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Monday, December 6, 2021

वाह सुधार, आह सुधार


इतिहास स्‍वयं को हजार तरीकों से दोहराता रह सक‍ता है. लेकि‍न संदेश हमेशा बड़े साफ होते हैं. इतने साफ क‍ि हम माया सभ्‍यता की स्‍मृ‍त‍ियों को भारत में कृषि‍ कानूनों की वापसी के साथ महसूस कर सकते हैं. अब तो पुराने नए सबकों का एक पूरा कुनबा तैयार है जो हमें  इस सच से आंख मिलाने की ताकत देता है क‍ि चरम सफलता व लोकप्र‍िता के बाद भी, शासक और सरकारें हकीकत से कटी पाई जा सकती हैं

स्‍पेनी हमलावर नायकों पेड्रो डी अल्‍वराडो और हरमन कोर्टेस को भले ही माया सभ्‍यता को मिटाने का तमगा या तोहमत म‍िला हो लेक‍िन  अल्‍वराडो 16 वीं सदी की शुरुआत में जब यूटेलटान (आज का ग्‍वाटेमाला) पहुंचा तब तक महान माया साम्राज्‍य दरक चुका था. शासकों और जनता के बीच व‍िश्‍वास ढहने  से इस सभ्‍यता की ताकत छीज गई थी.  माया नगर राज्‍यों में सत्‍ता के ज‍िस केंद्रीकरण ने भाषा, ल‍िप‍ि कैलेंडर, भव्‍य नगर व भवन के साथ यह चमत्‍कारिक सभ्‍यता (200 से 900 ईसवी स्‍वर्ण युग) बनाई थी उसी में केंद्रीकरण के चलते शासकों ने आम लोगों खासतौर पर क‍िसानों कामगारों से जुडे एसे फैसले क‍िये जिससे भरोसे का तानाबाना बिखर गया. इसके बाद माया सम्राट केइश को हराने में अल्‍वराडो और हरमन कोर्टेस को ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगा. 

2500 वर्ष में एसा  बार बार होता रहा है क‍ि शासक और सरकारें अपनी पूरी सदाशयता के बावजूद वास्‍तविकतायें समझने में चूक जाती हैं, व्‍यवस्‍था ढह जाती हैं और बने बनाये कानून पलटने पड़ते हैं. एक साल बाद कृषि‍ कानूनों को वापस लेने की चुनावी व्‍याख्‍या तो कामचलाऊ है. इन्‍हें गहराई में जाकर देखने पर सवाल गुर्राता है क‍ि बड़े आर्थि‍क सुधारों से लोग सहमत क्‍यों नहीं हो रहे?

भारत में राजनीतिक खांचे इतने वीभत्‍स हो चुके हैं क‍ि नीत‍ियों की सफलता-व‍िफलता पर न‍िष्‍पक्ष शोध दुर्लभ हैं.  अलबत्‍ता इस  मोहभंग की वजहें तलाशी जा सकती हैं . बीते एक दशक से आईएमएफ यह समझने की कोशिश कर रहा है क‍ि उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं में सुधार पटरी से क्‍यों उतर जाते हैं. 

व‍िश्‍व बैंक और ऑक्‍सफोर्ड यून‍िवर्सिटी का  ताजा अध्‍ययन,  (श्रुति‍ खेमानी 2020 )  भारत में कृषि‍ सुधारों की पालकी लौटने के संदर्भ में बहुत कीमती है. इस अध्‍ययन ने पाया क‍ि दुन‍िया में सुधारों का पूरा फार्मूला केवल तीन उपायों में सि‍मट गया है. एक है न‍िजीकरण, दूसरा और कानूनों का उदारीकरण और  सब्‍सिडी खत्‍म करना. दुनिया के अर्थव‍िद इसे  हर मर्ज की संजीवनी समझ कर चटाते हैं.  मानो सुधारों का मतलब स‍िर्फ इतना ही हो.

