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Wednesday, July 27, 2016

अधूरे सुधारों का अजायबघर



भारत के आर्थिक सुधार अधूरी कोशिशों का  शानदार अजायबघर हैं. 

शुरुआत अच्छी हो तो समझ लीजिए कि आधा रास्ता पार. कहावत ठीक है बशर्ते इसे भारत के आर्थिक सुधारों से न जोड़ा जाए. भारत के आर्थिक सुधार अधूरी कोशिशों का  शानदार अजायबघर हैं. उदारीकरण की रजत जयंती पर बेशक हमें फख्र होना चाहिए कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा मुल्कों में है जिसने ढाई दशक में अभूतपूर्व और अद्भुत उपलब्धियां हासिल की हैं, जो बढ़ी हुई आय, सेवाओं, तकनीकों, उत्पादों, सुविधाओं की शक्ल में हमारे आसपास बिखरी हैं और इन सुधारों की कामयाबी की गारंटी देती हैं. लेकिन इसके बावजूद आर्थिक सुधारों की बड़ी त्रासदी इनका अधूरापन है, जो अगर नहीं होता तो हमारे फायदे शायद कई गुना ज्यादा होते और असंगतियां कई गुना कम.
सबसे नए उदारीकरण से शुरू करते हैं. इसी जून में मोदी सरकार ने महत्वाकांक्षी और दूरगामी उड्डयन (एविएशन) नीति जारी की और इसके ठीक बाद विमानन क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियम भी उदार किए गए. यह दोनों ही फैसले आधुनिकता और साहस के पैमानों पर उत्साहवर्धक थे, क्योंकि नई नीति के तहत सरकार ने भारतीय विमानन कंपनियों के लिए विदेशी उड़ानों के दकियानूसी नियमों को बदल दिया था और दूसरी तरफ विदेशी विमान कंपनियों के लिए बाजार खोलने की हिम्मत दिखाई थी. लेकिन इसके बाद भी यह सुधार अधूरा ही रह गया.
नई उड्डयन नीति का अधूरापन इसलिए और ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में विमानन क्षेत्र का उदारीकरण 1990 में प्रारंभ हुआ. 1994 की ओपन स्काई नीति और विमान सेवा में सरकारी कंपनियों (एयर इंडिया) के एकाधिकार की समाप्ति के बाद तेजी आई लेकिन 26 साल के तजुर्बों के बावजूद नई विमानन नीति में इस क्षेत्र के समग्र उदारीकरण की हिम्मत नजर नहीं आई. कई नीतियों के सफर के बावजूद विमानन क्षेत्र को अभी कुछ और नीतियों का इंतजार करना होगा.
ऊर्जा और बिजली क्षेत्र असंगतियों का शानदार नमूना है. निजी कंपनियों को बिजली उत्पादन की इजाजत 1992 में (इंडिपेंडेंट पॉवर प्रोड्यूसर्स नीति) और उत्पादक इस्तेमाल (कैप्टिव) के लिए कोयला निकालने की छूट 1993 में मिल गई थी. नब्बे के दशक में राज्य बिजली बोर्डों के पुनर्गठन और 2000 के दशक में नए बिजली कानून सहित कई कदमों के बावजूद बिजली सुधार पूरे नहीं हुए. इसी दौरान सरकार ने कोयला क्षेत्र में विदेशी निवेश की गति तेज की और कैप्टिव खदानों का आवंटन-घोटाले-पुनर्आवंटन हुए.
