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Monday, October 2, 2017

हाथी की बीमारी बकरी का इलाज


सरकार के साथ सहानुभूति रखिए.

वह कभी-कभी सवालों के अनोखे जवाब ले आती है.

जैसे मंदी और बेकारी दूर करने के लिए गांवों में बिजली के खंभे लगाना. यह पानी की कमी दूर करने के लिए रेल की पटरी बिछाने जैसा है.
देश जब मंदी के इलाज का इंतजार कर रहा था जो किसी अंतरराष्ट्रीय आपदा के कारण नहीं बल्कि पूरी तरह सरकार के गलत फैसलों से आई, तब मुफ्त में बिजली कनेक्शन बांटने की योजना का त्योहार शुरू हो गया. यह स्कीम उन राज्यों में लागू होगी जहां बिजली वितरण नेटवर्क बुरे हाल में है, बिजली बोर्ड घाटे में हैं, कर्ज से उबरने की कोशिश कर रहे हैं और बिजली सप्लाई के घंटे गिने-चुने ही हैं. 

सरकारें अक्सर यह भूल जाती हैं कि अर्थव्यवस्था के मामले में आत्मविश्वास और दंभ की विभाजक रेखा बहुत बारीक होती है. देश में व्याप्त मंदी इसी गफलत की देन है. लेकिन दंभ के बाद अगर दुविधा आ जाए तो जोखिम कई गुना बढ़ जाते हैं, क्योंकि तब घुटने की चोट के लिए आंख में दवा डालने जैसे अजीबोगरीब फैसले लिए जाते हैं. मंदी के मौके पर सब्सिडी का 'सौभाग्य' महोत्सव इसी दुविधा से निकला है.

सरकारी स्कीमों का हाल बुरा है. इसे खुद सरकार से बेहतर भला कौन जानता है. सरकार का एक मंत्रालय है जो स्कीमों के क्रियान्वयन का हिसाब-किताब रखता है. इस साल की शुरुआत में उसने जो रिपोर्ट जारी की थी उसके मुताबिक, मोटे खर्च और बजट वाली सरकार की 12 प्रमुख स्कीमें 2016-17 में बुरी तरह असफल रहीं. मसलन, ग्रामीण सड़क योजना 14 राज्यों में लक्ष्य से पीछे रही. प्रधानमंत्री आवास योजना 27 राज्यों में पिछड़ गई.

इस रिपोर्ट में दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना भी है जो 14 राज्यों में ठीक ढंग से नहीं चली. सौभाग्य योजना इसी का विसतार है. नोटबंदी के बाद जनधन को लकवा मार गया है. फसल बीमा योजना के बारे में तो सीएजी ने बताया है कि इसका फायदा बीमा कंपनियों ने उठा लिया, कुदरत के कहर के मारे किसानों को कुछ नहीं मिला. 

गरीबों को मुफ्त गैस कनेक्शन देने वाली योजना उज्ज्वला भी अब दुविधा की शिकार है. केंद्रीय पेट्रो कंपनियों के कारण स्कीम की शुरुआत ठीक रही लेकिन सिलेंडर भरवाने के लिए 450 रुपए देना उज्ज्वला धारकों के लिए मुश्किल है. ग्रामीण इलाकों में मंदी के पंजे ज्यादा गहरे हैं. केरोसिन और लकड़ी हर हाल में एलपीजी से सस्ती है.

उत्तर प्रदेश, मध्य‍ प्रदेश, बिहार, ओडिशा, राजस्थान जैसे राज्यों में एलपीजी धारकों की संख्या और एलपीजी की खपत में बड़ा झोल है. पेट्रो मंत्रालय के रिसर्च सेल की रिपोर्ट बताती है कि उज्ज्वला के बाद यहां जिस रफ्तार से कनेक्शन बढ़े हैं, उस गति से एलपीजी की मांग या खपत नहीं बढ़ी.

सिर्फ आंकड़े ही नहीं, लोगों का नजरिया भी स्कीमों को लेकर बहुत उत्साहवर्धक नहीं है. इस साल अगस्त में इंडिया टुडे के 'देश का मिज़ाज सर्वे' ने बताया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का आंकड़ा जितना ऊंचा है, उनकी स्कीमों की अलोकप्रियता उतनी ही गहरी है. इनमें जन धन, डिजिटल इंडिया जैसी बड़ी स्कीमें शामिल हैं. यह स्थिति तब है जबकि प्रधानमंत्री देश से लेकर विदेश तक लगभग हर दूसरे भाषण में इनका नाम लेते हैं और पिछले तीन साल में इन स्कीमों के प्रचार पर क्‍या खूब खर्च हुआ है ?

