महंगाई, ब्‍याज दरों, निवेश, खर्च, कर्ज का उठाव, बाजार में मांग और निर्यात के आंकड़ों में उम्‍मीदों की चमक नदारद है। शेयर बाजार में तेजी और रुपये की मजबूती के बावजूद किसी ग्‍लोबल निवेश या रेटिंग एजेंसी ने भारत को लेकर अपने नजरिये में तब्‍दीली नहीं की है।
दरारों की कतार   
वित्‍त मंत्री की घोषणाओं और कैबिनेट से निकली ताजी सुधार सुर्खियों को अगर कोई केलकर समिति की रिपोर्ट में रोशनी में पढ़े तो उत्‍साह धुआं हो जाएगा। केलकर समिति तो कह रही है कि भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था तूफान में घिरी है। कगार पर टंगी है। भारत 1991 के जैसे संकट की स्थिति में खड़ा है। चालू खाते का घाटा  जो विदेशी मुद्रा की आवक व निकासी में अंतर दिखाता है, वह जीडीपी के अनुपात में 4.3 प्रतिशत पर है जो कि 1991 से भी ऊंचा स्‍तर है। विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर 1991 जैसे संकट की बात अप्रैल में रिजर्व बैंक गवर्नर डी सुब्‍बाराव ने भी कही थी। ग्‍लोबल वित्‍तीय संकट, भारत के भारी आयात बिल और निवेशकों के अस्थिर रुख के कारण यह दरार बहुत जोखिम भरी है। राजकोषीय संतुलन के मामले में भारत अब गया कि तब

Monday, October 1, 2012

बड़े दांव और गहरे जोखिम



ह इतिहास बनते देखने का वक्‍त है, जो आर या पार के मौके पर बनता है। दोहरी मंदी और वित्‍तीय संकटों की अभूतपूर्व त्रासदी में खौलते अटलांटिक के दोनों किनारों में ऐतिहासिक फैसले शुरु हो गए हैं। यूरोप और अमेरिका में ग्रोथ को वापस लाने की निर्णायक मुहिम शुरु हो चुकी है। जिसकी कमान सरकारों के नहीं बल्कि प्रमुख देशों के केंद्रीय बैंकों के हाथ है। अमेरिकी फेड रिजर्व और यूरोपीय केंद्रीय बैंक अब मंदी और संकट से मुकाबले के आखिरी दांव लगा रहे हैं। केंद्रीय बैंकों के नोट छापाखाने ओवरटाइम में काम करेंगे। मंदी को बहाने के लिए बाजार में अकूत पूंजी पूंजी छोड़ी जाएगी। यह एक नया और अनदेखा रास्‍ता है जिसमें कौन से मोड और मंजिले आएंगी, कोई नहीं जानता। क्‍या पता मंदी भाग जाए या फिर यह भी सकता है कि  सस्‍ते डॉलर यूरो दुनिया भारत जैसी उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं के बाजार में पहुंच कर नई धमाचौकड़ी मचाने लगें। या ग्‍लोबल महंगाई नई ऊंचाई छूने लगे। .... खतरे भरपूर हैं क्‍यों कि इतने बड़े जोखिम भी रोज रोज नहीं लिये जाते।
पूंजी का पाइप 
बीते 15 सितंबर को दुनिया के बाजारों में लीमैन ब्रदर्स की तबाही की चौथी बरसी अलग ढंग से मनाई गई। फेड रिजर्व के मुखिया बेन बर्नांके ने अमेरिका के ताजा इतिहास का सबसे बड़ा जोखिम लेते हुए बाजार में हर माह 40 अरब डॉलर झोंकने का फैसला किया, यानी क्‍वांटीटिव ईजिंग का तीसरा दौर। तो दूसरी तरफ यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने कर्ज संकट में ढहते यूरोपीय देशों के बांड खरीदने का ऐलान कर दिया। बैंक ऑफ जापान  ने भी बाजार में पूंजी का पाइप खोल दिया। इन खबरों से शेयर बाजार जी उठे और यूरोप और अमेरिका के बांड निवेशकों के चेहरे खिल गए।
अमेरिका को मंदी से उबारने के लिए शुरु हुआ फेड रिजर्व का आपरेशन ट्विस्‍ट कई मामलों में अनोखा और क्रांतिकारी है। पहला मौका है जब

Monday, September 24, 2012

सुधार, समय और सियासत


भारत में एक राजनेता था। आर्थिक नब्‍ज पर उसकी उंगलियां चुस्‍त थीं मगर सियासत और वक्‍त की नब्‍ज से हाथ अक्‍सर फिसल जाता था। 1991 में उसके पहले आर्थिक सुधारों को लेकर देश बहुत आगे निकल गया मगर उस की पार्टी कहीं पीछे छूट गई। बहुत कुछ गंवाने के बाद 2012 में जब दूसरे सुधारो का कौल लिया तो उसकी राजनीतिक ताकत छीज चुकी थी और जनता को इनके फायदे दिखाने का वकत नहीं बचा था। अफसोस! उस राजनेता के साहसी सुधार उसकी पार्टी की सियासत के काम कभी नहीं आए।... आज से एक दशक बाद जब इतिहास में आप यह पढ़ें तो समझियेगा कि डा. मनमोहन सिंह और कांग्रेस का जिक्र हो रहा है। आर्थिक सुधारों के डॉक्‍टर के  समय और सियासत के साथ सुधारों की केमिस्‍ट्री नहीं बना पाते। उनके सुधारों का लाभ उनके राजनीतिक विपक्ष को ही मिलता है।
संकट के सूत्रधार 
पैसों के पेड़ पर लगने का सवाल बड़ा मजेदार है। लेकिन इसे तो सरकार के राजनीतिक नेतृत्‍व से पूछा जाना चाहिए। यूपीए के नए राजनीतिक अर्थशास्‍त्र ने पिछले सात साल में राजकोषीय संतुलन का श्राद्ध कर दिया। इक्‍कीसवीं सदी का भारत जब तरक्‍की के शिखर पर था तब कांग्रेस का आर्थिक चिंतन आठवें दशक की कोठरी में घुस गया। देश की आर्थिक किस्‍मत साझा कार्यक्रमों और राष्ट्रीय सलाहकार परिषदों जैसी सुपर सरकारों ने तय की जिन्‍हें ग्रोथ और सुधार के नाम पर मानो ग्‍लानि महसूस

Monday, September 17, 2012

सुधारों का स्‍वांग



ग्रोथ की कब्र पर सुधारों का जो नया झंडा लगा है उससे उम्‍मीद और संतोष नहीं बलिक ऊब होनी चाहिए। अब झुंझलाकर यह पूछने का वक्‍त है कि आखिर प्रधानमंत्री और उनकी सरकार इस देश का करना क्‍या चाहती है। देश की आर्थिक हकीकत को लेकर एक अर्थशास्‍त्री प्रधानमंत्री का अंदाजिया अंदाज हद से ज्‍यादा चकित करने वाला है। यह समझना जरुरी है कि जिन आर्थिक सुधारों के लिए डॉक्‍टर मनमोहन‍ सिंह शहीद होना चाहते हैं उनके लिए न तो देश का राजनीतिक माहौल माकूल है और दुनिया की आर्थिक सूरत। देश की अर्थव्‍यवस्‍था को तो पर्याप्‍त ऊर्जा, सस्‍ता कर्ज और थोड़ी सी मांग चा‍हिए ताकि ग्रोथ को जरा सी सांस मिल सके। पूरी सरकार के पास ग्रोथ लाने को लेकर कोई सूझ नहीं है मगर कुछ अप्रासंगिक सुधारों को लेकर राजनीतिक स्‍वांग जरुर शुरु हो गया है, जिससे प्रधानमंत्री की साख उबारने का जतन किया जा रहा है।
कौन से सुधार 
कथित क्रांतिकारी सुधारों की ताजी कहानी को गौर से पढि़ये इसमें आपको सरकार की राजनीति और आर्थिक सूझ की कॉमेडी नजर आएगी। यह भी दिेखेगा कि अर्थव्‍यवस्‍था की नब्‍ज से सरकार का हाथ फिसल चुका है। एक गंभीर और जरुरी राजनीतिक सूझबूझ मांगने वाला सुधार किस तरह अंतरराष्‍ट्रीय तमाशा बन सकता है, खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश इसका नमूना है। दुनिया के किस निवेशक को यह नहीं मालूम कि भारत का राजनीतिक माहौल फिलहाल मल्‍टीब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश के माफिक नहीं है। अपना इकबाल गंवा चुकी एक लुंज पुंज गठबंधन सरकार