ऊर्जा नीतियों में तमाम फेरबदल के बावजूद बिजली और ऊर्जा सुधार अधूरे उलझे और पेचीदा रहे. सरकार ने उत्पादन का निजीकरण तो किया लेकिन बिजली वितरण अधिकांशतः सरकारी नियंत्रण में रहा. सरकारें बिजली दरें तय करने की राजनीति छोडऩा नहीं चाहती थीं, इसलिए बिजली क्षेत्र में नियामक खुलकर काम नहीं कर सके. दूसरी तरफ बिजली उत्पादन में निजी निवेश के बावजूद सरकार ने कोयला खनन अपने नियंत्रण में रखा. इन अजीब असंगतियों के चलते भारत का ऊर्जा क्षेत्र विवादों, घोटालों और घाटों का पुलिंदा बन गया. 1990 में बिजली बोर्ड घाटे में थे और राज्यों के बिजली वितरण निगम आज भी घाटे में हैं, जिन्हें पिछले 25 साल में तीन पैकेज मिल चुके हैं. तीसरा पैकेज उदय है, जो मोदी सरकार लेकर आई है. बिजली का उत्पादन व आपूर्ति बढ़ी है लेकिन कोयला व बिजली वितरण के क्षेत्र में अधूरे सुधारों के कारण असंगतियां और ज्यादा बढ़ गई हैं.
दूरसंचार सुधारों का किस्सा भी जानना जरूरी है, जो लगभग हर दूसरे साल किसी नीतिगत बदलाव के बावजूद आज तक नतीजे पर नहीं पहुंच सके. 1993 में मोबाइल सेवा की शुरुआत से लेकर, 1995 में कंपनियों को लाइसेंस फीस से माफी, टीआरएआइ का गठन, सीडीएमए सेवा, 2जी लाइसेंस, विदेशी निवेश का उदारीकरण, 3जी सेवा, 2जी घोटाला, नए स्पेक्ट्रम आवंटन और 4जी तक दूरसंचार सुधारों का इतिहास रोमांच से भरा हुआ है.
इस उदारीकरण का मकसद बाजार में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा लाना और उपभोक्ताओं को आधुनिक व सस्ती सेवा देना था लेकिन दूरसंचार सुधारों को सही क्रम नहीं दिया जा सका. सुधारों के अधूरेपन व तदर्थवाद का नतीजा है कि स्पेक्ट्रम घोटालों के बावजूद सरकारें पारदर्शी स्पेक्ट्रम आवंटन नीति नहीं बना सकीं. टीआरएआइ एक सफल व पारदर्शी नियामक बनने में असफल रहा, इसलिए 2जी से 4जी तक आते-आते बाजार में प्रतिस्पर्धा (ऑपरेटरों की संक्चया घटी) सीमित रह गई. सेवा की गुणवत्ता बिगड़ी है और सेवा दरें महंगी हो गई हैं.
खुदरा कारोबार के उदारीकरण को चौथे उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं जिसकी शुरुआत 1997 में कैश ऐंड कैरी में शत प्रतिशत विदेशी निवेश के साथ हुई थी. 2000 के दशक में सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी और मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआइ खोला गया लेकिन सियासी ऊहापोह के कारण सुधार पूरी तरह लागू नहीं हो सके. इस बीच सरकार ने हाल में ही ई-कॉमर्स और फूड रिटेल में शत प्रतिशत विदेशी निवेश खोल दिया. कागजों पर पूरा रिटेल क्षेत्र विदेशी निवेश के लिए खुला है, लेकिन प्रक्रियागत उलझनों व राजनैतिक असमंजस के चलते निवेश नदारद है.
अधूरे, अनगढ़ और असंगत सुधारों के कारण, न चाहते हुए भी भारत में ऐसी अर्थव्यवस्था बन गई है जिसमें खुलेपन के फायदे चुनिंदा हाथों तक सीमित हैं और बाजार का स्वस्थ और समानतावादी विस्तार कहीं पीछे छूट गया. इस खुले बाजार में अवसर बांटने वाली ताकत के तौर पर सरकार आज भी मौजूद है जबकि अवसर लेने की होड़ में लगी कंपनियां कार्टेल, नेताओं से गठजोड़ और भ्रष्टाचार से इस उदारीकरण को आए दिन दागी करती हैं.