मोदी सरकार मनरेगा जैसे किसी बड़े करिश्मे की तलाश में है जिसकी पूंछ पकड़ कर चुनावों की लंबी वैतरणी पार हो सके. दिलचस्प है कि मनरेगा की सफलता उसके जरिए मिले रोजगारों में नहीं बल्कि उसके जरिए बढ़ी मजदूरी की दरों में थी. मनरेगा लागू होते समय आर्थिक विकास की गति तेज थी इसलिए मनरेगा के सहारे मजदूरी दरों का बाजार पूरी तरह श्रमिकों के माफिक हो गया. मजदूरों को गांव में भी ज्यादा मजदूरी मिली और शहरों में भी. अगर मंदी के दौर में मनरेगा आती तो शायद ये नतीजे नहीं मिलते.

दरअसल, सरकारी स्कीमें गरीबी का समाधान हैं ही नहीं. 1994 से 2012 तक कुल आबादी में निर्धनों की तादाद 45 फीसदी से घटकर 22 फीसदी रह गई. 2005 से 2012 के बीच गरीबी घटने की रफ्तार, इससे पिछले दशक की तुलना में तीन गुना तेज थी. ध्यान रखना जरूरी है कि यही वह दौर था जब भारत की आर्थिक विकास दर सबसे तेजी से बढ़ी.

हम इतिहास से यह सीखते हैं कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा. हम इतिहास से यह भी सीखते हैं कि नसीहतें न लेने के मामले में सरकारें सबसे ज्यादा जिद्दी होती हैं. वे ऐसे इलाज लाती हैं जिसमें हाथी की दवा चींटी को चटाई जाती है. तभी तो बेकारी दूर करने के लिए अब गांवों में एलईडी बल्ब टांगे जाएंगे.



Tuesday, September 6, 2016

आखिरी मंजिल की चुनौती


ढाई साल पूरे कर रही मोदी सरकार को अब क्रियान्वयन की चुनौती से दो-दो हाथ करने चाहिए, जो उसके अच्छे-अच्छे इरादों को पटरी से उतार रही है.

