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Friday, March 8, 2019

सवाल हैं तो सुरक्षा है


अगर 1999 या 2000 आज (2019) जैसा होता तो हम कभी यह नहीं जान पाते कि करगिल के युद्ध में सरकार या सेना ने क्या गलती की थी? उस युद्ध में जितनी बहादुरी सेना ने दिखाई थी उतनी ही वीरता से सामने आया था भारत का लोकतंत्र, सवाल जिसके प्राण हैं.

करगिल के बाद भारत में ऐसा कुछ अनोखा हुआ था जिस पर हमें बार-बार फख्र करना चाहिए. करिगल की जांच के लिए तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने एक समिति बनाई. यह समिति सरकारी नहीं थी लेकिन कैबिनेट सचिव के आदेश से इसे अति गोपनीय रणनीतिक दस्तावेज भी दिखाए गए.

बहुआयामी अधिकारी और रणनीति विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में इस समिति ने न केवल सुरक्षा अफसरों से बल्कि तत्कालीन और पूर्व प्रधानमंत्रियों, रक्षा मंत्रियों, विदेश मंत्रियों यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति से भी पूछताछ की. करीब 15 खंड और 14 अध्यायों की इसकी रिपोर्ट ने करगिल में भयानक भूलों को लेकर सुरक्षा, खुफिया तंत्र और सैन्य तैयारियों की धज्जियां उड़ा दीं.

अगर 2017 भी आज जैसा होता तो फिर हम यह कभी नहीं जान पाते कि भारत की फटेहाल फौज के पास दस दिन के युद्ध के लायक भी गोला-बारूद नहीं है. सीएजी ने 2015 में ऐसी ही पड़ताल की थी. अगर 1989 भी आज की तरह होता तो बोफोर्स पर एक मरियल-सी सीएजी रिपोर्ट (राफेल जैसी) सामने आ जाती.

सेना या सुरक्षा बलों से रणनीति कहीं नहीं पूछी जाती. लेकिन लोकतंत्र में सेना सवालों से परे कैसे हो सकती है? रणनीतिक फैसले यूं ही कैबिनेट की सुरक्षा समिति नहीं करती है, जहां सेनानायक भी मौजूद होते हैं. इस समिति में वे सब लोग होते हैं जो अपने प्रत्येक आचरण के लिए देश के प्रति जवाबदेह हैं.

लोकतंत्र के संविधान सरकारों को सवालों में घेरते रहने का संस्थागत आयोजन हैं. संसद के प्रश्न काल, संसदीय समितियां, ऑडिटर्स, उनकी रिपोर्ट पर संसदीय जांच... सेना या सैन्य प्रतिष्ठान इस प्रश्न-व्यवस्था के बाहर नहीं होते.

लोकतंत्र में वित्तीय जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण है. सैन्य तंत्र भी संसद से मंजूर बजट व्यवस्था का हिस्सा है जो टैक्स या कर्ज (बैंकों में लोगों की बचत) पर आधारित है. इसलिए सेना के खर्च का भी ऑडिट होता है, जिसमें कुछ संसद से साझा किया जाता है और कुछ गोपनीय होता है.

पाकिस्तान में नहीं पूछे जाते होंगे सेना से सवाल लेकिन भारत में सैन्य प्रतिष्ठान से पाई-पाई का हिसाब लिया जाता है. गलतियों पर कैफियत तलब की जाती है. सेना में भी घोटाले होते हैं. जांच होती है.

लोकतंत्र में निर्णयों और उत्तरदायित्वों का ढांचा संस्‍थागत है, व्यक्तिगत नहीं. सियासत किसी एक व्यक्ति को पूरी व्यवस्था बना देती है, जिसमें गहरे जोखिम हैं इसलिए समझदार राजनेता हमेशा संस्था‍ओं का सुरक्षा चक्र मजबूत करते हैं ताकि संस्थाएं जिम्मेदारी लें और सुधार करें.

करगिल के बाद भी राजनीति हुई थी. कई सवाल उठे थे, संसद में बहस भी हुई. सेना को कमजोर करने के आरोप लगे लेकिन तब शायद लोकतंत्र ज्यादा गंभीर था इसलिए सरकार ने सेना और अपनी एजेंसियों पर सवालों व जांच को आमंत्रित किया और स्वीकार किया कि करगिल की वजह भयानक भूलें थीं. सुब्रह्मण्यम की रिपोर्ट पर कार्रवाई के लिए मंत्रिसमूह बना.