ब्रिटिश कवि जॉन कीट्स कहते थे कि अच्छी शुरुआत से आधा काम खत्म नहीं होता. दरअसल जब तक आधा रास्ता न मिल जाए तक अच्छी शुरुआत का दावा ही नहीं करना चाहिए. आर्थिक सुधारों ने भारत को बड़ी नेमतें बख्शी हैं लेकिन सुधारों के तलवे में अधूरेपन का एक बड़ा कांटा चुभा है जो एक स्वस्थ देश को हमेशा लंगड़ा कर चलने पर मजबूर करता है. काश हम यह कांटा निकाल सकते!   

Monday, August 8, 2011

घोटालों की रोशनी


घोटालों के कीचड़ के बीच भी क्या हम उम्मीद के कुछ अंखुए तलाश सकते हैं? भ्रष्टाचार के कलंक की आंधी के बीच भी क्या कुछ बनता हुआ मिल सकता है? यह मुमकिन है। जरा गौर से देखिये घोटालों के धुंध के बीच हमारी संवैधानिक संस्थाओं की ताकत लौट रही है। कानूनों की जंग छूट रही है और आजादी के नए पहरुए नए ढंग से अलख जगा रहे हैं। घोटालों के अंधेरे के किनारों से झांकती यह रोशनी बहुत भली लगती है। यह रोशनी सिर्फ लोकतंत्र का सौभाग्य है।
संविधान की सत्ता
डा. अंबेडकर ने संविधान बनाते समय कैग (नियंत्रक व महालेखा परीक्षक) को देश के वित्तीय अनुशासन की रीढ़ कहा था मगर व्यावहारिक सच यही है कि पिछले छह दशक के इतिहास में, कैग एक उबाऊ, आंकड़ाबाज और हिसाबी किताबी संस्थान के तौर पर दर्ज था। ऑडिट रिपोर्ट बोरिंग औपचारिकता थीं और कैग की लंबी ऑडिट टिप्पणियों पर सरकारी विभाग उबासी लेते थे। कारगिल युद्ध के दौरान ताबूत खरीद, विनिवेश पर समीक्षा के कुछ फुटकर उदाहरण छोड़ दिये जाएं तो देश को यह पता भी नहीं था कि कैग के पास इतने पैने दांत हैं। एक ऑडिट एजेंसी को, मंत्रियों को हटवाते (राजा व देवड़ा), प्रधानमंत्री की कुर्सी हिलाते और मुख्यमंत्रियों (सीडब्लूजी) के लिए सांसत बनते हमने कभी नहीं देखा था। कैग अब भ्रष्टाचारियों को सीबीआई