Monday, September 10, 2012

ताकतवर होने का डर


क्‍या आपने ऐसे कानून के बारे में सुना है जो अपराध के संदिग्‍धों को ही जांच के दायरे से बाहर रखता हो ? वह टैक्‍स सिस्‍टम कैसा होगा जिसमें बड़े निवेशकों की सुविधा के लिए टैक्‍स का सिद्धांत ही बदल दिया जाए? क्‍या आपने ऐसा दौर कभी देखा है जब पूरी दुनिया वित्‍तीय जरायम को रोकने के लिए अपने टैक्‍स कानूनों को ताकत दे रही हो तब एक उभरती हुई अर्थव्‍यवस्‍था टैक्‍स कानूनों के नख दंत उखाड़ कर उन्‍हें मरियल बनाने में जुट जाए। भारत में ऐसा ही होने जा रहा है। देशी विदेशी रास्‍तों से भारी टैक्‍स चोरी रोकने के नियम यानी जनरल एंटी अवाइंडेस रुल् (गार) का तीन साल के लिए कोल्‍ड स्‍टोरेज में जाना तय है। इसके बाद यह अंदाजना कठिन नहीं है कि काला धन रोकने और टैक्‍स हैवेन से पैसा लाने का सरकारी कौल कितना खोखला और नपुंसक हैमुट्ठी भर विदेशी निवेशक एक संप्रभु देश के टैक्‍स कानून पर भारी हैं।
टैक्‍स हैवेन मॉडल 
गार के टलने के बाद अब दुनिया को एक नए टैक्‍स दर्शन के लिए तैयार हो जाना चाहिए। भारत वित्‍तीय जरायम टैक्‍स चोरी के कानूनों में नया पहलू जोड़ने जा रहा है। भारत के कर कानूनों मे टैक्‍स हैवेन देशों को विशेष आरक्षण मिलेगा।  गार को टालने की सिफारिश करने वाल पार्थसारथी शोम समिति की राय है कि मारीशस से आन वाला निवेश गार की जांच के दायरे से बाहर रहे। यानी कि जिस रास्‍ते से भारत में सबसे ज्‍यादा निवेश आता है और जहां से टैकस चोरी का सबसे बड़ा शक है उसे ही जांच से बाहर रखा जाए। यही नहीं समिति तो यह भी कह रही है कि विदेशी निवेशकों को इस अनोखी छूट के बदले देशी निवेशकों को भी शेयर आदि में निवेश पर टैक्‍स (कैपिटल गेंस) से छूट दे दी जाए। यानी कि विदेशी भी कानून से मुक्‍त और देशी भी। यह तो टैक्‍स हैवेन

Monday, September 3, 2012

सीनाजोरी का अर्थशास्‍त्र



मेरी कमाई देश में है। एक भी पैसा देश से बाहर से नहीं गया यानी सरकार को कोई घाटा नहीं हुआ। क्‍या मैं टैक्‍स देने से मना कर सकता हूं ?? कंपनियों को मुफ्त में कोयला खदान देने से देश को नुकसान न होने की सरकारी दलील पर अगर आपके दिमाग में ऐसा कोई सवाल उठे तो आप कतई गलत नहीं हैं। कंपनियों को मिली खदानों कोयला धरती के गर्भ में सुरक्षित होने से सरकार को कोई यदि नुकसान नहीं दिखता तो फिर आप भी कमाइये, देश में खर्च कीजिये और टैक्‍स मत दीजिये। सरकार को क्‍या नुकसान हो रहा है। पैसा तो देश में ही है। कोयला खदानों की मुफ्त बंदरबांट में देश को हानि न होने की यह सूझ उस नए अर्थशास्‍त्र का हिस्‍सा है जिसे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की टीम देश के गले उतारना चाहती है। यह दागदार हिसाब संपत्तियों के मूल्‍यांकन के शास्‍त्रीय से लेकर बाजारवादी सिद्धांतों तक का गला घोंट देता है और राजस्‍व का नुकसान आंकने के बजटीय सिद्धांतों को दफ्न कर देता है। सरकार के समझदार मंत्री देश को शर्मिंदा करने वाला यह अर्थशास्‍त्र सिर्फ इसलिए पढ़ा रहे हैं ताकि प्राकृतिक संसाधनों को बांटने के अधिकार की कीमत वसूलने वाले नेताओं (रेंट सीकिंग) और उनकी चहेती कंपनियों (क्रोनी कैपटिलिज्‍म) के बीच  गठजोड़ को सही साबित किया जा सके। यह चोरी के बाद सीनाजोरी का अर्थशास्‍त्र है।
दागी गणित 
सरकार और कांग्रेस देश को शायद सिरे से मूर्ख समझती है। वह देश के सामान्‍य आर्थिक ज्ञान का मखौल बना रही है। सदियों से बाजारी, कारोबारी और संपत्ति के हिसाब  में तपे हुए इस देश का एक अदना सा किसान भी जानता है कि

Monday, August 27, 2012

संविधान से डरी सरकार


संवैधानिक संस्‍थाओं से डरी हुई सरकार देखी है आपने। भारत में आजकल ऐसी सरकार की नुमाइश चल रही है। डा.भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा की बहस में जिस ऑडिटर जनरल को संविधान का सबसे महत्‍वपूर्ण अधिकारी कहा था। सरकार की कमाई खर्च के निगहबान इस अधिकारी का दायित्‍व, अंबेडकर की निगाह मेंन्‍यायपालिका से भी ज्‍यादा बड़ा था, उसने पूरी सरकार को डर से भर  दिया है। खिसियाये मंत्री सरकारी ऑडीटर को ही उसकी सीमायें बता रहे हैं। मंत्रियों को जेल भेजता, जांच एजेसियों लताड़ता,  अधिकारियों को हटाता , पीएमओ को सवालों में घेरता, राज्यपालों को संविधान सिखाता और जंग लगे कानूनों को नकारता सुप्रीम कोर्ट का एक शुभ संकेत है। लेकिन सरकार अदालत से इस कदर घबराई है कि न्‍यायपालिका को सबक देने की जुगत में है। देश इस समय गवर्नेंस की उलटबांसी पढ़ रहा है। उदारीकरण के बाद बेताब हुए बाजार को संभालने के लिए ताकतवर, दो टूक, पारदर्शी, प्रभावी और निष्‍पक्ष, नई संस्‍थायें तो मिली नहीं अलबत्‍ता सरकार खुद संविधान और उसकी पारंपरिक संस्‍थाओं की नीयत पर सवाल उठाने लगी है। बदलते आर्थिक परिवेश के बीच इन पुरानी संस्‍थाओं की नई सक्रियता ने सियासत को अनजाने हादसों के डर से भर दिया है। संविधान से डरी सरकारें बड़ी जोखिम भरी होती है।
ऑडिट का खौफ 
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के ऑडिट आज सरकार की आफत क्‍यों बन गए? सीएजी तो भारत में ब्रितानी ताज का राज शुरु होने के बाद खुले सबसे पहले दफ्तरों में एक था। तब से हजारों ऑडिट हो चुके हैं। अभी कुछ दो तीन वर्ष पहले तक सीएजी उबाऊ, आंकड़ाबाज और हिसाबी किताबी संस्थान माना जाता था। उसकी रिपोर्ट  संसदीय औपचारिकता थीं और ऑडिट टिप्पणियों पर सरकारी विभाग उबासी लेते थे। मगर सरकारी ऑडीटर सरकार के लिए इतना खौफनाक हो गया कि खुद वित्‍त मंत्री कोयला खदान आवंटन पर सीएजी की उस रिपोर्ट को खारिज कर रहे हैं जो अब संसद की संपत्ति बन चुकी है। दरअसल हमें संविधान निर्माताओं पर रश्‍क करना चाहिए कि उन्‍होंने एक मुनीम जैसी संस्‍था

