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Sunday, May 26, 2019

यह भी मुमकिन है!


 
लोकप्रिय नेता हमेशा साहसी सुधारक ही हों या बहुमत से गढ़ी सरकारें सुधारों की चैम्पियन ही साबित हों इसकी कोई गारंटी नहीं है!

सिर्फ यही दो पुरानी मान्यताएं बची हैं. नरेंद्र मोदी को अब इन्हें  भी तोड़ देना चाहिए क्योंकि भारत के लोगों ने उनके लिए सरकारें चुनने का तौर-तरीका सिरे से बदल दिया है.

पिछले तीन-चार दशक के किसी भी काल खंड में ऐसा दौर नहीं मिलेगा जिसमें भारत की जटिल क्षेत्रीय और राजनैतिक अस्मिताएं किसी एक नेता में इस कदर घनीभूत हो गई हों, जैसा कि मोदी के साथ हुआ है.

इतिहास गवाह है कि भारत के वोटर नाक पर मक्खी नहीं बैठने देते. मंदी, बेकारी, ग्रामीण बदहाली के बाद अगले चुनाव में ही सरकारों को सिर के बल खड़ा कर देते हैं लेकिन इस बार लोगों ने दर्द और निराशा को दबाकर मोदी के पक्ष में पहले से बड़ी लहर बना दी. किसी राजनेता से उम्मीदों का यह अखिल भारतीय उछाह, ताजा राजनैतिक अतीत के लिए अजनबी है.

इनकार के लिए मशहूर भारतीय वोटरों का भव्य स्वीकार, 69 वर्षीय नरेंद्र मोदी को ऐसे मुकाम पर ले आया है जहां वे अब ऐसे नेता हो सकते हैं जो न केवल लोकप्रिय होते हैं बल्कि बड़े सुधारक भी. रोनाल्ड रेगन, ली क्वान यू, या मार्गरेट थैचर जैसे. यानी कि अगले कई दशकों के लिए अपने देशों की दिशा बदलने वाले नेता.

अमेरिकी विचारक जेम्स फ्रीमैन कहते थे कि कि राजनेता अगले चुनाव के बारे में सोचते हैं और राष्ट्र नेता अगली पीढ़ी के बारे में.

2019 के बाद के नरेंद्र मोदी को, पिछले पांच साल के मोदी से अलहदा होना पड़ेगा. 2014 से 2019 तक नरेंद्र मोदी, अपनी पार्टी के राष्ट्रव्यापी चुनावी अश्वमेध के नायक रहे हैं. हर चुनाव हर कीमत पर जीतने का उनका अभियान 2019 में लोकसभा दोबारा जीतने के मकसद पर केंद्रित था. यह मुहिम ही थी जिसके चलते मोदी का अपेक्षित सुधारक, अवतार नहीं ले सका. वे सुधारक और लोकलुभावन राजनीति के ध्रुवों के बीच तालमेल बनाते रह गए और पांच कीमती साल गुजर गए.

अभूतपूर्व लोकप्रियता के बाद मोदी को इतना बड़ा जन विश्वास फिर मिल गया है जिससे वे सभी बड़े सुधार संभव हैं जिनके बारे में उनके पूर्ववर्ती सोचकर रह जाया करते थे. मोदी यकीनन अब विरासत खड़ी करना चाहेंगे. कुछ ऐसा करना चाहेंगे जिससे उन्हें भारत के अंतरराष्ट्रीय नेता के बतौर याद किया जाए.

बड़े सुधारक हमेशा आर्थिक सुधारों से पहचाने जाते हैं. व अपने देश के लोगों की आय बढ़ाकर जीवन स्तर बदलते हैं.

रोनाल्ड रेगन (1981-89) के बड़े टैक्स सुधारों, भव्य निजीकरण, आर्थिक नियमों में ढील, सुरक्षा पर भारी निवेश और अर्थव्यवस्था की जड़ों तक पहुंचने वाली नीतियों के बाद अमेरिका में न केवल बेरोजगारी में निर्णायक गिरावट और जीडीपी में रिकॉर्ड बढ़त (महामंदी-1929-39 के बाद सर्वोच्च) हुई बल्कि सबसे बड़ा बदलाव यह था कि सरकारी संस्थाओं में लोगों के विश्वास (क्राइसिस ऑफ कॉन्फीडेंस-जिमी कार्टर 1979) में उल्लेखनीय इजाफा हुआ.