मई 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने संसद को बताया था कि करगिल समीक्षा रिपोर्ट की 75 में 63 सिफारिशें लागू की जा चुकी हैं. इन पर क्रियान्वयन के बाद भारत में सीमा प्रबंधन पूरी तरह बदल गया, ‘खुफिया तंत्र ठीक हुआ’, नया साजो-सामान जुटाया गया और सेना की कमान को समन्वित किया गया. करगिल पर उठे सवालों की वजह से हम पहले से अधिक सुरक्षित हो गए.

जोश चाहे जितना हो लेकिन उसमें लोकतंत्र का होश बने रहना जरूरी है. सवालों की तुर्शी और दायरा बढऩा परिपक्व लोकतंत्र का प्रमाण है जबकि सत्ता हमेशा सवालों के दायरे से बाहर रहने का उपक्रम करती है, जो गलतियों व जोखिम को सीधा न्योता है.

क्या हम नहीं जानना चाहेंगे कि पुलवामा, उड़ी और पठानकोट हमलों में किसी एजेंसी की चूक थी? इनकी जांच का क्या हुआ? क्या सैन्य साजो-सामान जुटाने में देरी की वजह या अभियानों की सफलता- विफलता की कैफियत नहीं पूछना चाहेंगे?

राजनेता कई चक्रों वाली सुरक्षा में रहते हैं. खतरे तो आम लोगों की जिंदगी पर हैं. शहीद फौजी होता है. लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना सबसे बड़ी देशभक्ति‍ है क्योंकि सवाल ही हमारा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हैं.

Saturday, March 2, 2019

‌चिंगारी का खेल


 
क्या हम अब भी खेल रहे हैं?
एक अनोखा खेल,
जिसमें जिताऊ दांव कभी नहीं चला जाना है ...(प्रसिद्ध फिल्म वार गेम्स से)

आप सियासत पर हैरत से अधिक और कर भी क्या सकते हैं. इस सप्ताह जब, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कोरियाई तानाशाह किम जोंग उस करीब छह दशक पुराने कोरियाई युद्ध को खत्म करने और परमाणु हथियारों की समग्र समाप्ति पर बात करने के लिए हनोई (वियतनाम) में जुटे थे, तब एशिया की दो परमाणु शक्तियां, भारत और पाकिस्तान युद्ध के करीब पहुंच गए. 

यही वह ट्रंप हैं जो मेक्सिको सीमा पर दीवार खड़ी करने के लिए अपने देश में आर्थिक आपातकाल की नौबत ले आए और यह वही किम हैं जो दुनिया को कई बार परमाणु युद्ध के मुहाने तक पहुंचा चुके हैं. दूसरी तरफ भारत-पाकिस्तान के नेता हाल तक एक-दूसरे की शादी में शामिल होते रहे हैं.

उड़ी हमले के बाद भारत का जवाब अपवाद था. लेकिन पुलवामा की जवाबी कार्रवाई और इस पर पाकिस्तान का जवाब पूरे दक्षिण एशिया के लिए बड़ी नीतिगत करवट है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विदेश नीति में तीन बड़े परिवर्तन किए हैं. बाजुएं फड़काने वाले माहौल से निकलकर ही हम इनके फायदे-जोखिम की थाह ले सकते हैं.

पहला: उड़ी और न ही पुलवामा सबसे बड़ी आतंकी वारदात है. लेकिन पहली बार भारत ने लगातार (दो बार) छद्म युद्ध का जवाब प्रत्यक्ष हमले से दिया है. पिछले दो साल में आतंकी रणनीति बदली है. कश्मीर से बाहर और आम लोगों पर हमलों की घटनाएं सीमित रही हैं. अब सुरक्षा बल निशाना हैं.

भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध स्तरीय पलटवार में क्या हम कुछ और भी पढ़ पा रहे हैं. चीन की छाया में पाकिस्तान की सेना भारत को लंबे ‘वार गेम’ में खींचने की कोशिश में सफल हो रही है जिसे हर कीमत पर टालने की कोशिश की गर्ई थी. कोई यकीन के साथ नहीं कह सकता कि पुलवामा आखिरी आतंकी हमला है तो फिर जवाब भी आखिरी नहीं...