Monday, August 20, 2012

उदारीकरण का ऑडिट


प्राकृतिक संसाधनों की खुली बंदरबांट, कुछ भी करने को तैयार निजी क्षेत्र और एक एक कंपनी टर्नओवर के बराबर संपत्ति वाले राजनेता !!!!  यह सब देखकर अगर आर्थिक उदारीकरण को बिसूरने का मन करता है तो आप गलत नहीं है। गुलाम अतीत, राजनीति से बोझिल व्यवस्था, लचर कानून, जरुरी सुविधाओं की कमी और जबर्दस्त अवसरों वाले समाज में उदारीकरण शायद ऐसी ही आफत लाता है। प्राकृतिक संसाधन किसी भी देश की तरक्की की बुनियाद होते हैं लेकिन संसाधनों को संभालने वाले कानून अगर बोदे हों और निगहबान भ्रष्ट, तो खुला बाजार दरअसल खुली लूट बन जाता है। संवैधानिक संस्थाओं का शुक्रगुजार होना चाहिए वह हमें हमारे आर्थिक खुलेपन का बदसूरत चेहरा दिखा रही हैं। सीएजी की रिपोर्टें भारत के उदारीकरण की दो टूक समीक्षा हैं।
अराजक राज
खदान, खनिज, जमीन, स्पेक्‍ट्रम जैसे प्राकृतिक संसाधन आर्थिक विकास की बुनियादी जरुरत हैं। श्रम और पूंजी देश से बाहर से लाए सकते है मगर प्राकृतिक संसाधनों का आयात नहीं हो सकता। इसलिए पूंजी सबसे पहले इनके पीछे दौड़ती है ताकि इन्हें लेकर बाजार में बढ़त हासिल की जा सके। समझदार सरकारें देश के प्राकृतिक संसाधनों को बाजार के साथ बड़ी चतुराई से बांटती हैं। संसाधनों की वाणिज्यिक कीमत का तथ्यांत्मक व शोधपरक आकलन होता है‍। भविष्य की संभावनाओं का पूरा गुणा भाग करते हुए यह आंका जाता है कितने संसाधन विकास की जरुरत हैं और कितने बाजार की। इनके आधार पर सरकारें बाजार से इसकी सही कीमत कीमत तय करती है और बाजार से वह कीमत वसूली जाती है क्यों कि बाजार इनके इस्तेमाल की कीमत उपभोक्ता से लेता है। प्राकृतिक संसाधन, बाजार और पूंजी का यह ग्लोबल रिश्ता , उदारीकरण के साथ भारत भी पहुंचा मगर यहां एक अनोखा

Monday, August 13, 2012

ब्रिटेन की अगली मेजबानी



जाने भी दीजिये ब्रांड लंदन !!! हमें तो यह देखना है ब्रिटेन की मेजबानी में ओलंपिक के बाद क्‍या होने वाला है …!  एक ग्‍लोबल कंपनी के मुहफट मुखिया ने यह बात ठीक उस समय कही जब प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन ओलंपिक को ब्रिटेन की आर्थिक तरक्‍की का मुकुट बता रहे थे। कैमरुन सरकार  ओलंपिक मेडल्‍स में ब्रिटेन की खेल ताकत दिखा रही थी तो निवेशक लंदन की वित्‍तीय साख पर दागों की लिस्‍ट बना रहे थे और ओलंपिक के भव्‍य उद्घाटन से निगाहें हटाकर ब्रिटेन की भयानक मंदी की आंकड़े पढ़ रहे थे। शताब्दियों से पूरी दुनिया के बैंकर रहे लंदन के बैंक घोटालों की नई नई किस्‍मे ईजाद कर रहे हैं और ब्रिटेन की अर्थव्‍यवस्‍था की यूरोजोन से जयादा बुरी हालत में है। ब्रिटेन विश्‍व की वित्‍तीय नब्‍ज संभालता है इसलिए बाजारो में डर की नई सनसनी है। यूरोप की चुनौतियां यूरोजोन से बाहर निकल कर ब्रिटेन के रास्‍ते ग्‍लोबल बैकिंग में फैल रहीं हैं। ओलंपिक के बाद यूरोपीय संकट की जो पदक तालिका बनेगी उसमें ब्रिटेन सबसे ऊपर होगा।
तालियों का टोटा
अमेरिका व चीन के बाद ओलंपिक की तीसरी ताकत होते हुए भी ब्रिटेन दरअसल तालियों को तरस गया। क्‍यों कि ऐन ओलंपिक के मौके पर लंदन दुनिया को तरह तरह के घोटाले और अपनी साख ढहने की खबरें बांट रहा था। 241 ग्‍लोबल बैंकों का गढ़ लंदन विश्‍व का वित्‍तीय पावर हाउस है। यहां हर रोज करीब 1.4 ट्रिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा और ब्‍याज दर सौदे होते हैं, जो इस तरह के विश्‍व कारोबार का का 46 फीसदी है। बैंकरों, बीमा कंपनियों, हेज फंड, ब्रोकरों, रिसर्च फर्म से लंद फंदे लंदन के वित्‍तीय कारोबारी जोन (फाइनेंशियल डिस्टि्क्‍ट) में सेकेंडों में अरब डॉलर इधर से उधर होते है। बीते सप्‍ताह जब ओलंपिक का झंडा चढ़ रहा था तब ब्रिटेन वित्‍तीय पारदर्शिता का परचम उतरने

Monday, August 6, 2012

सूखे का मौका


सूखा आ गया है यानी सरकारों को महसूस करने का मौका आ गया है।  पिछले दो साल में हमें सरकारें नहीं दिखीं हैं या अगर दिखीं हैं तो सिर्फ अपना मुंह छिपाती हुई। लेकिन अब  अगर देश में सरकारें हैं तो उन्‍हें अब खुद को साबित करने के लिए सड़क पर आ जाना चाहिए। पिछले एक दशक में यह तीसरा सूखा है जो सबसे अलग, बेहद पेचीदा किस्‍म का है। नीतियों के शून्‍य, ग्रोथ की ढलान, बहुआयामी उलझनों के बीच नियति ने चुनौती की कहानी को एक नया ट्विस्‍ट दिया है। यह सूखा खेत से निकल कर सरकार के खजाने तक जाएगा और बैंकों के खातों से होता हुआ बाजार तक आएगा। इसलिए यह सरकारों के बुद्धि और विवेक का सबसे तगड़ा इम्‍तहान लेने वाला है। केंद्र की गैरहाजिर और प्रभावहीन सरकार के लिए यह आपदा दरअसल लोगों से जुड़ने का एक अवसर है। वरना तो भारत के इतिहास में सूखा दरअसल लूट का नया मौका ही होता है।
तब और अब 
अपने 137 साल के इतिहास में भारतीय मौसम विभाग कभी भी मानसून की विफलता नहीं बता सका। पिछले सौ वर्षों में 85 फीसदी मानूसन सामान्‍य रहे हैं इसलिए मानूसन को सामान्‍य कहना मौसम विभाग आदत बन गई है। इस मानसून का झूठ हमें देर तक सुनना पड़ा, क्‍यों कि देश को सूखा बताने का फैसला भी सियासत करती है यह पिछले एक दशक का तीसरा सूखा है। 2002-03 और 2009 की तुलना में यह हीं से कमजोर नहीं है। सूखे की गंभीरता को सामान्‍य से कम बारिश से स्‍तर से नापते हैं। इस अगस्‍त तक सामान्‍य से औसतन 19 फीसदी कम पानी बरसा है जबकि देश की अनाज पट्टी में बारिश की कमी 37 फीसदी तक है। अभी सितंबर बाकी है, जब अल निनो (समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि) असर करेगा। पिछले 40 साल में जो पांच बड़े सूखे