1970 के दशक के अंत में ब्रिटेन की बिखरती अर्थव्यवस्था और नीति शून्यता की पृष्ठभूमि में मार्गरेट थैचर ने ब्रिटेन की सत्ता संभाली थी. लेकिन बदलाव 1983 के बाद आया जब भारी बेरोजगारी के बावजूद विभाजित विपक्ष के चलते थैचर को जबदरस्त जनादेश मिला. उन्होंने इस मौके का लाभ लेकर ब्रिटेन के वेलफेयर स्टेट को बदलकर मुक्त बाजार की राह खोली. महंगाई पर नियंत्रण और निजी हाउसिंग के साथ थैचर ने ब्रिटेन का नया मध्यम वर्ग तैयार किया. 

1965 में मलेशिया से आजाद हुआ ली कुआन यू (1965-90) का सिंगापुर कुछ ही दशकों में मैन्युफैक्च‌‌रिंग और विदेशी निवेश उदारीकरण से ग्लोबल कंपनियों का केंद्र बन गया. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और सामाजिक नीतियों में सुधार के साथ यू ने सिंगापुर को विकसित मुल्कों की कतार में पहुंचा दिया.

रेगन, थैचर और यू के सुधारों में मोदी के भावी एजेंडे का ब्लूप्रिंट मिल सकता है. ये तीनों नेता राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर अपनी दो टूक नीतियों और कड़े फैसलों के‍ लिए भी जाने जाते हैं.

भारत में पिछले अधिकांश आर्थिक सुधार संकटों से बचने के लिए हुए हैं. सिर्फ इनसे ही भारत कितना बदल गया है! अब अगर सुविचारित भविष्योन्मुखी ढांचागत बदलावों की शुरुआत हो तो अगले पांच साल भारत के अगले पंद्रह साल को सुरक्षित कर सकते हैं.

ताजा इतिहास में मोदी पहले ऐसे नेता हैं जिनके सामने कोई बड़ा संकट नहीं है. उम्मीद से उपजी लोकप्रियता ने उन्हें अभूतपूर्व अवसरों का आशीर्वाद दिया है. चुनावी इतिहास तो बन गया है, अब मोदी को सुधारों का इतिहास गढ़ना चाहिए.

सर्वश्रेष्ठ नेताओं की उपस्थिति महसूस ही नहीं होती. वे जब कुछ करते हैं तो लोग कहते हैं कि यह हमने खुद किया है.— लाओ त्से, प्राचीन चीनी दार्शनिक और लेखक


Friday, May 10, 2019

नतीजा, जो आ गया !





अंतरिम बजट के आंकड़े गढ़ने तक मोदी सरकार को यह एहसास हो गया था कि अर्थव्यवस्था की पूंछ पकड़कर लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार नहीं होगी. नतीजतन, पांच साल तक न्यू इंडिया का बिगुल बजाने के बाद नरेंद्र मोदी पाकिस्तान से आर-पार के नाम पर चुनाव मैदान में उतर गए.

मार्च में चुनावी राष्ट्रवाद का पारा चढ़ने तक अर्थव्यवस्था में अच्छे दिनों के दुर्दिन शुरू हो गए थे और बाजार मुतमइन हो चुके थे कि चुनाव के नतीजे चाहे जो हों लेकिन

एक— अंतरिम बजट में सरकार ने आंकड़ों की जो खिचड़ी पकाई है, वह जल्द ही सड़ जाएगी. सरकार की कमाई घटेगी और घाटा धर दबोचेगा.

दो— आर्थिक आंकड़ों को चमकाने की हजार कोशिशों के बावजूद 2019 की आखिरी तिमाही में विकास दर गिरेगी और नरेंद्र मोदी पिछले पांच साल की सबसे खराब अर्थव्यवस्था के साथ वोट मांगने निकलेंगे. (संदर्भ पिछले अर्थात्)

सबसे तेज झटका
चौथे चरण का मतदान खत्म होने तक सरकारी राजस्व में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज हो गई और वित्त मंत्रालय ने मान लिया कि अर्थव्यवस्था मंदी में है...अलबत्ता यह किसी ने नहीं सोचा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा इंजन भी थमने लगेगा.