Monday, February 14, 2011

सबसे बड़ा घाटा

अथार्थ
इस बजट में अगर वित्तस मंत्री दस फीसदी विकास दर का दम भरें तो पलट कर खुद से यह सवाल जरुर पूछियेगा कि आखिर पांच फीसदी (सुधारों से पहले यानी 1989-90) से साढ़े आठ फीसदी तक आने में हम इतने हांफ क्यों गए हैं। ग्रोथ की छोटी सी चढ़ाई चढ़ने में ही गला क्यों सूख गया है, दो दशकों में सिर्फ तीन-चार फीसदी की छलांग इतनी भारी पड़ी कि कदम ही लड़खड़ा गए हैं। अचानक सब कुछ अनियंत्रित व अराजक सा होने लगा है। जमीन से लेकर अंतरिक्ष (एसबैंड) तक घोटालों की पांत खड़ी है। मांग महंगाई में बदलकर मुसीबत बन गई है। नियम, कानूनों और          व्यवस्था की वाट लग गई है। शेयर बाजार अब तेज विकास का आंकड़ा देखकर नाचता नहीं बल्कि कालेधन की चर्चा और महंगाई से डर कर डूब जाता है। यह बदहवासी बदकिस्मंती नहीं बावजह और बाकायदा है। दरअसल विकास की रफ्तार सुधारों पर ही भारी पड़ी है अर्थव्यंवस्था छलांग मारकर आगे निकल गई और सुधार बीच राह में छूट ही नहीं बल्कि बैठ भी गए। आर्थिक सुधारों का खाता जबर्दस्त घाटे ( रिफॉर्म डेफिशिट) में है इसलिए बजट को अब विकास की रफ्तार से पहले इस सबसे बड़े घाटे यानी सुधारों की बैलेंस शीट बात करनी चाहिए। क्यों कि सुधारों का बजट बिगड़ने से उम्मींद टूटती है।
सुधारों का अंधकार
बीस साल की तेज वृद्धि दर अब उन रास्तों पर फंस रही है जहां हमेशा से सुधारों का घना अंधेरा है। भारत अब आपूर्ति के पहलू पर गंभीर समस्याओं में घिरा है यह समस्या रोटी दाल से लेकर उद्योगों के कच्चे माल तक की है। खेती में सुधारों की अनुपस्थिति का अंधेरा सबसे घना है। कृषि उत्पादो की आपूर्ति की कमी ने महंगाई को जिद्दी और अनियंत्रित बना दिया है। अगर बजट सुधारों पर आधारित होगा तो यह पूरी ताकत के साथ खेती में सुधार शुरु करेगा। खेती में अब सिर्फ आवंटन बढ़ाने या

Monday, January 24, 2011

टाइम बम पर बैठे हम

अर्थार्थ
अर्थव्यथवस्था के डब्लूटीसी या ताज (होटल) को ढहाने के लिए किसी अल कायदा या लश्क र-ए-तैयबा की जरुरत नहीं हैं, आर्थिक ध्वंस हमेशा देशी बमों से होता है जिन्हें कुछ ताकतवर, लालची, भ्रष्टं या गलतियों के आदी लोगों एक छोटा का समूह बड़े जतन के साथ बनाता है और पूरे देश को उस बम पर बिठाकर घड़ी चला देता है। बड़ी उम्मीदों के साथ नए दशक में पहुंच रही भारतीय अर्थव्यवस्था भी कुछ बेहद भयानक और विध्वंसक टाइम बमों पर बैठी है। हम अचल संपत्ति यानी जमीन जायदाद के क्षेत्र में घोटालों की बारुदी सुरंगों पर कदम ताल कर रहे हैं। बैंक अपने अंधेरे कोनों में कई अनजाने संकट पाल रहे हैं और एक भीमकाय आबादी वाले देश में स्थांयी खाद्य संकट किसी बड़ी आपदा की शर्तिया गारंटी है। खाद्य आपूर्ति, अचल संपत्ति और बैंकिग अब फटे कि तब वाले स्थिति में है। तरह तरह के शोर में इन बमों की टिक टिक भले ही खो जाए लेकिन ग्रोथ की सोन चिडि़या को सबसे बड़ा खतरा इन्ही धमाकों से है।
जमीन में बारुद
वित्तीय तबाहियों का अंतरराष्ट्रीय इतिहास गवाह है कि अचल संपत्ति में बेसिर पैर के निवेश उद्यमिता और वित्तीय तंत्र की कब्रें बनाते हैं। भारत में येदुरप्पाओं, रामलिंग राजुओं से लेकर सेना सियासत, अभिनेता, अपराधी, व्यायपारी, विदेशी निवेशक तक पूरे समर्पण के साथ अर्थव्ययवस्था में यह बारुदी सुरंगे बिछा रहे हैं। मार्क ट्वेन का मजाक (जमीन खरीदो क्यों कि यह दोबारा नहीं बन सकती) भारत में समृद्ध होने का पहला प्रमाण है। भ्रष्ट राजनेता, रिश्वतखोर अफसर, नौदौलतिये कारोबारी, निर्यातक आयातक और माफिया ने पिछले एक दशक में जायदाद का