Monday, July 30, 2012

सुब्‍बाराव के बाल


रिजर्व बैंक गवर्नर डी सुब्‍बाराव अपने बालों से परेशान हैं। जब उनके सर पर घने बाल थे तब वह सैलून पर 25 रुपये देते थे। दस साल पहले तक वह 50 रुपये में बाल कटा लेते थे। मगर अब उनके सर पर बालों के अवशेष मात्र हैं, तो सैलून वाला 150 रुपये लेता है। उन्‍हें यह समझ में नहीं आता कि भारत में महंगाई कैसे बढ़ती है और कीमतों को किस तरह से नापा जा रहा है। बेचारे रिजर्व बैंक गवर्नर!  नाप जोख की यह मुसीबत तो सूखा, बा‍रिश, ग्रोथ, मांग, ब्‍याज दरों का लेकर भी है।  हमारे आर्थिक आंकड़ो की बुनियादी किताब ठीक उस वक्‍त गुम हो गई है जब हम एक जटिल, अस्थिर और चुनौतीपूर्ण आर्थिक माहौल में घिरे है। सरकार के तमाम विभागों और दिमागों के बीच आंकड़ों के असमंजस ने नीतिगत फैसलों की प्रक्रिया को ही अगवा कर लिया है। ब्‍याज दरों में कमी को लेकर भ्रम है। महंगाई को लेकर मतभेद हैं। औद्योगिक उत्‍पादन घटने बढ़ने की गणना धोखे से भरी है और सूखा है या नहीं इस पर सरकार अब तक पहलू बदल रही है। नीतियों की गाड़ी पहले से ठप थी अब दागी और घटिया आंकड़ो का भारी पत्‍थर भी इसके सामने आ गया है।
महंगाई की नाप जोख
महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक गवर्नर (राष्‍ट्रीय सांख्यिकी दिवस संबोधन) की हैरत दरअसल अब एक मुसीबत है। भारत में महंगाई आंकड़ों अंतर इतना पेचीदा हो चुका है कि इसमें फंस कर जरुरी फैसले रुक गए हैं। । सरकार के भीतर महंगाई के कई सरकारी आंकडे तैर रहे हैं। ब्‍याज दरों में कमी के लिए मुद्रास्‍फीति की मूल दर को आधार बनाया जाता है जिसे पॅालिसी इन्‍फ्लेशन कहते हैं। इसकी गणना में खाद्य उत्‍पादों की कीमतें शामिल नहीं होतीं। यह दर पांच फीसदी पर है। अर्थात रिजर्व बैंक इसे माने तो ब्‍याज दर

Monday, July 23, 2012

लाइबोर के चोर


रे उन्‍होंने लाइबोर चुरा लिया!! लाइबोर क्‍या ?? लाइबोर यानी दुनिया के वित्‍तीय सिस्‍टम की सांस लाइबोर यानी कि ग्‍लोबल बैंकिंग का सबसे कीमती आंकड़ा!  दुनिया भर में बैंक कर्ज पर ब्‍याज दर तय करने का दैनिक पैमाना। लाइबोर जिसे देखकर टोकियो से न्‍यूयार्क तक और वेलिंगटन से सैंटियागो तक बैंक रोज अपनी दुकानें खोलते हैं। लाइबोर, (लंदन इंटरबैंक ऑफर्ड रेट-ब्‍याज दर) जो रोज यह तय करता है कि दुनिया भर की कंप‍नियां, उपभोक्‍ता, सरकारों को करीब 10 मुद्राओं में अलग अलग तरह के कर्ज किस ब्‍याज दर पर दिये जाएंगे। दुनिया में करीब 800 ट्रिलियन डॉलर का वित्‍तीय कारोबार जिस सबसे अहम पैमाने बंधा है, उस लाइबोर को, एक दर्जन छंटे हुए बैंक उड़े। उनके फायदे के लिए लाइबोर दो साल तक झूठे आंकडो के आधार पर मनमाने ढंग से तय हुआ और और पूरी दुनिया निरी बेवकूफ बनती रही। पूरा वित्‍तीय जगत सन्‍न है। लाइबोर की चोरी वित्‍तीय दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा संगठित संगठित वित्‍तीय अपराध साबित हो रहा है, पहले से ही बदनाम ग्‍लोबल बैंकिंग की पूरी संस्‍कृति ही अब दागी हो गई है। एक पुरानी अमेरिकी कहावत को सच लग रही है कि बैंकों में लुटेरों को नौकरी देने की जरुरत नहीं है, यह काम तो बैंकर खुद कर सकते हैं।
बैंक की नोक पर
वित्‍तीय बाजारों में कहावत है कि आप लाइबोर में कोई दिलचस्‍पी न रखते हों लेकिन लाइबोर आपमें पूरी रुचि रखता है। लंदन की घडि़यों में रोज सुबह 11 बजे 11.10 तक का वक्‍त पूरी दुनिया की बैंकिंग उद्योग के लिए सबसे कीमती होता है। इस दस मिनट के भीतर यह तय हो जाता है कि उस सरकारों लेकर  उपभोक्‍ताओं तक के बैंक कर्ज से लेकर जटिल वित्‍तीय निवेशों (डेरीवेटिव) पर क्‍या ब्‍याज दर लगेगी। लाइबोर को देखकर विश्‍व के बैंक अलग अलग तरह के कर्जों पर अपनी ब्‍याज दरें तय करते हैं। लाइबोर का दैनिक उतार चढा़व बैंकों की वित्‍तीय सेहत का प्रमाण होता है। ऊंची लाइबोर (ब्‍याज) दर बैंकों की खराब सेहत और निचली दर बैंकों की खुशहाली का सबूत है। लाइबोर जटिल हो सकता है लेकिन इसका घोटाला बड़ी आसानी