निर्यात, सरकार का खर्च, निजी निवेश और खपत—इन चार इंजनों पर चलती है भारतीय अर्थव्यवस्था. इनमें खपत यानी आम लोगों का खर्च सबसे बड़ी ताकत है. निर्यात पहले से मृतप्राय था. बीते दिसंबर में निजी और सरकारी कंपनियों का निवेश 14 साल के न्यूनतम स्तर पर आ गया था. घाटे की मारी सरकार ने 2018-19 की आखिरी तिमाही में खर्च भी काट दिया. इन सबके बीच खर्च-खपत ही था जो अर्थव्यवस्था को ढुलका रहा था अलबत्ता चुनाव के गर्द-ओ-गुबार के बीच बाजार को जब यह नजर आया कि मांग की कमी मकानों से लेकर कार और मोटरसाइकिल से होते हुए साबुन, तेल, मंजन तक फैल गई है, तो खौफ लाजिमी था. खपत में गिरावट ऐसा झटका है जिसके लिए अर्थव्यवस्था हरगिज तैयार नहीं है.

क्यों गिरी खपत

पिछले ढाई दशक में पहली बार भारत में खपत गिर रही है यानी कि 135 करोड़ लोगों की अर्थव्यवस्था (पीपीपी) की सबसे मजबूत बुनियाद डगमगा रही है! क्यों?

उपभोग या खपत के दो हिस्से हैं और दोनों एक साथ टूट गए हैं.

पहला है वह उपभोग जो कर्ज के सहारे बढ़ता है, इसमें ऑटोमोबाइल और हाउसिंग प्रमुख हैं. बकाया कर्ज से दबे बैंक उद्योगों को नया कर्ज देने की हालत में पहले से ही नहीं थे अलबत्ता नोटबंदी के दौरान बैंकों में बड़ी मात्रा में जो धन जमा हुआ था उसका बड़ा हिस्सा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को कर्ज के तौर पर मिला. तभी तो 2016 से 2018 के बीच ऑटो लोन में एनबीएफसी का हिस्सा 77 फीसद हो गया. लेकिन यह मांग सिर्फ कर्ज के कारण बढ़ी, तेज विकास के कारण नहीं.

इस साल कई बड़ी एनबीएफसी के वित्तीय संकट में फंसने के बाद कर्ज की पाइपलाइन पूरी तरह बंद हो गई इसलिए बाजार को गुलजार करने वाली खपत टूट गई है. मकानों की मांग पहले से ही गर्त में बैठी है इसलिए कर्ज आधारित खपत लौटने में वक्त लगेगा.

उपभोग का दूसरा हिस्सा कमाई या बचत पर आधारित है जिसमें उपभोक्ता उत्पाद, खाद्य, कपड़े आदि आते हैं. अगर आम लोगों की वित्तीय बचतों के आंकड़े पर गौर फरमाया जाए तो साबुन, तेल, मंजन की मांग कम होने की वजह उसमें मिल जाएगी. 2011 में लोगों की वित्तीय बचत जीडीपी के अनुपात में 9.9 फीसदी थी जो 2018 में 6.6 फीसदी रह गई. यानी कि कमाई में कमी के कारण लोग खपत घटाने को मजबूर हैं.

2013-18 के बीच अचल संपत्ति यानी मकानों की कीमतें स्थिर रही हैं लेकिन कुल बचत के अनुपात में भौतिक बचत गिरना मकानों की मांग न बढ़ने का सबूत है. सोने के आयात व मांग में कमी भी इसी क्रम में है

पिछले पांच साल की तथाकथित तेज विकास दर के बीच रिकॉर्ड बेकारी का असर समझना जरूरी है. दुनिया के विभिन्न देशों का तजुर्बा बताता है कि जो देश तेज विकास दर के दौरान पर्याप्त रोजगार नहीं बनाते, उनके यहां बचत दर गिरती जाती है जो अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिए विस्फोटक है. सनद रहे कि 2017 में भारत में आम लोगों की कुल बचत दर बीस साल के सबसे निचले स्तर (जीडीपी के अनुपात में 17 फीसदी) पर आ गई थी.