दिल्ली से 150 किमी दूर उत्तर प्रदेश का गांव नगला फतेला मोदी सरकार की नई किरकिरी है. गांवों में बिजली पहुंचाने को लेकर एक साल पुराने अभियान की सफलता का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने लाल किले से ऐलान कर दिया कि इस गांव में सत्तर साल बाद बिजली पहुंच चुकी है. भाषण को सात घंटे भी नहीं बीते थे कि सरकार को पता चला कि दावा गलत है, क्योंकि गांव में अब तक अंधेरा है. इसके बाद ट्वीट वापस लेने और उत्तर प्रदेश सरकार से कैफियत तलब करने का दौर शुरू हुआ.
स्कीमों को लाभार्थी तक पहुंचाने की चुनौती भारतीय गवर्नेंस की बुनियादी उलझन है. नगला फतेला इसका सबसे नया नुमाइंदा है. मोदी सरकार के साथ यह उलझन ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि नई महत्वाकांक्षी स्कीमें बनाने से पहले पुराने तजुर्बों से कुछ नहीं सीखा गया. दूसरी तरफ प्रचार इतना तेज हुआ कि नगला फतेला कई जगह नजर आने लगे.
स्कीमें बनाने में हमारे नेता लासानी हैं. अच्छी स्कीमें पहले भी बनीं और इस सरकार ने भी बनाईं. स्कीमों की दूसरी मंजिल संसाधन जुटाने, समन्वय (केंद्र, राज्य और सरकारी विभागों से) और लक्ष्य  तय करने की है. लाभार्थी तक पहुंचाने के बाद स्कीम को आखिरी मंजिल मिलती है. सरकार की कई स्कीमें दूसरी मंजिल भी पार कर नहीं कर पाई हैं, जबकि मध्यावधि लग चुकी है.
नगला फतेला के संदर्भ में तीन प्रमुख स्कीमों की पड़ताल की जा सकती है, जो लास्ट माइल चैलेंज की शिकार हैं.
नवंबर, 2015 में जब सरकार ने सर्विस टैक्स पर 0.5 फीसदी सेस लगाया, तब तक स्वच्छता अभियान को एक साल बीत चुका था और स्कीम के लक्ष्य, क्रियान्वयन का तरीका व संसाधन तय नहीं हो पाए थे. सफाई का मिशन नगरों व गांवों में संपूर्ण स्वच्छता की उम्मीद जगाता था, लेकिन एक साल के भीतर ही इसे यूपीए सरकार के निर्मल ग्राम की तर्ज पर गांवों में शौचालय बनाने और खुले में शौच को समाप्त करने पर सीमित कर दिया गया.
नया टैक्स लगने से संसाधन मिलने लगे, लेकिन अभियान में गति नहीं आई. शहरों की सफाई अंतत: नगर निकायों को करनी है जिनके पास संसाधन नहीं हैं. यदि संसाधन नगर निगमों को जाने लगते तो शहरों में सफाई का पहिया घूम सकता था. गांवों में शौचालय बनाते समय यह नहीं देखा गया कि पानी की आपूर्ति और मल निस्तारण का इंतजाम कैसे होगा. इन दोनों बुनियादी जरूरतों के लिए संसाधनों की व्यवस्था स्कीम में शामिल नहीं थी. इसलिए गांवों में बने शौचालय इस्तेमाल के लायक नहीं हो सके.
ताजा सूरते-हाल यह है कि सरकारी संकल्प, स्कीमों, विभागों और नए टैक्स के बावजूद शहर व गांव जस के तस गंदे हैं. 
दूसरा उदाहरण डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर (लाभार्थियों तक सीधे सब्सिडी) स्कीम का है. स्कीम के पास संसाधनों की चुनौती नहीं थी क्योंकि सब्सिडी पहले से बांटी जा रही थी. अलबत्ता एलपीजी सब्सिडी बांटने में मिली सफलता के बाद स्कीम ठिठक-सी गई. दरअसल, एलपीजी सब्सिडी यूनिवर्सल थी यानी सबको मिलनी थी. केरोसिन या दूसरी सब्सिडी स्कीमों की तरह, इसमें लाभार्थियों को पहचानने की चुनौती नहीं थी. 
एलपीजी के बाद डीबीटी का सफर धीमा पड़ गया. केरोसिन व खाद्य सब्सिडी की डीबीटी स्कीमें सक्रिय नहीं हो सकीं. सब्सिडी वाली स्कीमों को अलग-अलग मंत्रालय चलाते हैं. इसमें राज्य सरकारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. यह समग्र समन्वय ही डीबीटी की दूसरी मंजिल है. एलपीजी में यह काम आसानी से हो गया क्योंकि पेट्रोलियम मंत्रालय, तेल कंपनियों और कुछ सौ गैस एजेंसियों को यह स्कीम लागू करनी थी. अन्य स्कीमों के मामले में यह इतना आसान नहीं है. लाभार्थियों की पहचान इस स्कीम की आखिरी मंजिल है, जिसका पैमाना अभी तक तय नहीं है. मनरेगा को डीबीटी से जोडऩे की कोशिशें तेज नहीं हो सकीं क्योंकि राज्यों व केंद्र के बीच तालमेल नहीं बन पाया.
डीबीटी के लिए सरकार के पास संसाधन हैं. सफलताओं का तजुर्बा भी है, लेकिन समन्वय और क्रियान्वयन की चुनौतियों के कारण मंजिल नहीं मिल सकी है.
सांसद आदर्श ग्राम योजना भारत में ग्रामीण विकास की सबसे क्रांतिकारी पहल हो सकती थी क्योंकि पहली बार किसी सरकार ने चुने हुए सर्वोच्च प्रतिनिधि को लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई यानी पंचायत से जोड़ा था. सांसद निधि से जोड़े जाने पर यह स्कीम चमत्कारिक हो सकती थी. लेकिन योजना के लक्ष्य अस्पष्ट थे. गांवों में केंद्र व राज्य की दर्जनों स्कीमें चलती हैं जिनसे समन्वय नहीं हुआ इसलिए सरकारी विभाग तो दूर, सांसदों ने भी गांवों को अपनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और एक बड़ी पहल बीच में ही दम तोड़ गई.
कैबिनेट में ताजे फेरबदल से पहले प्रधानमंत्री ने कहा था कि मेरे लिए सफलता का अर्थ यह है कि लोग बदलाव महसूस करें. यदि उपलब्धियों का दावा करना पड़े तो मैं इसे सफलता नहीं मानूंगा. हालांकि प्रधानमंत्री को खुद, लाल किले के मैराथन भाषण में रह-रहकर दावे करने पड़े.
स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण उनकी बेचैनी बता रहा था कि सरकार आधा रास्ता पार कर चुकी है, लेकिन स्कीमों के असर नजर नहीं आ रहे हैं. अच्छा है कि प्रधानमंत्री बेचैन हैं, कांग्रेस की तरह हकीकत से गाफिल नहीं. राजनेताओं की बेचैनी अच्छी होती है खासतौर पर तब जबकि सरकार को हकीकत का अंदाजा हो.

ढाई साल पूरे कर रही मोदी सरकार को अब क्रियान्वयन की चुनौती से दो-दो हाथ करने चाहिए, जो उसके अच्छे-अच्छे इरादों को पटरी से उतार रही है. सरकार को स्कीमों की भीड़ से निकल कर चुनिंदा कार्यक्रमों को चुनना होगा और उन्हें नतीजों तक पहुंचाना होगा ताकि बदलाव महसूस हो सके. प्रधानमंत्री के पास अब नगला फतेला जैसे तजुर्बों की कोई कमी नहीं है. अपेक्षाओं के खेल का जोखिम भी अब तक उन्हें समझ आ गया होगा. उनकी होड़ अब वक्‍त के साथ है, जिसके गुजरने की रफ्ता्र पर उनका कोई काबू नहीं है.