Monday, July 16, 2012

पिछड़ने की कला

फिसड्डी होने के लिए दौड़ना कतई जरुरी नहीं है। हारने के कई नायाब तरीके भी होते हैं। मसलन दौड़ ही बंद करा दी जाए। या दौड़ने के तरीकों पर कमेटियां बिठा दी जाएं। अथवा दौड़ की तैयारी को इतना कनफ्यूज कर दिया जाए कि स्‍पर्धा का वक्‍त गुजर जाए। इसके बाद दौड़ने की जहमत भी नहीं उठानी पड़ती और हारना आदत बन जाता है। भारत की सरकार ने पिछले आठ वर्षों में हारने के लिए दरअसल इन्‍हीं बेजोड़ नुस्‍खों का इस्‍तेमाल किया है। फैसलों पर ऊंघते मंत्रिसमूह, एक दूसरे के प्रस्‍तावों में टंगड़ी फंसाते विभाग, राजकाज के तरीकों पर लड़ती संस्थायें और विवादित होते नियामक !.... पिछले आठ साल भारत ऐसे ही चल रहा है। भारत को क्रांतिकारी सुधारों कमी ने नहीं बल्कि गवर्नेंस के एक निहायत नाकारा तरीके ने विकलांग कर दिया है। भारत का नेतृत्‍व दुनिया की निगाह में फिसड्डी (अंडरअचीवर) इसलिए है क्‍यों कि सरकार को संकट का इलहाम हुए काफी वक्‍त बीत चुका है मगर   घटिया, लटकाऊ और लचर गवर्नेंस की लत इतनी मजबूत है कि पिछले एक माह में उम्‍मीद को दो बूंद पानी देने वाला एक फैसला नहीं हुआ।
गवर्नेंस का पत्‍थर   
यूपीए ने पिछले एक आठ साल में राजकाज के एक बिल्‍कुल अनसुने तरीके का ईजाद किया। मंत्रियों की समिति, सचिवों की समिति और विशेषज्ञ समितियों के जरिये फैसले करने (दरअसल रोकने) की नई पद्धति ने देश को वस्‍तुत: ठप कर दिया। यह फैसले न करने वाली सरकार का जन्‍म था,  वह भी  ठीक उस वक्‍त पर जब देश और तेज फैसलों की उम्‍मीद बांधे बैठा था। गार (कर चोरी रोकने के सामान्‍य नियम) के नियमों पर इसी सप्‍ताह (छह माह में) तीसरी समिति बैठ गई है। यह हाल उस मुद्दे का है जिस पर प्रधानमंत्री सबसे ज्‍यादा फिक्रमंद थे और प्रणव मुखर्जी के रुखसत होते ही सक्रिय हो गए थे। एक विशालकाय केंद्रीय कैबिनेट के अंतर्गत और सामानांतर करीब 27 मंत्रिसमूह , दवा, अनाज, जंगल, सरकारी कंपनियों का विनिवेश, गैस, महिलाओं के उत्‍पीड़न, भ्रष्‍टाचार, मंत्रियों के विवेकाधिकार खत्‍म करने तक दर्जनों प्रस्‍ताव इन समितियों फाइलों में बंद हैं। पिछले चार साल से किसी मंत्रिसमूह किसी भी नीति या प्रस्‍ताव को मंजूरी की मेज तक नहीं पहुंचाया है। प्रणव मुखर्जी सरकार छोड़ने तक 13 मंत्रिसमूहों और 12 अधिकार प्राप्‍त समूहों के मुखिया थे। यह गवर्नेंस इतनी महंगी क्‍यों पड़ी इसे समझना जरुरी है। 2005-06 में ग्रोथ के शिखर पर बैठा देश केवल सरकारी मंजूरियों में तेजी चाहता था। ठीक ऐसे मौके पर मनमोहन सरकार ने गवर्नेंस के पैरों में मंत्रिसमूहों के पत्‍थर बांध दिये। सरकार में  मंत्रिमंडल सर्वशक्तिमान होता है। विभाग या मंत्रालय कैबिनेट को प्रस्‍ताव भेजते हैं जिन पर हरी झंडी मिलती है। सरकारें वर्षों से ऐसा करती आईं हैं। लेकिन मंत्रिसमूहों और समितियों के नए तरीके ने कैबिनेट से इतर निर्णय के नए स्‍तर बना दिये। कई जगह मंत्रियों की समिति के नीचे सचिवों की समिति और फिर अलग से विशेषज्ञ समि‍ति भी बन गईं!!  यानी कि विभाग से लेकर कैबिनेट तक जाने के चार या पांच स्‍तर। अगर इसके बाद अगर संसद से मंजूरी लेनी हो तो फिर संसदीय समिति और संसद के दरवाजे एक्‍सट्रा। सिंगल विंडो क्लियरेंस की उम्‍मीद लगाये भारत की नीतियां और फैसले, कुछ इस तरह से समितियों की अंधी गलियों में खो गए। गवर्नेंस का दूसरा काला पक्ष यह भी है कि जब आर्थिक मशीन को तेल पानी देने जैसे आसान फैसलों (बिजली के लिए कोयला आपूर्ति) पर मंत्रिसमूह बैठ रहे थे तब स्‍पेक्‍ट्रम, खदाने और ठेके बांटने बड़े बड़े फैसले घंटो में हो रहे थे। नतीजन फैसले न लेने का भी दाग लगा और और दागी फैसलों का भी।

Monday, July 9, 2012

नई दरारें, गहरे जोखिम


क्‍या  हम हिंदुस्‍तानी अपनी आर्थिक मुश्किलों में जरा भी मॉडर्न नहीं हुए? यूरोप को देखो क्‍या हाई प्रोफाइल, फ्रेश मुसीबतों से दो चार है और हम बाबा के जमाने की समस्‍याओं पर मगज खर्च कर रहे हैं। यह फब्‍ती अर्थशास्‍त्र के एक मनचले छात्र की थी। वह भारत में घाटे, सब्सिडी जैसी पुरानी चर्चाओं से ऊब कर क्रेडिट डिफॉल्‍ट स्‍वैप (कर्ज में चूकने का बीमा),  हेयरकट (आंशिक कर्ज माफी) जैसी जटिल नई यूरोपीय उलझनों पर फिदा हुआ जा रहा था।.. गुरु जी ने टोका! ऐसा नहीं कहते बेटा! हमने भी बहुत तरक्‍की की है। पहले कभी सुना था कि भारत के बैंकों के पास पैसे की इतनी कमी पड़ जाएगी कि  उनका काम बीमा और म्‍युचुअल फंड कं‍पनियों से कर्ज लेकर चलेगा ? अथवा आधुनिक वित्‍तीय कंपनियां ही लोगों को सोने जैसे दकियानूसी निवेश का दीवाना बनाने लगेंगी जिससे पूरा वित्‍तीय नेटवर्क को खतरे में फंस जाएगा। रिजर्व बैंक की ताजी फाइनेंशियल स्‍टेबिलिटी रिपोर्ट सबूत है कि भारत का वित्‍तीय तंत्र अब नए किस्‍म के जोखिमों में तैर रहा है। यह दरारें ऊपर से नहीं दिखतीं, मगर भीतर से बड़ी गहरी हैं।
बैंकों पर कर्ज  
भारत के बैंक कभी वित्‍तीय बाजार को अपनी उंगली पर नचाते थे मगर आज यह रोजमर्रा की पूंजी के लिए बीमा व म्‍युचुअल फंड कंपनियों से कर्ज के मोहताज हैं। यह एक नए तरह की (लिक्विडिटी डे‍फशिट) समस्‍या है और एक ऐसा खतरा है जिसके असर सोचकर रिजर्व बैंक भी दुबला हुआ जा रहा है। बैंकों के इस नए सिनेमा की पटकथा जमाकर्ताओं ने लिखी है, जो जमा पर घटती ब्‍याज दर के कारण बैंकों में पैसा रखने में बहुत इच्‍छुक नहीं दिखते। भारत का बैंकिंग उद्योग जमाकर्ताओं के भरोसे की कथा सुनाते थकते नहीं था लेकिन 2011-12 में बैकों की जमा वृद्धि दर दस साल के सबसे निचले 