चुनाव का नतीजा चाहे जो हो लेकिन मोदी सरकार के कामकाज का सबसे बड़ा नतीजा आ गया है. अर्थव्यवस्था के आंकड़े रहस्य नहीं हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था आय-बचत-खपत-निवेश में समन्वित गिरावट के दुष्चक्र की तरफ खिसक रही है. विकास दर का आकलन घटाए जाने का दौर शुरू हो चुका है, सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई सरकार आने पर कोई जादू नहीं होने वाला है. चुनाव की आंधी तो 23 मई को थम जाएगी लेकिन आर्थिक संकट के थपेड़े हमें लंबे समय तक बेहाल रखेंगे.

Saturday, April 20, 2019

चुनिए, सिर धुनिए


‘‘‘मतदाता को क्या मतलब कि राजनैतिक दल चंदा से कहां जुटाते हैं. उनका मतलब केवल प्रत्याशी से है’’ —सुप्रीम कोर्ट को सरकार का जवाब (अप्रैल 2019)


अपराधियों को चुनाव से दूर रखने के लिए संसद को कानून बनाना चाहिए —सुप्रीम कोर्ट की सलाह (सितंबर 2018) पर सरकार ने कानों में रुई ठूंस ली

''आपराधिक रिकार्ड वाले प्रत्याशियों का ब्योरा प्रमुख अखबारों में छपना चाहिए.'' चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट के आदेश (सितंबर 2018) पर कोई कार्रवाई नहीं

उंगली पर स्याही लगाकर दीवाने हुए जाते आम लोग ही लोकशाही की जिम्मेदारी उठाने के लिए बने हैं? चंदों की गंदगी, अपराधी नेताओं और अनंत चुनावी झूठ से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता जिनको चुनने के लिए हमें ‘पहले मतदान फिर जलपान’ का ज्ञान दिया जाता है! और उनका क्या जो राजनीति को अपराध मुक्त करने की कसम उठाकर सत्ता में आए थे!

यह 2014 का अप्रैल था. वाराणसी से कांग्रेस के प्रत्याशी का नाम हथियारों के सौदे में आया था. हरदोई की रैली में नरेंद्र मोदी ने वादा किया कि ‘‘सत्ता में आने के बाद सरकार एक कमेटी बनाएगी जो चुनाव आयोग को मिले हलफनामों के आधार पर सांसदों के आपराधिक रिकार्ड की जांच कर सुप्रीम कोर्ट से मुकदमा चलाने के लिए कहेगी. इन्हें जेल भेजा जाएगा. चाहे इनमें भाजपा या एनडीए के सांसद ही क्यों न हों."

नरेंद्र मोदी जीत गए और राजनीति को अपराध मुक्त करने का वादा हरदोई के मैदान में ही पड़ा रह गया. अलबत्ता थे कुछ जिद्दी लोग जो सियासत और जरायम के गठजोड़ को खत्म करने की मुहिम लेकर सबसे बड़ी अदालत पहुंच गए. सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने पिछले साल सरकार से कहा कि अपराधी प्रत्याशी कैंसर हैं, चुनाव जिताऊ प्रत्याशी के तर्क से लोकतंत्र का गला घोंटना बंद किया जाए. यह संसद की जिम्मेदारी है कि वह कानून बनाकर अपराधियों को हमेशा के लिए चुनावों से दूर करे. इस आदेश के बाद भी प्रधानमंत्री को हरदोई वाला वादा याद नहीं आया!

चुनाव आयोग और सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इतना अमल भी सुनिश्चित नहीं करा सके कि कम से कम अपराधी प्रत्याशियों के बारे में कायदे से प्रचार किया जाए ताकि लोग यह जान सकें कि वे किसे अपना चौकीदार बनाने जा रहे हैं. अब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अवमानना का नोटिस भेजा है.

सनद रहे कि इस लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों में 464 प्रत्याशी ‘अपराधी’ हैं. इनमें 46 चौकीदारों (भाजपा) और 58 न्यायकारों (कांग्रेस) के हलफनामों में जरायम दर्ज है. अन्य प्रमुख दलों के करीब 61 अपराधी प्रत्याशी (एडीआर रिपोर्ट) हमें हमारी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी सिखा रहे हैं.