राजनीति‍ लोगों की नब्‍ज क्‍यों नहीं समझ पाती ? अर्थव‍िद अपने स‍िद्धांत कोटरों से बाहर क्‍यों नहीं न‍िकल पाते? सुधार उन्‍हीं को क्‍येां डराते हैं जिनको इनका फायदा मिलना चाह‍िए? जवाब के ल‍िए असंगति की  इस गुफा में गहरे पैठना जरुरी है. सुधारों की परिभाषा केवल जिद्दी तौर सीम‍ित ही नहीं हो गई है बल्‍क‍ि इनके केंद्र में आम लोग नजर नहीं आते. भले ही यह फैसले बाद में बडी आबादी को फायदा पहुंचायें   लेक‍िन इनके आयोजन और संवादों के मंच पर में  कं  पनियां‍ और उनके एकाध‍िकार दि‍खते हैं  जैसे क‍ि बैंकों के निजीकरण की चर्चाओं के केंद्र में जमाकर्ता या बैंक उपभोक्‍ता को तलाशना मुश्‍क‍िल है. कृष‍ि सुधारों का  आशय तो किसानों की आय बढाना था लेक‍िन उपायों के पर्चे पर नि‍जीकरण, कारपोरेट वाले चेहरे छपे थे. इसलिए सुधार ज‍िनके ल‍िए बनाये गए थे वही लोग बागी हो गए.

भारत ही नहीं अफ्रीका और एशि‍या के कई देशों में कृषि‍ सुधार सबसे कठ‍िन पाए गए हैं. कृषि‍ दुन‍िया की सबसे पुरानी नि‍जी आर्थ‍िक गति‍वि‍ध‍ि है. सद‍ियों से लोकमानस में यह संप त्‍ति‍ के मूलभूत अध‍िकार और व जीविका के अंति‍म आयोजन के तौर पर उपस्‍थि‍त है. उद्योग, सेवा या तकनीक जैसे किसी दूसरे आर्थ‍िक उत्‍पादन  की तुलना में खेती बेहद व्‍यक्‍त‍िगत, पार‍िवार‍िक और सामुदाय‍िक  आर्थ‍िक उपार्जन है. कृषि‍ सुधारों का सबसे सफल आयोजन चीन में हुआ लेक‍िन वहां भी इसलि‍ए क्‍यों क‍ि देंग श्‍याओ पेंग ने (1981)  कृषि‍ के उत्‍पादन व लाभ पर किसानों का अधिकार सुन‍िश्‍च‍ित कर दि‍या.

 

आर्थ‍िक सुधार  पहले चरण में  बहुत सारी नेमतें बख्शते हैं. जैसे क‍ि 1991 के सुधार से भारत को बहुत कुछ मिला. लेक‍िन प्रत्येक सुधार 1991 वाला नहीं होता.  आर्थि‍क सुधार दूसरे चरण में  कुर्बान‍ियां मांगते हैं.  इसके ल‍िए  सुधारों के विजेताओं और हारने वालों के ईमानदार मूल्‍यांकन चाह‍िए.   अर्थशास्‍त्री मार्केट सक्‍सेस की दुहाई देते हैं मगर मार्केट फेल्‍योर (बाजार की विफलताओं) पर चर्चा नहीं करते. जिसके गहरे तजुर्बे आम लोगों के पास हैं इसलिए सरकारी नीति‍यो के अर्थशास्‍त्र पर आम लोगों का अनुभवजन्‍य अर्थशास्‍त्र भारी पड़ने लगा है.

सुधारों से च‍िढ़ बढ़ रही है  क्‍यों क‍ि सरकारें इन पर बहसस‍िद्ध सहमत‍ि नहीं बनाना चाहतीं.  जीएसटी हो या कृषि‍ बिल सरकार ने उनके सवाल ही नहीं सुने जिनके ल‍िए इनका अवतार हुआ था. सनद रहे क‍ि लोगों को सवाल पूछने की ताकत देने की ज‍िम्‍मेदारी भी सत्‍ता की है. शासन को ही यह तय करना होता है कि ताकत का केंद्रीकरण किस सीमा तक क‍िया जाए और फैसलों में लोगों की भागीदारी क‍िस तरह सुन‍िश्‍चि‍त की जाए.

दूसरे रोमन सम्राट ट‍िबेर‍ियस (42 ईपू से 37 ई) ने फैसले लेने वाली साझा सभा को समाप्‍त  कर दि‍या और ताकत सीनेट को दे दी. इसके बाद ताकत का केंद्रीकरण इस कदर बढ़ा कि आम रोमवासी अपने संपत्‍ति‍ अध‍िकारो को लेकर आशंक‍ित होने लगे. अंतत: गृह युद्धों व बाहरी युद्धों से गुजरता हुआ रोमन साम्राज्‍य करीब 5वीं सदी में ढह गया ठीक उसी तरह जैसा क‍ि माया सभ्‍यता में हुआ था.