Monday, July 2, 2012

याद हो कि न याद हो


ह जादूगर यकीनन करामाती था। उसने सवाल उछाला। कोई है जो बीता वक्‍त लौटा सके। .. मजमे में सन्‍नाटा खिंच गया। जादूगर ने मेज से यूपीए सरकार के पिछले बजट उठाये और पढ़ना शुरु किया। भारी खर्च वाली स्‍कीमें, अभूतपूर्व घाटेभीमकाय सब्सिडी बिलकिस्‍म किस्‍म के लाइसेंस परमिट राज, प्रतिस्‍पर्धा पर पाबंदी,.... लोग धीरे धीरे पुरानी यादों में उतर गए और अस्‍सी के दशक की समाजवादी सुबहें, सब्सिडीवादी दिन और घाटा भरी शामें जीवंत हो उठीं। यह जादू नही बल्कि सच है। उदार और खुला भारत अब अस्सी छाप नीतियों में घिर गया है। यह सब कुछ सुनियोजित था या इत्तिफाकन हुआ अलबत्‍ता संकटों की इस ढलान से लौटने के लिए भारत को अब बानवे जैसे बड़े सुधारों की जरुरत महसूस होने लगी है। इन सुधारों के लिए प्रधानमंत्री को वह सब कुछ मिटाना होगा जो खुद उनकी अगुआई में पिछले आठ साल में लिखा गया है।
बजट दर बजट
ढहना किसे कहते हैं इसे जानने के लिए हमें 2005-06  की रोशनी में 2011-12 को देखना चाहिए। संकटों के सभी प्रमुख सूचकांक इस समय शिखर छू रहे हैं। जो यूपीए की पहली शुरुआत के वक्‍त अच्‍छे खासे सेहत मंद थे। राजकोषीय घाटा दशक के सर्वोच्‍च स्‍तर पर (जीडीपी के अनुपात में छह फीसद) है और विदेशी मुद्रा की आवक व निकासी का अंतर यानी चालू खाते का घाटा बीस साल के सबसे ऊंचे स्‍तर (4.5 फीसद) पर। ग्रोथ भी दस साल के गर्त में है। राजकोषीय संयम और संतुलित विदेशी मुद्रा प्रबंधन भारत की दो सबसे बडी ताजी सफलतायें थीं, जिन्‍हें हम पूरी तरह गंवा चुके हैं।  ऐसा क्‍यों हुआ इसका जवाब यूपीए के पिछले आठ बजटों में दर्ज है। उदारीकरण के सबसे तपते हुए वर्षों में समाजवादी कोल्‍ड स्‍टोरेज से निकले पिछले बजट ( पांच चिदंबरम चार प्रणव) भारत की आर्थिक बढ़त को कच्‍चा खा गए। बजटों की बुनियाद यूपीए के न्‍यूनतम साझा कार्यक्रम ने तैयार की थी। वह भारत का पहला राजनीतिक दस्‍तावेज था जिसने देश के आर्थिक संतुलन को मरोड़ कर

Monday, June 25, 2012

मुसीबतों का पॉवर हाउस



नियति के देवता ने अमेरिका व यूरोप की किस्मत में शायद जब अमीरी के साथ कर्ज लिखा था या अफ्रीका को खनिजों के खजाने के साथ अराजकता की विपत्ति भी बख्शी थी तो ठीक उसी समय भारत की किस्मत में भी उद्यमिता के साथ ऊर्जा संकट दर्ज हो गया था। अचरज है कि पिछले दो दशक भारत के सभी प्रमुख आर्थिक भूकंपों का केंद्र ईंधन और बिजली की कमी में मिलता है।  मसलन , महंगाई की जड़ में  महंगी (पेट्रो उत्पाद व बिजली)  ऊर्जा!, रुपये की तबाही की पीछे भारी ऊर्जा (पेट्रो कोयलाआयात ! बजटों की मुसीबत की वजह बिजली बोर्डों के घाटे!, बैंकों के संकट का कारण बिजली कंपनियों की देनदारी ! पर्यावरण के मरण की जिम्मेदार डीजली बिजली और अंततऊर्जा की किल्लत की वजह से ग्रोथ की कुर्बानी!....  ऊर्जा संकट का बड़ा  खतरनाक भंवर अर्थव्यवस्था की सभी ताकतों को एक एक कर निगल रहा है। और कारणों की छोडि़ये, हम तो अब तो  लक्षणों का इलाज भी नहीं कर पा रहे हैं।
कितने शिकार
2016 में कच्चा तेल ही नहीं बल्कि कोयले की दुनियावी कीमत बढ़ने पर भी हमारा दिल बैठने लगेगा। बारहवी पंचवर्षीय योजना का मसौदा व ताजा आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि चार साल बाद भारत (246 अरब टन के घरेलू भंडार के बावजूदअपनी जरुरत का एक चौथाई (करीब 23 फीसद) कोयला आयात करेगा। तब तक 80 फीसद तेल और 28 फीसद गैस की जरुरत के लिए विदेश पर निर्भर हो चुके होंगे। इस कदर आयात के बाद रुपये के मजबूत होने का मुगालता पालना बेकार है। महंगाई का ताजा जिद्दी दौर भी बिजली कमी की पीठ

Monday, June 18, 2012

यूरोप का खौफ खाता


स्‍पेन के वित्‍त मंत्री क्रिस्‍टोबाल मोंटेरो कार से उतर कर वित्‍त मंत्रालय की इमारत की तरफ बढे ही थे कि पत्रकारों व सुरक्षा कमिर्यों की भीड को चीरते हुए एक अधेड़ महिला आगे आई ओर मोंटेरो से हाथ मिलाते हुए बोली..   मि. फाइनेस मिनिस्‍टर! मैं स्‍पेन की नागरिक हूं। बहुत डरी हुई हूं। मेरा पैसा बैंकिया (प्रमुख स्‍पेनी बैंक) में जमा है। क्‍या मुझे पूरा पैसा निकाल लेना चाहिए। 
नहीं!  . वित्‍त मंत्री मोंटेरो ने जवाब दिया
क्‍या आप पूरी तरह आश्‍वस्‍त हैं ?.. महिला ने जोर देकर पूछा
हां हां बिलकुल!  .. मोंटेरो ने जवाब दिया।
मैंने पूरी जिंदगी काम किया है। अगर कोई मेरा पैसा ले लेगा, तो मैं किसी को मार डालूंगी ... महिला ऊंची आवाज में बोली ... मोंटेरो तब तक आगे बढ गये थे।
एक निवेशक को यूट्यूब पर यह ताजा वीडियो दिखाते हुए वह विश्‍लेषक बोला, बेचारा यूरोप! बस इसी का तो खौफ था। यूरोप के समृद्ध इतिहास में दर्ज बैंकों की तबाही के किस्‍से स्‍पेन और ग्रीस में शहरों में खुद को दोहराने लगे हैं। बैंकों का डूबना, यूरोपीय समाज का सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक डर इसलिए है क्‍यों कि बैंकों से जमा निकालने लिए जनता की अफरा तफरी  (बैंक रन)  कुछ घंटों में एक ताकतवर मुल्‍क को पिद्दी सा देश (बनाना रिपब्‍ल‍िक) बना देती है। यूरोप सरकारें भी  अब सुधार व उद्धार छोड़ कर आपदा प्रबंधन में लग गई हैं। खौफ जायज भी है क्‍यों कि जब सरकारें दीवालिया हों और बैंक तबाह, तो उबरने की उममीदें भी खत्‍म हो जाती हैं। यही वजह है कि दुनिया मैक्सिको में दुनिया के 20 दिग्‍गजों (जी20) जुटान को नहीं बल्कि ग्रीस के चुनाव को देख रही है। ग्रीस के चुनाव परिणाम इसी सप्ताह यूरो का भविष्‍य तय कर देंगे।
भरोसे का डूबना   
150 साल में  करीब सत्रह बैंकिंग, कर्ज  मुद्रा संकटों के धनी स्‍पेन के बैंकों को जब बीते सप्‍ताह 100 अरब यूरो का कर्ज मिला तो यूरोप में बैंकों के फायर अलार्म बज उठे। यूरोजोन की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था (स्‍पेन) के ऑक्‍सीजन लगने के बाद अब यूरोप की सेहत बैकों में जमा व निकासी के आंकड़े से परखी जा रही है। इस साल में अब तक स्‍पेन के बैंकों से करीब 50 अरब यूरो निकाले जा चुके हैं। स्‍पेन का प्रमुख बैंक, बैकिया, ताजा राष्‍ट्रीकण से पहले  करीब एक अरब यूरो की जमा गंवा चुका था। इधर 14 व 15 मई को दो दिन में लोगों ने ग्रीस के बैंकों से 180 करोड़ यूरो , पुर्तगाल और इटली के हाल भी ऐसे ही है। बैंकिंग उद्योग मान रहा है कि यूरोप में एक स्‍लो बैंक रन (जमा की लगातार निकासी) शुरु हो गई है और साथ में पूंजी पलायन भी। स्‍पेन से करीब 100 अरब यूरो और इटली के बाजारों से करीब दस फीसदी पूंजी हाल में बाहर गई है। इस पूंजी के ठिकाने जर्मनी अमेरिका और स्विटजरलैंड के बैंक या बाजार हैं, जिनकी अर्थव्यवस्‍थायें कमोबेश सुरक्षित हैं। लेकिन इतने यूरो की आवक को देखकर स्विस व जर्मन सरकारें नई पाबंदिया लगाने वाली है। बैंक ऑफ इंग्‍लैंड के वर्तमान गर्वर्नर मर्विन किंग ने एक बार कहा था कि बैंक रन (डर में जमा की निकासी) की शुरुआत गलत है मगर एक बार जब यह शुरु हो जाए तो इसमें भाग लेना ही समझदारी है। ग्रीस के यूरो जोन से अलग होते ही बैंकों पर आफत टूटेगी। इसलिए यूरोप की सरकारें बैंक व एटीएएम से जमा की निकासी, देश से बाहर पैसा ले जाने की सीमायें और इलेक्‍ट्रानिक फंड ट्रांसफर की सीमायें तय करने की तैयारी में है।