गलत सोचते थे हम कि जब बहुमत की सरकार होगी, ताकतवर नेता होगा, देश के अधिकांश हिस्से में एक दल का राज होगा तो हमें ऐसे सुधार मिलेंगे जिनकी छाया में हम अपने लोकतंत्र पर गर्व कर सकेंगे. लेकिन अब तो

·       जरा-सी बात पर तुनक कर कार्रवाई करने वाला सुप्रीम कोर्ट, इलेक्टोरल बांड से चंदे का ब्योरा सार्वजनिक करने का आदेश दे सकता था लेकिन उसने सूचनाओं को फाइलों में दबाकर अगली तारीख लगा दी.

·       जजों की नियुक्ति पर सरकार से जूझने वाली सबसे बड़ी अदालत अपराधी नेताओं के लिए कानून बनाने पर सरकार को बाध्य कर सकती थी लेकिन उसने उपदेश देकर बात खत्म कर दी.

·       अपराधी प्रत्याशी के ब्योरे का पर्याप्त प्रचार न होने पर पर्चे खारिज करने का आदेश देने में क्या हर्ज था?

इस बार चुनाव में वोटरों की लाइनें नोटबंदी की कतारों जैसी लग रहीं हैं. मतदाता धूप में तप कर अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर बिछे जा रहे हैं. लेकिन जैसे नोटबंदी के दौरान सियासी दल, कंपनियां और बैंक पिछले दरवाजे से लोगों के विश्वास का सौदा कर रहे थे ठीक उसी तरह संवैधानिक संस्थाएं वह सब धतकरम होने देना चाहती हैं जिनके बाद लोकतंत्र के इस संस्क‍रण पर भरोसा मुश्किल से बचेगा.

दुनिया में कई जगह लोकतंत्र है, लोग वोट भी देते हैं लेकिन वहां पालतू संसद चुनी जाती है, संविधानों को उमेठ दिया जाता है, आजादियों को न्यूनतम रखा जाता है. सत्ता के फायदों को अपने तरीके से बांटा जाता है. हम ऐसा लोकतंत्र हरगिज नहीं चाहते जिसमें वोटर अपनी जिम्मेदारी निभाएं लेकिन वोट लेने वाले पूरी बेशर्मी के साथ कुछ भी करते चले जाएं !

मतदाता और रैली में जुटी किराये की भीड़ में फर्क बनाए रखना होगा. मतदान हमेशा स्वीकार ही नहीं होता, इसे सवाल या इनकार भी बनाया जा सकता है. वोट देना हमारी मजबूती है, मजबूरी नहीं.


Sunday, April 7, 2019

चौकीदारों की चौकीदारी


जनवरी 2018
इलेक्टोरल यानी चुनावी बॉन्ड से राजनैतिक चंदे के लिए साफ सुथरे धन का इस्ते‍माल होगा और पारदर्शिता आएगी.
—
अरुण जेटली, वित्त मंत्री

मार्च 2019
इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनावी चंदे में पारदर्शिता ध्वस्त हो गई है.
—चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा 

एक साल पहले यह बॉन्ड लाते समय वित्त मंत्री ने चुनाव आयोग से पूछा भी था या नहीं अथवा उस समय चुनाव आयोग के मुंह में दही क्यों जम गया था. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट में आयोग के हलफनामे के बाद इस पर शक बिल्कुल खत्म हो जाना चाहिए कि राजनैतिक चंदे भारत का सबसे बड़ा संगठित घोटाला हैं. चौकीदारों की सरकार में यह घोटाला पहले से ज्यादा वीभत्स और बेधड़क हो चला है.

दरअसल पिछले पांच साल में सभी तरह के देशी और विदेशी राजनैतिक चंदे जांच से परे यानी परम पवित्र घोषित कर दिए गए हैं. सिर्फ यही नहीं, सियासी चंदे का यह पूरा खेल लेने और देने के वाले के लिए टैक्स फ्री भी है.

हमारे लिए यह जानना जरूरी है कि यह सब कब और कैसे हुआ?