दो: युद्ध, विदेश नीति की मृत्यु का ऐलान है. पाकिस्तान पर दो जवाबी कार्रवाइयां आतंक के खिलाफ लड़ाई की भारतीय नीति में निर्णायक मोड़ हैं. आतंक बेचेहरा युद्ध है. यह लड़ाई भूगोल की सीमा में नहीं लड़ी गई है. आतंक से प्रभावित दुनिया के सभी देशों ने इसे अपनी सामूहिक लड़ाई माना क्योंकि इससे घायल होने वाले दुनिया के सभी महाद्वीपों में फैले हैं. मुंबई और संसद पर हमले के बाद भी भारत जवाब देते-देते अंत में रुक गया था और कूटनीतिक अभियानों से पाकिस्तान को तोड़ा गया था.

क्या छद्म युद्ध के मुकाबले प्रत्यक्ष युद्ध, आतंक पर कूटनीतिक कोशिशों से ऊब का ऐलान है? क्या आतंक पर अंतरराष्ट्रीय एकजुटता से भारत को उम्मीद नहीं बची है? भारत-पाक के पलटवार पर दुनिया ने संयम की सलाह दी, पीठ नहीं थपथपाई. सनद रहे कि प्रत्येक युद्ध खत्म हमेशा समझौते की मेज पर ही होता है.

तीन: पाकिस्तान की राजनीति हमेशा से भारत या कश्मीर केंद्रित रही है, भारत की नहीं. ऐसा पहली बार हो रहा है जब सुरक्षा, युद्ध नीति, विदेश नीति किसी सरकार की चुनावी संभावनाओं को तय करने वाली हैं. भारतीय कूटनीति व सेना के पास, पाकिस्तान से निबटने की ताकत व तरीके (संदर्भ—बांग्लादेश बलूचिस्तान) हमेशा से मौजूद रहे हैं. लेकिन मोदी की मजबूरी यह है कि 2014 में उनका चुनाव अभियान पाकिस्तान के खिलाफ दांत के बदले जबड़े तोडऩे की आक्रामकता से भरा था इसलिए साल दर साल पाकिस्तान से दो टूक हिसाब करने के आग्रह बढ़ते गए हैं और 2019 के चुनाव से पहले उन्हें अविश्वसनीय पड़ोसी को घरेलू राजनीति के केंद्र में लाना पड़ा है. भारत में कोई चुनाव, पहली बार शायद पाकिस्तान के नाम पर लड़ा जाएगा.

चीनी जनरल, युद्ध रणनीतिकार और दार्शनिक सुन त्जु ने कहा था कि चतुर योद्धा शत्रु को अपने हिसाब से चलाते हैं. उसके हिसाब से आगे नहीं बढ़ते. वक्त बताएगा दक्षिण एशिया में कौन किसे चला रहा था. फिलहाल तो फिल्म वार गेम्स का यह संवाद भारत-पाक की सियासत समझने में काम आ सकता है.

फाल्कन: तुमने कट्टा-बिंदी (टिक-टैक-टो) खेली?
जेनिफर: हां.
फाल्कन: अब नहीं खेलते?
जेनिफर: नहीं.
फाल्कन: क्यों?
जेनिफर: यह बोरिंग है. इसमें हमेशा मुकाबला बराबरी पर छूटता है.
फाल्कन: यकीनन, इसमें कोई नहीं जीतता लेकिन वार रूम में बैठे लोग सोचते हैं कि वे परमाणु युद्ध जीत सकते हैं.

Sunday, February 24, 2019

बदले की भाषा



पूरी कोई देश ऐसे मौके पर भी आर-पार की भाषा बोल सकता है जब उसकी अर्थव्यवस्था-ध्वस्त हो, मुद्रा और साख डूब चुकी हो, बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे पर खड़ा हो?

दुस्साहस की भी अपनी एक कूटनीति होती है. यही वह नया पाकिस्तान है जिसका जिक्र उसके प्रधानमंत्री इमरान खान ने किया और जो प्रामाणिक छद्म युद्ध (आतंकवाद) छेड़कर उसकी तरफदारी में प्रत्यक्ष युद्ध की चेतावनी दे रहा है.

चीनी युद्ध दार्शनिक सुन त्जु कहते थे, खुद को जानो, समझो अपने प्रतिद्वंद्वी को, फिर हजार लड़ाइयां बगैर तबाही के लड़ी जा सकती हैं.
हमने पाकिस्तान के सबसे बुरे वक्त का अपने लिए सबसे बुरा इस्तेमाल किया है. देखते-देखते पाकिस्तान ने वह कूटनीतिक करवट बदल ली. अब उसे आतंक का देश कहे जाने से फर्क नहीं पड़ता लेकिन उसकी करवट ने बहुत कुछ हमेशा के लिए बदल दिया.