बीते ढाई दशक में लोगों में आर्थि‍क सुधारों के फायदों और नुक्सानों की समझ बनी है. मंदी से टूटे  लोग कमाई और जीवन स्तर में ठोस बेहतरी के प्रमाण व उपाय चाहते हैं.  यही वजह है क‍ि विराट प्रचार तंत्र के बावजूद सरकार लोगों को सुधारों के फायदे नहीं समझा पाती.  सुधारों की भाषा उनके ल‍िए ही अबूझ हो गई जिनके ल‍िए उन्‍हें  गढ़ा जा रहा  है . सरकारें और उनके अर्थशास्‍त्री जिन्‍हें सुधार बताते  हैं जनता उन्‍हें अब सत्‍ता का अहंकार समझने लगी है.

कृषि कानूनों की दंभजन्‍य घोषणा पर ज‍ितनी चिंता थी उतनी ही फ‍िक्र  इनकी वापसी पर भी होनी चाह‍िए  जो सरकारों से विश्‍वास टूटने का प्रमाण है. भारत को सुधारों का क्रम व संवाद  ठीक करना होगा ताकि ईमानदार व पारदर्शी बाजार में भरोसा बना रहे. सनद रहे क‍ि गुस्साए लोग सरकार तो बदल सकते हैं, बाजार नहीं. मुक्त बाजार पर वि‍श्वास टूटा तो सब बिखर जाएगा क्योंकि कोई सरकार कितनी भी बड़ी हो, वह बाजार से मिल रहे अवसरों का विकल्प नहीं बन सकती.

 


Friday, December 11, 2020

धुआं-सा यहां से उठता है


एक गांव के लोग भरपूर पैदावार के बाद भी गरीब होते जा रहे थे. मांग थी नहीं, सो कीमत नहीं मिलती थी. नि‍जाम ने कहा बाजार में नए कारोबारी आएंगे. लोग समझ नहीं पाए कि समस्या मांग की कमी है या या व्यापारियों की? भ्रम फैला, सब गड्मड् हो गया. हैरां थे अपने अक्स पे घर के तमाम लोग, शीशा चटख गया तो हुआ एक काम और.

कृषि‍ बिलों की बहस यह है कि किसान बाजार में अपना नुक्सान बढ़ते जाने को लेकर आशंकित हैं. केंद्र सरकार समझा नहीं पा रही है कि निजी कंपनियों के आने या कॉन्ट्रेक्ट खेती से किसानों की आय कैसे बढ़ेगी?

उत्पादन और बाजार से रिश्ता ही असली है, बाकी सब मोह-माया है. इस मामले में भारतीय खेती 2012 से ज्यादा बुरे हाल में है. तब आ रही कंपनियां, कम से कम, सप्लाइ चेन, प्रोसेसिंग, कोल्ड चेन में निवेश कर एक विशाल रिटेल मार्केट बनाकर किसानों के लिए बाजार बनाने का वादा तो कर रहीं थीं लेकिन अब तो जिन ‘बड़ों’ के लिए तंबू ताना जा रहा है, पता नहीं वे आएंगे भी नहीं या नहीं.

समझना जरूरी है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फूड फैक्ट्री (सबसे बड़ा अनाज, फल-सब्जी-मछली उत्पादक, दूध उत्पादक, सबसे बड़ी मवेशी आबादी और 95.2 अरब अंडों का सालाना उत्पादन) गरीबी ही क्यों पैदा करती है.

■ वोट की गरज से सरकारें समर्थन मूल्य के जरिए खूब उगाने का लालच देती है और फिर कुल उपज का केवल 13 फीसद हिस्सा खरीदकर बाजार बिगाड़ देती हैं. बची हुई उपज समर्थन मूल्य से काफी कम कीमत पर बिकती है. 2014 के बाद खेती चिरंतन मंदी में है, आय घट रही है. गांवों में मुसीबत है, यह सरकार भी मानती है.

■ 80 फीसद किसान एक एकड़ से कम जोत वाले हैं, समर्थन मूल्य तो दूर वे क्या खाएं और क्या बेचें, इसी में निबट जाते हैं. गांवों में 60 फीसद आय गैर खेती कामों से आती है.

■ खाद्य बाजार निन्यावे के फेर में है. न निवेश है, न किसानों को सही कीमत और न ही उपभोक्ताओं को अच्छे उत्पाद.