·       एनडीए की पहली सरकार ने पहली बार राजनैतिक चंदे पर कंपनियों को टैक्स में छूट (खर्च दिखाकर) लेने की इजाजत दी. सियासी दलों के लिए चंदे की रकम पर कोई टैक्स पहले से नहीं लगता. 2017-18 में 92 फीसदी कॉर्पोरेट चंदा भाजपा को मिला. यह लेनदेन टैक्स फ्री है.
·       कांग्रेस की सरकार ने चंदे के लिए इलेक्टोरल ट्रस्ट बनाने की सुविधा दी. देश के सबसे धनी इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 85 फीसदी चंदा भाजपा को दिया.

·       नोटबंदी हुई तो भी राजनैतिक दलों के नकद चंदे (2,000 रु. तक) बहाल रहे.

·       मोदी सरकार ने वित्त विधेयक 2017 में कंपनियों के लिए राजनैतिक चंदे पर लगी अधिकतम सीमा हटा दी. इससे पहले तक कंपनियां अपने तीन साल के शुद्ध लाभ का अधिकतम 7.5 फीसदी हिस्सा ही सियासी चंदे के तौर पर दे सकती थीं. इसके साथ ही कंपनियों को यह बताने की शर्त से भी छूट मिल गई कि उन्होंने किस दल को कितना पैसा दिया है.

·       2016 में सरकार ने विदेशी मुद्रा नियमन कानून (एफसीआरए) उदार करते हुए राजनैतिक दलों को विदेशी चंदे की छूट दे दी. 

·       और वित्त विधेयक 2018 में राजनैतिक दलों के विदेशी चंदों की जांच-पड़ताल से छूट देने का प्रस्ताव संसद ने बगैर बहस के मंजूर कर दिया. जनप्रतिनिधित्व कानून में इस संशोधन के बाद राजनैतिक दलों ने 1976 के बाद जो भी विदेशी चंदा लिया होगा, उसकी कोई जांच नहीं होगी चाहे पैसा कहीं से आया हो. सियासी चंदों के खेल में बहुत भयानक गंदगी है, इसीलिए तो 1976 के बाद से सभी विदेशी चंदे जांच से बाहर कर दिए गए हैं. सनद रहे कि 2014 में दिल्ली हाइकोर्ट ने भाजपा और कांग्रेस, दोनों को विदेशी चंदों के कानून के उल्लंघन का दोषी पाया था. इस बदलाव के बाद दोनों के धतकरम पवित्र हो गए हैं.

·                   अंतत: इलेक्टोरल ब्रॉन्ड, जिन्हें चुनाव आयोग ने पारदर्शिता पर चोट बताया है, इनसे 95 फीसदी चंदा भाजपा को मिला है.

भ्रष्टाचार के वीभत्स स्वरूपों से रू-ब-रू होने के बाद यह उम्मीद करना क्या गलत था कि ईमानदारी का हलफ उठाकर सत्ता में आई सरकार राजनैतिक पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कुछ नए प्रयास करेगी. होना तो दरअसल यह चाहिए था कि
¨    जब सरकार सामान्य लोगों से हर तरह के रिटर्न मांगती है तो राजनैतिक दलों को भी चंदे की एक-एक पाई का हिसाब देश को देना चाहिए. हमें क्यों न पता चले कि कौन, किसको चंदा दे रहा है और सत्ता में आने पर उसे बदले में क्या मिल रहा है.

¨    अब चुनावी हलफनामों के दायरे में पूरा परिवार होना चाहिए. आखिर देश को यह जानकारी क्यों नहीं मिलनी चाहिए कि उनके नुमाइंदों के परिजनों का कारोबार क्या है. उनके परिवार में कौन, कहां और क्या करता है. उन्होंने किन कंपनियों में निवेश कर रखा है.

याद रखना चाहिए कि 2016 में नोटबंदी की लाइनों में खड़ा देश जब अपनी ईमानदारी का ‌इम्तिहान दे रहा था तब सरकार, राजनैतिक दलों को यह छूट दे रही थी कि वह बंद किए गए 500 और 1,000 रुपए के नोट में चंदा लेकर उन्हें अपने खातों में जमा करा सकते हैं.

ईवीएम पर बटन दबाने से पहले एक बार खुद से जरूर पूछिएगा कि क्या हम भारत के सबसे बड़े घोटाले के लिए वोट देते हैं. चंदों की गंदगी में लिथड़े नेता हमारे चौकीदार कैसे हो सकते हैं, उलटे हमें ही इनकी चौकीदारी करनी होगी.