बात ज्यादा पुरानी नहीं है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, मोदी सरकार के स्वागत समारोह में भाग लेकर इस्लामाबाद लौटे थे. तब पाकिस्तान अपने सबसे बुरे वक्त से गुजर रहा था. अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो फौजों की वापसी के बाद विदेशी सहायता बंद हो चुकी थी. निवेश नदारद था और  अर्थव्यवस्था लगभग डूब चुकी थी. ठीक उसी वक्त पाकिस्तान ने अमेरिका से दूरी बनाकर अपना आर्थिक भविष्य चीन को सौंप दिया और चीन ने दुनिया के सबसे जोखिम भरे देश पर आर्थिक दांव लगा दिया.

पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों के आसमानी स्वागत के बीच, अप्रैल 2015 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस्लामाबाद पहुंचे और पाकिस्तान के साथ 46 अरब डॉलर की परियोजना (चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) पर दस्तखत हो गए.

पाकिस्तान के जीडीपी के 20 फीसदी के बराबर निवेश के साथ चीन ने भारत के पड़ोसी की डूब चुकी अर्थव्यवस्था को गोद में उठा लिया. पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक और निर्माण परियोजना (काश्गर से ग्वादर तक 3,000 किमी में फैली सड़कों, रेलवे, तेल-गैस पाइपलाइन, औद्योगिक पार्क का नेटवर्क) शुरू हो गई जिसके तहत बलूचिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर सहित पूरा पाकिस्तान चीन के प्रभाव में आ गया. पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी कंपनियों का ऊधम शुरू होते ही दक्षिण एशिया का कूटनीतिक संतुलन तब्दील हो गया.

भारतीय कूटनीति को उस आर्थिक संकट के वक्त, पाकिस्तान को चीन की शरण में जाने से रोकना था. चीन के करीब जाते ही पाकिस्तान में दो बदलाव हुए:

एक—पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान में केवल अस्थायी सामरिक निवेश किया था, चीन ने वहां आर्थिक बुनियादी ढांचा बनाया. यह किसी भी हमले की स्थिति में पाकिस्तान का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है

दो—पश्चिम के बरअक्स पाकिस्तान अब गैर लोकतांत्रिक कूटनीति की शरण में है, जिस पर दुनिया का नियंत्रण नहीं है

जबरदस्त वित्तीय संकट के बीच चीन पाकिस्तान का खर्चा चला रहा है. कुछ मदद सऊदी अरब दे रहा है. इमरान की गुर्राहट बताती है कि अगर भारत के विरोध की वजह से पाकिस्तान को आइएमएफ की मदद नहीं मिली तो चीन है न.

उड़ी का जवाब देकर भारत ने संयम की नियंत्रण रेखा पार करने का ऐलान कर दिया था लेकिन ध्यान रखना होगा कि हथियार वहीं उठते हैं जहां कूटनीति खत्म हो जाती है इसलिए पुलवामा के बाद पाकिस्तान को घेरने के लिए कूटनीति की शरण में जाना पड़ा.

पाकिस्तान को अलग-थलग करना ही एक विकल्प है और अगर आक्रामक कूटनीति की हिम्मत हो तो मौके अभी खत्म नहीं हुए हैं. अलबत्ता घेराव पूर्व से शुरू करना होगा यानी चीन की तरफ से.

यदि आतंक बढ़ता रहा तो ग्लोबल मंसूबों वाले चीन के लिए पाकिस्तान के साथ खड़ा रहना मुश्किल होगा. अगर किसी मंच (मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव) पर चीन को पाक के आतंक के पक्ष में खुलकर खड़ा दिखाया जा सके तो बड़ी सफलता होगी. अमेरिका के साथ सींग फंसाए और आर्थिक तौर पर परेशान चीन को इस समय भारतीय बाजार की जरूरत है. क्या हम इस मौके का इस्तेमाल कर सकते हैं? यह स्पष्ट है कि अब चीन से आंख मिलाए बिना पाकिस्तान को चौखटे में कसना नामुमकिन है

रूजवेल्ट कहते थे कम बोलो और छड़ी लंबी रखो, दूर तक जाओगे. पाकिस्तान को लेकर वाजपेयी और मोदी की उलझन एक जैसी है. पूरी विदेश नीति को हमने को गले लगाने या गोली चलाने के बीच बांट दिया है. कूटनीति इन दोनों के बीच खड़ी होती है. हमें पाकिस्तान से निबटने के लिए तीसरी भाषा का आविष्कार करना होगा. बदला सिर्फ उसी जबान में लिया जा सकेगा.