Monday, June 11, 2012

ये ग्रोथ किसने मारी !

हली तिमाही 8 फीसद, दूसरी तिमाही 6.3, तीसरी तिमाही 6.1 और चौथी तिमाही 5.3 !!! इसे आर्थिक ग्रोथ का गिरना नहीं बल्कि ढहना कहते हैं। सिर्फ एक साल (2011-12) में इतनी तेज गिरावट यकीनन अनदेखी है। ऐसे तो ग्रीस भी नहीं ढहा, जिसकी त्रासदी को सरकार अपनी आर्थिक कुप्रबंध कॉमेडी का हिससा बना रही है। औद्योगिक उत्पादन की बढ़ोत्तरी पंद्रह साल में दूसरी बार शून्य से नीचे ! 41 साल में पहली बार खनन क्षेत्र में उत्पापदन वृद्धि शून्य्!  छह साल बाद बैंक जमा दर में पहली गिरावट! यह सब अभूतपूर्व कारनामे हैं जो भला ग्रीस या स्पेन की देन कैसे हुए? देशी नीतिगत गलतियों के ठीकरे के लिए जब सरकार जब ग्लोबल सरों की तलाश करती है तब यह शक करने का हक बनता है कि क्या टीम मनमोहन हकीकत में देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए बेचैन है। बेचैनी अगर सच है तो सरकार को वापसी के वह सूत्र क्यों नहीं दिखते जो उन्ही फाइलों के नीचे चमक रहें है जिन पर बैठकर प्रधानमंत्री मीटिंग मीटिंग खेल रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्‍था की ताजा मुसीबतें जिन दरवाजों से आई हैं बचने के रास्ते भी वहीं से खुलते हैं। इन रास्तों को गठबंधन का कोई घटक नहीं रोक रहा है। अर्थव्यवस्था की चिंचियाती मशीन में थोड़ा तेल पानी डालने के लिए सुधारों कोई बडे तीर नहीं मारने हैं।
वापसी के रास्ते
नजारे बड़े चौंकाने वाले हैं। देश की कंपनियां नकदी के पहाड़ पर बैठी हैं और निवेश बंद है। बीते साल की आखिरी तिमाही में प्रमुख कंपनियों (निजी व सरकारी) के पास 456,700 करोड़ रुपये की नकदी थी जो इससे पिछले साल के मुकाबले 21 फीसदी ज्या दा थी। अगर निवेश स्कीमों (‍लिक्विड फंड) में कंपनियों के निवेश को जोड़ लिया जाए तो नकदी के पर्वत की ऊंचाई 570,700 करोड़ रुपये हो जाती है। इनमें भी जब दस शीर्ष सरकारी कंपनियां 137,576 करोड़ रुपये की नकदी लिये सो रही हों तो सरकार के काम करने के तरीके पर खीझ आना लाजिमी है। इस जनवरी में प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पुलक चटर्जी ने सार्वजनिक उपक्रमों की बैठक बुलाकर उन्हें नकदी के निवेश के लिए कहा था मगर पत्ता तक नहीं

Monday, June 4, 2012

संकट के सूत्रधार


क थी अर्थव्‍यवस्‍था। बाशिंदे थे मेहनतीग्रोथ की कृपा हो गई। मगर आर्थिक ग्रोथ ठहरी कई मुंह वाली देवी। ऊर्जाईंधन उसकी सबसे बडी खुराक। वह मांगती गईलोग ईंधन देते गए। देश में न मिला तो बाहर से मंगाने लगे। ईंधन महंगा होने लगा मगर किसको फिक्र थी। फिर इस देवी ने पहली डकार ली। तब पता चला कि ग्रोथ का पेट भरने में महंगाई आ जमी है। ईंधन के लिए मुल्‍क पूरी तरह विदेश का मोहताज हो गया है। आयात का ढांचा बिगड़ गया है इसलिए देश मुद्रा ढह गई है। और अंतत: जब तक देश संभलता ग्रोथ पलट कर खुद को ही खाने लगी। यह डरावनी कथा भारत की ही है। एक दशक की न्‍यूनतम  ग्रोथजिद्दी महंगाईसबसे कमजोर रुपये और घटते विदेशी मुद्रा भंडार के कारण हम पर  अब संकट की बिजली कड़कने लगी है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अपनी बुनियादी गलतियों को गिनने का वक्‍त आ गया है। बिजली भयानक कमी और ऊर्जा नीति की असफलता ताजा संकट की सबसे बड़ी सूत्रधार है।   
डरावनी निर्भरता   
भारत का आयात एक हॉरर स्‍टोरी है। पिछले एक साल में देश का तेल आयात करीब 46 फीसदी बढ़ा और कोयले का 80 फीसदी। यह दोनों जिंस आयात की टोकरी में सबसे बडा हिससा घेर रहे हैं। दरअसल प्राकृ‍तिक संसाधनों को संजोनेबांटने और तलाशने में घोर अराजकता ने हमें कहीं का नही छोड़ा है। कोयले की कहानी डराती है। भारत की 90 फीसदी बिजली कोयले से बनती है और इस पूरे उजाले व ऊर्जा की जान भीमकाय सरकारी कंपनी कोल इंडिया हाथ में है जो इस धराधाम की सबसे बड़ी कोयला कंपनी है। पिछले दो साल में जब बिजली की मांग बढ़ी तो कोयला उत्‍पादन  घट गया। ऐसा नहीं कि देश में कोयला कम है। करीब 246 अरब टन का अनुमा‍नित भंडार है जिसइसके बाद कोल इंडिया की तानाशाही और कोयला ढोने वाली रेलवे का चरमराता नेटवर्क.. बिजली कंपनियां कोयला आयात न करें तो क्‍या करें। इसलिए कोयला भारत का तीसरा सबसे बड़ा आयात है। अगले पांच साल में कोयले की कमी 40 करोड़ टन होगीयानी और ज्यादा आयात होगा। पेट्रो उत्‍पादों का हाल और भी बुरा है। भारत अपनी 80 फीसदी से ज्‍यादा पेट्रो मांग के लिए आयात पर निर्भर है।  देश में घरेलू कच्‍चा तेल उत्‍पादन पिछले दो साल में एक-दो फीसद से जयादा नहीं बढ़ा। तेल खोज के लिए निजी कंपनियों का बुलाने की पहली कोशिश (नई तेल खोज नीति 1990) कुछ सफल रही लेकिन बाद में सब चौपट। कंपनियों के उत्‍पादन में हिस्‍सेदारी की पूरी नीति सरकार के गले फंस गई है। तेल क्षेत्र लेने वाली निजी कंपनिया उत्‍पादन घटाकर सरकार को ब्‍लैकमेल करती हैं। सरकार असमंजस मे हैं कि निजी कंपनियों के साथ  उत्‍पादन भागीदारी की प्रणाली अपनाई जाए या रॉयल्‍टी टैक्‍स की। अलबत्‍ता ग्रोथ की खुराक को इस असमंजस से फर्क नहीं पड़ताइसलिए पिछले दो साल में कीमतें बढ़ने के बाद भी पेट्रो उतपादों की मांग नहीं घटी। तेल आयात बल्लियों उछल रहा है।