उपज की अंतरराज्यीय बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं है. पहाड़ के फल, केरल का नारियल और उत्तर प्रदेश का आलू पूरे देश में मिलता है. समस्या दरअसल सही कीमत की है, जिसके लिए देश के भीतर प्रसंस्कृत खाद्य की मांग बढ़ानी होगी या फिर निर्यात. दोनों ही मामलों में सरकारों ने बाजार के पैरों पर पूरी कलाकारी से कुल्हाड़ी मारी है. 

1991 के बाद फूड प्रोसेंसि‍ग की संभावनाएं सुनते-सुनते कान पक गए लेकिन भारत में कुल उपज का केवल 10 फीसद (प्रतिस्पर्धा देशों में 40-50) हिस्सा प्रोसेस होता है. इसमें भी अधि‍कांश प्राइमरी प्रोसेसिंग है, जैसे, धान से चावल, आलू, मछली और मीट को ठंडा रखना आदि. कीमत और कमाई बढ़ाने वाली प्रोसेसिंग नगण्य है.

135 करोड़ की आबादी में खाद्य प्रसंस्करण यह हाल इसलिए है क्योंकि एक—टैक्स व लागतों के कारण प्रोसेस्ड फूड महंगा है, और पहुंच से बाहर है. दो—खाने की आदतें फर्क हैं. 

कुल औद्योगिक इकाइयों में 15 फीसद खाद्य उत्पाद (इंडस्ट्री सर्वे 2016-17, सीआइआइ फूड प्रो रिपोर्ट 2019) बनाती हैं और उनमें भी 93 फीसद छोटे उद्योग हैं. 45 में केवल एक मेगा फूड पार्क शुरू हो पाया है. प्रोसेसिंग से कीमत और कमाई बढ़ती है, मांग नहीं हो तो कंपनियां आगे नहीं आतीं.

कमाई बढ़ाने का दूसरा विकल्प विदेश का बाजार यानी निर्यात है. लेकिन उत्पादन का महज 7 फीसद हिस्सा निर्यात होता है, उसमें भी ज्यादातर पड़ोस के बाजारों को. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कृषि‍ अर्थव्यवस्था निर्यात के मामले में 13वें नंबर पर (बेल्जि‍यम से भी पीछे) है. 2009 से 2014 तक करीब 27 फीसद सालाना की दर से बढ़ने के बाद कृषि‍ निर्यात सालाना 12 फीसद की गति से गिर रहा है क्योंकि सरकार को व्यापार उदारीकरण से डर लगता है.

कृषि‍ का विश्व व्यापार तगड़ी सौदेबाजी मांगता है. दुनिया में बेचने के लि‍ए व्यापार समझौते चाहिए. अगर कोई हमारा घी खरीदेगा तो हमें उसका दूध खरीदना होगा.

भारत के पास या तो अमेरिका बनने का विकल्प है, जहां बड़ा घरेलू फूड उत्पाद बाजार है या फिर वियतनाम बनने का, जिसने 1990 के बाद चुनिंदा फसलों में वैल्यू चेन तैयार की. दस साल में 15 मुक्त व्यापार समझौतों किए और जीडीपी में खेती का हिस्सा चार गुना (10 से 36 अरब डॉलर) कर दिया.

अतिरिक्त उपज और मुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दम सुमेरियाई सभ्यता (मेसोपटामिया 7000 ईपू) ने एक विराट खाद्य अर्थव्यवस्था तैयार की थी. महाकाव्य गिल्गामेश बताता है कि महानगर उरुक (मौजूदा बगदाद से 250 किमी दक्षिण) इसका केंद्र था.

भारतीय किसान, अकूत खनिज संपदा पर बसे निपट निर्धन अफ्रीकियों जैसे हो गए हैं, जहां शस्य लक्ष्मी या भरपूर पैदावार गरीबी बढ़ा रही है. बाजार पर उत्पादक का भरोसा उसके श्रम के उचित मूल्य से ही बनता है, इसके बिना हो रहे फैसले सरकार की नीयत पर संदेह बढ़ा रहे हैं. यह सियासत जिस बाजार के नाम पर हो रही है वह तो भारतीय खेती के पास है ही नहीं, नतीजतन किसान, दान के चक्कर में कटोरा गंवाने से डर रहे हैं.