Monday, May 28, 2012

रुपये के मुजरिम

स्ताद जी, रुपया ही क्यों खेत रहा ? भोले निवेशक ने चतुर ब्रोकर से पूछा। दलाल बोला चुप रहो जी, हमारी पुरानी पोल फिर खुल गई। और बहुत सतर्क रहो क्यों। कि इस बार मामला कुछ ज्याजदा ही संगीन है। बाजार की नब्ज थामे वह ब्रोकर बिल्कुल ठीक समझ रहा है। रुपये का मामला यकीनन संगीन है। विकलांग सरकार की संकट न्योता नीति रुपये को ही ले डूबी क्यों। कि रुपया भारत आर्थिक शरीर की सबसे कमजोर नस है। विदेशी मुद्रा प्रबंधन में इतना लोचा है कि 1991 के संकट लेकर आज तक, हम ज्यादा वित्ती्य मुसीबतें इसी दरवाजे से आई हैं और रुपये ने ही तबाही की कहानी बनाई है। शेयर बाजार में विदेशी निवेश कमी को मत कोसिये, विदेशी मुद्रा बाजार और भंडार के प्रबंधन की दरारें तो पिछले कई वर्षों से संकट का स्वागत करने को आतुर हैं। आत्म निर्भरता की कमी, महंगाई, प्राकृतिक संसाधनों का घरेलू उत्पादन, विदेशी मुद्रा की आवक निकासी के असंतुलन, रुपये की बदहाली के लिए जिम्मेदारों की फेहरिस्त छोटी नहीं है। विदेशी मुद्रा का मोर्चा सबसे संवेदनशील होता है, इसे तो सबसे ज्यादा मजबूत होना चाहिए था मगर यही भारत का सर्वाधिक कमजोर और असुरिक्षत मोर्चा साबित हुआ है। रुपया ही सबसे गिरा और बेसहारा है।
कुप्रबंध का विनिमय
रुपये की तोहमत बेचारे ग्रीस के सर क्यों ? यह त्रासदी यूरोजोन ने नहीं हमने खुद लिखी है। ऐतिहासिक गलतियों से लेकर, किस्म किस्म के घाटे और सरकार की नीतिगत निष्क्रियता तक सबने रुपये को तोड़ने में बखूबी काम किया है। रिजर्व बैंक से लेकर वित्ता मंत्रालय सबको यह खबर थी कि रुपये पर हमला होना तय है क्यों कि भारतीय अर्थव्यवस्‍था  दोहरे घाटे (राजकोषीय और चालू खाता) के दुष्च‍क्र में फंस गई है। भुगतान संतुलन (विदेशी देनदारियों और विदेशी पंजी की आवक के बीच का अंतर) के तीन साल में पहली बार घाटे में आने की खबर बाजार को पिछले साल ही मिल गई थी और इसलिए अक्टूबर नवंबर से रुपये की बुरी गत बननी शुरु हो गई थी। इसके बाद से बाजार को विदेशी मुद्रा प्रबंधन के मोर्चे पर कुछ भी अच्छा नहीं

Monday, May 21, 2012

फिर ग्रोथ की शरण में

हीं चाहिए खर्च में कंजूसी ! घाटे में कमी! निवेश करो !आर्थिक विकास बढ़ाओ! रोजगार दो! नहीं तो जनता निकोलस सरकोजी जैसा हाल कर देगी। .. ग्‍लोबल नेतृत्‍व को मिला यह सबसे ताजा ज्ञान सूत्र है जो बीते सप्‍ताह कैम्‍प डेविड (अमेरिका) में जुटे आठ अमीर देशों के नेताओं की जुटान से उपजा और अब दुनिया में गूंजने वाला है। फ्रांस के चुनाव में निकोलस सरकोजी की हार ने चार साल पुराने विश्‍व आर्थिक संकट को से निबटने के पूरे समीकरण ही बदल दिये हैं। सरकारों का ग्‍लोबल संहार शुरु हो गया है क्‍यों कि जनता रोजगारों से भी गई और सुविधाओं से भी। वित्‍तीय कंजूसी की एंग्‍लो सैक्‍सन कवायद अटलांटिक के दोनों पार की सियासत भारी पड़ रही है। अमेरिका और यूरोप अब वापस ग्रोथ की सोन चिडिया को तलाशने निकल रहे हैं। चीन ग्रोथ को दाना डालना शुरु कर चुका है। दुनिया के नेताओं को यह इलहाम हो गया है कि घाटे कम करने की कोशिश ग्रोथ को खा गई है। यानी कि मु्र्गी ( ग्रोथ और जनता) तो बेचारी जान से गई और दावतबाजों का हाजमा बिगड़ गया।...
देर आयद
अगर बजट घाटे न हों तो ग्रोथ की रोटी पर बेफिक्री का घी लग जाता है। लेकिन घी के बिना काम चल सकता है ग्रोथ की, सादी ही सही, रोटी के बिना नहीं। 2008 में जब लीमैन डूबा और दुनिया मंदी की तरफ से खिसकी तब से आज तक दुनिया की सरकारें यह तय नहीं कर पाई कि रोटी बचानी है या पहले इस रोटी के लिए घी जुटाना है। बात बैंकों के डूबने से शुरु हुई थी। जो अपनी गलतियों से डूबे, सरकारों ने उन्‍हें बचाया अपने बजटों से। बजटों में घाटे पहले से थे क्‍यों कि यूरोप और अमेरिकी सरकारें जनता को सुविधाओं से पोस रही थीं। घाटा बढ़ा तो कर्ज बढे और कर्ज बढ़ा तो साख गिरी। पूरी दुनिया साख को बचाने के लिए घाटे कम करने की जुगत में लग गई इसलिए यूरोप व अमेरिका की जनता पर खर्च कंजूसी के चाबुक चलने लगे। जनता गुस्‍साई ओर उसने सरकारें पलट दीं। तीन साल की इस पूरी हाय तौबा में कहीं यह बात बिसर गई कि मुकिश्‍लों का खाता आर्थिक सुस्‍ती